अयोध्या बंदी: बाबा और बंदर

-धर्मेन्द्र कुमार त्रिपाठी

पर्यटन क्षेत्र में शोधरत। सहायक प्रबंधक, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आलेख एवं अन्य साहित्यिक सामग्री प्रकाशित।
पता: गोमती गेस्ट हाउस, तानसेन मार्ग, मंडी हाउस, नई दिल्ली-110001
चलभाष: +91 991 063 1043; ईमेल: dktripathi@mail.jnu.ac.in

अयोध्या में बसे हुए प्रत्येक बाबा और बन्दरों के मन में बस एक ही सवाल है कि यह कौन सा काल आ गया जिसमें हमें कोई पूछने वाला नहीं, लोग इसे लॉकडाउन कह रहे हैं। यह नगरी कभी हमारे लिए ही जानी जाती थी यह मंदिरों की नगरी कहलाती थी क्योंकि यहाँ प्रत्येक घर मंदिरों के आकार के बने होते थे पर आज आधुनिकता ने इसे भी अपनी गोद में समा लिया है। हम दोनों ही पूर्ण रूप से यहाँ आने वाले यात्रियों पर निर्भर हुआ करते थे पर इस काल ने सब कुछ छीन लिया। अयोध्या जब भी जाना गया तो बाबा और बंदरों के लिए लेकिन आज की हालत ने दोनों को धराshaaयी कर दिया है।

बाबा अर्थात अयोध्याजी के साधु संत जो सच्चे मन से सुबह से शाम तक प्रभु की भक्ति में डूबे रहते है और पूरे अयोध्यावासियों को दशकों से सीताराम के मनमोहक भजन में लीन होने पर मजबूर करते रहते हैं। पूरी अयोध्या में आज भी राम नाम कोने-कोने में गूंजता सुनाई पड़ेगा क्योंकि यह बाबा अब भोजन से ज्यादा भजन पर निर्भर है। इस काल में जितने प्रवासी बाबा थे वो अपने-अपने आवास पर वापस लौट चुके हैं लेकिन जिनकी जन्म और मरण यहीं है उनका क्या? वे अपने प्रत्येक दिन को ईश्वर पर समर्पित कर चुके हैं। कुछ रोज पहले मेरे एक मित्र से एक बाबाजी की भेंट हुई उसने बाबाजी से इन्हीं विषयों पर बात की उनकी बातें सुनकर मै स्तब्ध रह गया। बाबाजी ने बताया कि यह काल भुखमरी से भले हमारी जान ले ले पर हम आज भी भजन पर, भक्ति पर निर्भर है। हम एक जून की रोटी में रह लेंगे पर दोनों जून की प्रभु की आरती के बिना नहीं। ऐसे महान लोगों के रहते यह सृष्टि आज भी गौरवान्वित महसूस करती है। वहीं बाबाजी ने यह भी बताया कि लाखों श्रद्धालुओं के बीच उत्सव और उल्लास के साथ मनाए जाने वाला अयोध्या का राम जन्मोत्सव महामारी के कारण पहली बार भय और बंदिशों के बीच सादगी के साथ मनाया गया जिससे हर्षोल्लास की कमी दिखी और हम सब भयभीत दिखे। जो बाबा सरयू के तीर पर बैठकर रोजाना मंत्र जाप से दान प्राप्त करते थे वो अब अपनी कुटिया में बैठकर भजन में लीन हैं पर भोजन कहाँ से मिलेगा इसका पता नहीं। इस दयनीय स्थिति में वो किसी के द्वार भिक्षा के लिए भी नहीं जा सकते। अगर सरकार की बात करें तो इस समय हम सरकार के ऊपर पूर्ण रूप से निर्भर नहीं हो सकते।

बंदर हनुमान जी के दूत के रूप में अयोध्या में आज भी उपस्थित हैं लेकिन इस काल का असर ज्यादा इन्हीं पर पड़ा है। यह वह दूत हैं जो कुछ दशकों पहले अपनी शरारत और छीनाझपटी के लिए प्रसिद्ध थे क्योंकि बचपन में जब हम हनुमानगढ़ी पर प्रसाद के साथ ऊपर की ओर सीढ़ियों द्वारा बढ़ते थे तब शायद ही कोई भाग्यशाली होता था जो ऊपर तक सुरक्षित प्रसाद लेकर पहुंच जाता था ये बन्दर किसी को नहीं छोड़ते थे। प्रसाद को कोई अपनी साड़ी के पल्लू में दबाये तो कोई दुपट्टे में दुबका के इधर-उधर बंदरों से बचते हुए नज़रों को फेरते हुए ऊपर पहुँचता था। वह दृश्य भी देखने योग्य होता था। हनुमान जी के ये दूत लगभग सबके प्रसाद से नीचे ही भोग लगा दिया करते थे। परन्तु समय के साथ सब कुछ बदल गया था। यह बन्दर अब इतने सरल हो गए थे कि अब ये यहां आने वाले श्रद्धालुओं को बिलकुल परेशान नहीं करते। जब तक आप इनको प्रसाद के लिए आमंत्रण नहीं देते थे तब तक ये आपके पास नहीं आते थे। लेकिन कहा जाता है अगर घोड़ा घास से दोस्ती कर लेगा तो खायेगा क्या? हुआ यही आज उन बंदरों की सरलता उनकी भुखमरी का कारण बन गयी। लेकिन इस भूख ने एक बार फिर उनमें हिंसा वापस जगा दी है और इन बंदरों की टीम दुबारा हिंसक हो गयी है और पिछले कुछ ही दिनों में 4 दर्जन से अधिक लोग इनकी चपेट में आ गए। इनकी संख्या अधिक होने के कारण प्रशासन भी परेशान है। इन सब में बंदरों की क्या गलती उन्हें भोजन नहीं मिल रहा इसलिए उग्र होना स्वाभाविक है। वही अयोध्या के सीनियर डाक्टर से बात करने पर यह पता चला कि अगर इन्हें पूर्ण भोजन न मिला तो आने वाले दिनों में यह बन्दर और भी हिंसक हो सकते हैं।

इस समय अयोध्या की गालियाँ सूनी पड़ी हैं इस चिलचिलाती धूप में हर तरफ बस खाकी वर्दी वाले सर पर टोपी या गमछा रखे अपने कर्तव्य के लिए तैनात हैं और अयोध्या की सड़कों पर गाड़ियों की जगह बस एम्बुलेंस ही दिख रहे हैं। इस संकट की घड़ी में इन बंदरों का कौन है? एक दिन मेरी अयोध्या के एक पत्रकार से फ़ोन पर बात हुई और इस मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए विनती की गयी कि शायद उनके लेख पढ़ कर यहाँ की जनता जागरूक होकर इनके लिए आगे आएँ क्योंकि अभी कुछ लोग ही इसके लिए आगे आ रहे हैं और शायद और लोग भी प्रेरित हों। परन्तु पत्रकार का एक लाइन का उत्तर ही मुझे फ़ोन को रख देने के लिए मजबूर कर दिया बाबूसाहब को तो कुछ मसालेदार समाचार की आवश्यकता थी। परन्तु उनकी भी क्या गलती आज कुछ लोगों को छोड़ दिया जाय तो पत्रकारिता जगत को बस मसालेदार समाचार ही चाहिए चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। सुबह से शाम तक न्यूज चैनेलों पर बस एक ही धुन है बस- कोरोना और कोरोना। मानों चैनलों की आपस में प्रतिस्पर्धा लगी हो कि कही कोई कोरोना की संख्या जल्दी और उनसे ज्यादा न बता दे। किसी चैनल पर तो जैसे राज्यों के वोटों की गिनती चल रही हो। आज गुजरात में आंकड़ा पन्द्रह सौ के पार तो दूसरा एंकर- वही महाराष्ट्र ने तोड़ा रिकॉर्ड, आँकड़े में दोगुनी बढ़त के साथ एक दिन में तीन हज़ार। हंस हंसकर ऐसे न्यूज बोल रहे जैसे कोई राजनैतिक पार्टी जीतने के बाद इनके स्टूडियो में मिठाई का डिब्बा भिजवाने वाली हो। इस संवेदना को क्या कहेंगे? इन चैनलों को आगे ले जाने की होड़ में किसी का ध्यान इन जानवरों की ओर नहीं जा रहा कि आज और आने वाले दिनों में इनके खाने का बंदोबस्त कैसे होगा, यह सवाल बहुत बड़ा है। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया भी बस कोरोना के लिए ही काम कर रही है। हर कोई अपने जिले की हालात यूँ बयां करने में लगा है जैसे अब इस धरती पर कोई नहीं बचेगा।

इस समय हमें अपनों के साथ-साथ उनका भी ध्यान रखना है जो पूर्ण रूप से हम पर निर्भर थे। अतः अयोध्यावासियों से यह विनम्र निवेदन है कि आप सब भी सरकार के साथ आगे आएँ और प्रतिदिन सुबह और शाम अपने-अपने घरों के ऊपर कुछ खाद्य और पेय पदार्थ रख दें व आपके संपर्क में जो भी साधु-संत हैं उनको अपने अंश से कुछ दान दे जिससे उनको आने वाले दिनों में कष्ट न सहना पड़े। यह समय सोशल साइट्स पर सकारात्मक सोच फ़ैलाने का है ना कि डराने का। सरकार द्वारा हमें आत्मनिर्भर बनने की सलाह मिल चुकी है कृपया इसे अमल में लाएँ। आगे बढ़ें और लोगों को आगे ले जाएँ।

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