निर्मल वर्मा के निबन्धों में व्यक्त धर्म और राजनीति विषयक चिंतन

श्रुति पाण्डेय

शोधार्थी (पीएच.डी हिंदी), हैदराबाद विश्वविद्यालय, तेलंगाना, भारत
चलभाष: 981 093 7130
ईमेल: sharmaangel748@gmail.com


निर्मल वर्मा एक ऐसे रचनाकार हैं जो अपने परिवेश को लेकर हमेशा सजग रहते हैं। इस परिवेश के केंद्र में मनुष्य के साथ-साथ संपूर्ण चराचर जगत के वह सभी घटक मौजूद हैं जो सम्मिलित रूप से जीवन को संभव बनाते हैं। जीवन-दृष्टि में यह समग्रता का बोध उत्पन्न होने के कारण ही मनुष्य यह समझ पाता है कि वह इस सृष्टि के क्रियाकलापों का द्रष्टा मात्र नहीं है। वह आत्मद्रष्टा भी है जो बाहर के विराट से अपने अंदर देखता है और यह पाता है कि वह स्वयं इस सृष्टि की गति से जुड़ा हुआ है। निर्मल वर्मा के अनुसार इस सृष्टि से यह लगाव अनुभव करना और यह बोध होना कि मनुष्य की अपनी सत्ता से विशाल भी कोई शक्ति है जो उसके इस सृष्टि के संबंध को संचालित करती है- यही ‘धर्म’ और ‘ईश्वर’ से उसका परिचय कराता है। उनका मानना है- “सब धर्म-संप्रदायों के अपने धर्मग्रंथ हैं, किंतु मनुष्य का धर्मग्रंथ सिर्फ यह सृष्टि है, जिसके बिना ईश्वर की अवधारणा असंभव होती।” 1 निर्मल वर्मा धर्म को उसके मूल अर्थ में ग्रहण करने के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं, भारतीय संदर्भ में उसको ग्रहण करते हैं न कि उसके प्रचलित अंग्रेजी के ‘रिलीजन’ के अर्थ में।

भारत में ‘धर्म’, ‘रिलीजन’ के अर्थ एवं संदर्भ में प्रयुक्त नहीं होता7 है। यहाँ धर्म और रिलीजन के अर्थ और उसके अंतर को समझना आवश्यक है। धर्म अपने मूल रूप में बहुत व्यापक अर्थ वाला है। धर्म का अर्थ रिलीजन नहीं है। धर्म शब्द की उत्पत्ति और उसके प्रारंभिक प्रयोग को समझना आवश्यक है। ‘धर्म’ शब्द संस्कृत के ‘धृ’ धातु से निर्मित है, जिसका अर्थ है ‘धारण करना’।

“धारणाद् धर्ममित्याहुधर्मेण विधृताः प्रज्ञाः।
यः स्याद् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः॥” 2 - यह धर्म का अर्थ स्पष्ट करने वाली सामान्य प्रचलित उक्ति है जिसका अर्थ है जो सभी को धारण करता हो और धारण करने योग्य हो, वह धर्म है। मनु ने धर्म के 10 लक्षण बताए हैं –

“धृतिः क्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम्”॥ (मनुस्मृति 6.92)

अर्थात् “धृतिः (धैर्य), क्षमा (क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियंत्रण), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (बाह्य और अंतरंग शुचिता), इंद्रिय निग्रह (इंद्रियों पर नियंत्रण), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या, सत्य और अक्रोध (क्रोध न करना) - यह धर्म के 10 लक्षण हैं।”3 

इसी तरह और उदाहरण देखें तो हम समझ पाएंगे कि धर्म कोई बंधी-बंधाई परिपाटी नहीं है। जब तुलसीदास रामचरित मानस में कहते हैं – “परहित सरिस धर्म नहिं भाई” और मैथिलीशरण गुप्त ‘जयद्रथ-वध’ में लिखते हैं –

“अधिकार खोकर बैठ रहना यह महा दुष्कर्म है,
न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है।”

इन दोनों उदाहरणों में ‘परोपकार’ और ‘न्यायोचित निर्णय’ भले ही वह कितना ही कठिन क्यों न हो - को धर्म बताया गया है। इस प्रकार धर्म वह है जो व्यक्ति के जीवन को अधिक अर्थवान, संतुलित और अनुशासित बनाता है। ऐसे गुणों का समुच्चय है जो गुण-दुर्गुण, नैतिक-अनैतिक में अंतर करना सिखाता है। जहाँ धर्म में सत्य, अहिंसा, न्याय, सदाचार जैसे अनेक अनुसरण करने योग्य तत्व निहित हैं, वहीं ‘रिलीजन’ का अर्थ देखें तो ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार – “The belief in and worship of a superhuman controlling power, especially a personal God or Gods”.4 यहाँ धर्म और रिलीजन के मध्य हम स्पष्ट अंतर देख सकते हैं।

इस तरह भारत में धर्म दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है और समूचे क्रियाकलाप में बसा हुआ है। निर्मल वर्मा एक साक्षात्कार में कहते हैं, “... यहाँ (भारत) धर्म का अभिप्राय ही वह नहीं था जो यूरोप में था। यहाँ धर्म का अभिप्राय पारलौकिक शक्तियों से अपना संबंध बिठाना ही नहीं था, जो यूरोप में था। धर्म वह एक पूरी श्रृंखला थी, जो मनुष्य को अपने कर्तव्य निभाने के लिए बाँधती थी। धर्म के कारण ही भारतीय मनुष्य राजनीति में भी अपना वैसा ही रोल अदा करता था, जैसे राजा का रोल होता था। धर्म हमारे समाज के समूचे क्रियाकलाप में रचा-बसा होता है। वह उसके आध्यात्मिक जीवन का कटा हुआ अंश नहीं होता जैसा कि यूरोपीय समाज में पाया जाता है।”5

इस प्रकार हम देखते हैं कि एक भारतीय व्यक्ति के जीवन में धर्म रचा-बसा हुआ है। जिस प्रकार पानी में चीनी के घुलने के बाद दोनों को अलग नहीं किया जा सकता उसी प्रकार धर्म को एक भारतीय व्यक्ति के जीवन से अलग नहीं किया जा सकता। वह उसे एक प्रकार की समग्रता प्रदान करता है जिसमें धार्मिक और लौकिक जीवन में अलगाव नहीं है। किंतु यह अलगाव यूरोप में मौजूद है जहाँ सप्ताह में रविवार का दिन जीसस क्राइस्ट को याद करने के लिए, चर्च जाने के लिए समर्पित किया गया है और बाकी के छः दिन दुनिया के लिए हैं।

धर्म के संबंध में जब भी बात की जाती है तो धर्मनिरपेक्षता का उल्लेख अनायास ही हो जाता है। धर्मनिरपेक्षता को अंग्रेजी में ‘सेक्युलरिज़्म’ कहा जाता है और सेक्युलरिज़्म का यूरोप में अपना एक इतिहास है। निर्मल वर्मा धर्मनिरपेक्षता को नकारते हैं। वे सभी धर्म-संप्रदायों के सम्मान की बात करते हैं और धर्मनिरपेक्षता को यूरोपीय अवधारणा मानते हैं। वे यूरोप में धर्म की पूरी भूमिका को ही दो टूक शब्दों में व्यक्त करते हैं, “धर्मनिरपेक्षता भी आयातित थी यूरोप से जहाँ सेक्युलरिज़्म का अपना इतिहास था। यूरोप में चर्च का गहरा प्रभुत्व था समाज पर, अन्य संस्थाओं पर, राजनीति पर, राज्य पर। चार सौ पाँच सौ वर्षों तक चर्च के इस प्रभुत्व से छुटकारा पाने के लिए समूचे यूरोप ने संघर्ष किया। ... दूसरा कारण यह भी था कि यूरोपीय समाज में अनेक कारणों से ईश्वर, धर्म, अलौकिक शक्तियों का क्षय हुआ, उससे आत्माभिमान की जो बपौती मिली, उसके कारण - मनुष्य में एक तरह का दर्प पैदा हुआ कि वह इस धरती का मालिक है, कि वह इस सृष्टि का केंद्र है, कि अगर सब प्राणियों का कोई मापदंड है, तो वह मनुष्य है।”6 

इसीलिए सेक्युलरिज़्म का कोशगत अर्थ है “यह विश्वास कि सरकार, शिक्षा, समाज आदि पर धर्म का प्रभाव नहीं होना चाहिए।” और सेक्युलर का अर्थ है, “धर्म से संबंधित न होना।” इस तरह हम देखें तो वर्तमान समय में कोई भी राजनीतिक दल वास्तव में सेक्युलर अर्थात धर्मनिरपेक्ष नहीं रह गया है। धर्मनिरपेक्ष वह है जो किसी भी धर्म की पक्षधरता न करे, जिसके लिए संविधान सर्वोपरि हो। परंतु आज हर राजनीतिक दल के लिए धर्मनिरपेक्षता मात्र वोट-बैंक के लिए किसी-न- किसी धर्म-समुदाय को लुभाने का साधन मात्र बन गया है – “धर्मनिरपेक्षता सिर्फ मुसलमानों को आतंकित करने का अस्त्र बन गई है, ताकि चुनाव में उनके वोट हासिल किए जा सकें।”7  पहले तो कोई दल अपनी निष्ठा और समर्पण किसी धर्म अथवा समुदाय-विशेष के प्रति प्रकट करते हुए उन्हें आकर्षित करने का प्रयत्न करता है और इसी को आदर्श मानकर अन्य दल समाज के शेष वर्गों को अपना शिकार बनाते हैं। यह पद्धति समय के साथ जितनी पुरानी होती जा रही है, उतनी ही असरदार भी। लेकिन इस समूचे क्रम में जनता की धार्मिक आस्थाओं का बहुत ही निम्न स्तर पर राजनीतिकरण किया जाना अत्यंत दुखद है।

यहीं से धर्म और राजनीति का एक ऐसा खेल शुरू होता है जिसका ओर-छोर पकड़ पाना बहुत ही कठिन है। निर्मल वर्मा का मानना है कि भारत कभी धर्मनिरपेक्ष हो ही नहीं सकता क्योंकि धर्म भारतीय जीवन के मूल में है। धर्मनिरपेक्षता का चोंगा यूरोप की नक़ल करने मात्र का परिणाम है। पहले धर्म जहाँ व्यक्ति के बाह्य और आंतरिक जीवन में सेतु का कार्य करता था, आज वहीं धर्म की अल्पज्ञता से ‘सांप्रदायिकता’ की आग ने जन्म ले लिया है – “यह जो हम धर्मनिरपेक्षता की नकल करते हैं यह भारतीय मनीषा, भारतीय परंपरा, भारतीय स्वभाव से कहीं मेल नहीं खाता...  सेक्युलरिज़्म के नाम पर हम जिन धार्मिक विश्वासों को दरवाजे से बाहर निकाल देते हैं, वे ही पूर्वाग्रह बनकर पिछली खिड़की से सांप्रदायिकता की गंदगी के रूप में भीतर आ जाते हैं।”8

दुनिया के सभी धर्मों की अपनी मान्यताएँ, बिम्ब-प्रतीक हैं, जो लगभग उन विभिन्न भाषाओं की तरह हैं, जिनमें एक ही गीत विद्यमान है। सभी धर्मों की अपनी पद्धतियों और व्याख्याओं के बावजूद उनके मूल में एक ही अर्थ निहित है, जो इस संपूर्ण सृष्टि और मानवता का सत्य है। निर्मल वर्मा अपने समाज के इस धार्मिक वैषम्य के संकट को भी भली प्रकार से पहचानते हैं- “धर्म की यह आधुनिक विडंबना है कि लोग ईसाई, मुसलमान, हिंदुओं की हैसियत से गिरजों, मस्जिदों, मंदिरों में जाते हैं - किंतु भीतर जाकर वे जिस धर्म की आदिम स्मृति को अपनी प्रार्थना में जागृत करते हैं, वह देहरी के बाहर आते ही सांसारिक समय के उजाले (या अंधेरे) में धूमिल पड़ जाती है।... एक धर्मावलंबी व्यक्ति की दयनीयता उसकी कट्टरता में नहीं, विस्मृति में है; वह अपने धर्म की भाषा तो पढ़ता है, किंतु उसके प्रतीकों और संकेतों के अर्थ को भूल गया है।”9 

ऐसी परिस्थिति में जब दुनिया भर के धर्मतंत्रों के मूल में एक ही सत्य रूपायित होता है, तो समस्त धर्मावलंबी समुदाय क्यों वैषम्य में जीते हैं? मनुष्य की प्रार्थनाओं और आकांक्षाओं में जो अखंडित और अविभाज्य जीवन जीने का स्वप्न है, वह व्यावहारिक और सांसारिक जीवन में आकर क्यों विकृत और खंडित हो जाता है? मनुष्यता के समक्ष प्रस्तुत ऐसे प्रश्नों से जूझते हुए निर्मल वर्मा का सामना ऐसे तंत्र से होता है जिसे राजनीति कहते हैं।

धर्म और राजनीति के इस खेल को यदि निकटता से देखें तो इसमें मात्र किसी राजनीतिक दल द्वारा किसी धर्म-विशेष के लोगों को आकृष्ट करने का ही कार्य नहीं किया जाता बल्कि अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक राजनीति की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। तटस्थ दृष्टि से विचार करें तो आखिर यह कैसी मानसिकता समाज में विकसित हो रही है कि अल्पसंख्यक समूह के अधिकारों की बात करना उचित और प्रशंसनीय है, किंतु जब एक बड़ा समुदाय अपने अधिकारों की बात करने लगे तो उसे ‘कम्युनल’ की श्रेणी में धकेल दिया जाए। निर्मल वर्मा यहाँ एक ऐसे मुद्दे को छूते हैं जिस पर बात करने से कई लोग कतराते हैं। उनका मानना है कि यह मनुष्य का सहज स्वभाव है कि यदि किसी एक के अधिकारों की बात की जाएगी तो दूसरा भी अपने अधिकारों की मांग करेगा, यदि किसी एक वर्ग को विशेष मान्यता दी गई तो दूसरे को भी न्यायोचित सम्मान देना होगा, “आज जब हम अपने को अल्पसंख्यकों का समर्थक कहकर उन्हें विशेष दर्जा देने लगते हैं, एक वर्ग के रूप में मान्यता देने लगते हैं, तो जो बहुसंख्यक वर्ग है उसे भी मान्यता देनी होगी। वह अस्सी प्रतिशत है तो उसका भी एक प्रभुत्व है, जिसके कारण नाजायज लाभ उठा सकते हैं राजनीतिज्ञ।... जब हम इस तरह का विभाजन करने लगते हैं माइनॉरिटी और मेजॉरिटी के नाम पर, तो सहज और स्वाभाविक रूप से उन राजनीतिक शक्तियों को प्रभुत्व मिलने लगता है, जो अपने को बहुसंख्यकों का समर्थक मानती हैं। आप उन्हें दोष नहीं दे सकते।”10 

निर्मल वर्मा ने यह देखा कि एक बड़े जनसमूह को समय के प्रवाह में गलत फ्रेम किया गया है और इसलिए वे हिंदू धर्म के संबंध में अनेक पूर्वाग्रहों को तर्कपूर्ण ढंग से दूर करते हैं। यही कारण है कि उन पर कई बार ‘हिंदूवादी’, ‘बाबावादी’ होने का आरोप भी लगाया जाता है। किसी पार्टी से जुड़े होने के आरोपों पर निर्मल वर्मा दो टूक उत्तर देते हैं, “... ज्ञान जो हमेशा से अपनी परंपरा, अपनी अस्मिता से प्राप्त किया था, वह कोई पार्टी की बपौती नहीं है। वह हमारी गौरवशाली धरोहर है जिसपर हर पार्टी को गर्व होना चाहिए। क्यों नहीं हर पार्टी भारतीय परंपरा, भारतीय अस्मिता और अपनी धरोहर को लेकर भारतीय नागरिकों का मत प्राप्त करने की कोशिश करती है? यह सिर्फ एक पार्टी पर क्यों छोड़ दिया गया है?”11

हमारे समाज में बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने सामाजिक राजनीतिक जीवन में धर्मनिरपेक्ष बनते हैं किंतु निजी जीवन में हर प्रकार के धार्मिक विश्वासों में जीते हैं। भारतीय समाज में धर्मनिरपेक्षता के संबंध में निर्मल वर्मा गांधीजी से प्रभावित दिखाई देते हैं, “यह अचानक नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता शब्द कभी गांधीजी ने भी इस्तेमाल नहीं किया था। गांधीजी का यह विश्वास था कि हर हिंदू हर मुसलमान देश के विकास में तभी योग दे सकता है जबकि वह अच्छा हिंदू अच्छा मुसलमान बने। वह यह नहीं कहते कि वह अपना हिंदुत्व छोड़ दे या इस्लामियत छोड़ दे जो कि धर्मनिरपेक्षता परोक्ष रूप से हमसे मांग करती है। धर्मनिरपेक्षता हमसे वह मांग करती है जो हमारे चरित्र के विरोध में जाता है।”12

अंत में हम कह सकते हैं कि धर्म और राजनीति का संबंध अविभाज्य है। वर्तमान समय में धर्म मात्र एक साधन है राजनीतिक स्वार्थों को पूरा करने का। धर्म की धीमी आँच को भड़का कर सांप्रदायिकता की रोटियाँ सेंकने का काम राजनीति करती है। धर्म आज अपना मूल स्वरूप खोता जा रहा है और धर्म की अज्ञानता से ग्रस्त व्यक्ति समाज को सांप्रदायिकता की आग में जला रहा है। इस अज्ञानता को दूर करने का एक उपाय यह हो सकता है कि विद्यालयों में सभी धर्मों की मूल बातों के बारे में बताया जाए, जिससे धर्म संबंधी भ्रम दूर होगा और राजनीतिक स्वार्थ के लिए इसका लाभ उठा पाना संभव नहीं होगा। सुधीश पचौरी निर्मल वर्मा के संदर्भ में लिखते हैं कि “निर्मल हर भारतीय को उसकी भारतीयता लौटाना चाहते हैं। सेक्युलर सूखे में निर्मल आत्म निर्वासन को खत्म करना चाहते हैं।”13

पश्चिम से आयी धर्मनिरपेक्षता की आंधी में उड़ती भारतीयता के मूल को निर्मल वर्मा बचाना चाहते हैं और इस कुचक्र को और अधिक भयावह रूप देने के लिए राजनीतिक दलों की निंदा करते हैं। इसलिए वे ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ में अंतर करते हैं। धर्म की ज्ञान-ज्योति से सांप्रदायिकता के अंधकार को सदा के लिए मिटाना चाहते हैं ताकि किसी भी भारतीय को अपने धर्म बोध से निर्वासित ना होना पड़े। तभी हर एक धर्म का व्यक्ति सच्चे अर्थों में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक से ऊपर उठकर, एक भारतीय बनकर ‘भारतीयता’ का निर्वाह कर सकेगा।

सन्दर्भ सूची

  1.   शताब्दी के ढलते वर्षों में, निर्मल वर्मा, पृष्ठ 188
  2.   महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय  9/11
  3.   मनुस्मृति, संपादक- राजवीर शास्त्री
  4.   www.lexico.com/uk-english/definition/religion
  5.   मेरे साक्षात्कार, निर्मल वर्मा, पृष्ठ 118
  6.   मेरे साक्षात्कार, निर्मल वर्मा, पृष्ठ 117-118
  7.   शताब्दी के ढलते वर्षों में, निर्मल वर्मा, पृष्ठ 119
  8.   धर्म, धर्म-निरपेक्षता और भारतीय संस्कृति, निर्मल वर्मा (लेख)
  9.   शताब्दी के ढलते वर्षों में, निर्मल वर्मा, पृष्ठ 241
  10.   कला का जोखिम, निर्मल वर्मा, पृष्ठ 119
  11.   धर्म, धर्म-निरपेक्षता और भारतीय संस्कृति, निर्मल वर्मा (लेख)
  12.   मेरे साक्षात्कार, निर्मल वर्मा, पृष्ठ118
  13.   निर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवाद, सुधीश पचौरी, पृष्ठ 23

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