रतन थियाम - रंग-परंपरा का पुनराविष्कार

डॉ. प्रोमिला

- प्रोमिला

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद-500007; 
चलभाष: +91 897 796 1191

  मणिपुरी रंगमंच के बड़े नाम रतन थियाम समकालीन भारतीय रंगजगत के गिने-चुने सबसे सृजनात्मक, सबसे ईमानदार, झोली फटकार कर चलने वाले और अकुंठ रंगनिर्देशकों में से एक हैं। वह ऐसे संक्रमित समय में जब अधिकांश लोग प्रयोजन और फलतः बड़ी सरलता से निरर्थकता के शिकंजे में जा फंसते हैं, अपनी धुन में अपनी राह तलाशते हैं। जीवन के प्रत्येक पक्ष के प्रति एक तर्कसंगत दृष्टिकोण की रंगमंचीय कार्यान्विति में रूढ़ियों के प्रति समर्पित जीवन पद्धति को प्रश्नों के साथ देखते हैं। उनका यह देखना एक नई या भिन्न रंग बनावट की तलाश में परिपूर्णता पाता है, जिसके प्रति उनका प्रतिपक्ष और उनकी पक्षधरताएँ सुनिश्चित हैं। वह कभी रंगमंच पर मूल्य के आविष्कार और प्रतिष्ठा के द्वारा तो कभी मूल्य विपयर्य की अवज्ञा, उपहास और कटाक्ष के द्वारा अपने रंग-चिंतन को व्यक्त करते हैं। यह परख उनके कई रूपों- निर्देशक, अभिकल्पक, कम्पोजर, कोरियोग्राफर, में अभिव्यक्त होती है। उदयन वाजपेयी लिखते हैं, ‘मुझे अक्सर रतन थियाम को रंगमंच का चित्रकार कहने का लोभ होता है पर यह सही नहीं है। मुझे उन्हें रंगकर्म का प्रकाशक कहने का मन होता है पर यह सही नहीं है। मुझे उन्हें रंगकर्म का संगीतकार कहने का मन होता है पर यह सही नहीं है। मुझे उन्हें रंगकर्म का उच्चारण विशेषज्ञ कहने का मन होता है पर यह सही नहीं है। वे यह सब हैं पर यह इसलिए नहीं कि वे टुकड़ा विशेषज्ञ हों। दरअसल वे अपने नाटक की कल्पना इस तरह करते हैं कि ये सारे तत्व अपने आप उसे समृद्ध करने भागे चले आते हैं। इन सभी तत्वों में अपने स्वतंत्र होने का भाव नहीं होता, वे अपने को रंगकर्म के अवयव की तरह ही बरतते हैं। यह कुछ ऐसा है मानो रंगकर्म ने इन तमाम तत्वों को उसी तरह धारण कर लिया हो जैसे आत्मा ने हाथ-पैरों को, आंख कान को, कंधे पर हिलते सिर और उठते-गिरते विचारों को धारण किया है।’1 रतन थियाम के लिए रंगमंच वस्तुतः जीवन और जगत के विषय में अपनी रंगचेतना का साक्ष्य बनता है। उनकी रंगशीलता औपचारिक चौखटे के भीतर निर्दिष्ट कार्य की खानापूर्ति नहीं, जीवन के अनुबंधहीन पर्यवेक्षण से गुजर कर निकली अंतर-चेतना है जो प्रस्तुति के तनाव में मुखर होती है। उनकी आत्मसजगता/ स्वचेत दृष्टि उनके साक्ष्य का परिप्रेक्ष्य तय करती है। आत्मसजगता के सहारे एक ओर यदि वे अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को परंपरा-संबंध के साथ तो दूसरी ओर वैचारिक प्रतिबद्धता के सहारे अपनी आत्मसजगता को सीमाओं में ढलने से बचाते हुए संतुलन धारण करते हैं। रंगकर्म की पहचान के प्रश्न पर ‘मैं पश्चिमी खाका क्यों अपनाऊँ?’ की स्पष्ट सोच के साथ वह भारतीय लोक तथा शास्त्रीय ढांचे को उत्तम सौंदर्यशास्त्र के गुणों से सजाते हैं। वह स्वीकारते हैं कि ‘मेरी जड़े मुझे रचनात्मक रूप से विकसित होने में मदद करती हैं। मैं केवल प्राचीन ज्ञान लेकर उसे अपनी कला के रूप में अपनी भावी पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ और मेरी यह कला मेरी पहचान के निरंतर विकसित होने की प्रक्रिया है।’2 यह निरंतरता और अक्षय इधर दुर्लभ है।

रतन थियाम की नाट्य प्रस्तुतियों की विषय वस्तु जहाँ देश और काल की सीमाओं से परे तक जाती है- अपने अनेक रूपों में थियाम की सहमति, असहमति, विरोध को दर्ज करते हुए, वहीं उनकी रंग-व्यंजनाएँ राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तर पर अलगाव की भावना से पीड़ित मणिपुर की पहचान के समस्यात्मक मुद्दे को खोलती हैं। वहाँ के समृद्ध सांस्कृतिक भंडार में जड़ों के लिए एक अस्तित्वपूर्ण खोज के कलात्मक प्रयासों में केंद्रीयता पाती हैं। रतन थियाम के जीवन में इसकी पृष्ठभूमि मणिपुर के प्रसिद्ध नर्तक युगल माता-पिता से मिले संस्कारों, मेकअप रूम में ग्रीस, पेंट की बू सूंघते बीते बचपन, छात्र काल के समय अनेक नाटकों में निभाई तरह-तरह की भूमिकाओं, कवि हृदय की पुकार से जन्मी कविताओं, लोन्ना हाईगे तमिन्नाड (1965) (धीरे से बोलता हूूँ और चुपके से सुनता हूँ) से आरंभ हुई कहानी यात्रा से आगे बढ़ते हुए दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रशिक्षण से अपनी संस्कृति की गहन होती परख, पारंपरिक कलाओं को देखने की नई दृष्टि से आगे बढ़ 1975 में ‘ऐखोय नाट्यशाला’, जिसे 1976 के बाद से ‘कोरस रेपर्टरी’ के रूप में जाना जाता है, में परिणत होती है। साठ से अधिक नाटकों के निर्देशन में रतन थियाम मणिपुरी के मौलिक नाटकों के साथ-साथ ‘कर्णभारम्’ (1979), ‘उरुभंगम्’ (1981), ‘इम्फाल इम्फाल’ (1982), ‘चक्रव्यूह’ (1984), बर्टोल्ट ब्रेख्त के एँटीगोन का रुपांतरण ‘ल्यांगशोनी’ (1986), ‘ऋतुसंहार’, ‘अंधा युग’ (1994), ‘उत्तर प्रियदर्शी’ (1996), ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘द किंग ऑफ द डार्क चेंबर’ (रवींद्रनाथ  टैगोर के ‘राजा’ नाटक पर आधारित) (2012), ‘वियतनाम’, ‘हिरोशिमा’, ‘मैकबेथ’ (2014) जैसे नाटकों का मणिपुरी भाषा में निर्देशन कर थिएटर को उसकी जड़ों तक लाते हैं। भारतीय लोक और शास्त्रीय ढांचे को ले उसे उत्तर सौंदर्यशास्त्र के गुणों से सजाते हैं। 

रतन थियाम की रंग सार्थकता की परिभाषा में दुनिया को बदलने की राजनीति में शामिल होना एक पूर्व शर्त बनती है और दुनिया की परिभाषा है, अपने आसपास। दुनिया को बदलने का कार्य भूमंडलीय पैमाने का ऐसा कोई बृहद् विराट दिवास्वप्न नहीं जो देखने में भी स्वयं अपनी असंभवता का प्रमाण हो। दैनिक जीवन की छोटी-छोटी सच्चाईयों के प्रति जागरूकता और सच तथा सही की पक्षधरता का संकल्प, गलत की समझ तथा भरसक उससे लड़ने का प्रयास करने वाले नाटकों की विषयवस्तु आदर्श को यथार्थ बनाती है। मानव की किंकर्तव्यविमूढता उसके जीवन की विसंगतियां, विडंबनाएँ और द्वंद्व रतन थियाम की रंगऊर्जा से  निखर सहृदय के भीतर छिपी भाव संपदा से एकाकार हो कुछ यूं जागृत होती हैं कि सहृदय सहज ही रंगभूमि से मानसभूमि की यात्रा पूर्ण कर लेता है। उसकी चेतना मणिपुर से उठकर विश्व स्तर पर बोध अर्जित करती है। रतन थियाम कला को सक्रिय कार्यवाही बनाकर मनुष्यता की मूल चिंताओं को संबोधित करते हैं। मणिपुरी संस्कृति को उसके एकाकीपन में नहीं वरन् वैश्विक संस्कृति के मध्य रखकर देखते हैं। उनकी दृष्टि में नाटक का मूल अनुचित और अन्याय के विरोध से निर्मित होता है। रंगमंच उनके लिए एक राजनीतिक और नैतिक आलोचना बनता है। वे मानते हैं कि आदिकाल से ही नाटकों में दमन के तंत्र का विरोध होता आया है। दुनियाभर में लाखों नाटक लिखे गए हैं, सबने व्यवस्था की बुराइयों को नकारा और उनका विरोध किया है। नाटक अच्छाई के पक्ष में और बुराई के खिलाफ खड़े होने के लिए लिखे जाते हैं। आज तक ऐसा कोई नाटक नहीं लिखा गया जो खराब व्यवस्था का पक्षधर हो। नाटक में सत्य तथा सौंदर्य साथ-साथ चलते हुए अनुचित का प्रतिवाद करते हैं। 

रतन थियाम की रंगदुनिया में महाभारत पर केंद्रित एक त्रयी उन नाटकों की आती है, जिनमें भास के दो नाटक ‘उरुभंगम्’ (1981), ‘कर्णभारम्’ (1989) और द्रोण पर्व पर आधारित स्वरचित ‘चक्रव्यूह’ (1984) के माध्यम से हाशिए पर रखे गए दुर्योधन, कर्ण और अभिमन्यु जैसे पारंपरिक रूप से उपेक्षित चरित्र अपने जीवन विवेक के साथ नायक की पदवी लेकर, बिना चरित्र की स्वाभाविकता का क्षय किए अस्मिता संकट के बड़े प्रश्नों को उठाते हैं। समिक बंदोपाध्याय इस त्रयी की आत्मा को हिंसा से जोड़ते हुए ‘चक्रव्यूह’ के परिचय में कहते हैं, भास जो रतन को महाभारत के चरित्रों के लिए एक अलग दृष्टिकोण का मॉडल देते हैं, जैसा कि उन्होंने अपने पारंपरिक रूप से ब्राह्मणवादी व्याख्या में उपेक्षित और कलंकित नायकों के चरित्रों के लिए चुना है। जब रतन भास के पात्रों के साथ जुड़ते हैं, गैर नायक नायकों में बदल जाते हैं। वे मिथकीय नायकों के मुख्यधारापरक संस्थागतकरण के संबंध में मोर्चा लेते हैं। (चक्रव्यूह, ix) रतन थियाम का नाटक मंचन इस बात का साक्षी बनता है कि प्रतिबद्धता द्वारा कैसे रंगनिर्देशक का परिप्रेक्ष्य अहम होता है, पात्र का संदर्भ नहीं। भीम द्वारा दुर्योधन की जंघा तोड़ने के प्रसंग पर आधारित ‘उरुभंगम्’ थियाम को संस्कृत नाटकों की परिपाटी में अनूठा लगता है क्योंकि यहाँ दुर्योधन के सद्गुणों का बखान है। यह चरित्र जीवन से बड़ा नहीं है, उसके अपने परिवार से मानवीय संबंध हैं। वह सुयोधन है। ‘कर्णभारम्’ का कुंती के गर्भ से जन्मा और राधा के पुत्र रूप में पहचाना गया कर्ण रतन थियाम के मंच पर उच्च (हिंदू) अस्मिता और निम्न (जनजातीय) अस्मिता के व्यक्ति-सवालों से भारतीय संस्कृत परक संस्कृति या जनजातीय संस्कृति की अस्मिता के मध्य से मणिपुर में उठते सवालों तथा वैश्विक स्तर के सवालों का आकलन करता है। ‘चक्रव्यूह’ में थियाम अभिमन्यु के रूप में युवाओं की कहानी को केंद्र बना युद्ध तथा हिंसा का आलोचनात्मक पाठ रचते हैं। कौरवों तथा पांडवों के मध्य का युद्ध समकालीन समाज के विग्रह और भिड़ंत का द्योतक बनता है। अभिमन्यु रूपी युवा कौरवों, पांडवों के सत्ता संघर्ष में एक उपकरण साबित होता है। नाटक के अंत में वह सवाल करता है कि ‘क्या मैं बलि का बकरा हूँ या शहीद’ (चक्रव्यूह, पृ. 51) ‘रतन जो करने का प्रयास करते हैं, वह है संबंधों में शामिल ब्लैकमेल की खोज। अभिमन्यु द्रोपदी का पुत्र नहीं बल्कि सुभद्रा के गर्भ से जन्मा है। भीम और युधिष्ठिर वास्तव में उसके प्रति अपने पुत्र की भांति उत्तरदायी नहीं हैं।’ (कविता नागपाल, चक्रव्यूह, xxxi) 

मिथक से इतर ‘टोकेटिव प्ले’ की संज्ञा से अभिहीत ‘इम्फाल इम्फाल’ को रतन थियाम की प्रयोगधर्मी यात्रा के बीज रूप में देखा जा सकता है। नाटक में प्रस्तुत जगह विशेष का यथार्थ- पीढ़ियों का अंतराल, बेरोजगारी, सैन्य घेराबंदी, भूमिगत आंदोलन आदि समकालीन वातावरण का यथार्थ बन आधुनिक संदर्भ रचता है। असल में अपने समय,  समाज के साथ थियाम की संबद्धता समसामयिक और तात्कालिक विक्षुब्धता को परत दर परत जीवंत रंगदृश्यों में सवृत करती चलती है। अपने विरोध को व्यक्त करने के लिए वे युद्ध और हिंसा के कारकों के अन्तर्सूत्र तथा रंग-रेशे बार-बार तलाशते, जांचते हैं। 1994 में परफॉर्मिंग आर्ट सेंटर टोंगा (जापान) के आमंत्रण पर युद्ध की विध्वंसकारी समस्याओं, विसंगतियों, विडंबनाओं को जीवंत अभिव्यक्ति देने, 21वीं सदी की चुनौतियों का आईना प्रस्तुत करने के लिए धर्मवीर भारती के ‘अंधायुग’ को चुनकर उसे निजी रंग भाषा में पिरो प्रभावशाली नाट्य बिम्बों के साथ विदेशी भूमि पर मणिपुरी संस्कृति और कला की एक अलग ही छाप और प्रभाव छोड़ते हैं। वे कहते हैं, ‘अंधा युग कई दलों के साथ करते-करते पुनर्व्याख्या का वर्चस्व सामने आया। लगा कि यदि नाटककार हिरोशिमा, नागासाकी का संदर्भ अंकित करके आधुनिक हो सकता है तो निर्देशक क्यों नहीं? नाटक का दृश्यांकन भी तो आधुनिक हो सकता है। अंधों की कथा वर्णन करने वाले अंधे काला चश्मा तो पहन ही सकते हैं।’3 अज्ञेय रचित ‘उत्तर प्रियदर्शी’  के कृष्ण मोहन शर्मा कृत मणिपुरी अनुवाद में सम्राट अशोक की युद्धप्रियता और हृदय परिवर्तन की प्रख्यात घटना को मणिपुरी नाट्य-नृत्य शैली तथा सामरिक नाटक नृत्य कलाओं में संजो शांति के महत्व का पुनराविष्कार करते हैं। ‘रतन थियाम से जब इस नाटक में उनकी दिलचस्पी और उनके प्रयासों के अनुभव जानने चाहे तो उन्होंने दो बातों पर खासतौर से जोर दिया- इस नाटक की समसामयिकता और सार्वदेशिकता की पहचान और उसे दृश्य रूप में संप्रेषणीय बनाने के लिए किए गए अपने शोध; जिसके लिए उन्होंने थाईलैंड, भूटान, म्यांमार, पेरिस आदि की यात्रा की और म्यांमार ने अंकित नरक यातना की चित्रकला का खोजपरक अध्ययन किया।’ 4 रविंद्रनाथ टैगोर के नाटक ‘द किंग ऑफ द डार्क चैंबर’ में व्यक्त अंधेरे को रतन थियाम अंतरात्मा और मानव-मन का ऐसा अंधेरा करार देते हुए, जो अपनी प्रकृति में अधिकांश समय भौतिकवादी, असीमित इच्छाओं से भरा हुआ और आध्यात्मिक गहनता से रिक्त है, उसका प्रदर्शन पाठ की विषयगत सामग्री की जटिल मांगानुसार संरचनात्मक परिवर्तनों के साथ करते हैं। युद्ध और उसकी विभीषिका से थियाम का ध्यान इस नाटक में भी नहीं भटकता।

शेक्सपियर के ‘मैकबेथ’ को मात्र मैकबेथ नहीं रतन थियाम एक पथभ्रष्ट मानव की अनियंत्रित क्षुधा, सत्ता की महत्वकांक्षा और हिंसा की बीमारी/ महामारी के रूप में स्वीकारते हैं। मणिपुर से लेकर भारत और दुनिया भर में जीवन की तह के प्रथम कोनों में बैठ आध्यात्मिक संतुलन को नष्ट करते, मनुष्य को हिंसा की ओर ले जाते मैकबेथ-रोग की रंगमंचीयत्ता का अचूक उपक्रम तैयार करते हैं। नाटक अपने मूल स्वर में जीवंत वनस्पतियों की रंग-बिरंगी रोशनी और अस्वाभाविक ध्वनियों का संयोजन करता है। चेहरे सहित पूरे शरीर को कपड़े से ढके अप्राकृतिक जीव, जिनके शरीर से टहनियां उग रही हैं और जो शेक्सपियर की चुड़ैलों के प्रतिरूप हैं, वैश्विक स्तर पर वन संपदा, प्रजातियों और जीवन पर गहराते संकट को स्वर देते हैं। भारत की पुरातन, पहाड़ी, जनजाति छाप इसे थियाम के चिर परिचित हस्ताक्षर रूप में डाल देती है। 1600 ई.की कृति आज का संज्ञान बनती है। मनुष्य की चारित्रिक असंगतियों का चित्रण व्यक्ति की जटिलताएँ सामने लाता है। इस प्रक्रिया में स्वभावतः विचार और मूल्य भी अभिव्यक्त होते हैं। रंगमंचीय उपादान विघटन तथा उस विघटन से नवनिर्माण का नया सरोकार गढ़ते हैं। कहा जाता है कि त्रासदी मानवीय गरिमा की व्यंजना करती है, इसलिए उदास होती है। मनुष्य स्वयं से बड़ी शक्ति से टकराता है, असफल भी होता है किंतु हारता नहीं। टकराना, असफल होना किंतु पराजित न होना ही रतन थियाम की कला दृष्टि का संतुलन बनता है।    

‘यदि मक्खन नहीं तो सूखी रोटी’ ही सही के आदर्श वाक्य को लेकर चलने वाले रतन थियाम नाट्यकला को एक ‘कम्पोजिट आर्ट’ और एक धर्म मानते हैं, जिसमें वे इस तथाकथित सभ्य दुनिया, जहाँ मनुष्य अपनी आत्मा और संतुलन खो रहा है, के अपने अनुभवों को साझा करते हैं। स्थिति हो या व्यक्ति, भीतरी तहों में धंस पाने की क्षमता ही वास्तव में उनके रंगकौशल को अनूठा बनाती है। कभी विस्तार और बारीकियों के द्वारा तो कभी विरोधाभास और संघनन से उपजी नई अर्थछवियों में उनकी प्रज्ञा दृष्टिगत होती है। मनुष्य के आदिम संवेदन का छोर पकड़ रतन थियाम कुछ यूं संवत्सरों की यात्रा पर निकलते हैं कि मंच जीवंत हो उठता है। पूर्वी और पश्चिमी थिएटर के बीच एक सेतु बनाने की कोशिश को वास्तविकता में बदलता है। छोटे से राज्य की जमीन से निकल दुनिया से संवाद रचता है। अभिनेता भी यहाँ एक ‘कम्पोजिट मैन’ बनता है क्योंकि वह विषय सामग्री की अभिव्यक्ति का माध्यम है। उसे पारंपरिक मणिपुरी रूपों के साथ-साथ समय-समय पर विकसित अन्य तरीकों से नृत्य, अभिनय, मार्शल आर्ट, स्टेजक्राफ्ट और डिजाइनों में भी प्रशिक्षित होना होता है। वाचिक और श्वसन की तकनीकों तथा शारीरिक सहनशक्ति और नियंत्रण पर बल, उसे प्रभावशाली श्रवण और गति कौशल प्रदान करता है। रतन लिखते हैं, ‘उसकी मुद्रा और हाव-भाव, स्थान का अर्थबोध- ये सारी बातें उसके शब्दों में आती हैं, क्योंकि शब्द किसी भी अभिनेता की-कभी-कभी मूल पृष्ठभूमि बनाते हैं।’5 पद्मश्री रतन थियाम समय, स्थान और आधुनिक दर्शकों के मनोविज्ञान से जुड़कर भाषायी सीमाओं से परे का ऐसा रंगमंच तैयार करते हैं, जिसमें  प्रेक्षागृह में उपस्थित दर्शक सघन-उत्कट क्रियाव्यापार में नियोजित हो साथ सोचने की राह पर निकल पड़ता है। वे बदलते यथार्थ पर तीक्ष्ण दृष्टि और तथ्यात्मक रंगसर्जना के प्रति अटूट विश्वास से अपना विकास करते हैं। उनकी रंगशैली अतीत की मूल्यवान परंपरा पर वर्तमान की मात्र द्रष्टा ही नहीं, भविष्य की अन्वेषक भी बनती है।    

संदर्भ
1. उदयन वाजपेयी, भव्यता का रंगकर्म रतन थियाम से संवाद, पृष्ठ 56, 2018
2. रतन थियाम, मणिपुर ट्रिलॉजी, पृष्ठ 12, 2008
3. जे. एन, कौशल, दर्द आया था दबे पाँव, पृष्ठ 92, 2005
4. रीतारानी पालीवाल, अज्ञेय के सृजन में जापान, पृष्ठ 59
5. सं. अपर्णा भार्गव धारवाड़कर, ए पॉइटिक्स ऑफ मॉडर्निटी: इंडियन थिएटर थिअरी,1850 टू द प्रेजेंट, पृष्ठ 256, 2018



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