आचार्य चाणक्‍य एवं जीवन प्रबंधन सूत्र

अंजली खेर

चलभाष: +91 942 581 0540; पता: सी-206, जीवन विहार अन्‍नपूर्णा बिल्डिंग के पास पी एंड टी चौराहा, कोटरा रोड भोपाल- 462 003 मध्य प्रदेश


   अभी हाल कुछ दिन पहले मैने ‘वूमेन स्‍पेशल ट्रेनिंग सेशन’ में भागीदारी दर्ज की। वहाँ महिलाओं के स्‍वास्‍थ्‍य के साथ, घर-परिवार व बच्‍चों के विविध दायित्‍वों के निर्वहन में आने वाली समस्‍याओं के समाधान के लिए मनोवैज्ञानिक सलाहकार का सेशन भी रखा गया था। सेशन के दौरान उन्‍होंने बताया कि आज की रोबोटिक जीवनशैली की भागमभाग, गलाकाट प्रतिस्‍पर्धा व स्‍वार्थसिद्धी के लिए रिश्‍तों को भी दरकिनार करने की मानव की हीन मानसिकता के चलते मानव न केवल शारीरिक वरन् नित नई मानसिक व्‍याधियों के शिकंजे में फंसता जा रहा हैं। आगे उन्होंने बताया कि वर्तमान में उनके पास, दस में से आठ केसेस टीन एज बच्‍चों की समस्‍याओं के समाधान के लिए आ रहे हैं, जिसमें बच्‍चों की उदविग्‍नता, तनाव से उपजी अवसाद की स्थिति, बात-बात पर आक्रामकता का व्‍यवहार एवं कई बार उनकी जीवन के प्रति विरक्‍तता की भावना अभिभावकों के लिए जीवन की सबसे जटिल व अबुझ पहेली बनी हैं।

चिंतनीय विषय है कि आज पग-पग पर हमारा जीवन नित नई-नई चुनौतियों से पटा दिखाई पड्ता हैं। आपसी प्रेम, विश्‍वास, सामंजस्‍य या त्‍याग जैसे शब्‍द अब केवल किस्‍से कहानियों में ही सुनने-पढने को मिलते हैं। पर क्‍या सदियों पहले मानव का जीवन अत्‍यंत सहज एवं उक्‍त समस्‍याओं से परे था? क्‍या ये समस्‍याएँ आज के कलियुग की ही उपज हैं?  क्‍या हमारे पुरातन ग्रंथों की दंतकथाओं में षडयंत्रों की बू नहीं दिख पडती ?
मनन करेंगे तो पाएँगे कि संभवतया ये समस्‍त गुण मानवमात्र के जन्‍मजात गुण हैं।  हालांकि हो सकता है कि समय के साथ हमारी सोच, जीवनशैली व रहन-सहन में आएँ बदलाव के चलते यह गुण कुछ
अलग-अलग रूपों में दिखाई देता हो।

सच इस बात का एक सशक्‍त प्रमाण यह है कि लगभग 2400 वर्ष पूर्व तक्षशिला में चणक के परिवार में जन्‍में एक प्रकांड विद्वान, वितरागी, तपस्‍वी, मर्यादाओं का पालन करनेवाले एवं गंभीर चिंतक के रूप  में विख्‍यात चाणक्‍य ने नीतिशास्‍त्र में ऐसे कई जीवन प्रबंधन सूत्र लिखे जो आज के वैज्ञानिक युग में भी उतने ही अनुकरणीय एवं शिक्षाप्रद हैं, यानि कि जब आचार्य चाणक्‍य ने इस सूत्रों को रचा होगा तो नि संदेह ऐसी स्थितियां उस युग में भी दृष्टिगत हुई होंगी।

आचार्य चाणक्‍य ने ज्‍योतिष ग्रंथ के रूप में ‘विष्‍णुगुप्‍त सिदृांत’, आयुर्वेद के रूप में ‘वैद़य जीवन’ एवं अर्थशास्‍त्र के रूप में ‘नीतिशास्‍त्र’ की रचना की एवं इनके माध्‍यम से समाज में वर्षानुवर्ष बेहतरीन शिक्षा, चेतना एवं आत्‍मबल विकसित करने की दिशा में एक अनुकरणीय पहल करने में समर्थ थे।
भारतीय इतिहास में चाणक्‍य का नाम नंद वंश के विनाश, मगध साम्राज्‍य की स्‍थापना एवं विस्‍तार तथा पाटिली पुत्र चुद्रगुप्‍त मौर्य को सम्राट बनाने में विशेष रुप से उल्लिखित किया गया हैं। उनकी उक्तियों एवं उन्‍होनें जो शिक्षा चंद्रगुप्‍त मौर्य को दी, उसे आत्‍मसात कर हम आज भी अपना जीवन सुखमय बना सकते हैं।

आइयें,  ऐसे ही कुछ विशिष्‍ट बिंदुओं पर चिंतन करें -
1- ज्ञानानुमानैश्‍च परीक्षा कर्तव्‍या – आचार्य चाणक्‍य का मानना था कि व्‍यक्ति की पहचान उसके पहले के कार्यो, ज्ञान और अनुमान के आधार पर की जानी चाहिए।

नंद वंश के राजा द्वारा पिता चणक एवं स्‍वयं चाणक्‍य के किए गए घोर अपमान के बाद आचार्य चाणक्‍य विविध राज्‍यों में जा-जाकर एक ऐसे व्‍यक्ति की खोज करते हैं जिसके रक्‍त के कण-कण में वीरता का गुण व्‍याप्‍त हो, अपमान एवं गलत बात का विरोध करने का अदम्‍य साहस रखता हो, जिसमें नेतृत्‍व एवं निर्णय क्षमता हो।
जब शिकारी द्वारा लगाई शर्त के आधार पर, यदि चील द्वारा गिराएँ शिकार तक चंद्रगुप्‍त, शिकारी के छोडे गए खूंखार कत्‍तों के पहले पहुँच जाएँ, तो शिकारी द्वारा  बंदी बनाये 15 बच्‍चों को दो वक्‍त पेट भर खाना दिया जाएगा, अन्‍यथा सारे बच्‍चों को दिन में केवल आधी रोटी ही दी जाएगी।  चंद्रगुप्‍त जान की बाजी लगाकर शिकारी के पाले हुए कुत्‍तों के पहले ही शिकार तक पहुंच जाता हैं पर जब शिकारी अपने किये वादे से मुकरने लगता हैं, तो चंद्रगुप्‍त अपनी जान की परवाह किए बिना शिकारी से अपने साथी बच्‍चों के हक के लिए लड़ जाता हैं।  जब चाणक्‍य घटनाक्रम को स्‍वयं अपनी आँखों से देखते हैं तो उन्‍हें अहसास होने लगता हैं कि चंद्रगुप्‍त को पाकर उनकी खोज पूर्ण हो गई। तत्‍पश्‍चात आचार्य चाणक्‍य की तीन अन्‍य अलग-अलग कठिन परीक्षाओं में सफल होने वाले चंद्रगुप्‍त को वे उच्‍च शिक्षा हेतु अपने साथ तक्षशिला लेकर जाते हैं।

2- अप्रियेणं कृतं प्रियमपि द्वेष्‍यं भवति – तक्षशिला में शिक्षा के दौरान चंद्रगुप्‍त का सबसे बडा शत्रु गंधर्व कुमार आंबीक अचानक उसके प्रति उदार एवं मित्रतापूर्ण व्‍यवहार करने लगता हैं, तो चाणक्‍य चंद्रगुप्‍त को सतर्क रहने एवं मित्र व शत्रु में भेद करने की सलाह देते हुए कहते हैं कि यदि शत्रु का व्‍यवहार हमारे प्रति अचानक से बदल जाये तो समझ लेना चाहिए कि वह हमदर्द बनने का ढोंग रचकर कोई बडा घात करने की योजना बना रहा है।

3- अरिप्रयत्‍नमभिसमीक्षेत – आचार्य चाणक्‍य ने बताया कि हमें हमेशा अपने विपक्षी अथवा प्रतिदृवंदी के प्रयत्‍नों की समीक्षा करते रहना चाहिए एवं इसी के माध्‍यम से अपनी अग्रिम गतिविधियों को अंजाम देने का निर्णय लेना चाहिये।

नंदवंश के महाराज धनानंद द्वारा चाणक्‍य के घोर अपमान के बाद जब उन्‍होंने नंदवंश के विनाश के बाद ही अपनी शिखा को बांधने की प्रतिज्ञा ली तो धनानंद ने उन्‍हें बंदी बनाकर मृत्‍युदंड दिया, किंतु चंद्रगुप्‍त ने बुद्धिमानी से उन्‍हें मुक्‍त कराया तो वापस तक्षशिला आने के बाद चाणक्‍य ने कयास लगाया कि हालांकि तक्षशिला में धनानंद उनकी हत्‍या कर ब्रम्‍हहत्‍या का पाप तो नहीं लेगा किंतु चंद्रगुप्‍त की हत्‍या के लिए कुछ न कुछ प्रयोजन अवश्‍य करेगा, सो उसकी सुरक्षा के लिए अतिरिक्‍त सावधानी बरतनी होगी।  वैसा ही हुआ, जैसा चाणक्‍य ने सोचा था। धनानंद ने चंद्रगुप्‍त की हत्‍या के लिए अपने किसी करीबी को तक्षशिला भेजा किंतु आचार्य चाणक्‍य की दूरदर्शिता से चंद्रगुप्‍त की जान बच गई।

4- पूर्व निश्चित्‍य पश्‍चात कार्यमारभेत – चाणक्‍य ने कहा था कि कोई भी कार्य करने का निर्णय लेने के पहले उसके मकसद को जानें, उसकी रुप रेखा तैयार करने के पश्‍चात उसके परिणाम के बारे में बारीकी से सोच-विचार करके ही आगे बढें।  बिना सोचे-समझे कार्य करने का अंजाम सकारात्‍मक नहीं होता।

जब चंद्रगुप्‍त की माता मूरा ने उसे चाणक्‍य के साथ तक्षशिला ले जाने की अनुमति दे दी तो कुछ दूर जाने के बाद ही उन्‍हें खबर मिली कि धनानंद ने पाटिली के क्षत्रियों की बस्‍ती को आग लगाकर समाप्‍त कर दिया है तो भावविहृल होकर चंद्रगुप्‍त अपनी बस्‍ती की ओर दौड़ता हुआ वापस आता हैं और अपने गाँव को अग्नि में स्‍वाहा होते देखता है। फिर अपने घर की ओर जाकर पाता हैं कि उसकी माँ वहाँ नहीं हैं। क्रोधावेग में ‘महाराज धनानंद को जान से मार डालूंगा’ कहते-कहते वह महल की ओर दौड़ जाता है तो चाणक्‍य उसे रोककर कहते हैं कि वह अभी इतना सक्षम नहीं हैं कि धनानंद को मार सके। उसके लिए उसे बडा योद्धा बनना होगा, अपनी सेना तैयार करनी होगी तभी धनानंद का सामना कर विजय प्राप्‍त कर सकेगा।  अन्‍यथा अभी तो उसके सैनिक चंद्रगुप्‍त को बंदी बनाकर आजीवन कारावास में डाल देंगे।  तथ्‍य की गहनता को समझकर चंद्रगुप्‍त, धनानंद से बदला लेने की शपथ लेकर चाणक्‍य के साथ तक्षशिला की ओर रवाना हो जाता है।

5- गुण न मत्‍सर कार्य – तक्षशिला के शिक्षा के समय जब गंधर्वकुमार आँबीक, उसके मित्र एवं उनके ही खेमें के गुरु सुखदेव चंद्रगुप्‍त पर प्राणघातक षडयंत्रों की नित्‍य नई योजनाएँ बनाते हैं, ये देखकर चंद्रगुप्‍त कई बार हताश हो जाता हैं, तो चाणक्‍य उससे कहते हैं कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति चाहे चह मित्र हो या शत्रु, अपना हो या पराया, शुभचिंतक हो या ना हो, उससे जो भी सीखते बनता हैं, सीखते चलों।  यदि यह गुण हमने सीख लिया तो प्रत्‍येक परिस्थिति का सामना निर्भीकता से करने में समर्थ होगे और अपने शत्रु द्वारा बुनी हर चाल को विफल बनाने में कामयाब होंगे।

6- प्रियवादिनों न शत्रु –जब कवच प्राप्‍त करने के लिए वीरयात्रा के नेतृत्‍व के लिए चंद्रगुप्‍त का चयन हो जाता हैं तो चाणक्‍य उसके साथ उसके विरोधी आंबीक के मित्रों को साथ ले जाने का निर्णय ले लेते हैं।  चंद्रगुप्‍त जब पूछता हैं कि आप मेरे शत्रु के मित्रों को मेरे साथ क्‍यों भेजना चाहते हैं ?  वे तो मेरी राह में अगिनत समस्‍याएँ खडी करेंगे। तो चाणक्‍य कहते हैं कि व्‍यक्ति अपनी आकर्षक वाक्शैली, अपनवत्‍व या आत्‍मीयता भरे व्‍यवहार से किसी अपरिचित या शत्रु को भी अपना मित्र बना सकता हैं।  सच ही अपने आर्चा की छोटी-छोटी किंतु गहन अर्थ से ओतप्रोत सीखों को आत्‍मसात् करने के कारण चंद्रगुप्‍त के सदव्‍यवहार से उसके साथी जो पहले उसकी जान के दुश्‍मन थे, वीरयात्रा के दौरान उसके शुभचिंतक व सच्‍चे मित्र बन गएँ।

7 – शत्रुछिद्रे प्रहरेत – आचार्य चाणक्‍य का मत था कि हमें अपने प्रतिस्‍पर्धियों की कमजोरियों या दुर्बलताओं का ज्ञान होना चाहिए जिससे सही समय पर उन पर वार करने में सफल हों।  इसीलिए जब चंद्रगुप्‍त अपने समूह के साथ वीरकवच प्राप्‍त करने वीरयात्रा पर गया तो उसके वापस आने तक चाणक्‍य ने रणनीति तय करते हुए नर्तन प्रेमी धनानंद के पास चित्ररुपा को नर्तकी बनाकर मगध भेजा और धनानंद की समस्‍त दुर्बलताओं एवं उसके राज्‍य की गतिविधियों की जानकारियां एकत्र कर समय-समय पर चाणक्‍य को भेजने का काम करने लगी।

8- मित्रसंग्रहेण बलं सम्‍पदृधेत – चाणक्‍य ने च्ंद्रगुप्‍त को सिखाया कि संगठन में ही शक्ति है और जितना हो सके, हमें ऐसा व्‍यवहार करना चाहिए कि हमारे मित्र एवं शुभचिंतकों की संख्‍या में इज़ाफ़ा होता रहे।  कितनी ही परेशानियों और दुश्‍मन हो चले साथी साथी राजकुमारों की चालों का समझदारी से तोड़ निकालते हुए अपनी काबिलियत और आर्चा चाणक्‍य के मार्गदर्शन पर चलते हुए चंद्रगुप्‍त ने बहुत ही कम समय में तक्षशिला के शिक्षा ग्रहण करने वाले विरोधी सार्थियों को भी को अपने खेमे में शामिल कर लिया। सच वर्तमान में ही नहीं, सृष्टि की रचना से ही समय, मानव को अपनी कसौटी में कसता आया हैं। जिसने भी समय की महत्‍ता को जाना, अपनी क्षमताओं का अधिकाधिक दोहन किया, परिस्थिति के अनुरुप स्‍वयं को परिष्‍कृत करने की क्षमता को विकसित किया, अन्‍य लोगों को समझने, सच्‍चे-झूठे में भेद करने की क्षमता का विकास किया, वो बेशक ही अपनी राह की असंख्‍य बाधाओं को पार कर अपना जीवन अपने मूल्‍यों पर जीते आये  हैं। हालांकि हम सभी को इस सभी बोधसूत्रों का संज्ञान अपने- अपने अनुभवों के आधार पर कम या ज्‍यादा हो सकते  हैं, फिर भी आज के परिवेश में कभी व्‍यक्तित्‍व विकास, तो कभी प्रबंधन कला को पल्‍लवित करने के लिए हमारा रुझान विदेशी मोटिवेशनल लेक्‍चर्स सुनने व पर्सनेलिटी डवलपमेंट सेमीनार की ओर बढ्ता ही चला जा रहा हैं, नि: संदेह उक्‍त सभी हमारे पथप्रदर्शक बन हमारी राह को सुगम बनाने में मददगार साबित होते हैं, पर हमें यह जान लेना अत्‍यावश्‍यक हैं कि सदियों पहले भारत की धरा पर जन्‍म लेने वाले नव क्रांति के आगाजकर्ता, अर्थशास्त्री, विज्ञ, गंभीर चिंतक एवं मगध साम्राज्‍य के स्‍थापक आचार्य चाणक्‍य ने अखंड भारत के स्‍वप्‍न को साकार रूप प्रदान करने के लिए प्रत्‍येक भारतवासी को आपस में जुडने, अपनी जन्‍मभूमि के प्रति दायित्‍व निर्वहन हेतु प्रेरित करने के लिए जिन जीवनप्रबंधन सूत्रों की रचना की, वे सदियों बाद आज के वैज्ञानिक परिवेश में भी हमारे अंतस को अदम्‍य आत्‍मविश्‍वास से ओतप्रोत कर जाते हैं, एवं जीवनपथ की दुर्गम राह को भी सुगम बनाने में मददगार साबित होते हैं।

आज मानवीयता का मुखौटा ओढे, एक ही थाली में खाकर छेद करने वालों को पहचानना, कदम-कदम पर प्रतिस्‍पर्धा के विकट दौर में स्‍वयं को अव्‍वल बनाएँ रखने की कवायद करना, प्रतिक्षण स्‍वयं के गुणों को परिष्‍कृत करते रहने का गुण पल्‍लवित करना एक आवश्‍यक कारक बन गया हैं। किंतु विचारणीय तथ्‍य है कि हजारों वर्ष पूर्व भारत की माटी में जन्‍मे सूत ‘आचार्य चाणक्‍य’ ने जीवन प्रबंधन के उक्‍त  महत्‍वपूर्ण सूत्रों को रचकर न केवल जटिल जीवन को सरलतम बनाने की सामर्थ्‍य प्रदान की वरन् सच्‍चे शिक्षक के रुप में हर राह पर सही पथ-प्रदर्शन कर साबित कर दिया कि बेशक सृष्टि की रचना से लेकर वर्तमान तक हमारे समक्ष समस्‍याएँ नए-नए रूपों में हमारे सामर्थ्‍य को परखने आती ही रहती हैं, किंतु हमारे दृढनिश्‍चय व निर्णयन क्षमता के माध्‍यम से हम उन पर आसानी से विजय हासिल कर ही लेते हैं। सच्‍चे मायने में आचार्य चाणक्‍य एक सफल कूटनीतिज्ञ, पथ प्रदर्शक व आदर्श शिक्षक रहे हैं।

8 comments :

  1. It's very interesting and informative article fantastic job....you're doing great work.

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  2. It's very interesting and informative article fantastic job....you're doing great work.

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  3. Bahut hi gyan vardhak aur prerna dayak.

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  4. यशवंत पवारMay 3, 2020 at 4:29 AM

    चांणक्य महान नीतिकारों में एक थे बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक आर्टिकल
    यशवंत पवार

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