काव्य: रूपम मिश्रा

रूपम मिश्रा
घूंघट के भीतर से

अम्मा कभी घूमी नहीं।
न पहाड़ देखे, न ताल, न झील, न समुद्र,
क्योंकि अम्मा कभी घूमी नहीं।
देखा तो बस घर, चौखट, आँगन और दालान,
और देखे खेत, इनार, और पोखर,
सब घूंघट के भीतर से। 
जब बारह वर्ष की आयु में ब्याही गयीं वह बाबा के साथ,
उन्होंने बस दो बार कार्तिक का मेला देखा था,
हर साल सावन में झूले पर झूली थीं 
अपनी बहनों और सहेलियों के साथ,
लेकिन तीव्र गति वाली रेल की सवारी नहीं की।
कुल तीन बार वह दूसरे गाँव गयी थीं,
एक बार अपनी नानी के घर जब वह उनसे पहली और आखिरी बार मिलीं,
एक बार मौसी के बेटे के जनेऊ में डन्लप पर बैठ कर उनके घर,
और एक बार क्वार मास की भोर में काली माई के नए मंदिर दो कोस दूर वाले गाँव।
फिर बारहवाँ लग गया और ब्याह हो गया,
और ब्याही बेटियों को कौन कहाँ घूमने देता है?
फिर  पन्द्रहवें में हुआ गौना,
सोलहवें तक सँभालने लगीं रसोई और ललना ।
पितृसत्तात्मक सास और ननदों ने उन्हें कुछ ऐसे मथा 
जैसे मथानी में रस्सी लपेट वह हर शनिचर
तब तक मथा करती थीं 
जब तक मक्खन और मठ्ठा अलग न हो जाये।
फिर बरसों बीत गए उन्होंने अपना पीहर तक नहीं देखा,
देखा तो बस घर, चौखट, आँगन और दालान,
और देखे खेत, इनार, और पोखर,
सब घूंघट के भीतर से।
न अपनी सहेली के ब्याह में गयीं,
न भाई के तिलक में, जैसे-तैसे पहुँची ब्याह में,
जब उनके बाबा उनके ससुर जी से 
अपनी ही पोती नइहर ले जाने का निवेदन करने लगे।
फिर बेटे बड़े हुए, 
सरकारी नौकरियों में लग गए,
अम्मा ने तब पहली बार काशी विश्वनाथ का प्रसाद चखा,
मंदिर तब भी न देख पायीं। 
बहुएँ आयीं, बेटों के साथ शहर में बस गयीं,
अम्मा गाँव की सीमाओं में अवरुद्ध रहीं।
जब बाबा परलोक सिधारे
अम्मा के नेत्रों में असंख्य अश्रु आये और गए,
कुल-कुटुंब, नात-रिश्तेदार का जमावड़ा लगा और छँट गया,
उनके जीवन से रंग चले गए,
पर अम्मा यथास्थान ही रहीं,
देखती रहीं घर, चौखट, आँगन और दालान,
खेत, इनार, और पोखर- सब घूंघट के भीतर से।
बस अब उन्हें कोई न देखता किसी काज-कल्याण पर,
विधवाएँ अभागन होती न!
अम्मा वृद्ध हुईं, कमर झुक गयी,
लेकिन न तीर्थ किये, न गंगा नहायीं
विधवाएँ कहाँ जाया करती हैं तीर्थों पर?
जब धू-धू कर प्रचंड लपटों में 
जलता रहा उनका मृत शरीर श्मशान में,
निर्मूल उनके अणुओं ने विचरण किया होगा स्वछन्द,
जैसे उनकी अस्थियाँ प्रवाहित हुईं पावन गंगा में,
वह भी मिली होंगी अंततः सागर में-
पार किया होगा सैकड़ों महानगरों को,
जो अम्मा अपने जीवनकाल में कभी देख नहीं पायीं,
क्योंकि वे प्रतिबद्ध और सीमित रहीं आजीवन
अपने घर, चौखट, आँगन और दालान तक।
***


बढ़ गयी हूँ मैं

यूँ जो टूट-टूट कर बिखर रही हूँ मैं,
किनारों से आहिस्ता-आहिस्ता
चिटक रही हूँ मैं।
जब समूची थी, तब शायद कुछ कम थी,
ज़र्रों में ख़ुद से
कई गुना बढ़ गयी हूँ मैं।
हवाओं के झोंकों से,
दरियाओं की तेज़ लहरों में,
मवेशियों की चमड़ियों में,
आँधियों में, तूफानों में,
इन मौसमों की साज़िशों से,
यूँ तितर-बितर फ़ैल गयी हूँ मैं,
खुद से कई गुना बढ़ गयी हूँ मैं।
अपने वजूद को तलाशती, थकती- हारती,
ऐसे ढेर हो गयी हूँ मैं,
ज़मीं में दफ़्न बीजों में अब
अंकुरों सी फूट रही हूँ मैं,
खुद से कई गुना बढ़ गयी हूँ मैं।
***


सम्मिश्रित पिटारे से टाइमपास वाली कविता

अब तुम्हारे लिए ज़माने से, 
तुम्हारी एक्स से,
और वाई और ज़ेड से,
तुम्हारे दोस्तों से, तुम्हारे दुश्मनो से, 
तुम्हारे मुंशी, तुम्हारे मुलाज़िम से, 
और यहाँ तक कि ख़ुद से तो हम लड़ भी लेते, 
लेकिन तुम्हारे लिए, हम तुम से ही कैसे लड़ें? ये भी कोई लड़ाई है?
जब तुम हमारे पास खुद ही चल कर ना आना चाहो,
कैसे बाँध लें तुम्हें खुद से, और कैसे बोझिल कर दें,
तुम्हें उस रिश्ते से, जिसका भार
कोई भी बिना इच्छा उठाना नहीं चाहता?
कैसे थोप दें ख़ुद को हम तुम पर,
और कैसे सुकून से रहें इतनी दूरियों के बावजूद?
हज़ारों अनकही बातें हैं तुम्हारी आँखों में, हमने देखा है।
तुमने आधी बात कह कर, जो हमने कहा वो दोहरा कर,
गहरी नींद की दुहाई दे कर, ऐसे करवट बदल ली,
और हम, बेचैन, बेबस, घड़ी की टिक-टिक सुन कर,
चिंतित, व्याकुल, सारी रात जागे रहे।
उन अधूरी बातों का, और उन अनकही बातों का,
जाने क्या-क्या निष्कर्ष निकालने लगे।
अब तो बस सुबह का इंतज़ार रहेगा कि तुम जागोगे
और उन अनकही गुत्थियों को सहजता से सुलझाओगे।
***

(अंग्रेज़ी व हिंदी में लेखन में प्रवीण, रूपम मिश्रा लखनऊ विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं।)


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