कविताएँ: अनुपमा मिश्रा

कलछी की जगह कलम

तमाम उम्र सुना किया यही
लोग बदलते रहे
पर बातें वही रहीं। 
बहुत लापरवाह हो
किताबें ढंग से नहीं रखती
बहुत बेकार हो 
नहीं सीखती नये व्यंजनों
की शेफगिरी, 
बहुत नाकारा हो
देती नहीं बच्चों का ध्यान, 
ये क्या, इतनी स्वार्थी हो
कि लिख रही हो कविताएँ 
बुन रही हो ख्वाब
चुन रही हो कल्पना के फूल
ढूँढ रही हो खंडहरों में
भ्रम का तिलिस्म, 
पलकों पर क्यों हैं
आशा की भीगी पंखुड़ियाँ, 
ज़ुबाँ पर क्यों हैं गीत
पाँव में क्यों है चकरघिन्नी
घर से दफ्तर
दफ्तर से घर, 
माथे पर क्यों है
स्पष्टवादिता का चंदन, 
बदन पर क्यों है
झीना झीना सा सच का आवरण, 
नाक पर क्यों है
गलत को गलत कहता क्रोध
हाथ में क्यों है
कलछी की जगह कलम। 
***

मैं व्यस्त हूँ

मैं व्यस्त हूँ आजकल। 
पढ़ने की कोशिश में हूँ प्रतिक्रियाएँ, 
जो जेहन से बिसरति जा रही हैं। 
आजकल हर चेहरा सपाट है, 
इनमें लयात्मकता भूल चुकी है अपना बसेरा करना। 
बच्चों को नाश्ता परोसो तो वो, 
भूल जाते हैं प्रतिक्रिया देना, 
वो गुम हैं गेम और कार्टून के बीहड़ में। 
किसी की तारीफ करने पर प्रतिक्रियाएँ नहीं आती, 
प्रतिक्रियाएँ सिमट चुकी हैं नोटिफिकेशन और एमोजिस में। 
इसलिए मैं आजकल पढ़ रही हूँ, 
चाय की प्याली पकड़ाने पर सामने वाला कैसे मुस्कुराता है, 
उसके चेहरे की कौन सी रेखाएँ उभरती या सिकुड़ती हैं, 
या उसके होंठ कितने विस्तृत होते हैं और
किस बिंदु पर ठहर जाते हैं। 
पढ़ रही हूँ आँखों में चमक कब आती है। 
ढूँढने में लगी हूँ चेहरे की तमाम भाव- भंगिमाएँ
पर भावपूर्ण चेहरे विलुप्त प्राय हो चुके हैं, 
इसलिए रसोई घर के स्लैब पर चींटियों की कतारें देखती हूँ। 
रोटियाँ जब फूलकर फूटती हैं, 
तो लगता है वो कोई चुटकुला सुनकर खिलखिला रही हैं। 
चाय उबलती है तो सुन पाती हूँ, 
राग देश और देखती हूँ गदगद होती चाय के चेहरे की आतुरता, 
 जो अदरक का सामंजस्य पाकर प्रफ्फुलित हुई है। 
अब इंसानों के चेहरे की प्रतिक्रियाएँ विरली हैं, 
मेहमान भी घर आये तो जाते हुए कह जाता है, 
पहुँच कर मेसेज करता हूँ, 
पर सामने वो भूल जाता हैं, 
मुस्कुराना, तारीफ करना और 
ज़ाहिर करना के बड़े दिनों बाद तुमसे मिलकर 
अच्छा लगा। 
***


यदि एक होता दुःख

दुनिया को तुम्हारे दुःख से कोई लेना देना नहीं है
यह दुनिया तुम्हारे दुःखों से है
जान बूझकर अनभिज्ञ, 
दुनिया इंसानों से मिलकर बनी है यकीनन
और हर इंसान का दुःख है अलग
पर ये दुःख मिलकर एक क्यों नहीं जाते। 
सड़क पर गिरे दुर्घटनाग्रस्त इंसान की
टूटी पसलियों को देखकर
नहीं पसीजता, पास से गुजरते इंसान का दिल
उस इंसान का दुःख है कि वो कम क्यों कमाता है
इतना कम कि ठीक से घर भी नहीं चला पाता है। 
उसके ऑफिस के अफसर 
 रहते हैं उसके दुःख के प्रति उदासीन
उन्हें नहीं परवाह कि कर्मचारी का
घर चलता है या रुकता है। 
उन अफसरों का दुःख है
कि वो नहीं दे पाते समय घर को
अकेलेपन के पिंजर में  गिरफ्तार हैं वे, 
उनकी जिंदगी उन्हें किसी चक्की सी लगती है
जिसमें पिसते हुए उनकी सारी संवेदनाएँ
चूर्ण बनकर हवा में छू हो जाती है। 
इस दुनिया का दुःख टुकड़ों में बँटा है
रेज़ा रेज़ा उमड़ता है
पसरा है दिनों में, दुपहरों में
रातों के अँधेरे  में साये फुफकारते हैं। 
गरीब की थाली खाली है
अमीर की नींद खाली। 
पत्थरों  का रोना है 
वो क्यों नहीं बन सकते
प्रतिमा ईश्वर की, 
मिट्टी रोती है क्यों न बन सकी
एक घड़ा या कोई पात्र सुंदर, 
उदास है आसमान कि नितांत अकेला क्यों है
देखता रहता है असंख्य दुःखों को
जब भर जाता है गुबार तो बस
फूट पड़ता है बारिश की बूँदे बन कर। 
ईश्वर होता है दुःखी कि
क्यों वो दुःखों को एकाकार नहीं कर सका
 क्यों एक इंसान की पीड़ा
 दूसरे इंसान की संवेदना 
को छू न सकी। 
धरती बंजर होकर दुःखी है
जंगल कटने से परिंदे आतंकित
पानी की बूंदों को तरसते जीव आँसू बहाते हैं, 
बाँधों में रोकी गयी नदी दुःखी है
क्यों नहीं एकाकार होकर सभी दुःख
एक हो जाते, 
संवेदना एक होती सभी हृदयों में
और दुःख केवल एक ही होता, 
मानवता का दुःख। 

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