‘शत प्रतिशत’: प्रवासी और भारतीय जीवन की विसंगतियों को उजागर करती कहानियाँ

समीक्षक: नीलोत्पल रमेश


'शत प्रतिशत' (कहानी संग्रह)

लेखिका: हंसा दीप
प्रकाशक: किताबगंज प्रकाशन, गंगापुर सिटी-322201
मूल्य: 250/-रुपए, पृष्ठ-172, वर्ष 2020 ई. 



'शत प्रतिशत' प्रवासी कथाकार हंसा दीप का तीसरा कहानी-संग्रह है। इसके पहले इनके दो कहानी-संग्रह 'चश्मे अपने-अपने' और 'प्रवास में आसपास' प्रकाशित हो चुके हैं। इनके दो उपन्यास 'कुबेर' और 'बंद मुट्ठी' भी प्रकाशित हैं। 'शत प्रतिशत' कहानी-संग्रह में सत्रह कहानियाँ संकलित हैं जिनमें की अधिकांश कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर प्रशंसित हो चुकी हैं।

डॉ. हंसा दीप
हंसा दीप की कहानियाँ प्रवासी जीवन की सच्चाइयों से रूबरू कराने में पूरी तरह सक्षम हैं। प्रवास में क्या हो रहा है, वहाँ के लोगों का जीवन स्तर कैसा है, वहाँ के लोगों की मानसिकता कैसी है आदि प्रश्नों का उत्तर सहज ही पाया जा सकता है, 'शत प्रतिशत' की कहानियों के द्वारा। हंसा दीप की भाषा इतनी सहज, सरल और ग्राह्य है कि सामान्य पाठक भी आसानी से समझ जाता है। बिना बनाव-सिंगार के हंसा दीप अपनी कहानियों को बुनती हैं और अपनी बात कहती हैं, जो बात वह पाठकों तक पहुँचाना चाहती हैं, पहुँचा ही देती हैं। इनकी कहानियों के माध्यम से प्रवासी जीवन और भारतीय जीवन की विसंगतियाँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं। पाठकों को कहानी पढ़ते समय ये बात मालूम भी पड़ जाती है।

'शत प्रतिशत' कहानी के माध्यम से लेखिका ने मानवीय स्वभाव को शत-प्रतिशत एक ही होना दिखाया है। लोगों की मानसिकता, रहन-सहन, सोच, पहनावा और विचार एक हो सकते हैं, जैसा कि इस कहानी में लेखिका ने दिखाया है। साशा के माध्यम से लेखिका ने बाल मनोविज्ञान की पड़ताल करने की कोशिश की है। साशा के जीवन में पड़ी बचपन की गाँठ खुल नहीं पाती है, उसके बड़ा हो जाने और अपने पाल्य के अच्छे व्यवहार के बाद भी। साशा अपने पिता द्वारा प्रताड़ित किए जाने की बातें, कभी भूल नहीं पाता है। बच्चों के कोरे मस्तिष्क पर पड़ा डर निकलने का नाम ही नहीं लेता है, यही कारण है कि साशा उससे उबर नहीं पाता है। वह अंत में गाड़ी चलाते हुए, लोगों को रौंदते हुए, अपनी जान गँवाना चाहता है। इस बीच उसकी प्रेमिका लीसा मिल जाती है। उससे वह बेहद प्रेम करती थी। लेकिन साशा उससे डरता था। उसके मन पर पड़ी बचपन की गाँठें खुलने का नाम ही नहीं ले रही थीं। वह उससे छुटकारा पाकर अपनी जान गँवाना चाहता था, उस किराए की गाड़ी से लोगों को रौंदते हुए। एकाएक वह देखता है कि एक ट्रक लोगों को रौंदते हुए उसके आगे से निकल पड़ा। लेखिका ने लिखा है- “साशा को सुनायी दे रहा था अपने कानों में कि वे सारे लोग साशा की बात कर रहे हैं, उसके ऊपर थूक रहे हैं, इस जघन्य अपराध के लिए गालियाँ बरस रही हैं, हर भाषा की गालियाँ बरस रही हैं उस पर। यह कौन था जो बीच में आया था, शत प्रतिशत उसकी प्रतिच्छाया बनकर। बिल्कुल उसी की तरह सोचने वाला और शायद बिल्कुल उसी की तरह न्याय तलाशता। अगर यह आदमी बीच में नहीं आता तो साशा यही तो सब कुछ करने वाला था।”
नीलोत्पल रमेश

साशा और लीसा इस खूनी दिन के साक्षी थे। साशा तो इस खूनी खेल का रचयिता बनने वाला था। दोनों एक दूसरे से लिपटे रहे, सांत्वना देते हुए। अंत में लेखिका ने लिखा है- “साशा की तेज धड़कनें बेजुबान थीं पर धड़कते हुए बहुत कुछ कह रही थीं, अतीत को अतीत में झोंककर नये पन्ने पर नयी कहानी लिख रही थीं। नि:संदेह अब लीसा की बाँहों में जो था एक नया व्यक्ति था, नयी सोच के साथ शत प्रतिशत परिवर्तित व्यक्ति साशा।” यह कहानी दिल को दहला देने वाली है, लेकिन अंत संभावनाओं को बचाए हुए है। 

'पूर्णविराम के पहले' कहानी के माध्यम से लेखिका ने एक ऐसी महिला की कहानी को कहा है जो बचपन में एक शिक्षिका से पाए स्नेह रूपी ऋण को चुकाना चाहती है। वह अपने ऊपर उस शिक्षिका के एहसान को कर्ज समझती है। वह ड्राइवर महिला लाख कोशिश करके भी उस शिक्षिका को नहीं ढूँढ पाती है तो वह लेखिका के नजदीक आना चाहती है। लेखिका में वह सब कुछ महसूस करती है, जो उस शिक्षिका में था। यही कारण है कि वह लेखिका से बस का टिकट नहीं लेती है। पर, लेखिका के मन में अनगिनत प्रश्न उठते हैं जिनका वह समाधान चाहती है। वह सोचती है कि यह ड्राइवर मेरी संपत्ति पर तो कहीं नज़र नहीं गड़ाई हुई है। अपने व्यस्ततम समय में एक दिन कुछ समय निकाल कर उस महिला ड्राइवर से पूछ ही लेती है। उसका जवाब सुनकर वह हतप्रभ रह जाती है। यानी पूर्णविराम के पहले के सारे विचार लेखिका के बेतुके थे। लेखिका ने स्पष्ट किया है- “उसका बस ले जाने का समय हो गया था, वह उसी मुस्कान के साथ जाने लगी और मैं उसे जाते देखती रही अपलक। चाहती तो उसे गले लगाकर अपना अपराध बोध कम कर सकती थी लेकिन हौसला नहीं जुटा पाई। बगैर कुछ जाने, बगैर कुछ समझे जितने आरोप किसी के ऊपर लगाए जा सकते हैं, मैं लगा चुकी थी। उस बेरूखी से, उस बेहूदी सोच से मैंने खुद को अपनी नज़रों में नीचे गिरा दिया था, पर मेरे जंगलीपन को इंसानियत के घेरे में संजो कर वह मेरी अनर्गल सोच पर पूर्णविराम लगा गयी थी।”

'इलायची' कहानी के माध्यम से लेखिका ने शौकत मियाँ के चरित्र को उजागर किया है। शौकत मियाँ अपने धर्म और कर्म के प्रति पूरी तरह समर्पित रहते थे। बचपन में अपनी पड़ोसी रजनी से प्यार भी करते थे, लेकिन रजनी का पूरा परिवार गाँव छोड़कर जा चुका था, तो वे रजनी को भूल-से गए थे। एक दिन रजनी उनके सामने उपस्थित होकर उनके घर में अपने संत महाराज को रुकवाना चाहती है, पर शौकत मियाँ का गोश्त का व्यापार था। संत महाराज रुकना नहीं चाहेंगे, पर एक शर्त पर वे तैयार हो गए थे कि पूरे घर को गंगाजल से धोकर पवित्र कर दिया जाए, तो वे रुकेंगे। ऐसा ही किया भी जाता है। शौकत मियाँ और रजनी का प्रेम सहयोगी बनता है। लेखिका ने शौकत मियाँ के बारे में लिखा है- “और फिर खाना और बेचना तो दूर ताउम्र गोश्त को छुआ भी नहीं, एक बार किसी को वचन दिया तो दिया। उम्र भर गोश्त से अपनी जीविका और जीवन चलाने वाले के लिये उससे दूर रहना एक महान संत के धैर्य जैसा था। संतों जैसी कोई प्रवृत्ति नहीं पर किसी संत से बहुत ऊपर। न जाने दोनों में बड़ा संत कौन था, एक घोषित संत था और दूसरा अघोषित संत। बिल्कुल एक इलायची की तरह मानवीयता की खुशबू से ओतप्रोत, अंतर्मन के हर दाने में भी और बाहरी छिलके में भी।”

'खिलखिलाती धूप' कहानी के माध्यम से लेखिका ने चार बूढ़ी बहनों के अतीत को याद किया है। ये चारों बहनें अपने भाई की मृत्यु के अवसर पर मैके आयी हुई थीं। क्रिया-कर्म समाप्त होने के बाद घर में अब कोई नहीं बचा था, माँ पहले ही गुजर गई थीं। ये बहनें माँ के पुराने बक्से को खोलकर देख रही थीं कि एकाएक एक अखबार में लिपटे कुछ फोटो मिले। ये फोटो उनके जवानी के दिनों के थे। इन्हें देखकर वे बहनें अपने-अपने अतीत में जीने लगती हैं। इन बहनों को लेखिका ने तितलियाँ कहा है, जो खिलखिलाती धूप में उड़ान भरने को बेताब थीं। यानी उनके अंदर चालीस वर्ष पूर्व की स्मृतियाँ हिलोरें मार रही थीं।

'उसकी मुस्कान' कहानी के माध्यम से लेखिका ने वर्तमान दौर में लड़कियों के द्वारा जीवन-साथी के चुनाव को लेकर अजीब तरह के लिए जा रहे निर्णय की ओर पाठकों का ध्यान दिलाया है। आज की युवतियाँ अपने साथी से प्रसन्न नहीं रह रही हैं, यही कारण है कि वे पूरा जीवन एक बूढ़े के साथ गुजार देने का निर्णय लेती हैं। एक पिता अपनी बेटी की मुस्कान को कायम रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है। यह कहानी बदलते पारिवारिक रिश्ते को व्यक्त करने में पूरी तरह सफल हुई है।

'प्रोफेसर साब' कहानी के माध्यम से लेखिका ने शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त कर्त्तव्यहीनता की ओर पाठकों का ध्यान दिलाया है। प्रोफेसर साब को कॉलेज या विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के सिवाय बाकी सभी काम करने में आनंद आता है। कॉलेज की राजनीति में तो सभी शामिल रहते ही हैं। ये जब पढ़ाने से भागते रहते हैं, तो अपने घर में छोटे बच्चों को पढ़ाते समय स्वयं को भूल जाते हैं कि वे किसे पढ़ा रहे हैं। ये कर्त्तव्यपरायणता की बात करते हैं, लेकिन स्वयं कर्त्तव्यहीन हैं।

'पाँचवीं दीवार' कहानी के माध्यम से लेखिका ने एक महिला समता सुमन के राजनीति में प्रवेश की पृष्ठभूमि को रेखांकित किया है। वैसे समता सुमन एक विद्यालय की प्राचार्या थीं, जहाँ पर उनकी तूती बोलती थी। उनकी धाक थी जिसका लोहा सभी मानते थे। राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता उन्हें राजनीति में घसीट लाते हैं। जहाँ पर वह पहले ही दिन अकबका गई थीं और पुन: इस ओर न रहने का निर्णय लेना चाहती थीं, पर उनका अन्तर्मन उन्हें राजनीति में ही बने रहने का संकेत दे देता है और वह पार्टी कार्यालय पहुँच जाती हैं। अब वह पाँचवीं दीवार के रूप में जनता का भविष्य तय करने का निर्णय ले लेती हैं।

'अक्स' कहानी के माध्यम से लेखिका ने बाल मनोविज्ञान की पड़ताल करने की कोशिश की है। पारिवारिक परंपराएँ यानी अक्स एक-दूसरे में हस्तांतरित हो जाते हैं। आज के बच्चे कल के नाना-नानी, दादा-दादी भी बनेंगे। उनके अंदर का बचपन हमेशा जिंदा रहता है, भले ही आज के नाना-नानी और दादा-दादी क्यों न बन गए हों। एक नानी को याद करती बच्ची, स्वयं जब नानी बन जाती है तो उसमें उसके नानी का अक्स हूबहू दिखाई पड़ता है। इस कहानी के द्वारा लेखिका बचपन को जीवंत बनाने में पूरी तरह सफल हुई हैं।

हंसा दीप 'शत प्रतिशत' कहानी-संग्रह के माध्यम से समाज में और हमारे आसपास व्याप्त कुरीतियों की ओर पाठकों का ध्यान खींचने में पूरी तरह सफल हुई हैं। लेखिका हंसा दीप एक मनोवैज्ञानिक की तरह सामाजिक परिवर्तन को देखती हैं, और उन्हें ही अपनी कहानियों का विषय बनाती हैं। हिंदी कथा-साहित्य में हंसा दीप की कहानियाँ समकालीनता का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होती हैं। इन कहानियों के माध्यम से हिंदी कथा-साहित्य की वर्तमान रचनाशीलता को जाना जा सकता है। पुस्तक की पठनीयता गजब की है। यानी एक बार शुरू करने के बाद पूरी कहानी पढ़े बिना चैन नहीं मिलने वाला है। पुस्तक की छपाई साफ-सुथरी है और प्रूफ की गलतियाँ नहीं हैं।
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समीक्षक संपर्क: डॉ. नीलोत्पल रमेश
पुराना शिव मंदिर, बुध बाजार, गिद्दी -ए, जिला – हजारीबाग, झारखंड -829108
चलभाष: +91 993 111 7537, +91 870 979 1120
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