पुरानी कथा-रूढ़ियों का अतिक्रमण करती कहानी ‘परिंदे’ का पुनर्मूल्यांकन

डॉ. सितारे हिन्द

- सितारे हिन्द

सहायक प्रोफ़ेसर (अतिथि), हिन्दी विभाग, तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर, तमिलनाडु
चलभाष: +91 897 823 8235; ईमेल: sitareeflu@gmail.com


हिन्दी कथा-साहित्य की दुनिया में; निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ को काफी प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त है। गहराई से विचार करने पर यह कहानी न तो चरित्र प्रधान दिखाई देती है और न ही विचार प्रधान, इसके बाद भी यह कहानी पाठकों पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ती है। एक प्रकार का नयापन लिए हुए यह कहानी अपने भावबोध के स्तर पर बेजोड़ है । यह न सिर्फ ‘परिंदे’ कहानी की खास बात है, बल्कि एक कथाकार के रूप में यह निर्मल वर्मा की भी विशेषता है कि उनकी कहानियाँ पाठक को एक ऐसे यथार्थ का दर्शन करवाती है, जो अब तक ‘सूक्ष्म’ माना गया था और वहाँ तक कहानियों की पहुँच नहीं थी। ये मानव-मन के अंदर का यथार्थ था।  डॉ. नामवर सिंह लिखते हैं कि “अभी तक जो कहानी सिर्फ कथा कहती थी या कोई चरित्र पेश करती थी अथवा एक विचार को झटका देती थी, वही निर्मल के हाथों जीवन के प्रति एक नया भावबोध जगाती है; साथ ही ऐसे दुर्लभ अनुभूति चित्र प्रदान करती है जिन्हें हम कम-से-कम हिन्दी में कहानी के माध्यम से प्राप्त करने के अभ्यस्त नहीं थे।”1  ऐसा जान पड़ता है कि इसी कारण नामवर जी, ‘परिंदे’ को नई कहानी आंदोलन की पहली रचना मानते हैं। दरअसल पहले की कहानियाँ या तो आदर्शवाद को स्थापित करती थीं या फिर उपदेशात्मक होती थीं, लेकिन इस नए ढंग की कहानियों में लेखक की परिवेशगत प्रतिबद्धता और अनुभूति की सघनता साफ तौर पर देखी जा सकती है। नई कहानी आंदोलन के लेखकों ने खुद के यथार्थ को सामने लाया । ये यथार्थ के भोक्ता हैं । इनके द्वारा सृजित कहानियाँ अपनी भाषा और संवेदना दोनों में अपनी पूर्व की कहानियों से अलग हैं। आधुनिकता-बोध की दृष्टि से हो या संवेदना की दृष्टि से या फिर भाषा की ही दृष्टि से, ‘परिंदे’ नई कहानी आंदोलन की प्रतिनिधि कहानी मानी जा सकती है। इसमें सांकेतिकता, प्रतीकात्मकता और बिम्बात्मकता का प्राधान्य है। पहले ये कविता की चीज हुआ करती थी, लेकिन कहानी में इसका प्रयोग कर लेखक ने मन के अंदर के यथार्थ को बखूबी पकड़ा है । देखा जाय तो यही इसका नयापन है जिससे ये पुरानी कथागत रूढ़ियों का अतिक्रमण करती है तथा नवीन मूल्यांकन की माँग करती है।
‘परिंदे’ की लतिका एक तरह के मानसिक द्वंद्व में रहती है, तनाव में रहती है।  वह अकेलेपन की शिकार है, वह अपने अकेलेपन को दूर कर सकती है, स्मृतिशेष गिरीश नेगी को भूल सकती है, वह उस अतृप्त प्रेम से उपजे खालीपन को मि. ह्यूबर्ट के प्रेम से भर सकती है, लेकिन वह ऐसा नहीं करती है। वह अपने अंदर के सूनेपन को न तो किसी के सामने जाहिर होने देती है और न ही मि. ह्यूबर्ट का प्रेम-निवेदन स्वीकार करती है। ‘परिंदे’ कहानी अपने पात्रों के मन के अंदर के द्वन्द्वों पर टिकी हुई है। व्यक्ति के मन के अंदर के यथार्थ को सामने लाना या उसके लिए एक सार्थक भाषा की खोज भी नई कहानी की प्रमुख विशेषता बनकर उभरी।
‘परिंदे’ कहानी पर कामू के ‘एबसर्ड’ का भी प्रभाव परिलक्षित होता है। कहानी के लगभग चरित्र अपने संवाद से ऐसी सूचना देते हैं कि वो एक प्रकार का निरर्थक जीवन जीने के लिए अभिशप्त है। वो बार-बार जीवन के मूल्य की तलाश करते हैं । ये पात्र बुढ़ापा और मृत्यु से डरे हुए लगते हैं।  डॉ मुकर्जी को कई बार लगता है कि वह क्यों है? उसके जीवन का उद्देश्य क्या है? वो क्या करे?  डॉ मुकर्जी मि. ह्यूबर्ट से बात करते समय कहते हैं-
“क्या तुम नियति में विश्वास करते हो, मि. ह्यूबर्ट?”2
  “मैं कभी-कभी सोचता हूँ, इंसान जिंदा किसलिए रहता है – क्या उसे कोई और बेहतर काम करने को नहीं मिला?” 3
                  ऐसा प्रतीत होता है कि कामू के ‘मिथ ऑफ सिसिफ़स’ के मिथकीय पात्र सिसिफ़स की सोच ही यहाँ सामने आ गई हो और नियति के द्वारा जबरन डॉ मुकर्जी को इस संसार में उसकी उस स्थिति पर उसे जीने के लिए विवश कर दिया गया हो।
                 ‘परिंदे’ के पात्र अपनी विवशता से मुक्त होना चाहते हैं, लेकिन स्थितियों के सामने लाचार हैं। हालाँकि नामवर सिंह ‘परिंदे’ के पात्रों की स्वतन्त्रता या मुक्ति की आकांक्षा के प्रश्न को समकालीन विश्व-साहित्य के प्रश्नों के ही समानान्तर रख कर विचार करने के पक्ष में हैं । उनके अनुसार “स्वतन्त्रता या मुक्ति का प्रश्न, जो समकालीन विश्व-साहित्य का मुख्य प्रश्न बन चला है, निर्मल की कहानियों में प्रायः अलग-अलग कोण से उठाया गया है ... ये कहानियाँ जीवन की विभिन्न स्थितियों के संदर्भ में आज के सबसे बड़े मानव-मूल्य – मानव-मुक्ति – को परिभाषित करती है।”4  लतिका अपने पुराने मूल्यों से चिपकी हुई है, और इसी वजह से वो परेशान है। वह भी जीवन के मूल्य की तलाश करती है, लेकिन वह मान लेती है कि वास्तव में जीवन का कोई अर्थ नहीं है। जीवन अर्थहीन (Meaningless) है। इसमें कोई तार्किकता भी नहीं है। वह डॉ. मुकर्जी से कहती है-
“डॉक्टर-सबकुछ होने के बावजूद वह क्या चीज है जो हमें चलाये चलती है, हम रुकते हैं तो भी अपने रेले में वह हमें घसीट ले जाती है। ”5 
यहाँ निर्मल वर्मा संकेत देते हैं कि रुँधे हुए गले से भर्राई सी आवाज में लतिका यह बात कहती है। वह कुछ ढूँढना चाहती है, लेकिन ऐसा लगता है कि वह अंधेरे में खो गया है।
नई कहानी से पूर्व की कहानियों में कहानीकार ऐसे चरित्र पर बल देता था जो पाठकों को प्रेरित करे। उनकी कोशिश रहती थी कि उनके संवाद तार्किक तथा मनोरंजक हो। देखा जाय तो उन कहानियों में एक अच्छी शुरुआत, मध्य तथा अच्छा अंत होता था जो अपने अंत तक जाते-जाते पाठकों को एक उद्देश्य से परिचित करवाती थी, लेकिन ‘परिंदे’ का कोई भी चरित्र प्रेरक नहीं है। न तो उनके संवाद में ही तारतम्यता है। ये संवाद अर्थहीन जीवन-स्थितियों का बोध कराते हैं। कहानी की शुरुआत, मध्य और अंत का कोई निश्चित क्रम भी नहीं दिखाई देता है। ये सारे तत्व पूर्व की कहानियों से इसे अलग करते हैं। 
‘परिंदे’ के पात्र का ‘मूड’ हमेशा बदलता रहता है। इन पात्रों का चरित्रांकन (Characterization) करना काफी मुश्किल है। लतिका द्वारा जूली का प्रेमपत्र छुपाना उसके स्वयं की कुंठा को दिखाता है, जो गिरीश नेगी के प्रति अतृप्त प्रेम से उपजी कुंठा है, लेकिन बाद में लतिका उसे प्रेम-पत्र लौटा देती है। दूसरी तरफ मि. ह्यूबर्ट, लतिका को प्रेमपत्र लिखकर उससे प्रेम-निवेदन करता है, लेकिन लतिका का सच जानने के बाद वह प्रेमपत्र लौटा देने और उसे माफ कर देने की विनती भी करता है। डॉ. मुकर्जी के चरित्र की भी साफ Category कभी खुलकर सामने नहीं आती है।
‘परिंदे’ के पात्र अजनबी हैं और ये अकेलेपन की समस्या से ग्रस्त हैं। वो कहीं भी समझौता नहीं करना चाहते हैं । वस्तुतः यह डॉ. मुकर्जी, लतिका, मि. ह्यूबर्ट या फिर करिमुद्दीन की ही समस्या नहीं है, बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व की या शहरीकरण के बाद वैसे तमाम लोगों की समस्या थी जो अपने घर से दूर ज़िंदगी बसर करने के लिए आ गए थे। मूलतः वर्मा के निवासी डॉ. मुकर्जी का तो पूरा घर ही जापानी आक्रमण से बर्बाद हो गया था। ऐसी स्थिति में ये पात्र अजनबी बनने के लिए विवश हैं। यहाँ मिस वुड और डॉ. मुकर्जी के संवाद को देखना अप्रासंगिक नहीं है –
मिस वुड – “लेकिन डॉ., कुछ भी कह लो, अपने देश का सुख कहीं और नहीं मिलता। यहाँ तुम चाहे कितने वर्ष रह लो, अपने को हमेशा अजनबी ही पाओगे।”6
डॉ मुकर्जी – “दरअसल अजनबी तो मैं वहाँ भी समझा जाऊँगा, मिस वुड। इतने वर्षों बाद मुझे कौन पहचानेगा! ” 7   
‘परिंदे’ कहानी में बिडम्बना (Irony) के भी दर्शन होते हैं। यह निर्मल वर्मा की गहरी रचनात्मक सूझ-बूझ का ही परिचायक है कि यह यहाँ जबरन आरोपित न होकर परिस्थितियों से पैदा हुई है। दरअसल बिडम्बना में कथन का वही अर्थ नहीं रहता है जो कहा जाता है। ‘परिंदे’ के लगभग पात्र अपनी परिस्थिति से खुश नहीं हैं, लेकिन वह दूसरों के सामने अपनी दुखद और त्रासद स्थिति को छुपाने की भरपूर कोशिश करते हैं । उन्हें पता है कि दूसरा कोई भी उसकी स्थिति को बदल नहीं सकता। यह लेखक की कला है कि यह परिस्थितिजन्य बिडम्बना, कहानी के कथानक को कमजोर न कर उसमें और भी धार देती है। डॉ. मुकर्जी हमेशा पुरानी यादों को याद कर दुखी रहते हैं, लेकिन मिस वुड को कहते हैं कि वो खुश हैं –
      “मुझे अपने बारे में कोई गलतफहमी नहीं है मिस वुड, मैं सुखी हूँ।”8
कहानी के पूर्व के घटनाक्रम से पाठक पूर्ण अवगत है कि डॉ मुकर्जी. सुखी नहीं हैं, लेकिन उनके इस कथन से पाठक भटकता नहीं है, बल्कि डॉ. मुकर्जी की दयनीय स्थिति से और अच्छी तरह परिचिति होता है।
लतिका को प्रकृति से कोई विशेष प्रेम या लगाव नहीं है। क्योंकि लतिका के संबंध में कथाकार कहता है “इस छोटे-से-हिल-स्टेशन पर रहते उसे (लतिका को) खासा अर्सा हो गया, लेकिन कब समय पतझर और गर्मियों का घेरा पार कर सर्दी की छुट्टियों की गोद में सिमट जाता है, उसे कभी याद नहीं रहता है।”9  वास्तविकता यह है कि छुट्टियों में वह भी घर जाना चाहती है, लेकिन वहाँ से न जा पाने के लिए वह विवश है । छात्रावास में रुकना उसकी मजबूरी है, उसकी विवशता है, लेकिन छात्राओं ने जब उससे पूछा –
 “मैडम, छुट्टियों में क्या आप घर नहीं जा रही हैं?”10 तब वह अपने तनाव को छुपाते हुए बनावटी मुस्कान के साथ कहती है - “अभी कुछ पक्का नहीं है –आई लव द स्नो फॉल”11
जबकि कहानी से यह ज्ञात है कि लतिका झूठ बोल रही है। यह कथन ही अपने आप में बिडंबनापूर्ण है। क्योंकि यहाँ कथन का वास्तविक अर्थ कहे गए अर्थ से ठीक उलटा है। इस तरह के कई उदाहरण इस कहानी में स्थान-स्थान पर देखे जा सकते हैं। 
संप्रेषण की दृष्टि से ‘परिंदे’ कहानी जटिल ठहरती है। इसका एक मात्र तो नहीं, लेकिन महत्वपूर्ण कारण इसकी सांकेतिकता (Semiotics) है। लेखक प्रतीक (Symbol) का  प्रयोग करता है। ‘सांकेतिकता’ नई कहानी की एक प्रमुख विशेषता है। नामवर सिंह मानते हैं कि इस दौर की अधिकांश कहानियों में सांकेतिकता भरी हुई है। हालाँकि ऐसा भी नहीं है कि पिछली पीढ़ी के रचनाकारों ने सांकेतिकता का प्रयोग नहीं किया था। उनके अनुसार “सांकेतिकता का सहारा पिछली पीढ़ी के लेखक कभी-ही-कभी लेते थे, जबकि आज का लेखक अक्सर इसका सहारा लेता है। ... आज की कहानी ‘आधार-भूत विचार’ का केवल अंत में संकेत नहीं करती; बल्कि नयी कहानी का समूचा रूप-गठन (स्ट्रक्चर) और शब्द-गठन (टेक्स्चर) ही सांकेतिक है। ... नयी कहानी संकेत करती नहीं, बल्कि स्वयं संकेत है।” 12
‘परिंदे’ कहानी अपने समकालीन समय के यथार्थ को बखूबी पकड़ती है। देखा जाय तो कहानी में शीर्षक के अलावे भी ‘परिंदे’ का जिक्र कई बार किया गया है। कहानी में ‘परिंदे’ का प्रयोग कहानीकार एक प्रतीक के रूप में करता है। यह प्रतीक कथानक के साथ इतना बिंधा हुआ है कि लतिका, मि. ह्यूबर्ट, डॉ. मुकर्जी जैसे चरित्रों में उलझा पाठक समझ ही नहीं पाता कि ‘परिंदे’ किस प्रकार ‘मुक्ति’ या ‘स्वतन्त्रता’ की सांकेतिकता को अभिव्यंजित करने लगता है! “कुछ दूर जाने पर उनकी आँखें ऊपर उठ गईं। पक्षियों का एक बेड़ा धूमिल आकाश में त्रिकोण बनाता हुआ पहाड़ों के पीछे से उनकी ओर आ रहा था। लतिका और डॉक्टर सिर उठा कर इन पक्षियों को देखते रहे। लतिका को याद आया, हर साल सर्दियों की छुट्टी से पहले ये परिंदे मैदानों की ओर उड़ते हैं, कुछ ही दिनों के लिए बीच के इस पहाड़ी स्टेशन पर बसेरा करते हैं, प्रतीक्षा करते हैं बर्फ के दिनों की, जब वे नीचे अजनबी, अनजाने देशों में उड़ जाएँगे...” 13 लेखक संकेत देता है कि क्या लतिका, डॉ मुकर्जी और मि. ह्यूबर्ट भी प्रतीक्षा कर रहे हैं? लेकिन सच्चाई तो यह है कि ये पात्र किसी भी प्रकार की मुक्ति की प्रतीक्षा नहीं कर सकते, क्योंकि प्रतीक्षा तो तब की जाती है जब थोड़ी भी उम्मीद हो। इनकी जिंदगी में तो सिर्फ अंधेरा और सन्नाटा है। यहाँ इन पात्रों की ‘मुक्ति’ भी अभिशप्त है। परिंदे तो उड़ भी सकते हैं, लेकिन लतिका, डॉ. मुकर्जी और मि. ह्यूबर्ट जैसे परिंदे तो अपनी संत्रास और घुटन भरी जिंदगी जीने के लिए बाध्य हैं। डॉ. रुचिरा ढींगड़ा के अनुसार “परिंदे उन विलग प्रेमियों का प्रतीक है जो अपने वास्तविक स्थान से दूर हटकर एक पहाड़ी स्थान पर एकत्र होते हैं। एक निश्चित समय तक रहने के बाद फिर अपने गंतव्य पर चले जाते हैं । ये पात्र कहीं नहीं आते-जाते। एक साथ रहते हुए भी संत्रास-ग्रस्त रहते हैं।”14  निर्मल वर्मा ने यहाँ ‘डॉट’ का प्रयोग कर अर्थ की अनेक संभावनाएँ पैदा कर दी है । ‘डॉट’ कुछ और नहीं, बल्कि मौन को ही अभिव्यक्त कर रहा है। वाचिक रूप से तो चरित्र मौन है, लेकिन मन के अंदर काफी कुछ चल रहा है, सन्नाटे में भी एक चीख है। निर्मल वर्मा पाठकों को इन चरित्रों के मन की गहराइयों में उतारने का प्रयास ही नहीं करते,बल्कि सफल भी होते हैं। इस संदर्भ में आलोचक नामवर सिंह लिखते हैं “उन्होंने प्रचलित कहानी-कला के दायरे से भी बाहर निकलने की कोशिश की है, यहाँ तक कि शब्द की अभेद दीवार को लांघकर शब्द के पहले के ‘मौन जगत’ में प्रवेश करने का भी प्रयत्न किया है और वहाँ जाकर प्रत्यक्ष इंद्रिय-बोध के द्वारा वस्तुओं के मूल रूप को पकड़ने का साहस दिखलाया है। इसीलिए उनकी कहानी-कला में नवीनता है”15  ‘ परिंदे’ कहानी में अनेक जगह पर ‘छाया’, ‘धुंध’ और ‘कोहरे’ भी प्रतीक के रूप में आए हैं। ये प्रतीक अवसादपूर्ण स्थितियों को और गाढ़ा करते हैं। प्रतीक अबतक कविता की ही चीज हुआ करती थी, लेकिन ‘परिंदे’ कहानी में प्रतीकों की बहुलता से पाठगम्यता के स्तर पर जरूर जटिलता आयी है, लेकिन अगर कहा जाय कि इन प्रतीकों से  निर्मल वर्मा ने व्यक्ति-मन के भीतरी द्वन्द्वों को दिखाने में सफलता अर्जित की है तो शायद ही किसी को कोई संदेह होगा। 

संदर्भ सूची 
  1. कहानी: नई कहानी, नामवर सिंह, पृष्ठ संख्या – 54
  2. श्रेष्ठ हिन्दी कहानियाँ (1950-1960), खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), पृष्ठ संख्या – 68
  3. वही
  4. कहानी: नई कहानी, नामवर सिंह, पृष्ठ संख्या – 53
  5. श्रेष्ठ हिन्दी कहानियाँ (1950-1960), खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), पृष्ठ संख्या – 102
  6. श्रेष्ठ हिन्दी कहानियाँ (1950-1960), खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), पृष्ठ संख्या – 88
  7. वही
  8. वही, पृष्ठ संख्या – 89
  9. वही, पृष्ठ संख्या – 62
10.  वही
11. वही
12. कहानी: नई कहानी, नामवर सिंह, पृष्ठ संख्या – 32-33
13. श्रेष्ठ हिन्दी कहानियाँ (1950-1960), खगेन्द्र ठाकुर (संपादक), पृष्ठ संख्या – 96-97
14. This Lecture Talks about Nirmal Verma: Parindey, The Consortium for EducationalCommunication, 23 Apr. 2018, www.youtube.com/channel/UCA7OQkX9AEIVQ6j9i0OSQhA.
15. कहानी: नई कहानी, नामवर सिंह, पृष्ठ संख्या – 64


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