दो कविताएँ: दीपप्रिया मिश्रा

दीपप्रिया मिश्रा
शिक्षा: स्नातकोत्तर/बी.एड
कार्यक्षेत्र: राँची/सी.बी.एस.सी 10+2 शिक्षिका
प्रकाशन: दो साझा काव्य संग्रह प्रकाशित, एकल काव्य संग्रह 'अपूर्व अनुभूति' प्रकाशनाधीन, यदाकदा पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।


पथरीली डगर है

नाजुक पाँव तेरे और ये पथरीली डगर है
चलने से पहले सोच लो, दूर का सफ़र है

मिज़ाज समन्दर का है जाने क्यों बिगड़ा,
तूफानी लहरों की मर्जी पर आज शहर है

चल रहा हूँ मिले मंजिल या मौत मुझको
भूख-प्यास, धूप-मौसम, सब बेअसर है

शून्य में सिमटा समझ का दायरा, है बदहवासी
चल रहा हूँ रात दिन,कहीं ठौर ना ठहर है

झेल रहा था इक अभिशाप गरीबी का
अब उस पर बरपा कोरोना का कहर है

बनते-फूटते हैं फफोले दिल और पाँव के
दया के नाम पर, राजनीति का जहर है

क्रुद्ध अपने भाग्य पर,लड़ रहा साँस-साँस,
मृत्यु दिखला रहा तांडव, हर पहर है

स्वार्थ आगे, मानवता रही पीछे खड़ी,
अजाना-शहर, मैं अकेला, बेगानी नजर है
***


यह प्रेम नहीं

तुम्हारी याचना सुन
द्रवित हो कर
अगर वादा करूँ
न बिछड़ने की
तो यह प्रेम नहीं
सहानुभूति होगी
तुम्हारे जख्मों को
जो मैं लगाऊँ मरहम
और सहारा दूँ,
तुम्हारे लड़खड़ाते कदमों को
तो यह भी प्रेम नहीं
हमदर्दी होगी
तुम्हारा चेहरा पसंद आना
तुम्हारी बातों का हृदय छूना
प्रेम कहाँ?
आकर्षण ही तो है
तुम्हारे पांडित्य पर मुग्ध होना
तुम्हारी अदाओं का कायल होना
ये भी तो प्रेम नहीं
मानव मन की ये सहज प्रक्रियाएँ हैं
श्रद्धा -विश्वास भी तो प्रेम नहीं,
उपासना -आराधना भी प्रेम नहीं,
प्रेम... स्रोत है,
अनायास फूट कर बह निकलता है
रूप-कुरूप, अच्छा-बुरा,लाभ-हानि सोचना नहीं जानता
प्रेम तेज है, आँखों में उतर आता है
प्रेम तडित सा, हृदय पल में तड़पाता है
प्रेम इक उबटन है, तन मन निखर जाता है
प्रेम वैराग्य सा, ताज छोड़ जाता है
प्रेम पावन एहसास कोई
महबूब के कदमों पर टूट कर
पंखुड़ी सा बिखर जाता है
प्रेम तो बस प्रेम है... 
जितना लुटाओ और बढ़ जाता है!

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