कविताएँ: रेनू यादव

डॉ. रेनू यादव
फेकल्टी असोसिएट
भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग
गौतम बुद्ध युनिवर्सिटी,
यमुना एक्सप्रेस-वे, गौतम बुद्ध नगर,
ग्रेटर नोएडा – 201 312 (उ.प्र.)
ई-मेल: renuyadav0584@gmail.com
तड़फड़ाते हृदय के पाँवों में फफोले
(दिनांक: 17.05.2020, प्रवासी मजदूरों को देखकर)

तड़फड़ाते हृदय के
पाँवों में फफोलों से
थरथराते आसमाँ तले
हाँफती धरती का दर्द
चुन रहा, पिस रहा
चला जा रहा वह कौन है?

आँखों में समन्दर
ताप सर पर उठाए
तूफान से टकरा रहा,
उस रिक्त-हस्त बेबसी का
उपहास उड़ाता
मुस्कराता वह कौन है?

सौदा मुफ़्त का था
मिल रहा कर्ज
अंतड़ियाँ पेट से निकाल
हाथ पर थमा
दोस्ती का हाथ बढ़ाता
वह कौन है?

थामती प्रकृति हाथ
पगडंडियों से खींचकर
मौत के आगोश में
सुला देतीं भींचकर
पहचान छीन होठों को सिल
दृश्य को अदृश्य
बनाता वह कौन है?

गरीबी का स्वाँग रच
गरीबों को बना बेदम
छल से भीम को तोड़ने की
साजिश रच रहा
वह कौन है?       


******

रास्ते पर प्रसव
(दिनांक 19.05.2020, प्रवासी मजदूरिनों की दुर्दशा से व्यथित होकर, जो रास्ते में प्रसव के लिए विवश हैं)


1.
तड़कती धूप की चादर तले
बदकती धरती पर
अनहद नाद
पसर गया

भीड़ देखती रह गई!

2.
खून से लथपथ
रास्ता
चीख-चीख कर
बुलाता रहा

नज़रें झुका
लोग गुजरते रहे!

3.
हताश
माँ को देख
अँधियारी गुफा
को चीर कर
निकल आया

माँ
मंजिल तक
पहुँचने से पहले
सुला नहीं सकती
उसे उसी गुफा में

4.
माँ
लिपट गई कँटीली
धरती से…
धरती नहीं फटी!

फट गई फव्वारे-सी
रक्तिम-आँखें
भर लिया
संतान को
अपनी बाँहों में

5.
मृत्यु की पगडंडी
पर 
एक माँ
डॉक्टर की सारी सीख
झुठलाते हुए
सूखी अंतड़ियों
की कराह में
गर्भ थाम
चीख पड़ी


6.
आकाश की सारी
लालिमा
पसर आयी जमीं पर

एक माँ
लालिमा को अपने ही
हाथों से पोंछ
अपने लाल को उठा
पुनः चल पड़ी
मीलों दूर


7.
रात की काली
अंधियारे में
अंधियारे को
जन्म देती
एक माँ

विवश है
अंधियारे को
रास्ते में छोड़
फटे-बिखरे दिल
को
हाथों में थाम
घर
जाने की खातिर


8.
माँ
सारी सार्थकता और
निर्रथकता
को एक तरफ रख

दीनता की कूची से
लीप रही
पगडंडियों को
एक नए
सृजन के साथ...


9.
धरती की छाती पर
पंजों के निशान छोड़ती
एक माँ
सत्ता को ललकारती
नकारती
सृष्टि को...


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