व्यंग्य: कब टिकाएँगे आपको टीका

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

कोरोना की वैक्सीन आने की खबर पड़ोसीजी के पॉजिटिव हो जाने जैसी फैल रही है। हर कोई तिकड़म लगा रहा है। इनके बस में होता तो वैक्सीन लूट लेते और अपने-अपनों को ठोक देते। हाईवे पर जाम लगाने वाले लोगों में सुरसुरी फैला दी जाती कि किसानों को खेतों में और आम नागरिकों को घरों में टीका लगाया जाएगा। सब आंदोलनकारी ठिकाने पहुँच जाते और सरकार किरकिरी से बच जाती। देने वाले ने छप्पर फाड़ कर वैक्सीनें दी हैं, एक साथ तीन। शून्य से नब्बे  डिग्री नीचे वाली अमीर वैक्सीन फाइजर। फ्रिज में पड़ी रहने वाली मिडिल क्लास वैक्सीन मोडरना और बस्तियों में ठोकने के लिए स्पुतनिक।

टीका पाने वालों की प्राथमिकता तय हो रही है। ‘पहले आए, वो पहले पाए’ के हिसाब से टीका लगना होता तो लोग अस्पतालों को घेर कर लाइनों में खड़े हो जाते। बेरोजगार लोग अपना स्पॉट बीस-तीस हजार रुपए में बेच देते। राजनेताओं को पहले टीका लगना होता तो देश केसरिया गमछों, सफेद टोपियों और हरे साफों से भर जाता। पर टीका सबसे पहले स्वास्थ्यकर्मियों और बंदोबस्त में लगे फ्रंटलाइन वर्कर्स को लगेगा। इन्हीं लोगों पर नासमझों ने थूका था, इन्हीं के सामने पागल नंगे हुए थे। कई महीनों से बंद पड़े प्राइवेट क्लीनिक धड़ाधड़ खुल रहे हैं। जो डॉक्टर अज्ञातवास में भाग गए थे वे स्टेथोस्कोप लगाए जिला चिकित्सक के दालान में खड़े हैं। फ्रंटलाइन से बचने की जुगाड़ में जीत गए सहायक और पुलिस वाले अब वर्दी पहनकर बॉस के घर चक्कर लगा रहे हैं। सारा देश फौजी कर्तव्यनिष्ठा से भर गया है।

असली दस्तावेज जैसे नकली कागजात बनाने वाले गैंग सक्रिय हैं। उन्हें यह देखना है कि टीका पाए लोगों को सरकार जो इम्युनिटी पासपोर्ट या कार्ड जारी करती है उसमें चाँदी की चिप है या सोने का तार। उनके बनाए नकली पासपोर्टों से माल्या और नीरव जैसे कई लोग विदेश भागे हैं। उनकी नकली डिग्री से डॉ. चंपक बने किडनियाँ बेच रहे हैं। उनसे इम्युनिटी पासपोर्ट खरीदने वालों के ऑर्डर आना शुरू हो गए हैं। नोटबंदी जैसा खेल हो तो देश लाइन में लग जाता है। कोरोनाबंदी के टीके कुछ को घर बैठे लग जाएँगे, शेष करोड़ों लोग लाइनों में लगे रहेंगे। लाइनों में लगे बिना देश का उद्धार नहीं है।

फ्रंटलाइन के बाद प्राथमिकता मिलेगी फ्रंटियर लाइन वाले फौजियों को। वही तो हैं जो कोरोना के जनक-देश और आतंक के पालनहारे देश को उनकी औकात समझाते हैं। उनके बाद टीके का उपहार मीडिया वालों को मिलना चाहिए। वे किसी के भी बेडरुम में घुस कर खबरें बाहर नहीं निकालें तो? वे अपना काम नहीं करें तो प्रधानमंत्री मन ही मन समझते रहें कि सब मजे में है और वित्त मंत्रालय घोषणाओं के बड़े-बड़े पैकेज झुलाता रहे। मीडिया नहीं हो तो देश में खबरें ही नहीं हो। गोदी मीडिया नहीं हो तो बेचारी प्रजा को लगे कि सरकार उसके लिए कुछ नहीं करती, वह सरकार की सौतेली संतान है। फिर टीका लगेगा कलाकारों, लेखकों-कवियों को, ताकि देश और समाज सुरक्षित रह सके। अन्यथा वे नेगेटिव बोल-बोल कर टीके को घातक सिद्ध कर देंगे। पाठकों आप अंतिमजन है, आप ही नहीं बचेंगे तो हम किस पर अपना ज्ञान पेलेंगे। आपने पूछा- राजनेता क्या होगा? आप जनता भी कितनी भोली हैं। जो बिना राजनीति खेले अपने पेंशन-भत्ते डबल कर सकते हैं वे अपना बूस्टर डोज गुपचुप पा लेंगे।
बस भुलक्कड़ लोग नोट कर लें- क्रेडिट कार्ड, आधार कार्ड, पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस आदि घर रह जाएँ तो चलेगा, पर इम्युनिटी कार्ड गले में टँगा नहीं मिला तो चौदह दिन का क्वारनटाइन पक्का।
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