करोना काल की कविताएँ - बबीता काजल

डॉ बबीता काजल
सह आचार्य, हिंदी विभाग
चौ बल्लूराम गोदारा राजकीय कन्या महाविद्यालय,श्री गंगानगर (राजस्थान)
चलभाष: +91 941 361 5637

दो संक्रमित

पापा
मैं नहीं जाऊंगा अस्पताल
साथ आपके
वरना
मुझे चुन लिया जायेगा
जीवित रहने के लिये।
अब
दोनों को
साँस नहीं आ रही थी
मुँह पर बंधा था मास्क
दोनों के।
डाक्टर ने देख कर काले बाल
मास्क की जगह थोप दिया वेन्टीलेटर।
और
सफेद बालों वाले को
कुछ ही देर में
ओढ़ा दिया झक सफेद कफन।


ईश्वर भी?

मन्दिर मस्जिद बन्द हुए
इंसानों से ईश्वर में फैल रहा वायरस
अनश्वर ने नाश के भय से
खुद को किया क्वारनटीन?
या
निराकार ने धर लिये
आकार कई...
बन्द भवनों से निकल कर
बसने लगा
हृदय की गहराइयों में ..
खुली प्रकृति की अङ्गड़ाइयों में ...
धुले धुले हिमालय की सफेद दाढ़ी में ...
मुक्त गगन में नि:संकोच  पंख फहराते परिंदों  में ...
और
काँच से स्वच्छ गंगा जल में
छलांग भरती डाल्फिन में...
उस रक्त में
जो बिना धर्म बताये दिया जा रहा है।
जात पूछे बिना लिया जा रहा है।
ईश्वर का फैलाव नहीं रहा मन्दिर तक
अल्लाह को कम पड़ गई मस्जिद भी

अब वो बसने लगा है वहाँ जहाँ बसना था उसे।
मानव निर्मित जड़ चारदीवारी के बाहर
तालेबन्दी का नहीं
मुक्ति के भी प्रतीक।

आमीन

विवाह
दो आत्माओं के मिलन का
भव्य समारोह।
हजारों, लाखों, करोड़ों की
बिंदास बरबादी।
खाने के जंगल में गुम
दिप-दिप करती साड़ियाँ।
जूस के ठसाठस भरे गिलासों
में डूबती रौब से झूलती टाइयाँ।
जगमग की होड़ में,
इस्तरी की हुई शेरवानियाँ।
जूठन के अम्बार से भरे क्रेट।
लिफाफे के बदले में
व्यंजनों पर चिपकी गिद्ध दृष्टियाँ।
हजारों रुपये के ऐवज
पार्लर में रगड़ खाता सौंदर्य,
छत्ते की तरह तान दी गई
केशराशि।
अपने ही बिम्ब पर मुग्ध
सुन्दरियों की मण्डली।
एक गोलगप्पे और पंजाबी कुल्फ़ी को तरसती
जूठे बरतन उठाने का ढोंग करती
वर्दी में सजी
वेटरों की पलटन।
लुप्त हैं अब ये सारे दृश्य।
गैरज़रूरी रिश्तों व खर्चों के बिना
पूरा हो रहा मिलन (दो आत्माओं का )
कोर्ट मैरिज़ सा मितव्ययी
बनाया महामारी ने।
असम्भव को सम्भव बनाया बीमारी ने।
गृहस्थ धर्म में प्रवेश का जश्न
जलसा होने से बच गया तालाबंदी में।
पुराने नासूरों से मुक्ति
की आस जगाई ताले ने।
बंधन में ही निकलती है राह मुक्ति की।
स्वाह होने से बचा ली गई मोटी रकम।
समय की आवश्यकता
निषेध समारोह का।
परिवर्तन की  प्रक्रिया से
बच गई वो लक्ष्मी
बचा भी सकती है
वेन्टीलेटर पर पड़ी
मेरे देश की अर्थव्यवस्था को।
आमीन।

4 comments :

  1. बहुत ही उम्दा।

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  2. कविताएं बहुत मार्मिक है । शुभाशीष ।

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  3. जी धन्यवाद 🙏🏻

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