प्रेमचंद की कहानी 'कफ़न' का पुनर्मूल्यांकन

- आदित्य पाठक

स्वर्ण-पदक-प्राप्त, पटना विश्वविद्यालय, जे.आर.एफ.; दूरभाष: +91 735 272 8552


हिंदी आलोचना-जगत् में किसी रचना की आलोचना विचारधारा की कलम से की जा रही है। इसीलिए वर्तमान समय में आलोचना-जगत् में नई क्रांति नहीं हुई है। आलोचक विचार पर विचार करते हैं और रचना-सौंदर्य स्वतः उपेक्षित हो जाता है। कहानी 'कफ़न' के साथ भी यही हुआ है। कहा जा सकता है कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ है।

'कफ़न' कहानी की समीक्षा जितने आलोचकों ने की है, सबने एक ही बात दोहराई है कि घीसू और माधव की स्थिति का गुनाहगार व्यवस्था है। मूल कारण शोषण है। यही है विचार पर विचार करने की परंपरा। इसे तोड़ना अत्यावश्यक है।इसके लिए कहानी की प्रत्येक पंक्ति से होकर गुजरना पड़ेगा।

यह ऐसे बाप-बेटे की कहानी है, जिनका जीवन निठल्लापन और संवेदनहीनता का पर्याय है। पेट भरना ही इनके जीवन का मूल उद्देश्य है। इसके अलावा इनके जीवन में किसी चीज का कोई स्थान नहीं है, न संवेदना का, न कर्तव्य का, न दायित्व का। कामचोर इतने हैं कि दोनों मिलकर एक आदमी का काम ही करते हैं। क़र्ज़ माँगना और पेट भरना, चोरी करना और पेट भरना ही इनके जीवन का मुख्य कार्य है। ऐसे लोग लाज-लज्जा पर विजय प्राप्त कर ही ये सब करते हैं। परिणामतः कोई गाली दे या मार दे, इन्हें कोई ग़म नहीं था। पिता घीसू ने इसी तरह साठ साल का जीवन खेप दिया और बेटा माधव पिता से ज्यादा कामचोर, संवेदनहीन और निर्लज्ज है।

आलोचना इन दोनों के निठल्लेपन पर शुरू होती है और अधिकांश आलोचक इनके निठल्लेपन को जायज़ ठहराते हुए व्यवस्था पर दोष मढ़ते हैं। सबने यही बात अपने अपने ढंग से दोहराई है, जो कि आंशिक सत्य है। प्रस्तुत आलोचना का उद्देश्य है पूर्ण सत्य की ओर ले जाना।

सबसे पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था ही केवल कारण नहीं होती है। व्यक्ति की स्थिति का ज़िम्मेदार व्यवस्था आंशिक रूप से हो सकती है, ज्यादा ज़िम्मेदार तो उसकी प्रवृत्ति ही होती है। व्यवस्था से संघर्ष कर अपनी स्थिति को बेहतर बनाना ही जीवन है। हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना अकर्मण्यता है। हमारे समाज में कई ऐसे व्यक्ति पैदा हुए, जो अत्यंत दीन थे और मूलभूत सुविधाओं से वंचित थे। पर उन्होंने सिर्फ व्यवस्था को दोष देकर स्वयं को उसी अंधेरे में न छोड़ा। उन्होंने उस व्यवस्था से संघर्ष किया, मेहनत की और अपने जीवन को सुंदर बनाया। इसके कई उदाहरण हैं, जिनमें से दो के बारे में कहकर अपनी बात पुष्ट करूंगा।अतीत से एक उदाहरण है भीमराव आम्बेडकर और वर्त्तमान से एक उदाहरण है देश के प्रधानमंत्री मोदी।

आम्बेडकर ने अपनी ग़रीबी को अपनी कमज़ोर नहीं बनाया और संविधान के निर्माता बने। ठीक ऐसे ही वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी भी ऐसे घर पैदा हुए, जहाँ अत्यन्त ग़रीबी थी। उनकी माँ घर-घर जाकर बर्तन धोती थीं। उन्होंने स्वयं चाय बेची। पर, उनके अंदर संघर्ष करने की अदम्य शक्ति थी और वे अपनी स्थिति से ऊपर उठकर पहले मुख्यमंत्री बने और आज देश के प्रधानमंत्री हैं। यह दो उदाहरण पर्याप्त हैं यह दिखलाने के लिए कि व्यवस्था मूल कारण नहीं है। मूल कारण है ख़ुद को संघर्ष के क़ाबिल न बनाना।

 इस कहानी में भी घीसू और माधव ऐसे ही लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये दोनों स्वेच्छाचारी हैं, मनोनुकूल आचरण करते हैं, पाखंड इनका आभूषण है। इसीलिए इनके विचार दो धरातल पर चलते हैं। एक बाहरी- दिखाने के लिए और एक भीतरी - जो मूल प्रवृत्ति है। यह कहानी भी दो धरातल पर चलती हुई दिखलायी पड़ती है।

 कहानी की शुरुआत ही कलात्मकता से भरपूर है। "जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई सारा गाँव अंधकार में लय हो गया था।" यह है दृश्य की 'पृष्ठभूमि'। इस पृष्ठभूमि में द्वार पर बाप-बेटा दोनों अलाव के सामने चुपचाप बैठे हैं। घर की वह बुधिया प्रसव-वेदना से दिल दहला देने वाली आवाज लिए कराह रही है। इस पृष्ठभूमि में बुधिया की आवाज की गूंज आम पाठक भी सुन सकते हैं।

 दिल दहला देने वाले इस दृश्य के बाद वार्ता शुरू होती है और दोनों की मूल प्रवृत्ति का पर्दाफाश धीरे- धीरे होने लगता है। शुरुआत में घीसू संवेदनशील प्रतीत होता है। बुधिया का हालचाल जानने को लेकर दोनों की वार्ता इस तरह शुरू होती है -

घीसू ने कहा, "मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।"

माधव चिढ़कर बोला,"मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूं?"

तब घीसू ने कहा, "तू बड़ा बेदर्द है बे! साल भर जिसके साथ सुख- चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफाई!"

घीसू यहाँ संवेदनशील प्रतीत होता है, किंतु कहानीकार ने इसकी संवेदनशीलता का पाखंड थोड़ी देर में ही में उजागर कर दिया -
"वह औरत प्रसव वेदना से मर रही थी और यह दोनों शायद इसी इंतजार में थे कि वह मर जाय तो आराम से सोयें"

जैसा कि पूर्व में ही हमने कहा था कि कहानी दो धरातल पर चलती है। इसकी शुरुआत इसी वार्ता से होती है। घीसू बाहरी तौर पर मानवीय संवेदना दिखलाता है, पर उसकी संवेदना का मुख्य कारण आलू के बड़े भाग के प्रति लालच है। यहीं से पाखंड शुरू होता है। उनका दोहरा चरित्र दिखने लगता है, जो कहानी के अंत तक चलता है।

कहानी का अगला भाग मूल्यांकन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। कहानीकार ने इस भाग में कई ऐसे वाक्य लिखे, जिन्हें आधार बनाकर अधिकांश आलोचकों ने एक ही राग अलापा है। सबसे पहला वाक्य है-
"जिस समाज में रात दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी।"

आलोचकों ने उपर्युक्त कथन का सहारा लेकर घीसू और माधव दोनों के निठल्लेपन को सही सिद्ध करने का प्रयास किया है। किंतु, वे वाक्य का 'कुछ बहुत अच्छी' को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। बहुत अच्छी न थी, पर अच्छी तो थी। उसी घर की बुधिया इन दोनों का दोजख भरती थी।

साथ ही साथ कहानीकार ने शुरुआत में ही स्पष्ट किया है-
"गाँव में काम की कमी ना थी किसानों का गाँव था मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे।" फिर भी इनके निठल्लेपन को सही करार देना कहानी के साथ अन्याय करना है।

कहानीकार का एक और वाक्य काफी महत्वपूर्ण है-
"हम तो कहेंगे घीसू किसानों से कहीं ज्यादा विचारवान था और किसानों के विचारशून्य समूह शामिल होने के बदले बैठकबाजो की कुत्सित मंडली में जा मिला था।"

किसानों को विचारशून्य कहने का अभिप्राय है कि वे जी-तोड़ मेहनत तो करते थे। पर, उन्हें उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता था। फिर भी उनमें कोई विद्रोह का स्वर नहीं था, वे काम किए जा रहे थे।

विद्रोह को केंद्र में रखकर कहानीकार को उचित मंडली में जा मिलना ज्यादा उचित लगा। किंतु, दुर्भाग्य कि यह दोनों बाप-बेटा उक्त मंडली के लायक भी नहीं थे। इसीलिए कहानीकार ने कहा-
"हाँ, उसमें यह शक्ति न थी कि बैठकबाजों के नियम और नीति का पालन करता।" यहाँ कहानीकार ने यह भी इंगित किया है कि कुत्सित मंडली के लोग ही गाँव के मुखिया बनते हैं। यह आज कुछ ज्यादा ही प्रासंगिक है। बिना कुत्सित मंडली का सदस्य हुए राजनीति में स्थान पाना अत्यंत मुश्किल है, न के बराबर है। इसीलिए अधिकांश नेताओं पर किसी न किसी आपराधिक मामले में संलिप्त होने का आरोप लगा हुआ हैं।

प्रत्येक व्यक्ति ख़ुद को सही सिद्ध करने में लगा रहता है। घीसू और माधव जैसे कामचोर लोग इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। अपने लिए तर्क भी ढूँढ़ लेते हैं। इसी मनोविज्ञान को पकड़कर कहानीकार ने कहा-
"फिर भी उसे यह तसकीन तो थी कि अगर वह फटे हाल है कम- से- कम उसे किसानों की-सी जी- तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती"

 यहाँ यह लग सकता है कि उनकी संवेदनशून्यता का मुख्य कारण भूख है। भूख निर्दयी होती है तो ऐसा संभव है कि उनका आचरण भूख की क्रूरता का परिणाम हो। पर, विचार करने के पहले हमें सामान्य मन:दशा समझनी चाहिए कि जब कोई परिवार का सदस्य मृत्यु के निकट हो और कराह रहा हो तो भूख का भाव स्वतः ही खो जाता है। इसीलिए उनका आलू खाना संवेदनशून्यता ही है। फिर भी, यदि इसका कारण भूख लगे तो आलू जब उन दोनों ने खाया, फिर भी बुधिया के पास जाना ठीक क्यों नहीं समझा? खाने के बाद घीसू को वह भोज याद आने लगा, जिसमें कभी उसने भरपेट भोजन किया था। घर में प्रसव-वेदना से स्त्री का कराहना और इन दोनों का भोज की चर्चा करना कितना अमानवीय और घृणास्पद कृत्य है! इसीलिए भूख इसका कारण नहीं है। उनकी अमानवीयता तब और अति की सीमा लाँघ जाती है, जब दोनों बड़े- बड़े अजगर की भाँति गेंडुलियाँ मार कर सो जाते हैं।

क्या व्यवस्था मनुष्य को इतना क्रूर और अमानवीय बना डालती है? क्या इस दशा का मूल कारण शोषण है? इन सवालों से गुज़र कर ही कहानी के साथ न्याय हम कर सकेंगे।

अगले भाग में बुधिया के मर जाने की घटना है। वह रातभर तड़पकर मर गई, शरीर पर मक्खियाँ भिनभिनाने लगीं, तब जाकर इन दोनों की नींद खुली। मृत्यु की ख़बर पाते ही उनका पाखंड शुरू होता है और वे दोहरे चरित्र के सहारे कहानी के अंत तक बने रहते हैं। वे दोनों हाय-हाय कर रोने लगे और कफ़न के लिए पैसा बटोरने के लिए ज़मींदार के पास गए। जमींदार द्वारा आने का कारण पूछने पर घीसू अपनी धूर्तता का परिचय देते हुए कारण बतलाता है-
"माधव की घरवाली रात को गुज़र गई। रात भर तड़पती रही सरकार !हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दगा दे गई।"

कितना पाखंडपूर्ण वक्तव्य है! अंदर कुछ और बाहर कुछ। ज़मींदार साहब और अन्य लोगों से पैसे बटोरने के बाद वे किस तरह बुद्धिजीवियों जैसा बर्ताव करते हैं, देखने लायक़ है।

वे दोनों कफ़न खरीदने बाजार गए।
घीसू- तो चलो, कोई हलका सा कफ़न ले लें।'
माधव- हाँ,और क्या ! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?"
इन दोनों की चालाकी देखने लायक़ है। रो-रो कर पैसे माँगे कफ़न के लिए और अब कफ़न पर इनके विचार बिल्कुल नए हैं। यह ठगपन नहीं तो और क्या है? यही उनका दोहरा चरित्र है।

इसके बाद एक काफी प्रसिद्ध पंक्ति आती है-
"कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चिथड़ा भी न मिले, मरने पर नया कफ़न चाहिए। "
कहानीकार ने यह बात बिल्कुल सही कहलायी। किंतु, जिस पात्र ने कही, उसके व्यक्तित्व से इसका कोई तालमेल नहीं है। इस पंक्ति में निहित विचार ही नहीं, बल्कि उद्देश्य भी देखना चाहिए, जो आगे स्पष्ट हो जाता है, जब वे घूम-घूमकर कर मधुशाला में पहुँच जाते हैं और इनके दोहरे चरित्र का पर्दाफाश पुनः हो जाता है।

 इसी क्रम में एक वाक्य और आता है-
"और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपये पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।"

जब गाँव में काम की कमी न थी तो मेहनत कर पाँच रुपये कमाए जा सकते थे।कामचोर बिना काम किए ही पारिवारिक खर्च वहन करना चाहते हैं,जो संभव नहीं। इसलिए दवा-दारू के लिए पैसे न जुटा पाना उनकी नाक़ाबिलीयत थी। अभी उनके पास पैसे हैं कफन के लिए तो शराबख़ाने में हैं। शायद दवा- दारू के पैसे मिले भी होते तो उसे भी यह चट कर जाते।

शराब पीने के बाद बाप-बेटे की वार्ता शराबियों जैसी है। नशे में माधव सही सवाल करने लगता है, जो गलत करने वालों के लिए हमेशा तीखे होते हैं।

घीसू - "कफ़न लगाने से क्या मिलता? आखिर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।"

इस पर माधव का उत्तर गौर करने लायक़ है-
"दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बाँभनों को हजारों रुपए क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!"

यह उसी माधव ने कहा, जिसने कहा था - 'कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है '। अतः ऊपर का विचार नशे में का विचार है।

इस तरह आगे भी वह एक सवाल करता है-
"क्यों दादा, हम लोग भी तो एक न एक दिन वहाँ जायेंगे ही?"

माधव परलोक जाने की बात कर रहा था कि वहाँ कैसे मुँह दिखाएँगे? इसका उत्तर घीसू के पास भी न था क्योंकि यह सवाल तीखा था, सत्य था।

इस तरह वह ऐसे कई सवाल करता है। किंतु, यहाँ यह समझ लेना चाहिए कि शराब पीने से भावपक्ष हावी हो जाता है और विवेक पक्ष गौण। अति भावुकता पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। इसीलिए माधव-घीसू की बातें ठीक वैसी ही हैं, जैसे शराबी की होती हैं। आगे शराबी जिस तरह का अभिनय करता है, वैसा ही ये दोनों करते हैं और बीच-बीच में ऐसी महत्वपूर्ण बात कह देते हैं, जिनका उनके जीवन से कोई संबंध नहीं। जैसे-
"वह न बैकुंठ में जायेगी तो क्या यह मोटे-मोटे लोग जायेंगे, जो ग़रीबों को दोनों हाथ से लूटते हैं और अपने पाप को धोने के लिए गंगा नहाते हैं और मन्दिरों में जल चढ़ाते हैं? "

यह बात बिल्कुल सत्य हैं। यदि स्वर्ग है तो ऐसे शोषक कभी स्वर्ग नहीं जा सकते। किंतु, इसका घीसू के जीवन से कोई लेना-देना नहीं।

घीसू-माधव जैसे परजीवी की दयनीय स्थिति की दोषी न तो व्यवस्था है न शोषण। दोषी है तो उनके अंदर संघर्ष-शक्ति की अनुपस्थिति।

2 comments :

  1. अच्छा विश्लेषण किया है।

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    1. सहृदय धन्यवाद।

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