डॉ० राजदेव शर्मा की साहित्य-साधना: एक अवलोकन

सुबोध कुमार शांडिल्य

सुबोध कुमार शांडिल्य

मगध के पावन धरती पर प्रादुर्भूत डॉ. राजदेव शर्मा एक लोकख्यात साहित्यकार, ओजस्वी प्रवचनकर्ता अवं महान चिन्तक थे। उनके व्यक्तित्व की निर्मिति साहित्य साधना एवं ठाकुर जी के चरणों में अगाध स्नेह के योग से हुई थी। वे सदा रामायण, गीता, रामचरितमानस, पुराण आदि की दिव्य-साधना में अपने को लगाये रखते थे। यही कारण था कि वे भक्ति साहित्य के कोना-कोना को झाँक आये थे तथा अपनी रचनाओं का आधार भक्ति को ही बनाया था। भक्ति साहित्य के महान ज्ञाता एवं मानस मर्मज्ञ के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। ऐसे विराट व्यक्तित्व के धनी डॉ. शर्मा जी का जन्म 12 फ़रवरी 1935 ई० को बिहार राज्य के औरंगाबाद जिले के गोह थाना अंतर्गत फाग नामक ग्राम में एक गृहस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम रामलगन शर्मा था। उन्होंने दर्शनशास्त्र से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की थी, तत्पश्चात् पीएच. डी. की डिग्री हिंदी साहित्य में अर्जित की थी। वे को-ऑपरेटिव में जी.एम. पद से सेवानिवृत हुए थे। सेवानिवृति के पश्चात् वे स्वयं को साहित्य साधना के क्षेत्र में समर्पित कर चुके थे। उनकी रचना क्षमता अवं विश्लेषण की कला अद्भुत थी। वे भक्ति साहित्य के आधार- स्तम्भ थे। उन्होंने भक्ति साहित्य की रचना कर हिंदी साहित्य को अमूल्य निधि प्रदान की है। वास्तव में वे एक साधक साहित्यकार थे। उनकी रचनाओं में भारतीय भक्तिदर्शन में कृपातत्त्व, तुलसीदर्शन में मानुषतन, नेह-नाते, मंगल कलश, मानस की गीताएँ, मगही कवियों के भक्ति काव्य आदि प्रमुख हैं। आगे हम कुछ पर संक्षिप्त विचार करना चाहेंगे।

डॉ. राजदेव शर्मा द्वारा विरचित मानस की गीताएँ जो दो भागों में प्रकाशित है, हिंदी साहित्य की एक अनुपम कृति है। इस रचना के प्रथम भाग में डॉ. शर्मा ने रामचरितमानस में वर्णित तेरह भगवद्गीताओं पर अनुचिंतन एवं अनुसंधान प्रस्तुत किया है; वही दूसरे भाग में शेष चौदह गीताओं की मीमांसा की गयी है। विदित हो कि मानस में कुल सत्ताइस गीताएँ हैं जिनमें तेरह गीताएँ भगवान् श्रीराम के मुख-कमल से निःसृत हैं तथा शेष चौदह गीताएँ विभिन्न पात्रों के द्वारा कही गयी है। वस्तुतः गीता उस महान ग्रन्थ को कहा जाता है जिसमे आत्मविद्या और ब्रह्मतत्व का उपदेशात्मक गान किया गया हो। मानस की भगवद्गीताओं में आत्मविद्या, ब्रह्मज्ञान, कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, प्रपत्ति, वैराग्य, कर्म सिद्धांत, आचार्याभिमान आदि के सुव्यवस्थित तत्व संग्रथित है। इन गीताओं में वेदों का सार संग्रहित है। इनके अनुशीलन से मानव अभ्युदय और निःश्रेयस की प्राप्ति कर सकता है। धर्म, नीति, मित्रधर्म, राजधर्म, लोकधर्म आदि का मन्त्र इन गीताओं में विद्यमान है। इन गीताओं के अनुशीलन से कथा प्रेमियों एवं गवेषकों को आनंद की प्राप्ति होती है। काव्यशास्त्रियों एवं भक्तिशास्त्रियों को रसास्वादन करने का अवसर सुलभ हो जाता है।

‘भारतीय दर्शन में कृपातत्त्व’ शर्मा जी का एक अन्य प्रमुख रचना है। इस रचना में उन्होंने भगवान् के अनंत सौशील्य गुणों में से एक कृपागुण का विशद् विवेचना की है। मूलतः इस महनीय ग्रन्थ में भक्ति के विकास के साथ भक्ति में कृपातत्त्व की समाविष्टि का विवेचन, भक्तितत्व की सैद्धांतिक विवेचना, कृपातत्त्व की सैद्धांतिक मीमांसा तथा उन सैद्धांतिक पहलुओं का तुलसी वांग्मय में विनियोग की समीक्षा की गयी है।

‘नेह-नाते’ भी शर्मा जी की एक प्रमुख कृति है। इस कृति में उन्होंने बताया है कि मानव का मूल नाता तो भगवान् से है। मनुष्य अंश है और भगवान् अंशी हैं, मनुष्य शेष है और भगवान् शेषी, मनुष्य सेवक है और भगवान् उसका स्वामी। लेखक ने रामानुजाचार्य के द्वारा बताये गए ग्यारह संबंधों का उल्लेख किया है जो निम्न प्रकार है- 1) ब्रह्म-जीव 2) शेषी-शेष 3) अंशी-अंश 4) नियामक-नियाम्य 5) पिता-पुत्र 6) गुरु-शिष्य 7) स्वामी-सेवक 8) पति-कान्ता 9) धर्मी-धर्म 10) शरीरी-शरीर तथा 11) रक्षक-रक्ष्य। गोस्वामी तुलसीदास भी कहते हैं कि जीव और ब्रह्म के अनेक नाते हैं। जो नाता आपके मन में अच्छा लगे, वही सम्बन्ध जोड़ना हितकर है। यथा-
तोहि मोहि नाते अनेक, मानियै जौ भावै।
ज्यों-त्यों तुलसी कृपालु! चरन-सरन पावै।।’ (विनयपत्रिका, पद-79)

इस प्रकार डॉ. शर्मा ने नेह-नाते के माध्यम से भगवान् के प्रति भक्ति का सुगम मार्ग प्रशस्त किया है।

‘मंगल-कलश’ शर्मा जी का एक संस्कारों से युक्त रचना है। मूलतः यह निबंध संग्रह है जिसमे सभी निबंध मांगलिक चेतना से युक्त हैं। इसमें विष्णु शरणागति का स्वरूप, गयागदाधर का तात्त्विक स्वरूप, मोक्षदायक पितृतीर्थ गया, गया में श्राद्ध और गयावाल पण्डे आदि निबंधों को स्थान दिया गया है। सभी निबंध सांस्कृतिक, धार्मिक, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक भावनाओं का प्रतिफलन करते हैं। इसी प्रकार इनके प्रमुख रचनाओं में ‘मगही कवियों के भक्तिकाव्य’ भी काफी महत्वपूर्ण हैं जो डॉ. भरत सिंह के साथ मिलकर लिखी गयी है। इस आलोच्य ग्रन्थ में आधुनिक काल के चौदह मगही कवियों के भक्तिकाव्यों की भक्तिशास्त्रीय समीक्षा की गयी है।

अस्तु कहा जा सकता है कि डॉ. शर्मा सच्चे अर्थों में साहित्य के साधक थे। उन्होंने भक्ति को ही माध्यम बनाकर रचना की है। मूल रूप से स्वयं वे वैरागी सम्प्रदाय में दीक्षित थे लेकिन भक्ति के सभी धाराओं के प्रति वे सकारात्मक दृष्टिकोण रखते थे। उनके दृष्टि में सभी राह भगवान् की ओर ही जाते हैं जैसे वर्षा का पानी अंततः सागर में ही जाता है। वे लेखनी के धनी थे। उनकी लेखनी भाषा और भाव दोनों को व्यंजित करने में पूर्ण सक्षम थी। उनकी भाषा सारगर्भित और उच्च स्तर की थी। वे कुशल प्रवचनकर्ता थे, जिसकी छाप उनकी रचनाओं में भी देखी जा सकती है। वे साहित्यिक उपलब्धि के लिए बिहार राष्ट्रभाषा परिषद पटना द्वारा समानित भी किये गए थे। वे अब इस धराधाम पर नहीं हैं। उनकी मृत्यु 31 अक्टूबर 2019 को हो गयी लेकिन उनका सुयश कृति आज भी उन्हें अमरत्व प्रदान कर रही है।

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