कोरोना और हमारी भविष्यगत संभावनाएँ

रवीन्द्र कुमार

रवीन्द्र कुमार

    
इस बात से कदापि इनकार नहीं किया जा सकता कि कोरोना जैसी महामारी ने पूरी दुनिया को अपनी जकड़ में इस प्रकार लिया है कि संसार के किसी भी कोने से कोई भी आशा की किरण नज़र नहीं आ रही है। पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, विद्वान, शोधार्थी, डॉक्टर इत्यादि सभी इस बात से स्वयं को ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं कि प्रकृति के इस प्रहार के समक्ष उनकी सारी शिक्षा, सभी वैज्ञानिक पद्धत्तियाँ पूर्णतः निष्फल हैं। ऐतिहासिक दृष्टिपात से भी किसी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा हुआ नज़र नहीं आ रहा है। संसार में सदियों से विभिन्न प्र्रकार की महामारियाँ फैलती आ रही हैं। किन्तु उनके द्वारा प्रभावित क्षेत्र के अंतर्गत किसी भी देश का कोई एकाध कोना होता था जिस पर किसी न किसी प्रकार से कुछ समय पश्चात् काबू पा लिया जाता था। किन्तु कोरोना के संबंध में इसके इलाज की बात तो बहुत दूर की बात है बल्कि सच्चाई तो यह है कि हम इसके प्रभाव से प्रभावित क्षेत्रों को भी न तो सही ढंग से संभाल पा रहे हैं और न ही हम अभी तक सभी लोगों को इसकी प्रमाणिक जानकारी एवं बचाव के संबंध से अवगत ही करा पाये हैं।
बड़े-बड़े देश जो कि स्वास्थ्य एवं चिक्तिसा के क्षेत्र में पूरी दुनिया में स्वयं को स्र्वोच्च मानते थे, इस बीमारी के लक्षणों का पूर्ण रूप से अध्ययन भी नहीं कर पाये हैं। किसी न किसी प्रकार से जिन लक्षणों की जानकारी हमें अवगत करवायी गयी है, वह सर्दी, जुकाम जैसी साधारण बीमारियों से संबंधित लक्षणों के समीप है अथवा लगभग वैसे ही हैं जिस कारण लोगों में शुरू से ही एक प्रकार की दुविधा रही है। कि हमें खांसी-जुकाम हुआ है या कोरोना। खैर, निष्कर्ष रूप से केवल इतना ही सत्य है कि यह एक ऐसी बीमारी है जिसने हाल की घड़ी में पूरी दुनिया को रोक दिया है। सारी दुनिया और उनके समाज के लिए यह एक ऐसा मोड़ है जो कदाचित् इस संसार की सभी सभ्यताओं ने इससे पहले कभी भी नहीं देखा होगा। हम आशा भी यही करते हैं कि भावी पीढ़ियों के समक्ष ऐसी परिस्थितियाँ अथवा ऐसा मोड़ कभी न आये। इस संसार में रहते सभी मनुष्यों के लिए एक शिक्षा है। जिसका उन्होंने अंतरात्मा से विश्लेषण तथा चिंतन करना है कि मानव जाति द्वारा दुनिया में ऐसा क्या हुआ होगा, जिसके बदले ऐसे हालात पैदा हुए।
कोरोना से संबंधित यह तो था एक पक्ष। दूसरे पक्ष की बात की जाए तो सामाजिक दृष्टिकोण के अंतर्गत बहुत ही विचारणीय एवं ध्यात्वय बात यह रहेगी कि सभी सरकारों ने इसके बचाव के लिए अपने पूरे देशा को अनिश्चित काल के लिए लॉक-डाउन कर दिया है। किसी को भी घर से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा। यदि यह इसी प्रकार चलता रहा तो मानव जाति की इस संसार में वर्तमान में जीवित रहने की तथा भविष्यगत् संभावनाएँ क्या रहेंगी। चूंकि अभी तक शिक्षा एवं सामाजिक कार्य-क्षेत्र की दृष्टि से तो हम सभी अभी तक इस बात से अवगत थे कि समाज लोगों का वह समूह है जो आपस की जरूरतों को पूरा करता है। दूसरी ओर हम देख रहे हैं कि इस बीमारी से बचने का केवल एक ही मार्ग अभी तक पूरे संसार में परिलक्षित हो रहा है कि, हमें एक दूसरे से मिलना नहीं है। आपसी दूरी को बनाये रखना है। यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के संपर्क में आने से एवं छूने से फैलती है। यदि ऐसा चलता रहा तो समाज की तो परिभाषा ही बदल जायेगी। पदार्थवादी सोच के कारण वैसे तो मानव पहले से ही अकेला रहना पसंद करता है। उपर से इस प्रकार की हिदायतें तो उनमें आपसी मेल-मिलाप की सारी संभावनायें ही खत्म कर देगी। किन्तु विडम्बना है कि ऐसा करने से ही बचाव संभव है। अन्यथा कदाचित् नहीं।
अब बात इस विचारणीय मुद्दे पर आती है कि सभी देश, सभी राष्ट्र, सभी समुदाय, समाज का प्रत्येक वर्ग आपसी सहयोग से, व्यापार से, पर्यटन से, एक दूसरे की आर्थिक एवं वित्तिय जरूरतों को पूरा करके अथवा करवा कर चलता है। इससे उनकी भावी परियोजनाओं का भी भविष्य सुरक्षित रहता है तथा वर्तमान योजनाएँ चलती रहती है। लगभग दो मास से हम देख ही रहे हैं कि पूरी दुनिया के सभी प्रकार के कारोबार, परियोजनाएँ, खेत-खलिहानों में लगभग सभी प्रकार के कार्य-व्यवहार, बाज़ार, दुकानें, कारखाने, मिलें, छोटी बड़ी कम्पनियाँ सब बंद पड़ी हैं। इसकी दूसरी और सभी लोग अपनी दिनचर्या के अनुरूप दो अथवा तीन वक्त की रोटी खा रहे हैं। सरकार घर बैठे लोगों को लगभग सभी ज़रूरत की चीजों का प्रबंध कर रही है। गरीब लोगों को पैसे का भी प्रबंध करके दे रही है। जो लोग कोरोना बीमारी से पीढ़ित हैं, उनका इलाज भी मुफ्त में कर रही है। उनके परिवारों की भी आर्थिक मदद कर रही है। किन्तु सोचने वाली बात यह हैं कि सरकार इस प्रकार के कार्यों में कब तक निरंतरता ला पायेगी? लोगों का बाहर आना-जाना बंद हैं, यात्राएँ बंद हैं, यातायात के सभी साधन ठप्प हैं। तेल की कोई भी खपत नहीं हो रही है जिससे सरकार को कमाई हो। खेती के संबंध में जो भी अन्न भण्डार सरकार के पास मौजूद है वह गरीब लोगों में निरंतर बाँटा जा रहा है। लोग बाज़ार इत्यादि का कोई भी सामान नहीं खरीद पा रहे हैं जिससे दुकानदारों का काम ठप्प है तो इससे भी टैक्स के रूप में मिलना वाला पैसा सरकार के पास नहीं पहुँच रहा है जिसके आधार पर सरकार लोक-कल्याण के कार्यक्रम चला सके अथवा अपने कर्मचारियों को तनख्वाह दे सके। एक देश से दूसरे देशों के आयात-निर्यात के कारण भी आपसी जरूरतों की चीज़ों की कमी धीरे-धीरे खलने लगेगी। सरकार की ऐसी बहुत सी परियोजनाएँ हैं जिनमें सरकार का खरबों रूपया और मानवीय मेहनत का भरपूर इस्तेमाल हुआ है। यदि उसका इस्तेमाल न किया गया अथवा उसे बहुत दिनों तक रोक के रखा गया तो वह सारी पूँजी और हमारी मेहनत बेकार चली जाएगी जिससे भारतीय अर्थ-व्यवस्था पर गहरा आघात लगेगा और उससे हम सभी नकारात्मक रूप से प्रभावित होंगे। कहने का भाव यह कि जितना भी वह वर्तमान स्थिति में कर रही है वह तो उसके वित्तिय एवं अन्न भण्डारण की उपलब्धता के कारण है और उसे यह बहुत लम्बें समय तक नहीं ले जा पायेंगे।
बच्चों के स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्याल इत्यादि के बंद होने से शिक्षा के स्तर में भी अत्यंत तेजी से गिरावट आ रही है। हमारे देश में तो पहले से ही पढ़े लिखे बेरोज़गारों की समस्या का समाधान नहीं निकल रहा; उपर से फैक्ट्ररियों, मिलों, कारखानों इत्यादि के बंद होने से बेरोज़गारी की समस्या बहुत ही तेज़ी से बढ़ रही है। आने वाले दिनों में तो यह विकराल रूप धारण कर लेगी। सारा दिन घर में रहने से, कोई भी कार्य न करने से, बच्चों एवं युवा वर्ग के लोगों के सारा-सारा दिन मोबाइल पर लगे रहने से शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों की संख्या में भी तेजी से बढ़ोतरी होगी। इतने दिनों से मजदूर वर्ग एवं अन्य कर्मचारियों की मानसिक स्थिति भी आरामदेह हो गई है। अब वह उस प्रकार की काम करने की स्थिति में नहीं हैं। क्योंकि आने वाले दिनों में समाज को उसी राह पर लाने के लिए दिन रात श्रम की आवश्यकता होगी जिसके लिए वह कदाचित् मानसिक व शारीरिक रूप से तैयार ही नहीं है। यातायात के साधानों के बंद होने से सरकारों को करोड़ों-खरबों रूपयों का दिन-रात का नुकसान हो रहा है। उसकी भरपाई होना तो कदाचित् संभव ही नहीं है। तेल की कीमतों में इज़ाफा करने अथवा किराया-भाड़ा बढाने से अराजकता की संभावना रहेगी। इस परीक्षा की घड़ी में समाज सेवी संस्थायें सरकार के साथ मिल कर  अपना भरपूर सहयोग दे रही हैं। किन्तु वह भी हम में से ही हैं। वह कब तक हमें घर में बेकार बैठे को, बिना हमारी किसी लाचारी के सहारा देती रहेंगी ?
हमारे बुजुर्ग चाहे भारतीय संस्कृति पर कितना भी मान करते आये हैं समयानुसार कदाचित् वह सही भी हैं। किन्तु आज भारतीय संस्कृति अंदर से इतनी खोखली हो चुकी है कि कभी-कभी हमें स्वयं भी यह सोच कर आश्चर्य होता है कि हमारे अंदर इतना बदलाव कैसे आ गया। पुराने समय में मुसीबत के समय प्रत्येक व्यक्ति अपनी आत्मा से मुसीबत में घिरे व्यक्ति की मदद के लिए तैयार रहता था। हमारे गुरुओं-पीरों ने भी हमें यही शिक्षा दी थी। किन्तु आज कुछेक लोगों अथवा एक पूरे वर्ग की मानसिक स्थिति इस प्रकार की हो चुकी है कि अपने थोड़े से लालच हेतु वह सोचते हैं कि कोई भी मुसीबत की घड़ी आये और हमें चार पैसे बनें।
सभी इस बात से अवगत है कि कोरोना के कारण सभी लोगों पर बहुत बड़ी मुसीबत आ पड़ी है। गरीब वर्ग तो इससे बुरी तरह नकारात्मक रूप से प्रभावित हुआ है। एक तो उनका काम-धंधा बंद है दूसरा उनके पास खाने को कुछ नहीं है तो ऐसे समय में भी खाने पीने की चीजों के साथ-साथ बाज़ार की अन्य चीजे भी मंहगी कर दी गयी हैं। पाँच-पाँच रूपये में मिलने वाला मास्क दुकानों में चालीस-पचास रूपये तक का मिल रहा है। जिन चीजों का पहले सी ही भण्डारण है, मुसीबत के समय उसकी कालाबाज़ारी भारतीय संस्कृति का कभी भी हिस्सा नहीं रही थी। किन्तु भ्रष्टाचार और कालाबाज़ारी हमारी भविष्यगत् संभावनाओं एवं जीने की कला पर कलंक है। अप्रत्यक्ष रूप से अपने ही बनाये कुटिल व धृत नियमों एवं नीतियों के माध्यम से गरीबों से पैसा लूटकर अमीरों का कर्ज माफ करना राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक एवं प्रबंधन की दृष्टि से पूर्णतः गलत है किन्तु यह वर्तमान स्थिति ऐसी ही है जो ग़रीब लोगों के भविष्य पर प्रश्न चिह्न है।
हमें मानवीय जीवन के वर्तमान और भविष्य दोनों के संदर्भ में इस बात को समझना होगा कि भले ही कोविड-19 आज की तारीख में एक वायरस है जो कदाचित् हमारी ही किसी न किसी गलती अथवा गैर ज़रूरी कार्यों की अधिक्ता के कारण है और हमें इससे निपटना भी बहुत जल्दी और ज़रूरी है। क्योंकि पूरी दुनिया में लाॅक-डाउन के कारण आर्थिक गतिविधियाँ ठप पड़ गई हैं और खाने पीने की चीजों का धीरे-धीरे स्टाॅक खत्म होता जा रहा है जिससे मनुष्य और पशु जगत पूर्ण रूप से निर्भर हैं। भविष्य तो तभी होगा जब जीवित रहेंगे।
सारांश में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि यदि समय के साथ मनुष्य ने अपने व्यवहार, अपने नियम, अपनी नीतियाँ, अपने संस्कार एवं संस्कृति में बदलाव नहीं किया तो यह कहने में हमें कोई भी संकोच नहीं होगा और इतिहास भी इस बात का ग्वाह रहा है कि जब-जब मनुष्य ने अपने अस्तित्व से बाहर हो कर कार्य किया है उसे अपना भविष्य संवारने का तो दूर वह वर्तमान भी अच्छे से नहीं जी पाया है। हमें अपनी जीवन शैली में बदलाव लाना होगा। यदि आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो कहा भी जा सकता है कि कदाचित् प्रकृति हमें इशारा कर रही है कि हमें साधारण जीवन जीने की और पहल करनी होगी। बहुत से गैर जरूरी अथवा विकास की झूठी व अंधी दौड़ के पीछे भागने की प्रवृति का त्याग करना होगा। प्रकृति के प्रत्येक अवसर एवं उसके द्वारा प्रदत्त उपहारों का बड़ी ही समझदारी एवं संयम से इस्तेमाल करना होगा। पृथ्वी पर हमें प्रकृति से सामन्जस्य बना कर ही रहना होगा अन्यथा पृथवी पर पता नहीं कितनी ही सभ्यताएँ आयीं और खत्म हो गई उसी प्रकार हमारे जीवन, हमारे भविष्य और हमारी भविष्यगत् संभावनाओं की उम्र भी कोई ज़्यादा लम्बी नहीं लगती।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।