व्यंग्य: लगे रहो मेरे भाई

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

सुबह से डेटा आ रहा है। थोक में आ रहा है, पर मुफ़्त में आ रहा है और मेरे मोबाइल में भरता जा रहा है। सरकारी ख़जाने में टैक्स भरते जाओ, भरते जाओ, पर उसका पेट नहीं भरता। मेरे मोबाइल फोन का उदर भी डेटा के लिए हमेशा खाली रहता है। यह तो अच्छा है डेटा किलोबाइट में हो या मेगाबाइट में, उसका वज़न मिलीग्राम भी नहीं होता। डेटा अपनी हीरोइनों की तरह स्लिमफिट है। इसलिए हर कोई अपने मोबाइल फोन को हमेशा अपने करीब रखता है। 

मेरे मोबाइल में बहुत सारे ऐप हैं। ऐब नहीं जनाब, ऐप - जैसे वाट्सऐप। वाट्सऐप और अंग्रेज़ी में एक से दस तक के अंक सबको आते हैं। शिशु माँ बोलने के पहले वाट्सऐप और दस तक के अंक समझने लगता है। जो लोग अन्यथा अंगूठा टेक हैं, मोबाइल उनके पास भी है और वे वाट्सऐप और अंग्रेजी के नंबर समझते हैं। साक्षरता का वाट्सऐप ने बेमिसाल प्रचार-प्रसार किया है। बटन दबाओ और साक्षर हो जाओ।

वाट्सऐप से महान ऐप है फेसबुक। यहाँ जितना लादना हो, लाद दो। शालीन भाषा में कहें तो 'पोस्ट' कर दो। मेरे एक मित्र फेसबुक पर हर घंटे पोस्ट करते हैं। जहाँ-कहीं जाते हैं एक पोज़ मारते हैं, और फेसबुक पर शेयर कर देते हैं। आपने भेड़ों के झुण्ड को जाते देखा होगा। भेड़ जिस रास्ते जाती है, लीद करती जाती है, ताकि लोग जान सकें वह किधर-किधर गई। मेरे मित्र भी फेसबुक पर इसी तरह फोटो छोड़ते जाते हैं। फेसबुक ने हर आदमी को बिना किसी टंटे के महान बना दिया है। अब उसकी सचित्र आत्मकथा नेट पर है। बायोपिक नेट पर है, 'फॉलो' करने वाले लोग हैं। महान बनने के लिए डॉ. कलाम अख़बार बेचते थे, मोदी जी चाय बेचते थे, अपुन को तो बस पोज़ मारना है और पोस्ट करना है।  शुक्रिया फेसबुक, सच्चा समाजवाद लाने के लिए। 

पर मुझे यूट्यूब ज़्यादा पसंद है। आपको जो करना सीखना है, सीख लो। जिसको उड़ाना है, उड़ा दो। देश को कैसे झाड़ू लगाना है तो प्रधानमंत्रीजी आपको सिखायेंगे। मेरे मित्र बात कर रहे थे, मेरे मुँह पर फव्वारे जैसी बूंदे आ रही थीं। वे बोलते थे तो थूक उड़ाते थे। मैंने यह तथ्य वीडिओ से जाना, जो रतन ने यूट्यूब पर डाल दिया था। रतन, हमारे स्टॉफ ड्राइवर का नाम है। उसका यह वीडिओ वायरल हो गया। मुख्यमंत्री जी के निजी सचिव का फोन आया। उन्होंने कहा 'मुख्यमंत्रीजी आहत हैं। आप यह वीडिओ तुरंत हटाइए। आपका दोस्त उनकी नकल उतार रहा है।' मैंने रतन को खूब डाँटा। उसने मोबाइल निकला और बोला 'सर जी, पहचानिए खुले में सु-सु कौन कर रहा है।' भगवान कसम, मैं छोटा अफसर हूँ। बॉस के पीछे चलता हूँ। उनका पिछवाड़ा पहचानने से कैसे मना कर सकता हूँ। 

मेरे फोन पर रतन ने स्नैपचैट इंस्टाल कर दिया है। पर मैं इसे खोलने से डरता हूँ। खोलते ही सफ़ेद भूत आता है। रतन पद्मावत फिल्म देख नहीं पाया, पर उसने स्नैपचैट पर अपना फोटो डूडल कर दिया है। शाहिद कपूर की जगह वह राजा रावल रतन सिंह बन गया है। पद्मावती वही है, दीपिका। उसने वहाँ सन्देश लिखा है 'मेरा जन्म सफल हो गया।' यह फोटो वायरल हो गया है। आज उसने ऑफिस से छुट्टी ले ली है। करणी सेना वाले उसे खोज रहे हैं।

ऐप्स तो बहुत सारे हैं, पर टाइम नहीं है। मुझे ट्रंप को भी रिट्वीट करना होता है। ट्रंप नाश्ता करते, खाना खाते और सोते हुए ट्वीट करते हैं। बाकी समय वे प्रेसिडेंट-प्रेसिडेंट खेलते हैं। मैं रिट्वीट इत्मिनान से करता हूँ। टॉयलेट सीट पर बैठ कर मैं पेट को ट्वीट करता हूँ, और ट्रंप को रिट्वीट करता हूँ, सब कुछ सहज निकल जाता है। कुछ अभिनेता, अभिनेत्रियाँ और राजनेता मुझे बिनमाँगे ट्वीट भेजते हैं। अदना-सा लेखक हूँ, सबका मान रखना पड़ता है। 

मेरे अफसर किसानों को भाव नहीं देते,  पर मुझे भाव देने लगे हैं। हुआ यूँ कि पिछले दिनों एक किसान ने आत्महत्या कर ली। वोट खरीदने वाले प्रजातंत्र में इससे क्या फर्क पड़ता है। सरकार के ख़िलाफ़ जन-आंदोलन की ख़बर आई। बड़ी रैली को विफल करने के लिए विभागीय मीटिंग हुई। मैंने शरीफ राय देते हुए कहा 'सर, यहाँ से आधे किलोमीटर दूर रैली-मार्ग पर हॉट-स्पॉट बनवा देते हैं। रैली वहाँ तक आएगी तो ख़बर फैला देंगे। यहाँ वाई-फाई फ्री है, शानदार स्पीड। वही हुआ, रैली वहीं थम गई। सब अपने मोबाइल फोन पर लगे थे। फोटो खींच रहे थे, खिंचा रहे थे। विरोध के नारे फुस्स हो गए और क्रांति के लिए उठने वाले हाथ बटन दबाने लग गए। युवा पीढ़ी को अहिंसक तरीके से बरगलाना कभी इतना आसान नहीं था। 

कल मैंने वाट्सऐप पर पाँच सौ पेज लंबी कविता लिख मारी। लिखा तो एक ही पेज था, पर उसे उत्तम बनाने के लिए वरिष्ठ कवियों से सुझाव माँगे। यहाँ कवियों के कई ग्रुप हैं, सब वरिष्ठ कवि हैं। सब कवि मेरी कविता पर पिल पड़े। कविता, रायता हो गई, फैलती गई। मैंने वाट्सऐप का नोटिफिकेशन बंद कर दिया है। पर संशोधन चल रहे हैं, प्रति-संशोधन आ रहे हैं। वहाँ घमासान मचा है।   

आज बेटे ने पूछा 'पापा, आपके पास कितना बैलेंस है?' मैं सकते में आ गया। बेटा संपत्ति का खुलासा क्यों माँग रहा है। मैंने डरते-डरते पूछा - बेटे तुम्हें कितना चाहिए। उसने कहा - सौ जीबी। जीबी मतलब गीगाबाइट। मेरी साँस में साँस आई। मैंने ऑनलाइन स्टोरेज की लिंक्स भेज दीं और कहा- इनसे दो सौ जीबी जगह मिल जाएगी, ख़ुश। मन में कहा - ये ऑनलाइन स्टोरेज भारतीय खाद्य निगम जैसे तो हैं नहीं कि अनाज बारिश में भीगता सड़ता रहे और जनता अनाज के लिए तरसती रहे। डेटा मुफ़्त, ऑनलाइन स्टोरेज भी मुफ़्त। बस स्टोर करते रहो, डेटा सुरक्षित। 

अभी रतन का फोन आया। बोला 'सर जी, एक लिंक टेक्स्ट की है। फटाफट सीएम ऐप इंस्टाल करिये और अपने आधार से लिंक कर दीजिये। आपको पाँच हज़ार रुपये मिलेंगे, और मुझे एक हज़ार। रुपये आपके बैंक अकाउंट में सीधे ही, तत्काल जमा हो जाएँगे। एक रात में लखपति बन सकते हो सर जी।' मैंने अभी यह ऐप इंस्टाल कर ली है, और अपने सबको सूचना दे रहा हूँ। लगे रहो। 

(चाणक्य वार्ता के मार्च 2018 अंक से साभार)
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