काव्य: एम जोशी हिमानी

एम जोशी हिमानी
बीतते बरस का आख़िरी ख़्वाब

जब भी मिलना मुझसे
जिंदगी की भट्टी में
तप कर मिलना
जला सकूँ जिसमें
अपने ताप सारे
जब भी मिलना मुझसे
किसी पहाड़ी
नदी सा मिलना
बहा सकूँ जिसमें
रंजो गम अपने
जब भी मिलना मुझसे
अमावस की
स्याह रात बनकर मिलना
देख न सको जिससे
मेरे मन का घना अंधेरा
जब भी मिलना मुझसे
गहरा समुंदर बनकर मिलना
डूबा सकूं जिसमें
सभी ख़्वाहिशें अपनी
जब भी मिलना मुझसे
तसव्वुर में ही मिलना
बेदर्द हकीकत
देख न सकूँ मैं
जब भी मिलना मुझसे
वक्त बनकर मिलना
ताकि कभी
मिल ही न सकूँ मैं
जब भी मिलना मुझसे
बीतते बरस का
आखिरी दिन बनकर मिलना
बुन सकूँ ताकि
कोई ख़्वाब नया।
***

नववर्ष

मैं तुम्हारे
सितम का ही नहीं
बेदर्द मौसमों की
बेवफ़ाई का भी
शिकार हूँ
कभी
काँपता- ठिठुरता
कभी
लू के
थपेड़े खाता
कभी
बाढ में बहता
इस धरा का
आम आदमी हूँ
मैं ही
सिंहासन सजाता हूँ
अपने भाग्यविधाता को
मैं ही
उस पर बिठाता हूँ
मैं न कभी नारे लगाता
न धरने पर बैठता हूँ
दुनिया में कब आया
कब गुमनाम सा चला गया
इस सबसे बेखबर हूँ
मेरे लिए न कभी
पुराना साल जाता है
न कभी नया आता है
मैं इन चोंचलों से
अनजान हूँ
मेरे लिए दुनिया का
सबसे कठिन प्रश्न
पापी पेट का है
जिसको आज तक
मेरी कोई पीढ़ी
हल नहीं कर पाई है
जब मैं पा लूंगा
उत्तर इसका
नया वर्ष मैं भी
मना लूंगा
साथ तुम्हारे।
***

ओ पितामह! 

आज हर हाथ में
गुम्मे हैं, पत्थर हैं
ज़ुबाँ पर खंजर हैं
हवा में लाठियाँ तनीं हैं
आसमान में मुक्के
उछाले जा रहे हैं
खौफ़जदा
सूरज दुबका बैठा है
अदृश्य गदायें लहरा रही हैं
फिजा में घुल चुकी है
हिंसा की दुर्गंध
कवियों ने कलम अपनी
म्यानों में रख ली हैं
शर्मीले शायरों नेे किवाड़ अपने
बंद कर लिए हैं
नफ़रत का जो मूसल
घिस-घिस कर
डालने का यतन किया था कभी
हमारे पुरखों ने किसी समंदर में
टुकड़े उसके बटोर लिए हैं
कुछ नरभक्षियों ने
उनकी दाढें बेहद
चमकीली हैं
उनकी हथेलियों में छिपे हैं
नुकीले जहरीले नाखून
ओ पितामह!
उठो जागो
यह सोने का समय नहीं है
 न ही मौन रहने का
 न स्थितिप्रग्य बनने का
 क्योंकि
 केशव भी अब थक चुका है
 हार चुका है
 त्याग दिये हैं उसने
 आयुध अपने
 आंखें मूंदे बैठ गया है वह
 किसी पीपल के तने से टेक लगाये
  ओ पितामह!
  तुम इतिहास को
  फिर न जीवित होने दो
   तुम मौन त्यागो
   तुम अपनी शक्ति को पहचानो
   रोको-रोको
   विध्वंस के
   अंधड़ को रोको
    क्योंकि
   द्वापर लौट रहा है
   नये षड्यंत्रों के साथ
   एक और
 महाभारत रचाने।
***

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