कविता: इसीलिए कविता लिखता हूँ

विजय कनौजिया
मैं तो बस यूँ ही लिखता हूँ
भावों की लड़ियाँ बुनता हूँ
खुद से खुद को पहचानूँ मैं
इसीलिए कविता लिखता हूँ॥

जीवन की हर उलझन को मैं
सुलझाने की कोशिश में
हर पल खुद को समझाता हूँ
इसीलिए बहका रहता हूँ॥

दिया उन्होंने आँसू मुझको
जिनको मैंने चाहा था
यही सोच पीड़ा होती है
इसीलिए रोता रहता हूँ॥

रिश्ते नाते बदल गए वो
जो सबसे उपजाऊ थे
अपनों का खलिहान नहीं अब
इसीलिए तन्हा रहता हूँ॥

जिन्हें किया सर्वस्व समर्पित
वो ही अब कतराते  हैं
अपनों से ये ज़ख्म मिला है
इसीलिए सहता रहता हूँ॥
इसीलिए सहता रहता हूँ॥
***

ग्राम व पत्रालय: काही, जनपद: अम्बेडकर नगर (उत्तर प्रदेश)
चलभाष: +91 981 888 4701; ईमेल: vijayprakash.vidik@gmail.com

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