दो कविताएँ: रामनरेश त्रिपाठी

धरोहर

रामनरेश त्रिपाठी
(4 मार्च 1890 :: 16 जनवरी 1962)
रामनरेश त्रिपाठी

प्रार्थना

हे प्रभो! आनन्द दाता ज्ञान हमको दीजिए।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए॥

लीजिए हमको शरण में हम सदाचारी बनें।
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें॥

गत हमारी आयु हो प्रभु! लोक के उपकार में
हाथ डालें हम कभी न भूलकर अपकार में॥
***

अन्वेषण

मैं ढूंढता तुझे था, जब कुञ्ज और वन में
तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में

तू आह बन किसी की, मुझको पुकारता था
मैं था तुझे बुलाता, संगीत में भजन में

मेरे लिए खड़ा था, दुखियों के द्वार पर तू
मैं बाट जोहता था, तेरी किसी चमन में

बनकर किसी के आँसू, मेरे लिए बहा तू
आँखें लगी थीं मेरी, तब मान और धन में

बाजे बजा बजा कर, मैं था तुझे रिझाता
तब तू लगा हुआ था, पतितों के संगठन में

मैं था विरक्त तुझसे, जग की अनित्यता पर
उत्थान भर रहा था, तब तू किसी पतन में

बेबस गिरे हुओं के, तू बीच में खड़ा था
मैं स्वर्ग देखता था, झुकता कहाँ चरन में

तूने दिये अनेक अवसर न मिल सका मैं
तू कर्म में मगन था, मैं व्यस्त था कथन में

तेरा पता सिकंदर को, मैं समझ रहा था
पर तू बसा हुआ था, फरहाद कोहकन में

क्रीसस की हाय में था, करता विनोद तू ही
तू अंत में हँसा था, महमूद के रूदन में

प्रह्लाद जानता था, तेरा सही ठिकाना
तू ही मचल रहा था, मंसूर की रटन में

आखिर चमक पड़ा तू गाँधी की हड्डियों में
मैं था तुझे समझता, सुहराब पीले तन में

कैसे तुझे मिलूंगा, जब भेद इस कदर है
हैरान होके भगवन, आया हूँ मैं शरन में

तू रूप की किरण में सौंदर्य है सुमन में
तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में

तू ज्ञान हिन्दुओं में, ईमान मुस्लिमों में
तू प्रेम क्रिश्चियन में, तू सत्य है सुजन में

हे दीनबंधु! ऐसी, प्रतिभा प्रदान कर तू
देखूँ तुझे दृगों में, मन में तथा वचन में

कठिनाइयों, दुखों का, इतिहास ही सुयश है
मुझको समर्थ कर तू, बस कष्ट के सहन में

दुख में न हार मानूँ, सुख में तुझे न भूलूँ
ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में॥


जौनपुर जिले के कोइरीपुर ग्राम में जन्मे रामनरेश त्रिपाठी की प्रारंभिक शिक्षा जौनपुर में हुई। छायावाद-पूर्व युग की खड़ी बोली के महत्वपूर्ण कवि रामनरेश त्रिपाठी राष्ट्रप्रेम की कविताओं के लिये जाने जाते हैं। 

इनकी पुस्तक 'स्वप्न' को हिंदुस्तानी अकादमी का पुरस्कार मिला। कविता के अतिरिक्त इन्होंने उपन्यास, नाटक, आलोचना, कोश, हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास तथा बालोपयोगी पुस्तकें लिखीं हैं। बानर नामक बाल-पत्रिका का सम्पादन भी इन्होंने कई वर्षों तक लिया। इन्होंने आठ खण्डों में प्रकाशित 'कविता कौमुदी' में हिंदी, उर्दू, संस्कृत, बंगला की लोकप्रिय कविताओं को संग्रहीत किया है।

मुख्य कृतियाँ: मिलन, पथिक, स्वप्न, मानसी,आँखों देखी कहानियाँ, हिंदी पद्य-रचना, हिंदी शब्द कल्पद्रुम, हिंदुस्तानी कोश, बाल कथा-कहानी, तुलसीदास और उनकी कविता, ग्राम साहित्य, दिमाग़ी ऐयाशी, जयंत, हमारा ग्राम साहित्य, घाघ और भड्डरी।

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