नारी पर रचनाएँ: ज्योत्स्ना प्रदीप

1. सिया बड़ी उदास है (प्रमाणिका छन्द)

सिया बड़ी उदास है।
न आस है न श्वास है॥
अशोक के तले रही।
व्यथा कहाँ कभी कही॥

सभी लगे विशाल थे।
बड़े कई सवाल थे॥
पिया- पिया पुकार के।
सिया थकी न हार के॥

पिया ,पिता न साथ रे।
कहाँ अजेय नाथ रे॥
धरा सुता जया बड़ी।
समेट पीर की घड़ी॥

सहै कहे न वेदना।
हिया जिया न भेदना॥
पिया-पिया सदा जपा।
सुकोमला महातपा॥

रहे सभी डरे-डरे।
सदेह भी मरे-मरे॥
रक्षा करे सम्मान की
बड़ी महान जानकी॥


2. तुमको तन-मन सौंपा

1
तुमको तन-मन सौंपा था
तब गाती, बलखाती थी।
उर-सागर गहरे पानी
पंकज खूब खिलाती थी।

2
छल बनकर तुम ही मेरी
आँखों को छलकाते हो।
हास छीनकर अधरों का
बस आँसू ढुलकाते हो!

3
धरम-करम से उजली थी
अपाला ऋषि कुमारी थी।
देह रोग से त्याग दिया
ये पीड़ा घन भारी थी!

4
मन ना काँपा पल तेरा
आँखें तूने ही फेरीं।
सघन विपिन में छोड़ दिया
दमयन्ती मै थी तेरी।

5
इंद्र छले पल में मुझको
तेरा दिल भी न सीला
कैसा ऋषि स्वामी मेरा?
युगों करा था पथरीला!

6
मै भोली तुझे बुलाया
कुंती का कौतूहल था।
सपन बहाया था जल में
तुझ पर ना कोई हल था?

7
आदर्शों की हवि तुम्हारी
सिया-सपने जले सारे।
सागर ने तज दी सीपी
निर्जन में मोती धारे!

8
पापी लीन रहा देखो
मेरे केशों को खींचा!
माँग भरी मेरी जिसनें
सर उसका क्यों था नीचा?

9
हिय झाँका होता मेरा
इक ऋतु ही उसमें रहती।
बुद्ध पार करे भव सागर
यशोधरा नद सी बहती।

10
ऋषि मुनि राजा रे मन के
धरम-करम तप ध्यान किया।
नारी मन गहरे दुख का
तूने न रे मान किया।

11
योग-भोग, जागे-भागे
बनों कभी तो आभारी!
तेरे कुल के अंकुर की
मूल सभी मैंने धारी l


3. बेटी तो प्यारी है (माहिया)

1
बेटी तो प्यारी है
मेरे घर आई
यह मन आभारी है!
2
अधरों मोहक तानें
कलियों से झरते
मोती के कुछ दानें।
3
सुर-ताल अनोखा है
खुशबू का लोगों!
धीमा-सा झोंका है।
4
हर बात समझती है
वीणा-सी प्यारी
मीठी-सी बजती है।
5
वो जीवन की आशा
पढ़ लेती पल में
सुख-दुख की हरभाषा।
6
मन सुखमय करती है
प्यारा लेप बनी
हर पीड़ा हरती है।
7
फूलों-सी खिल जाती
भाग घने उसके
बेटी जो मिल जाती।
8
घर वह सुखकारी है
बेटी की बोली
बनती किलकारी है।
9
सुख-बेलें बढ़ती हैं
प्यारे पल हैं वे
जो बेटी पढ़ती हैं।
10
खुशबू वह प्यारी है
मन उसके ठहरो
वो खुद ही क्यारी है।
11
साँसों की हरकत है
बुरके के पीछे
वो ही तो बरकत है।
12
बेटी का ध्यान करो
मंत्र नहीं पढ़ना
चाहे न अज़ान करो।
13
मन पूजा की थाली
बेटा चावल-कण
बेटी तो है लाली।
14
मंगल ही करती है
समझो माता तुम
घर वह ही भरती है।
15
नभ पर छा जाती है
चंदा-सी बेटी
पग मान बढ़ाती है।

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