काव्य: प्रेम बजाज

-1-

मेरे दिल में प्यार भरा, पर प्यार मेरा अधिकार नहीं
साथी बना हूँ पतझड़ का, मिलती मुझे बहार नहीं
पीड़ा मेरी साथिन है, साथ सदा निभाती रहती है
मदहोश करने को मुझको, मधुपान कराती रहती है
साथी मेरे सभी विराने, नि:संग हूँ, संगहीन नहीं
आँसुओं का अपार धन, मैं निर्धन हूँ धनहीन नहीं
मेरे अंधेरों पर गीत नहीं, दर्द का भरपूर सागर है
मेरे गीत के बोलों पर, मेरा कोई अधिकार नहीं
मेरे दिल की हर धड़कन पर, यादों का मीठा पहरा है
यादों के सिवा इस जीवन का और कोई आधार नहीं
मेरे दिल में प्यार भरा, पर प्यार मेरा अधिकार नहीं।
***


-2-

हाँ मैंने जीना सीख लिया... मैंने खुद के लिए जीना सीख लिया। मैंने खुद के लिए लड़ना सीख लिया।
 दिया सहारा सबको सदा ही, अब खुद का सहारा बनना सीख लिया, हाँ मैंने जीना सीख लिया। थामा था मेरा हाथ जिसने, मझदार में ला के छोड़ दिया, कभी डोलती, कभी सँभलती, लहरों से लड़ना सीख लिया, हाँ मैंने...
बहुत चढ़ी सूली पे औरों की खातिर, अब अपने लिए औरों को भी सज़ा देना सीख लिया। अब तक तो रहती थी सहमी-सहमी, अब दुर्गा सी हूँकार भरना सीख लिया । हाँ मैंने खुद...
 अब तक अपना हक था खोया, अब खो कर पाना सीख लिया। चलते-चलते पीछे सदा, अब आगे भी चलना सीख लिया। अब तक तो औरों की आँखों से देखी दुनियाँ (जिसने जो दिखाया बस वही देखा) अब अपनी आँखों से देखना सीख लिया। हाँ मैंने खुद...
क्या-क्या खोया अब तक मैंने उसका कोई हिसाब नहीं, अब मैंने भी हिसाब लगाना सीख लिया।...
मैं अदब हूँ... मैं इज़्ज़त हूँ... मैं सँसार की रचयिता हूँ... मैं कुदरत की इक सुन्दर रचना हूँ... यह समझाना सीख लिया, खुद को साबित करना सीख लिया। हाँ मैंने खुद के लिए जीना सीख लिया।
***


-3-

आज किसी ने उस किराएदार की याद दिला दी  जो आया था पल दो पल के लिए मेरे मकान में। कुछ अपना सामान छोड़ गया वो कुछ मेरा साथ ले गया।
आज उस बँद मकान को फिर से खोल दिया किसी ने , समय की पड़ी जो गर्त उस पर कुछ कह रही है  मुझसे ... कहाँ चला गया वो पल में यूँ छोड़ कर  जिस ने इस मकान को घर बनाया था दो पल के लिए ही सही वो एक बार तो आया था।
उस मकान में आज भी तुम्हारी तस्वीर नज़र आती है , कहीं-कहीं  तुम्हारी परछाई सी लगती है, वक्त की आँधी ने फिर उस खाली पड़े मकान की धूल उड़ाई है।
खाली पड़ा था मकान मेरा खाली ही रहने देते  ग़र नहीं था ठहरना तो आए ही क्यूँ, चलो आए तो ठीक बिन किराया दिए ही चले गए, ... ये तो ठीक नहीं ...।
 मेरा कुछ उधार है तुम पर, कभी तो आकर चुका जाना,  एक बार ही सही आ जाना।  तुम्हारा कुछ सामान है मेरे पास, मुझसे तो न दिया जाऐगा ग़र तुम ले जा सको तो ले जाना।
मुझे पता है तुम नहीं आओगे,  कभी नहीं  फिर भी इस दिल ने एक आस लगाई है।
क्यों भूलूँ मैं तुम्हें, ये दिल कोई तुम्हारी जगीर तो नहीं, ये मकाँ  मेरा है सिर्फ मेरा, मैं जिसे चाहूँ इस मकान में  रखूँ या खाली रहने दूँ।  पर क्या करूँ ये मकान किसी और को रास भी नहीं आता, न जाने तुमनें इस मकान पे क्या जादछ टोना किया है।
तुम पल दो पल के लिए आए थे जिस मकान में उसकी छतों से जाले झलकते हैं , दीवारों में सीलन और फर्श पर दरारें आ गई हैं।
शायद तुम्हारे आने से ये मकान एक बार फिर से सँवर जाए, शायद इसमें कुछ निखार आ जाए, शायद ये फिर से घर बन जाए।
इस मकान में ग़र तुम रह जाते तो ये यूँ जर्जर ना होता। एक सुन्दर सा घर होता ... हाँ एक प्यारा सा शायद ताजमहल होता ...

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