कहानी: खोज

प्रीति गोविन्दराज
   एक दो बार और झुंझला कर कंप्यूटर की स्क्रीन पर मेरी आँखें टिकी रही। नाम वही टाइप किया जो पिछले दो -चार वर्षों से लगातार टाइप किए जा रहे थी। अंततः मेरे अथक प्रयास का कोई फल मिलेगा भी या नहीं? ‘सुधा पंडित’ - एक उंगली के संकेत से इतने सारे नाम और तस्वीर उभरे, लेकिन सब अजनबी चेहरे! मेरी अपनी सुधा कहाँ है, वह कहाँ छुपी बैठी है? अचानक विचार आया कि इंजीनियर सुधा पंडित लिखकर दोबारा खोजा जाए तो संभव है कुछ सफलता मिले। आज तो मैंने पंद्रह बार इसी तरह अपने धैर्य की परीक्षा ली थी, किंतु सुधा ने तो जैसे गोपनीयता शब्द को बहुत गंभीरता से लिया था। फिर याद आया कि कुछ दिनों तक सुधा ने अपने घर के पास एक इंजीनियरिंग कॉलेज में जूनियर लेक्चरर के रूप में काम किया था। यह उस समय की बात थी जब वह अपनी माँ के देहांत के बाद बाबा के साथ रहने गयी थी। मस्तिष्क पर कुछ और दबाव डाला तो स्मृति-पटल पर वह नाम भी उभरा। जल्दी से डी ए कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के अंतर्गत पुनः अपना अन्वेषण जारी रखा। सहसा वही चिरपरिचित नाम, ‘सुधा पंडित’ दिखाई पड़ा, जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी। उंगलियों में और मन मस्तिष्क में स्वतः स्फूर्ति का संचार हुआ। भौंहें ध्यान में सिकुड गई होंगी, ठीक वैसे ही जैसे मेरी आदत थी! मुझे मेरी प्रिय सुधा चिढ़ाया करती थी, “तू इस तरह से तेवर क्यों चढ़ा लेती है?” “अरे यार, बचपन की आदत है, जब किसी चीज़ को पूरी एकाग्रता से करती हूँ न, तो माथे पर बल पड जाते हैं” मैं अपनी सफाई देती। और हंस कर मैं अपने मस्तक की सिलवटें मिटा देती। 

आशा की एक लहर तन मन में दौड़ पड़ी जब उस नाम को क्लिक किया। मेरे आश्चर्य की सीमा न रही, उसके नाम के आगे 2000 की तिथि थी। जब सुधा ने यह नौकरी आरंभ की थी, तब यही समय रहा होगा, मैंने अनुमान लगाया। उसकी दुर्घटना ठीक दो वर्ष बाद घटी थी, मतलब यह हुआ कि सुधा वर्तमान समय में वहीं काम कर रही है? वहीं फोन और नये इमेल का पता भी मिला, अपने सौभाग्य पर इतराने लगी। चार वर्ष पूर्व सुदेश को अमेरिका से वियतनाम जाना पड़ा, स्थानांतरण पर। उस समय हमारे बच्चे भी छोटे थे और ज़िम्मेदारियां भी अधिक। नये देश को अपनाने में समय भी लगता है और श्रम भी। मकान को घर बनाने में, स्वयं को नूतन वातावरण में सुव्यवस्थित करने में छह-सात महीने आराम से लग ही गये। बच्चों की स्कूल सबसे पहली प्राथमिकता थी। फिर उसके बाद छोटे बच्चे की देखभाल के लिए किसी को चुनना, कहाँ आसान था! अपने ढंग से किसी को ढालना वैसे भी सरल नहीं होता। विशेषकर, जब वह हमारी भाषा, संस्कृति और खान-पान नहीं जानता हो। इन सब समस्याओं का निदान करने के बाद मुझे कुछ फुर्सत मिली। 
इन्हीं दिनों मुझे इंजीनियरिंग स्कूल के एक अंतरंग सहेली का इमेल मिला। सुधा अजीब सहेली है, आवश्यकता और आशा से कहीं अधिक स्नेह दिखाने वाली - सामने पाओ तो ढेर सारी बातें, किंतु संपर्क रखने में उसकी बड़ी कंजूसी थी। मेरे विवाह से पहले मेरी हर छोटी बड़ी खरीदारी कराने वाली, मुझे बात-बात पर आईना दिखाने वाली, कितनी घनिष्ठ मित्रता थी हमारी। विवाह के दिन मेरे साथ प्रति क्षण रहने वाली, विवाह के बाद जैसे हवा में छूमंतर हो गई। न पत्र, ना फोन... सुदेश के साथ मेरा नया संबंध मुझे व्यस्त रखता था किंतु फिर भी मैंने अपनी ओर से उससे संपर्क बनाए रखा। कभी चिट्ठी भेज दी, कभी तस्वीरें, किंतु उसकी ओर से पत्र नहीं आते, जाने क्यों? इतनी हंसमुख और तीव्र बुद्धि की ये चुलबुली लड़की हमारी तरह अमेरिका क्यों नहीं आ जाती? मुझे उस तरह की सहेली यहाँ मिली ही नहीं! यही प्रश्न तो सुदेश ने भी कई बार मुझसे पूछा। सुधा ने ही तो विवाह के समय मेरा साज-श्रृंगार किया था। वैसे तो कई ऐसे अवसर आते जब मैं सुधा को याद करती। आज भी सुदेश साड़ी पहनने का आग्रह करते हैं, तो मैं वह दिन याद करती हूँ जब सुधा निपुणता से साढे पाँच मीटर के कपड़े को झटपट मेरे तन पर मिनटों में लपेट देती। ऐसी दक्षता मुझमें कहां, पल्लू बैठा लो तो चुन्नट सरकने लगे! ऐसा नहीं था कि सुधा ने सिखाने की कोशिश नहीं की, कुछ विद्याएँ मुझे आई ही नहीं। विवाह के समय सुदेश और सुधा को मैंने मिलवाया था। सुधा की प्रकृति ऐसी थी की पहली भेंट में वह बिल्कुल चुप-चुप रहती। किन्तु रूम मेट के रूप में जब वह मुझे पहली बार मिली थी, तब ऐसा नहीं था। कुछ अनूठा रिश्ता था, कि हम मिलते ही अंतरंग सहेलियां बन गईं। सुधा की बाकी सभी सहपाठियों के साथ भी ऐसा संबंध नहीं था। सुदेश स्वयं भी कहाँ इतनी जल्दी मिलते-जुलते हैं किसी से? संबंधों को गहरा बनाने में समय लगता है। हम दोनों साढे-चार वर्ष तक एक ही कमरे में रहे, फिर उसके बाद एक वर्ष और साथ ही रहे बैंगलोर में। जब तक जीवन में जीवनसाथी का आगमन नहीं हो जाता, तब तक सहेलियां अपने हंसी मज़ाक और अठखेलियां से जीवन में माधुर्य घोलती हैं! कितना सुखद समय था, जब हमारी पहली नौकरी लगी थी। आर्थिक स्वावलंबन से अधिक आनंद इस बात का था कि अब पढ़ाई के भार से छुटकारा हो चुका है। हॉस्टल के खाने के बाद शॉपिंग का मज़ा, कभी रेस्टोरेंट का चटपटा ज़ायका, तो कभी सिनेमा की काल्पनिक दुनिया में खुद को भूलना। सुधा के साथ बिताए समय में मस्ती के अलावा, एक और प्रमुखता थी, जो बार-बार उभरती। ‘सुधा की अच्छाई’, उसके अन्य सभी प्रतिभाओं के मध्य भी प्रकाशमान रहता। जब परीक्षा सर पर होते और सब नंबरों की होड़ में लगे रहते, तब मैंने उसे कमज़ोर सहपाठियों की मदद करते देखा है। उसकी रूम मेट होने के कारण मैं यह भी जानती थी कि सुधा अपनी अधूरी पढ़ाई छोड़ कर किसी और को सिखाने लग जाती। उसने समझाने की क्रिया को इतना स्वाभाविक बना दिया था कि पूछने वाले को शर्मिंदगी ना हो, कि यहाँ तक आप कैसे पहुँच गए? “मुझे भी इसी में सबसे अधिक कठिनाई हुई थी... तुम्हें समझाते-समझाते मेरी अपनी धारणा भी स्पष्ट हो गई इत्यादि।” निर्मलता मन में इतनी थी कि किसी को मदद माँ गते हुए उससे अपमानित ना होना पड़े। 

 कॉलेज के दिनों में सुधा हम सब सहेलियों को एक रहस्यमय और रोचक किस्सा सुनाती थी। वह कहती कि उसका एक बॉयफ्रेंड है, निहायत खूबसूरत और होनहार। वह एम आई टी में स्नातकोत्तर के बाद अब सिएटल में नौकरी कर रहा है। आयु में उससे तीन वर्ष बड़ा है और शीघ्र ही उनका विवाह हो जाएगा। सुधा की बातें सदैव ही विनोद भरी होतीं, कितना सच और कितनी कल्पना कोई नहीं जानता! यदि उसकी इस कथा का विवरण मांगा जाए, तो मानो सुधा को मुँह मांगा इनाम मिल गया हो! उसका नाम अभिजीत, उसका परिवार नागपुर में ही रहता है। उसका कद छह फुट, उसकी आँखें बड़ी और भूरी और स्वभाव मिलनसार और अत्यंत हास्यकर। वे दोनों एक दूसरे को तीन साल से जानते हैं। उसे पाव-भाजी और कोल्हापुरी मटन प्रिय है। खाने में रुचि तो है ही, उसे स्वादिष्ट खाना बनाना भी आता है। यदि संदेह जताओ तो मुँह फुला कर पूछेगी, “क्यों, क्या मुझे कोई पसंद नहीं कर सकता? क्या मेरे भाग्य में जीवनसाथी नहीं हो सकता? क्या सचमुच मैं दिखने में इतनी बुरी हूँ?” कहने वाले की तो शामत थी। झेंपकर कहने लगते कि, “मेरे कहने का यह मतलब नहीं था, ऐसा क्यों सोचती हो?” इतना सुनते ही सुधा खिलखिला कर हंस पड़ती, जैसे यह सब कुछ तो बस उसकी अठखेली थी। दुर्भाग्य से, सच्चाई यह थी कि सुधा का मन जितना सुंदर था उसका रूप, उसकी तुलना में दस प्रतिशत भी नहीं। सांवली, दुबली-पतली साधारण काया और नैन-नक्श में भी कोई आकर्षण नहीं। किसी को भी आकृष्ट करने वाली व्यक्तित्व की स्वामिनी, बाह्य सौंदर्य में बहुत पीछे रह गई थी। पता नहीं उस का यह प्रसंग सत्य था या मिथ्या? 

सुधा का परिवार नागपुर में रहता था। सामान्य निचले मध्यम वर्गीय श्रेणी का, छोटा-सा परिवार। पिता रेलवे अफसर की पद से सेवानिवृत्त हुए। सुधा की दीदी विद्या का विवाह हो चुका था। इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष में सुधा मौसी बनी। उसके बाद हर सप्ताह या दस दिन बाद बच्चे की फोटो समेत, विद्या दीदी का पत्र आ जाता। माँ पिताजी भी सुधा पर अपार स्नेह लुटाते। हमारी पूरी कक्षा में ऐसा कोई नहीं था जो सुधा के निष्कपट और हंसमुख व्यक्तित्व से अछूता रह पाता। 

मेरे विवाह के दो वर्ष बाद, अचानक उसका एक इमेल मिला। उस संदेश में एक दुखद समाचार भी था। सुधा की माँ को दिल का दौरा पड़ा और अकस्मात उनकी मृत्यु हो गई। पैंसठ की आयु में असामयिक देहांत, सुधा को पूरी तरह से हिला गया था। सुधा अमेरिका आने की सारी तैयारी कर चुकी थी लेकिन इस त्रासदी के कारण उसने अपनी योजना बदल दी। इतनी आदर्श पुत्री अपने पिता को ऐसी स्थिति में अकेले कैसे छोड़ सकती थी?

 सपरिवार वियतनाम पहुँचने के एक महीने बाद, सुधा का इमेल मिला। एक ऐसा इमेल जिसकी सामयिकता सरासर गलत थी! मेरे वैवाहिक जीवन को एवम् अमेरिका आये छह साल हो गए थे और सुधा से मिले, सात साल...। जैसे ही मैंने अमेरिका छोड़कर नए देश में पदार्पण किया, तब सुधा साहिबा अमेरिका पहुँच गई! इतने बड़े देश में, मेरे ही शहर में, भला यह भी कोई बात हुई? सुधा को यूनिवर्सिटी में लेक्चरर की पोस्ट मिली थी। मैं भौंचक्की रह गई, “अंकल ने आने दिया अपनी लाडली को?” मैंने मज़ाक किया तो उसका उत्तर मिला, “ बाबा तीन महीने पहले गुज़र गये हैं, इसलिए एक अनजानी जगह अपना दुख भुलाने आयी हूँ।” उसकी इमेल में और भी बहुत-सी जानकारी थी। उसकी दीदी विद्या अब सपरिवार दुबई में रहती है। दो वर्ष पूर्व उसके जीजा जी को वहाँ बढ़िया नौकरी मिल गई थी। पिछले वर्ष से उनका परिवार स्थायी रूप से वहीं बस गया था। अब उनके दो किशोर बच्चे थे, एक बेटा तथा एक बेटी। जब मेरा दूसरा बच्चा हुआ, तब भी सुधा कुंवारी ही थी। कभी-कभी सोचती कि पूछूँ, “क्या बात है, विवाह से क्या कोई परहेज़ है? या विवाह कब कर रही हो? अभिजीत के क्या हाल हैं? फिर सोचती कि यह भी कोई पूछने की बात है, जब कोई ऐसी बात होगी तो सुधा स्वयं बता ही देगी। संभव है, अभिजीत के साथ संबंध टूट गया हो, पिछले छह साल में तो एक भी बार उसका ज़िक्र नहीं हुआ। 

जो भी हो सुधा से संपर्क बनाने की इतनी प्रसन्नता थी कि तुरंत सुदेश को फोन लगाया। उन्होंने ईर्ष्या जताते हुए नाटकीय अंदाज में पूछा, “भला उसमें ऐसा क्या है जो मुझ में नहीं? मेरा संदेश पाकर तो कभी इतनी हर्षित होते हुए नहीं देखा!” मुझे याद है मैं खूब खिलखिला कर हंसी थी। कम से कम दो वर्ष बाद उससे साक्षात मिल भी सकूंगी। कितनी सारी बातें करनी है, शॉपिंग करेंगे पुरानी यादें ताज़ा होंगी! क्या पता उससे पूर्व भारत में, उससे मुलाकात भी हो जाये? इससे पूर्व मैंने भारत जाने से पहले प्रत्येक बार सुधा को मिलने हेतु संदेश भेजा था, किंतु उससे कभी उत्तर नहीं मिला। अन्य प्रवासियों की तरह मुझे भी भारत में अपने बहुमूल्य अवकाश के ढाई सप्ताह, तीन अलग-अलग शहरों में बांटने पडते। यदि सुधा इसलिए मुझ पर और दबाव नहीं डाल रही थी, तो यह उसका बड़प्पन था। उस इमेल के बाद दो-चार बार और पत्र का आदान-प्रदान भी हुआ। मैंने अपने व बच्चों के फोटो भी उसे भेजे। छोटे बेटे की तनी भवें देखकर उसने मुझे याद दिलाया कि मैंने अपने हाव-भाव बड़े स्नेह से अपने सुपुत्र को भेंट में दी हैं! छह-सात महीने बाद सुधा ने पुन: अपने स्वभावानुसार चुप्पी साध ली। उसके जन्मदिन के इमेल को भी केवल एक पंक्ति का धन्यवाद इमेल प्राप्त हुआ। उसके बाद मैं स्वयं भी बच्चों के स्कूल और सैर सपाटे में व्यस्त हो गई। 

एक दिन नागपुर की एक आपसी मित्र, शीतल का एक दुखद इमेल मिला, जिसे पढ़कर मुझे ऐसा आघात पहुँचा कि उसका वर्णन असंभव है। सुधा पिछले महीने एक भयानक दुर्घटना में अंतर्ग्रस्त हुई। उसे नौकरी संभाले कुल आठ हफ्ते ही हुए थे। बेचारी अपने जन्मदिन की शाम, सड़क के किनारे चल रही थी कि किसी गाड़ी वाले ने उस पर गाड़ी चला दी! दोष तो सरासर चालक का था किंतु उस बात से अब क्या प्रयोजन? ऐसी दुर्घटना कि वह अस्पताल के आई सी यू में तीन सप्ताह तक कोमा में पड़ी रही। सिर पर भारी चोट और शरीर पर इतनी हड्डियां टूटी कि कोई हिसाब नहीं। सारी शारीरिक क्रियाएं मशीनों से संपन्न हो रही थीं। वियतनाम से, सिवाय प्रार्थना और चिंता के मैं कुछ ना कर सकी। शीतल का तीन महीने बाद एक और इमेल आया, सच पूछो तो उसे खोलने से डर लग रहा था। 

किंतु उसे पढ़ कर मैं ईश्वर पर दुगना विश्वास करने लगी। सुधा को एक्यूट वार्ड में भेज दिया गया था, जिसका सीधा-साधा अर्थ यह था कि अब वह पूरी तरह से स्वस्थ हो सकती है। डॉक्टरों का कहना था की ऐसी काया पलट उनके समझ से बाहर है। जिस तरह वह कोमा में थी किसी को यह आशा नहीं थी कि उसे कभी होश भी आ सकता है। विद्या दीदी दुबई से आकर शीतल के यहाँ तीन हफ्ते तक रही। जब वे वापस जा रही थीं, तब भी सुधा की स्थिति मरणासन्न की थी, पूर्ण आरोग्य प्राप्ति की बात ही कहाँ! 

उसके बाद शीतल का एक ही इमेल आया, जिसमें उसने सुधा के बारे में इतना ही लिखा था कि पुनर्वासन के लिए उसे दूसरे संस्था में भेज दिया गया। उसके पश्चात शीतल अपने शोध कार्य के लिए जर्मनी चली गई। मीलों दूर से नित्य मैं उसके सेहत के लिए प्रार्थना करती। डेढ़ वर्ष बाद हम वापस अमेरिका आ गये। मैं लगातार सुधा के बारे में जानकारी प्राप्त करने का भरसक प्रयत्न करती किंतु आज से पहले इस खोजबीन में कोई सफलता हाथ नहीं लगी। 

आज इतने दिनों की साधना को फल मिल गया! सुधा की जानकारी मिली यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। इससे पहले सुधा का फोन नंबर होता तो कब का उसे फोन लगा दिया होता। भला हो उस कॉलेज की वेबसाइट का! दोनों देशों के मध्य समय का अंतर देख कर, उसे फोन लगाया। 

एक “हैलो” के बाद धड़कते दिल से सुधा की “हैलो” की प्रतीक्षा दीर्घ प्रतीत हुई। “हैलो” रोबदार लड़कों वाला स्वर जैसे असामान्य कठिनाई से उच्चारित हो रहा हो। अस्पष्ट उच्चारण के साथ-साथ उसका स्वर भी ऐसा लगा, जैसे नींद से भारी हो। “सुधा, मैं प्रिया बोल रही हूँ ”। “कैसी हो, ठीक हो?” एक सपाट सा, लापरवाह अभिनंदन। कुछ चुप्पी, फिर जैसे कुछ याद आया हो, “कौन सी प्रिया?” “प्रिया नाडकर्णी, हॉस्टल वाली प्रिया?” “ हाँ, हाँ प्रिया नाडकर्णी, हॉस्टल वाली” राहत की साँस लेकर मैं अपनी आँखों से छलकते आँसू पोंछने लगी। नाडकर्णी नाम त्याग कर ग्यारह साल हो गए, कब से कुलकर्णी नाम जुड़ गया था मेरे साथ, अब वही पहचान है। “कितनी बार मैंने तुझे ढूंढने की कोशिश की, पता है तुझे? तुम्हारा नाम गूगल करते-करते थक गई हूँ।” आश्वासन इस बात की थी की सुधा की पहचानी खिलखिलाती हंसी सुनाई पड़ी। यह निश्चल हँसी तो मेरी सुधा की ही थी। “सुधा तुम कैसी हो, ठीक हो गई हो बिल्कुल?” “हाँ, ठीक हूँ” किंतु बेमन-सा वो स्वर मानो मेरी सुधा का स्वर नहीं था। “मुझे तुम्हारा नंबर तुम्हारे कॉलेज की वेबसाइट से मिला, भगवान का शुक्र है तुम पूरी तरह से ठीक हो गई।” “हाँ, लेकिन मुझे स्थायी नौकरी नहीं मिली है, पहले कहा था की स्थायी नौकरी देंगे। हर महीने कहते रहे कि अगले महीने, फिर अंत में कह दिया कि साइट विज़िट पर नहीं जा सकती, इसलिए...। “क्यों?” “दूर तक चल नहीं सकती न?” “ओह, तुमने तो कहा कि तुम पूरी तरह से ठीक हो गई हो” “अब चलती हूँ, पिछले साल इतना चल नहीं पाती थी, थक जाती थी।” “लेकिन उन्हें मालूम तो होगा कि तुम इतनी बड़ी दुर्घटना से ठीक हो रही हो, पूरी तरह ठीक होने में समय तो लगता है।” “हाँ, मालूम तो था पर मैनेजमेंट बदल गया ना। पहले जो डीन थे, वो भी चले गए” उसका स्वर खिन्नता से भरा था, जैसे बच्चों का रूठा हुआ स्वर। मुझे लगा परिस्थिति की गंभीरता समझने की क्षमता नहीं रही या कम से कम घट तो गई ही थी। इतने समय के बाद मुझसे बात करते हुए वह यह नहीं समझ पाई कि यह सभी बातें मेरे लिए नयी हैं। “इसी कॉलेज में अमेरिका जाने से पहले डिपार्टमेंट हेड थी ना? फिर भी मुझे परमेनंट नौकरी नहीं दी, देख ना- बड़े बुरे लोग हैं।” मेरा मन बेचैन भी था और उदास भी। क्या कहती, जिससे उसका ढाढ़स बंध जाता? साथ रहने को यदि कोई अपना होता जो उसकी देखभाल कर सकता, उससे बातचीत कर लेता तो शायद मानसिक दशा में सुधार हो सकता था। “बाकी और भी तो कॉलेज हैं, वहाँ चेष्टा की?” “हाँ यार, इतनी परिश्रम करके क्लास में मैं थर्ड आई थी ना, मगर अब कहीं नौकरी नहीं मिल रही। सब जगह लोग पहले से नौकरी पर लगे हैं, ना? नो वैकन्सी” बच्चों की सी मासूमियत। “अब कभी ना कभी तो वैकेंसी खुलेगी, तुम अर्ज़ी देती रहो” “हाँ, तुम ठीक कह रही हो। कितने बच्चे हैं?” “दो लड़के हैं” मेरा मन फिर लड़खड़ाया, उसकी बातें एक विषय से दूसरे विषय तक कैसे उड़ रही थी। सुधा को अतीत की हर बात याद है, या सिर्फ कुछ-कुछ?

मेरी पहली नौकरी की एक कड़ी से मैंने अभी तक संपर्क बनाये रखा था। मिश्रा सर, अब कंसलटेंट के रूप में दो जगह काम कर रहे थे। कभी मल्टीनेशनल कंपनी में तो कभी विश्वविद्यालय में सलाहकार के रूप में। सुधा के लिए उनसे ज़रूर मदद मांगूंगी, मन ही मन सोचा। सुधा से संपर्क बनाए रखने का वादा लेकर, तुरंत उसे इमेल भी किया। दोनों ई-मेल पते पर, नया जो अभी मिला था, और पुराना जो उसका निजी ई-मेल था। कहीं बातचीत के बारे में भूल जाए तो कम से कम ई-मेल का सहारा तो होगा। आर डी आई कॉलेज ने वेबसाइट पर अपनी जानकारी संशोधन सामयिक ढंग से नहीं की, यह मेरा सौभाग्य था! ई-मेल तो मैंने कई बार लिखे, पता नहीं सुधा उसे पढ़ती भी है या नहीं? 

 मिश्रा सर को सुधा का परिचय देने के लिए जल्द ही फोन लगाया। संयोग से उनकी बेटी का नाम भी सुधा निकला! मन में आशा जगी कि शायद अपनी बेटी समझ कर, अपने जान-पहचान के कारण, सुधा को कोई नौकरी दिला दें। मेरी सुधा, फिर से स्वावलंबी बन जाए, यही कामना थी। जाने वह कितने समय से यूं ही घर पर बैठी थी? कुछ दिनों बाद फिर सुधा से फोन पर बात की, ई-मेल से उसका बायोडाटा मंगवाया। ई-मेल करते समय मुझे संकोच भी हुआ, क्या सोचेगी सुधा? मेरी योग्यता ही क्या थी, सुधा जैसे होनहार छात्रा को आज मेरी सहायता की आवश्यकता? चार वर्ष उसके तीव्र मस्तिष्क की समझ-बूझ के कारण रेंगते-पडते तो स्वयं पास हुई थी। अब आठ-दस साल के अपने बच्चों को गणित सीखा लेती हूँ। सुधा को इमेल करने के बाद पहली झिझक कम हुई, है तो अपनी सुधा! अहम जो भी कहता हो, स्नेह से भरे मेरे प्रयास को सुधा कैसे टालेगी? आखिर मुझे पूरे चार वर्ष तक उसी ने सिखा कर इस योग्य बनाया कि स्वयं भी वह यदि रुष्ट हो जाए तो मैं मना सकूं। उसकी शिकायत मुझे स्वीकार्य है, हममें कोई औपचारिकता थोड़ी है!

 अचानक मेरा सेल फोन फुदका, आशा से भरे नयनों ने सुधा का ई-मेल पढ़ा। उसमें उसका बायोडाटा भी सम्मिलित था, एक अर्ज़ीनुमा चिट्ठी भी। 

 प्रिय प्रिया,

 तुम्हारा फोन और उसके बाद तुम्हारा इमेल दोनों मेरे लिए आशा का संदेश लाये। कभी-कभी मैं बहुत निराश हो जाती हूँ। विद्या दीदी फोन पर बात करती है, और कभी-कभी मुझे पैसे भी भेजती है। नौ महीने हो गए घर बैठे-बैठे। एक वादा मैं करती हूँ, तुमसे संपर्क बनाये रखूँगी। कभी-कभी सोचती हूँ, कि तुम्हारा सतत प्रयास ना होता, तो मैं कब की खो गई होती। प्रत्येक बार तुमने मुझे ढूंढ ही लिया, शुक्रिया! 

 कब तक अपनी सुधा की सहायता करोगी? मालूम है कि घर-बाहर के मैनेजमेंट में निपुण हो गई हो। फिर भी साड़ी ढंग से पहननी तो नहीं आयी ना? तुम्हारी चिंता, तुम्हारा स्नेह दोनों मेरी बहुमूल्य निधियाँ हैं। अगली बार मुझसे मिलने जरूर आना, देख अपना अधिकार कैसे मांग रही हूँ?

सप्रेम सुधा (संभव है इसलिए जिंदा हूँ कि अमृत तो माँ-बाबा नाम में छोड़ गए थे!) 

 मैं मुस्कुराने लगी, इस बार सुधा मेरे अमृत मंथन के उपरांत ही मिल पाई थी। अब उसके अदृश्य होने की संभावना कम थी, ऐसा मुझे लगा।

विश्व हिंदी सचिवालय की कहानी प्रतियोगिता 2019 में अमेरिका क्षेत्र में प्रथम स्थान पाने वाली प्रीति गोविन्दराज वर्जीनिया में रहती हैं। वे व्यवसाय से मैं कैंसर नर्स हैं और कई वर्षों से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में मूलत: कविताएँ और कहानियाँ लिख रही हैं। उन्होंने अपने कुछ संस्मरण भी कहानियों के रूप में लिखे हैं।

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