श्रमविमर्श 👷 मई दिवस विशेष

कड़ा श्रम हर कमी ढँक लेता है। (Nothing works harder than hard work.)

अनुराग शर्मा
समाज और साहित्य के धरातलों पर विभिन्न प्रकार के विमर्श होते रहे हैं। देश, काल, भाषा, और संस्कृति के अनुसार विमर्श के विषय, और प्रवृत्तियाँ भी बदलती रही हैं। नारी विमर्श से लेकर दलित विमर्श तक अनेक विषयों पर विमर्श के ट्रेंड, विभिन्न प्रकार की प्रवृत्तियाँ आती-जाती रही हैं। लेकिन श्रम विमर्श एक ऐसा विमर्श है जिसे साहित्य में अपना उचित स्थान नहीं मिला। जहाँ कहीं संदर्भ आये वे सामान्यतः निजी राजनैतिक प्रतिबंधनों के प्रचार के माध्यम बनकर रह गये। यद्यपि हिंदी सिनेमा में समय-समय पर उस पर खासा ज़ोर दिखा लेकिन वहाँ भी वह एक श्वेत-श्याम विभाजन से आगे बढ़कर एक गम्भीर विमर्श नहीं बन सका।

वास्तव में संसार को पूञ्जी और श्रम के दो टुकड़ों में बाँटना एक अप्राकृतिक सरलीकरण मात्र है। अधिकांश सरलीकरणों की तरह इस विभाजन की भी अनेक विमायें हैं जिनका विस्तार भोलेपन से लेकर क्रूर कम्युनिस्ट तानाशाही तक पहुँचता है। याद रखिये, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की हत्या करने वाला कोई भी विचार मानवता का हितैषी नहीं हो सकता, इस नाते श्रमिकों का हित भी उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गला घोंटकर नहीं किया जा सकता है। कम्युनिस्ट हो, मज़हबी, या सैनिक - सत्ता यह तय नहीं कर सकती कि मैं क्या शिक्षा लूँ, या कौन सी वृत्ति चुनूँ। निर्दोष परम्पराओं, विवाह और परिवार जैसे संस्कारों के बारे में भी वे मेरे अधिकारों का दमन नहीं कर सकते।

तानाशाही में तो खैर चर्चा की स्वतंत्रता ही नहीं होती, परंतु लोकतंत्र में बाज़ारवाद की शक्ति पर बहुत चर्चा हुई है। वहाँ भी एक संवाद अक्सर छूट जाता है - वह है कम्यून, कम्युनिज़म की नींव का पत्थर। साम्यवाद में परिवार का दमन करने के लिये कम्यून का सिद्धांत दिया गया। सत्य यही है कि जब तक परिवार नामक संस्था जीवित है न बाज़ार की मोहिनी हमें हरा सकती है, और न कम्युनिज़्म के क्रूर कर। मानव सभ्यता के आरम्भिक दिनों से लेकर आज के करोना काल तक, परिवार हमारी शक्ति है। एकल-व्यक्तिवाद की तुलना में परिवार थोड़ा सामञ्जस्य अवश्य मांगता है लेकिन इसका स्वरूप, इसकी परिभाषा बनाये रखने में ही मानवता का हित है। वसुधैव कुटुम्बकम के मूल में भी कौटुम्बिक भावना है। कम्युनिज़्म जिस 'मैं' और 'मेरा' के अस्तित्व को मिटाने को आतुर है, छोटे रूप में परिवार, और विश्वरूप में वसुधैव कुटुम्बकम उस 'मैं' का उदार विस्तार है जिसे बनाये रखना मानवता के लिये आवश्यक है।

एक मई यानी श्रम दिवस पर यदि हम अन्य श्रमिकों के साथ-साथ उन स्वास्थ्य कर्मियों, पुलिस कर्मियों, सैनिकों व अन्य सेवाकर्मियों की भावनाओं, उनके जीवन और जीवन-स्तर का सम्मान करने का प्रण भी ले लें तो श्रम के प्रति हमारा सम्मान और समर्पण और सच्चा होगा।

इस अवसर पर एक श्रमिक वर्ग के बारे में विशेष रूप से सोचने की आवश्यकता है। भारत की सीवर पाइपलाइनों की सफ़ाई करते समय प्रतिवर्ष लगभग 100 श्रमिकों की मृत्यु हो जाती है। तकनीकी प्रगति के वर्तमान युग में ऐसे मार्मिक देहांत पूरी तरह रुकने चाहिये। स्थानीय पंचायत, नगर पालिका/निगम से लेकर राज्य और केंद्र सरकार तक, इस विषय में व्यापक चेतना की आवश्यकता है। सीवर, सैप्टिक टैंक आदि में उपस्थित विषाक्त गैसों के विषय में जन-जागृति के साथ-साथ प्रशासन-जागृति और कड़े कानूनों की आवश्यकता है। आज के समय में ऐसी मृत्यु, बार-बार होना अति-दुखदाई है। बेचारे श्रमिकों को तो उन ज़हरीली गैसों के बारे में कुछ पता भी नहीं। अधिकारियों के साथ-साथ ऐसे कार्यों के ठेकेदारों के लिये भी इस विषय की जानकारी अनिवार्य की जानी चाहिये और ऐसे कामों के लिये मानवरहित उपकरणों के प्रयोग को प्राथमिकता दी जानी चाहिये। अव्वल तो ऐसी स्थिति आये ही नहीं। लेकिन अपवादस्वरूप कहीं ऐसी दुर्घटना हो भी जाये तो न केवल त्वरित सहायता उपलब्ध हो, सभी अपराधियों को कड़ी सज़ाओं का प्रावधान भी हो। ऐसी किसी भी दुर्घटना की स्थिति में ठेकेदारों और सम्बंधित अधिकारियों के खिलाफ़ कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिये। लेकिन उस सबसे पहले, मृतकों के आश्रितों को दीर्घावधि तक समुचित आर्थिक सहायता सुनिश्चित की जानी चाहिये।

तीस रचनाओं के साथ सेतु के नवीन अंक में आपका स्वागत है। स्वस्थ रहें, सचेत रहें, प्रसन्न और प्रफुल्लित रहें।

आपका,







सेतु, पिट्सबर्ग ✍️

2 comments :

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

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  2. श्रम विमर्श के अन्तर्गत सेप्टिक टैंक, सीवर लाइन आदि की दुर्घटना का जिक्र कर, मानव रहित मशीनरी के प्रयोग द्वारा इनकी सफाई का सुझाव आपकी सुलझी हुई सोच और संवेदनशीलता को प्रमाणित करती है।
    एक उत्तम, सामयिक संपादकीय के लिए
    हार्दिक साधुवाद।

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