रासो काव्य परंपरा : एक संक्षिप्त अवलोकन

खुशबू
-खुशबू

सहायक प्राध्यापक (हिंदी विभाग), गंगा देवी महिला महाविद्यालय, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना।
ईमेल: Khushi28914@gmail.com
चलभाष: 9968746826

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार दसवीं शताब्दी के आस-पास लगभग एक सौ पचास वर्षों तक साहित्यिक रचनाओं का अभाव था। वे यह स्वीकार करते हैं कि जब मुसलमानों का आक्रमण हुआ तब देशी काव्य ने अपना स्वरूप ग्रहण किया जिसमें वीरता, शौर्य और पराक्रम मुख्य विषय बने। पर इसके पहले भी मुंज के दोहे शौर्य और वीरता की दुंदुभी बजा चुके थे जिनमें शौर्य, पराक्रम, वीरता के साथ-साथ सौन्दर्य के ह्रदयस्पर्शी चित्र है।1

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस अवहट्ट काल में तथा हिन्दी साहित्य के आदिकाल में (सन् 1000-1400 ई. तक) दो प्रकार की रचनाएँ प्राप्त होती हैं –

1. जैन प्रभावापन्न परिनिष्ठित अपभ्रंश की रचनाएँ। इस श्रेणी में हेमचन्द के व्याकरण, मेरूतुंग के प्रबंध चिन्तामणि, राजशेखर के  ‘प्रबन्ध कोश आदि में संग्रहित दोहे आते है।

2. रासो ग्रन्थ – खुमाण रासो, बीसलदेव रासो, जयचंद्र प्रकाश, जयमंयक जसचन्द्रिका, हम्मीर रासो, विजयपाल रासो, कीर्तिलता और कीर्तिपताका को साहित्यिक पुस्तक माना है और खुमाण रासो (आल्हा का मूल रूप) खुसरों की पहेलियाँ और विद्यापति पदावली को देशभाषा काव्य माना है।2

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, भारतीय कवियों ने ऐतिहासिक नाम भर लिया, शैली उनकी वही पुरानी रही। जिसमें काव्य-निर्माण की ओर अधिक ध्यान था, विवरण संग्रह की ओर कम, कल्पना विलास का अधिक मान था, तथ्य निरूपण का कम, उल्लसित आनंद की ओर अधिक झुकाव था विलासित तथ्यावली की ओर कम। इस प्रकार इतिहास को कल्पना के हाथों परास्त होना पड़ा। ऐतिहासिक तथ्य इन काव्यों में कल्पना को उकसा देने के साधन मान लिए गए हैं। यही कारण है जब ऐतिहासिक व्यक्तियों का भी चरित्र लिखा जाने लगा, तब भी इतिहास का कार्य नहीं हुआ। अन्त तक ये रचनाएँ काव्य ही बन सकीं, इतिहास नहीं। फिर भी निजंधरी कथाओं से वे इस अर्थ में भिन्न थीं उनमें बाह्य तथ्यात्मक जगत् से कुछ-न-कुछ अवश्य रहता था।3

रासो-साहित्य के विषय में विद्वानों में मतभेद है। अधिकांश रासो ग्रन्थों में प्रक्षिप्त अंशों क भरमार है। इसी कारण कुछ विद्वान इन्हें अप्रामाणिक रचना मानते हैं। तत्कालीन सन्दर्भ में यदि देखा जाए तो विदित होता हैं कि उस समय राज्य उत्तराधिकार में प्राप्त होता था और जिस चरित-नायक को लेकर रासो की रचना होती थी, उसके उत्तराधिकारी अपने वर्णन भी इन ग्रन्थों से जुड़वा देते थे। परन्तु सम्पूर्ण रासो ग्रन्थ ही अप्रामाणिक हों, ऐसा नहीं है। वास्तव में ये आदिकाल की रचनाएँ हैं तथा इनमें बाद की रचनाओं द्वारा प्रक्षेप कराया गया है। हिन्दी-साहित्य का इतिहास लिखने वाले सभी विद्वानों ने इन्हें आदिकाल का साहित्य स्वीकार करके इनका वर्णन अपने ग्रन्थों में किया है।

 

रासो काव्य-परम्परा

रासो साहित्य मूलतः सामंती व्यवस्था, प्रकृति और संस्कार से उपजा हुआ साहित्य है जिसका संबंध पश्चिमी हिन्दी-प्रदेश से है। इसे देशभाषा काव्य नाम से भी जाना जाता है। इस साहित्य के रचनाकार हिन्दू राजपूत राजाश्रय में रहने वाले चारण या भाट थे। रचनाकार का जुड़ाव सीधे राजा से होता है अतः उनका समाज में बहुत अधिक सम्मान था। चारण कला-रचना में कुशल होते थे। वे योद्धा भी होते थे, जो  युद्ध होने पर अपनी सेना की अगुवाई विरूदावली गा-गाकर किया करते थे। ये राजाओं, आश्रयदाताओं, वीर पुरुषों तथा सैनिकों के वीरोचित युद्ध घटनाओं का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते थे, उसके साथ-साथ यथार्थपरक स्थितियों एवं सन्दर्भों को भी बारीकी के साथ चित्रित करते थे। वीरोचित भावनाओं के वर्णन के लिए इन्होंने रासक या रासो छंद का प्रयोग किया था, क्योंकि यह छंद इस भावना को सम्प्रेषित करने के लिए अनुकूल था। इसलिए इनके द्वारा रचित साहित्य को रासो साहित्य भी कहा गया।

चारण साहित्य की रचना के समय देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पूरा देश कई छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया था। प्रत्येक राज्य का राजा अलग होता था। उनमें आये दिन युद्ध हुआ करता था। सभी राजा एक-दूसरे से मेल-जोल रखने के बजाय आपस में लड़ते-भिड़ते रहते थे। राज्य-विस्तार करने के लिए उन्हें युद्ध करना जरूरी था। विदेशी सामंतों के आ जाने से युद्ध का वातावरण और गर्म हो गया। विदेशी सामंतों ने देशी राजाओं में फूट डालो और राज करो की नीति का अनुसरण किया और एक दिन वे पूरे हिन्दू-जाति के शासक बन गए। जिस हिन्दू राजा ने उनका विरोध किया उससे उन्होंने युद्ध की ठान ली और शिकार उसे अपने अधीन कर लिया। राजनीतिक स्थिति के बिगड़ने से सामाजिक स्थिति में भी बिखराव आया। प्रमुख हिन्दू जातियाँ उपजातियाँ में बढ़ती गईं। धार्मिक सम्प्रदाय भी उपसम्प्रदायों में विभाजित हो गए। सभी जातियों और सम्प्रदायों में जो मेलजोल और सौहार्द पहले था, वह पूरी तरह वैमनस्य भाव में बदल गए। आये दिन एक जाति के लोग दूसरी जाति से और एक सम्प्रदाय के लोग दूसरे सम्प्रदाय से लड़ने-भिड़ने लगे। इससे समाज में युद्धोन्माद बढ़ा। सांस्कृतिक मेलजोल और एकता के अभाव ने इसे और बढ़ने दिया। संघर्ष के इस वातावरण से देश और राज्य की आर्थिक स्थिति और दयनीय हो गयी। लोग भूखों मरने लगे। भूखे लोगों को मरने और मारने के अतिरिक्त और कोई काम नहीं रह गया था। किन्तु  ये लोग जो निम्न और निम्न मध्यवर्ग के थे, लड़ नहीं पा रहे थे। इसीलिए उन्होंने लड़ने वाली जाति, विशेषकर राजपूत जाति की सेवा की और उन्हें लड़ने के लिए उकसाया। वे अपनी प्रजा को दुःखी नहीं देख सकते थे। इसीलिए उन्होंने युद्ध करना अपना नैतिक कर्त्तव्य मान लिया। इसीलिए एक धर्म और सम्प्रदाय के लोग दूसरे धर्म और सम्प्रदाय से अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगे हुए थे। इसके कारण भी संघर्ष बढ़ा। लोग क्रमशः जातियों और उपजातियों तथा सम्प्रदायों और उपसम्प्रदायों में विभक्त होते जा रहे थे। लड़ने वाली जाति के लिए सचमुच ही चैन से रहना असम्भव हो गया था क्योंकि सभी दिशाओं से आक्रमण होने की सम्भावना थी। निरन्तर युद्ध करने के लिए प्रोत्साहित करने को भी एक वर्ग आवश्यक हो गया था। चारण इसी श्रेष्ठ के लोग हैं। उनका काम हर प्रसंग में आश्रयदाता के युद्धोन्माद को उत्पन्न कर देने वाली घटना-योजना का आविष्कार करना था। स्पष्ट है कि जिस समय कोई देश या राष्ट्र (जाति) युद्ध में व्यस्त रहता है उस समय रचनाकार का मुख्य कर्म हो जाता है उसे चेतना में स्थान देना। चारण-साहित्य या रासो साहित्य का प्रमुख स्वर वीरत्व होने का यही कारण था।

हिन्दी साहित्य के इतिहास में रासो काव्य परम्परा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। रासो शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में अब तक कई मत सामने आए है। इतिहासकार गार्सा द तासी नेरासो शब्द की व्युत्पत्ति राजसूय, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल नेरसायण और डॉ. मोतीलाल मेनारिया नेरहस्य से माना है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदीरासक को एक छंद भी मानते है और काव्य-भेद भी। ऐस प्रतीत होता हैं कि उस काव्य की कविता के संबंध में अनेक प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ करता था। ये काव्य चरित्र-प्रधान हैं। इन चरित्रों को काव्य में बाँधने के लिए ही इस शब्द का प्रयोग होता रहा है। वस्तुतः रासो काव्य मूलतः रासक छंद का समुच्चय है। रासो काव्य में एक साथ वीरोचित छंद का समुच्चय है। रासो काव्य में एक साथ वीरोचित और श्रृंगारोचित भावनाओं के वर्णन सुलभतापूर्वक मिल जाते हैं। रासो परम्परा के प्रतिनिधि ग्रन्थ इस प्रकार है -  

1. खुमाण रासो – इस परम्परा की प्रारम्भिक कृतियों में खुमाण रासो का स्थान  सर्वोपरि है। इसका सर्वप्रथम उल्लेख शिव सिंह सेंगर की कृति शिवसिंह सरोज में मिलता है। इसके रचयिता दलपति विजय है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इसको नवीं शताब्दी (सन् 812 ई.) की रचना मानते है।4 इसमें राजस्थान के चित्तौड़-नरेश खुमण (खुम्माण) द्वितीय के युद्धों का सजीव वर्णन किया गया है। किन्तु राजस्थान के वृत्त-संग्राहकों के अनुसार यह सत्रहवीं शताब्दी की रचना ठहरती है, क्योंकि सत्रहवीं शताब्दी के चित्तौड़-नरेश राजसिंह तक के राजाओं के यशोगान का चित्रण मिलता हैं और इसी आधार पर इसको आदिकालीन रचनाओं के भीतर नहीं रखते हैं। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में वृत्त संग्राहकों के पास इतिहास को समझने की पैनी दृष्टि थी; इसीलिए राजस्थान में रहते हुए भी वे आदिकाल की समाप्ति को भक्तिकाल और रीतिकाल के भण्डार में डालने का पुराग्रह करके यश अर्जित कर रहे हैं, जब कि वह सामग्री उन कालों की प्रवृत्तियों से किसी भी रूप में मेल नहीं खाती। इन लोगों ने रचनाकारों के नामों के संबंध में भी भ्रम पैदा किया है।5 यही कारण है कि डॉ. मोतीलाल मेनारिया जैसे प्रबुद्ध इतिहासकार ने भी इस कृति के रचनाकार दलपति-विजय को जैन साधु माना है जो पूरी तरह से गलत है, क्योंकि रचना-शिल्प और वस्तु-विधान की दृष्टि से यह काव्य किसी जैन साधु द्वारा विरचित नहीं हो सकता। यदि ऐसा होता तो अवश्य ही इस रचना की अन्तर्वस्तु में जैन धर्म का प्रसार मिलता, जो कि नहीं है। इस स्थिति में इसका रचनाकाल नवीं शताब्दी मान लेने में कोई आपत्ति नहीं दिखाई पड़ती।

इस ग्रन्थ की प्रामाणिक हस्तलिखित प्रति पूना-संग्रहालय में सुरक्षित है। इसमें कुल पाँच हजार छंद हैं। इसमें समकालीन राजाओं के आपसी विवादों के बाद हुए एकता के साथ-साथ अब्बासिया वंश अलमॉमू खलीफा और खुमाण के साथ हुए युद्ध का चित्रण मिलता है। इस कृति का प्रमुख सरोकार राजा खुमाण का चरित्रांकन करना है। उनके प्रेम को दर्शाने के लिए ही कृतिकार ने नायिका भेद और षट्ऋतुवर्णन का उल्लेख भी किया जो रमणीय। वीर और श्रृंगार रस के साथ इसमें दोहा, सवैया और कवित्त छंदों का उपयोग किया गया है। इसकी भाषा राजस्थानी हिन्दी है। जैसे –

पिउ चित्तौड़ न आविऊ सावण पहिली तीज।

जौवे वाट रति विरहिणी, रिवण-रिवण अणवै खीज।।

संदेसो पिउ साहिबा, पाछो फिरिय न देह।

पंछी घाल्या पीज्जरे, छूटण रो संदेस।।6

2. परमाल रासो – इस परम्परा की अगली कृति के रूप में परमाल रासो का नाम लिया जाता है। इसेआल्हाखण्ड भी कहते है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे बैलेड तथा डॉ. रामकुमार वर्मा ने इसे वीरगाथा काव्य कहा है।7 अभी तक इसकी प्रामाणिक प्रति उपलब्ध नहीं हुई है जो  ‘आल्हाखण्ड प्रप्त है वह बहुत बाद में लिपिबद्ध किया गया है। सर्वप्रथम सन् 1865 ई. में चार्ल्स इलियट ने जिसआल्हाखण्ड का प्रकाशन कराया था, वह पूरी तरह से मौखिक परंपरा पर आधारित है। इसी प्रति को आधार बनाकर डां. श्यामसुंर दास ने  ‘परमाल रासोका पाठ निर्धारण किया और नागरी प्रचारणी सभा, काशी से प्रकाशित कराया। पाठ-निर्धारण के बाद भी यह कृति प्रामाणिक नहीं बन सकी। यह 13वीं शताब्दी के प्रारंभ की रचना है। इसके रचयिता जगनिक हैं,जो महोबा के नरेश परमर्दिदेव का आश्रित था। रचनाकार ने इस काव्य में महोबा के दो देश प्रसिद्ध वीरों आल्हा और ऊदल के वीर चरित्र को यथार्थ ढ़ंग से प्रस्तुत किया है। इसमें आल्हा छंद (वीरछंद) का प्रयोग हुआ है। इसकी भाषा बैसवाड़ी है।

इसका प्रचार वैसे सारे उत्तर भारत में है पर बैसवाड़ा इसका प्रमुख केन्द्र है। वहाँ इसके गाने वाले अधिक मिलते हैं। बुन्देलखण्ड में, विशेष रूप में महोबा के निकट क्षेत्रों में इसका अधिक प्रचलन मिलता है। गीत-योजना और छंद विधान की दृष्टि से यह एक वीरगीतात्मक काव्य है-

बारस बरिस लै कुकूर जिएँ, औ तेरह लै जिएँ सियार।

बरिस अठारह क्षत्री जिएं, आगे जीवन को धिक्कार।।8

3. जयचन्द्रप्रकाश और जयमयंक जस-चन्द्रिका – रासो काव्य परम्परा में जयचन्द्रप्रकाश और  ‘जयमयंक जस-चन्द्रिकाका उल्लेख मिलता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने शिवसिंह सरोज के आधार पर इन्हें क्रमश: भट्टकेदार तथा मधुरकवि की कृति माना है। ये रचनाएँ सन् 1167 ई. से सन् 1186 ई. के मध्य लिखी गई थी। ये कवि कन्नौज के राजा जयचन्द्र के समकालीन थे और उनके दरबार की शोभा बढ़ाते थे। कुछ इतिहासकार ने भट्ट केदार को शहाबुद्दीन गोरी का दरबारी कवि माना है जो कि गलत है। सोचने की बात है कि यदि ये शहाबुद्दीन गोरी के दरबारी कवि होते तो उनका यशोगान करते, पर उन्होंने ऐसा न करके, जयचन्द्र का यशोगान किया है।  ‘जयमयंकजस-चन्द्रिका के रचनाकार मधुकर ने भी इस ग्रन्थ में जयचन्द्र के प्रताप और पराक्रम का विस्तृत वर्णन किया है। इन कृतियों तथा हस्तलिखित प्रतियों की अनुपलब्धता के कारण इनका असित्व खतरे में है। जो भी हो, एतिहासिक संदर्भों में इन कवियों का अस्तित्व सुरक्षित है, भले ही ये कृतियां,नोटिसमात्र ही क्यों न हों।

4. हम्मीर रासो -  इस परम्परा की चौथी कृति का नाम हम्मीर रासोहै। आज तक स्वतंत्र रुप में इस रचना की खोज नहीं हो पायी है। हाँ,प्राकृतपैंगलम् में हम्मीर से संबंधित आठ छंद अवश्य उपलब्ध हैं। इन्हीं आठ छंदों के आधार पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने  इसके अस्तित्व की कल्पना की है। प्रचलित धारणा के अनुसार इस कृति के रचयिता शाड़र्गधर माने जाते हैं पं. राहुल सांकृत्यायन ने  ‘प्राकृत पैड.गलम के आठ छंदों ( हम्मीर से संबंधित) से रचयिता के रुप मेंजज्जल का नामोल्लेख किया है - उचित भी है। सचमुच प्राकृतपैंगलम् के दो छंदों में इस रचनाकार का नाम आया है –

1. हम्मीर कज्जु जज्जल भणह कोणाहण मुँह मह जलउ।

सुणतान सीस करवाण दह तेज्जि कबलेर दीअचलउ।9

2. ढोण्णा मारिअ ढिण्णी मह मुच्छिम मेच्छ सरीर।

पुर जज्जला मंतिवार चलिउ वीर हम्मीर।10

दूसरे की अंतिम पंक्ति का अर्थ यह है जज्जल और मंत्रिवर आगे करके वीर हम्मीर चले न कि आगे मंत्रिवर जज्जल को करके वीर हम्मीर चले (जैसा कि आचार्य शुक्ल ने किया है)। उस काल का कवि तलवार का भी धनी होता था जो सेना के आगे-आगे चलता था जैसे चन्दबरदयी। उसके बाद मंत्री और राजा रहते थे। डॉ. माताप्रसाद गुप्त जैसे विद्वान इन पंक्तियों के अर्थ को न समझ पाने के कारण ही उज्जल को मंत्री मान लिया है। हम्मीरदेव सन् 1300 ई. में अलाउद्दीन की चढ़ाई में मारे गए थे। इसीलिए इस कृति का रचनाकाल 13वीं शती ही मानना चाहिए। इसमें हम्मीर देव और अलाउद्दीन के युद्ध का ही चित्रण किया गया है।

5. वीसलदेव रासो -  ‘वीसलदेव रासो इस परम्परा की पाँचवी कृति है। इसकी रचना बारह से वहोत्तराँ मझारि। जाठ वदी नवमी बुधवारि के अनुसार जेष्ठ वदी नवमी, दिन बुधवार सन् 1155 ई. (संवत् 1212 वि.) में हुई थी। इसके रचयिता – नरपति नाल्ह थे, जो अजमेर के चौहान राजा बीसलदेव (विग्रहराज चतुर्थ) के समकालीन थे। यह एक श्रृंगारमूलक रचना हैं जो गेय है। इसमें चार खण्ड हैं। पूरी रचना श्रृंगारमूलक रचना हैं जो गेय है। इसमें चार खण्ड हैं। पूरी रचना लगभग 2000 चरणों में समाप्त हुई है। इसमें चार खण्ड में बीसलदेव और मालवा के भोज परमार की कन्या राजमती का विवाह-वर्णन, दूसरे खण्ड में बीसलदेव का रानी से रूठकर उड़ीसा जाना तथा वहाँ बारह वर्षों तक रहना, तीसरे खण्ड में राजमती का विरह-वर्णन बीसलदेव का उड़ीसा से लौटना और चौथे खण्ड में भोज का अपनी पुत्री को अपने घर ले आने की कथा तथा बीसलदेव का उसे पुनः चित्तौड़ लौटा लाने का प्रसंग वर्णित है। पूरा काव्य वर्णनात्मक शैली में लिखा गया है। यह एक कोमलधर्मी रासक काव्य है जो प्रेम प्रधान होने के कारण गेय है। इसमें मिलन की संवेदनाएं कम, विरह की संवेदनाएँ अधिक है। इस प्रकार यह एक संदशकाव्य, गेयकाव्य और विरह प्रधान काव्य है। इसकी भाषा परवर्ती अवहट्ट है।

6. विजयपाल रासो – मिश्रबन्धुओं ने इस परम्परा की एक कृतिविजयपाल रासो का उल्लेख किया है जिसके रचयिता नल्लसिंह है। इस कृति का नायक विजयपाल सम्भवतः विश्वामित्र गोत्रीय गुहिलवंशीय राजा विजयपाल से भिन्न है जिसने काई नामक वीर योद्धा को पराजित किया था। इस राजा के प्रपौत्र विजय सिंह का एक हिन्दी शिलालेख दमोह (मध्य प्रदेश) में प्राप्त हुआ है; ने इस रचना में रचनाकार ने राजा विजयपाल सिंह और बंगराजा के बीच हुए युद्धों को सजीव रूप में चित्रित किया है। इसका रचनाकाल सन् 1298 ई. है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसी नाम की दूसरी कृति का उल्लेख भी किया है जिसके रचनाकार मल्लदेव है। शिल्प-विधान की दृष्टि से यह आदिकाल के बाद की रचना ठहरती है।

7. पृथ्वीराज रासो – इस परम्परा की अन्तिम कृति पृथ्वीराज रासो है। इसके रचयिता चन्दबरदाई है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में – ये हिन्दी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका पृथ्वीराज रासो हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है। चंद दिल्ली के अंतिम हिन्दू सम्राट महाराज पृथ्वीराज के सामंत और राजकवि प्रसिद्ध हैं। ये महाराज पृथ्वीराज के राजकवि ही नहीं, उनके सखा और सामंत थे; तथा षड् भाषा, व्याकरण, काव्य, साहित्य, छंदशास्त्र, ज्योतिष, पुराण, नाटक आदि अनेक विधाओं में पारंगत थे।11 इनका जन्म सन् 1168 में हुआ था। जनसुति के अनुसार जिस समय पृथ्वीराज चौहान को मुहम्मद गोरी बन्दी बनाकर ले जा रहा था, उस समय चन्द भी महाराज के साथ गया था। उसी समय वह अपने पुत्र जल्ल (जल्हण) को पृथ्वीराज रासो को सौंप गया था।पुस्तक जल्हण हत्थ दै, चलि गज्जन नृप काज। ऐसा विश्वास है कि जल्हण ने चन्द के अपूर्ण महाकाव्य को पूरा किया था।

अभी तक पृथ्वीराज रासो के चार संस्करण ही उपलब्ध हैं। प्रथम संस्करण जिसका कलेवर बड़ा है, काशी नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित है और जिसकी हस्तलिखित प्रतियाँ उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है। यह प्रति 17वीं शती के आसपास की है। तीसरा संस्कार लघु है जिसमें 3500 छंद ही संकलित हैं। इसमें केवल 19 समय हैं। इसकी प्रति बीकानेर (राजस्थान) में सुरक्षित है। चौथे संस्करण के पृथ्वीराज रासो में केवल 1300 छंद है जिसका प्रकाशनराजस्थान भारती से हुआ है। यह सबसे छोटा संग्रह है।

पृथ्वीराज रासो काव्य-रूप की दृष्टि से एक ऐसा बेजोड़ महाकाव्य है जिसमें मानव-जीवन के दोनों गरिमामय और उदान्त पक्षों तथा वीर और श्रृंगार-भावनाओं का प्रभावपूर्ण रूप एक साथ वर्णित दिखलाई देता है। इसका नायक पृथ्वीराज अमित पौरुष और शौर्य के ही नहीं, उस युग के गौरवशाली परम्परा और संस्कृति के प्रतीक हैं। यह कृति भारतीय इतिहास-गाथा की कड़ी है जिसमें उस युग के सामंती-जीवन के सम्पूर्ण परिवेश और उसके कर्म को यथार्थ संदर्भों में उजागर किया गया है। साहित्यिक दृष्टि से इसमें वस्तु-वर्णन, भाव-व्यंजना, छंद प्रयोग और अलंकार-विधान का अनूठा प्रयोग किया गया है। इसकी भाषा डिंगल और पिंगल दोनों है। युद्धों के वर्णन में वीरता और पराक्रम की अद्भूत सर्जना हैं, सौन्दर्य, प्रेम-विलास के रसीले चित्र उतारे गए हैं – परन्तु नैतिक मर्यादाओं का कहीं उल्लंघन नहीं हुआ है। वस्तु, संवेदन, रंग और ध्वनियों के सम्मिलित प्रभाव के उदाहरण सहज ही मिल जाते है –

वज्जिय घोर निसान रान चौहान चहूँ दिसि।

सकल सूर सामंत समर बल जंत्र मंत्र तिसि।

उठ्ठि राज प्रथिराज बाग लग्ग मनहु वीर नट।

कढ़त तेग मन बेग लगत मनहु बीजु झट्ट घट्ट।12

चारण-साहित्य का अपना एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्त्व है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में यह साहित्य उन सामंतो के शोषण-कर्म को उजागर करता है जिसका संबंध जर, जोरू और जमीन से था। उनके द्वारा जो भी युद्ध किए जाते रहे उनका संबंध केवल उन्हीं से था। सामान्य जनता से इसका दूर तक नाता नहीं था। युद्ध के जीत के रूप में हस्तगत नारी केवल सामंतों की भोग्या बन कर रही थी। सामान्य जनता के हित-चिन्तन जैसे सरोकारों से उसका कोई संबंध नहीं था। राजनीति के नाम पर जो भी हथकण्डे अपनाए जाते थे – उससे मात्र सामंतो का हित-चिन्तन होता था। युद्ध इस काल में सामंतों की प्रसिद्धी और गौरव का कारण बनी हुई थी। मानव-समाज और सर्वहारा वर्ग के बारे में सोचने के लिए उनके पास अवकाश नहीं था। युद्ध जाति विशेष का पेशा बन गया था। इन सामंतों के दो ही प्रमुख कार्य थे – युद्ध करना और युद्ध में प्राप्त की गई वस्तुओं का उपभोग करना। नारियों को भोग्या वस्तु बनाकर इन सामन्तों ने अपने सामाजिक स्तर को और भी गिरा दिया था। बाहरी आक्रमणों ने देश, जाति और समाज की स्थिति को अवनति के कगार पर पहुँचा दिया। निरंतर युद्ध के अनुगूँज से देश और जाति की सांस्कृतिक विकास की गति थम-सी गई थी। सांस्कृतिक विरासत के रख-रखाव की चाह सामंतों में न थी। युद्ध और विलासिता ही उनके जीवन का मुख्य सरोकार बन गया था। साहित्यिक संरक्षण के रूप में उन्होंने जिन चारण-रचनाकारों को प्रश्रय दे रखा खा उनका मुख्य कार्य युद्धोन्माद को उत्पन्न कर देने वाली घटना-योजना का आविष्कार था। उन्होंने सामान्य जनता को रचना में स्थान नहीं दिया। सामंत ही उनके लिए सब कुछ थे। सारी सृजनात्मक ऊर्जा लगी हुई थी। सामाजिक और सांस्कृतिक कर्म के विविध पहलुओं की ओर उनकी दृष्टि नहीं जा सकी। निम्न-मध्यवर्ग की उपस्थिति उनकी रचनाओँ में नहीं के बराबर थी। देश और राज्य की भीतरी लड़ाई और बाहरी आक्रमणों से निम्न-मध्यवर्ग की आर्थिक स्थिति लड़खड़ा उठी। ऐसी स्थिति में जो रचनाएँ सामने आई उनें केवल सामंतों के गुणगान की प्रमुखता रही। 

 

 

 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

1. हिन्दी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या 20

2. हिन्दी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारी प्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ संख्या 37         

3. हिन्दी साहित्य का उद्भव और विकास, हजारी प्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ संख्या 49

4. हिन्दी साहित्य का आदिकाल, हजारी प्रसाद द्विवेदी

5. हिन्दी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या 20

6. हिन्दी साहित्य का इतिहास, सं. डॉ. नगेन्द्र, पृष्ठ संख्या 53

7. खुम्माण रासो, लेखक – दलपति विजय, सम्पादन – ब्रजमोहन जावलिया

8. हिन्दी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या 33

9. वही, पृष्ठ संख्या 33

10. राजस्थान की हिन्दी कविता, प्रकाश आतुर, पृष्ठ संख्या 22

11. वही

12. हिन्दी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या 24

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