जीवन की पहेलियों का विस्तृत फलक दर्शाती कहानियों का दस्तावेज: धुस-कुटुस

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 941 272 7361; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

पुस्तक: धुस-कुटुस
लेखक: प्रबोध कुमार गोविल
पृष्ठ: 136
मूल्य: ₹ 300.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2020
प्रकाशक: आयुष बुक्स,जयपुर
ISBN: 978-93-85398-38-4
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  हिन्दी साहित्य की कहानी, कविता , उपन्यास, नाटक, और लघुकथा एवं बाल साहित्य आदि विविध विधाओं में डेढ़ दर्जन से अधिक कृतियों के सृजनकर्ता, प्रबुद्ध साहित्यकार एवं मूर्धन्य शिक्षाविद् श्री प्रबोध कुमार गोविल का नया कहानी संग्रह-”धुस-कुटुस” अपने अन्दर जीवन की पहेलियों का विस्तृत फलक दर्शाती 12 कहानियों को समाहित किए हुए है।

संग्रह की पहली कहानी ‘शीर्षक कहानी’ है। धुस-कुटुस का कोई अर्थ नहीं होता लेकिन कभी-कभी ‘गतानुगति को लोको’ की भाँति ही अनजाने में मुँह से निकला कोई शब्द इतना प्रचलित हो जाता है कि बिना सोचे-समझे प्रबुद्धजन भी उसका प्रयोग करने लगते हैं। विद्वान लेखक श्री प्रबोध कुमार गोविल जी ने कहानी ‘धुस-कुटुस’ के माध्यम से इस बात को तो प्रमाणित किया ही है साथ ही इस ओर भी इशारा किया है कि हम ‘फ़ॉरेन रिटर्न’ के टैग को तथा विदेशियों को अपने यहाँ शासक के रूप में देखकर अधिक गौरवान्वित होते हैं-
“एक विदेशी विद्वान को अपना नया मुखिया पाकर लोग गर्व से भर उठे।” (पृष्ठ-10)

संग्रह की दूसरी कहानी, प्रेम विवाह, पारिवारिक आर्थिक धुरी, नौकरीपेशा पति-पत्नी के बीच आपसी ईगो की प्रबलता और पढ़े-लिखे आधुनिक दम्पत्तियों का प्रथम सन्तानोत्पत्ति के बारे में टालमटोलू विचार का दुष्परिणाम आदि, कई विषयों को विस्तृत रूप में अपने में समेटे है-
“शुरू के चार-छह साल तो मौज-मस्ती में निकल गये। उसके बाद के चार-छह साल करियर, प्रमोशन, क्वालिफिकेशन, एक्सपीरियंन्स, पोस्टिंग... के मसलों में। और उसके बाद के भी ऐसे ही निकलते रहते अगर...।” (पृष्ठ-13)

“हर आदमी चाहता ही है कि जब तक उसकी नौकरी या रोजगार रहे तभी तक उसके बच्चे भी बड़े होकर व्यवस्थित और आत्म निर्भर हो जायें।” (पृष्ठ-14)

पद और धन पाकर बिरले ही मद से मुक्त रह पाते हैं नहीं तो अक्सर बदल ही जाते हैं लोग। सम्बन्धों के समीकरणों को सहज ही अभिव्यक्त करती कहानी है संग्रह की तीसरी कहानी ‘बदलाव’, तो नारी जीवन की नियति की ओर इशारा करती हुई प्रतीत होती है कहानी ‘खिलते पत्थर’।

प्रबोध गोविल
समय के बदलाव के साथ ही साथ ग्राम्य-जीवन के परिवेश में हो रहे बदलावों का बारीकी से सजीव चित्र उपस्थित करते हुए इमरजेंन्सी के दौरान परिवार नियोजन के नाम पर की गई शासन की ज्यादतियों  एवं अनियमितताओं का भी खुलासा करती हुई कहानी है ‘शिकंजा’। पैसों के लिए अविवाहित सूरज ने ‘फैमिली प्लानिंग’ का ऑपरेशन करा लिया तो अपने-अपने केसों की गिनती बढ़ाने के लिए सब उसका नाम अपने साथ लिखने को बेताब हो उठे-
“हमें अपने स्कूल में चार-चार केस सबको दिखाने हैं न, सो मेरे तीन तो हो गये, यदि कहो तो चौथा एक नाम तुम्हारा दे दूँ? बड़ी मुश्किल है। कैसे भी हो हमें चार केस तो देने ही हैं, वरना ऊपर से आर्डर है कि...”
“घर पहुँचा तो सरपंच साहब का भाई, जो पंचायत के दफ्तर में था...बैठा उसी की राह देख रहा था।”
“... अभी वह बैठा ही था कि उसकी मझली भाभी आ गई। बड़े लाड़ से बोली, लाला, वो सिंचाई के दफ्तर में काम करते हैं न चैाहान जी, उनकी घरवाली कह गई थी सूरज आये तो जरा हमारे घर भेज देना। उन्हें कोई फारम भरवाना है तुमसे।”
“...सूरज को लगा जैसे वह कोई जिबह हो चुका बकरा है और कसाइयों की भीड़ उसकी हलाल हुई गर्दन पर अपने-अपने छुरों का दावा ठोकती उसकी ओर बढ़ रही है।” (पृष्ठ-41)

‘सपनों की सेल’ नाम है संग्रह की छठी कहानी का जो पाठक की संवेदना को झकझोरते हुए यह सिद्ध करने में पूर्ण सफल है कि पैसों से सब कुछ नहीं खरीदा जा सकता। धन के बल पर सब कुछ खरीद लेने का दावा करने वाले भी ईमानदार व्यक्ति के समक्ष हार मानने पर विवश हो जाते हैं-
“सिर झुकाए खड़ी निधि को ये सब बेहद नागवार गुजर रहा था। वह अपने करोड़पति पापा के पीछे इस तरह खड़ी थी मानो पापा को कोई रात की बासी रोटी का टुकड़ा दे देगा या फिर उनकी हथेली पर कोई सिक्का रख देगा।”
“पापा सामने बैठे प्रोफेसर से कह रहे थे कि उन्होंने जो कुछ कमाया है, सब बिटिया के लिए ही है।... वो विदेश से इसी प्रयोजन से आये हैं कि बेटी का दाखिला इस संस्थान में करवा दें।”
“प्रोफेसर साहब लगभग हर तरह के सुर में पापा को समझा चुके थे कि प्रवेश परीक्षा में उनकी बेटी पास नहीं हुई है लिहाजा वो कुछ नहीं कर सकते।”
“पापा पर उनकी किसी बात का असर नहीं हुआ था। पापा का लाया शानदार गिफ्ट और एक मोटा सा लिफाफा सामने मेज पर पड़ा हुआ था।” (पृष्ठ-44)

‘आजादी’ कहानी में विद्वान लेखक की भाषा आजादी पर सूक्ष्मता से व्यंग्य करती हुई कहानी को आगे बढ़ाती है। आजादी, चीजों के भाव आसमान छूने की, आजादी, रिश्वत देकर काम कराने की आजादी, परस्त्री संग रंगरेलियों की और निजभार्या को कैद रखने की... और न जाने क्या-क्या करने की आजादी। 

दाम्पत्य जीवन में पति का भटकाव, पत्नी के लिए किसी श्राप से कम नहीं होता फिर भी पत्नी हमेशा पति के सद्मार्ग पर लौटने की आकांक्षा लिए प्रत्येक विषमताओं का सामना करने को तत्पर रहती है, कहानी ‘शापमुक्ति’ की नन्दिता इसकी पुष्टि करती प्रतीत होती है।

दिनेश पाठक ‘शशि’
ग्रहस्थ के सुख-दुख, वृद्धों की उपेक्षा एवं अवहेलना और संघर्षों का कच्चा चिट्ठा बाँचती हुई कहानी है ‘स्वयंमेव’ जिसमें जीवन के अमूल्य मोती पिरोये हैं विद्वान लेखक ने। पुत्र-विवाह में दहेज की इच्छा, बहू की नजरों में गिरा देती है जिसे कहानी में काका के स्वकथन द्वारा सिद्ध किया है लेखक ने-
“काका महसूस करता है कि सावनी के पीहर से उन्होंने ब्याह के मौके पर जेवर, नकदी की मांग करके शायद अच्छा नहीं किया। उन्होंने देने को तो गोकुल और काका का मांगा सब दे दिया मगर बहू पहले ही दिन से ससुराल के लिए पराई नजर लेकर आई।” (पृष्ठ-76)

तो बहू के प्रति सास के मनोभावों को भी इस प्रकार प्रकट किया है -
“सोचती होगी, देह का चंदन बिछाकर सर्प को फुसला लेगी, पर मैंने भी छातियाँ उघाड़कर उसके हलक में खून निचोड़ा है अपना, कैसे नहीं सुनेगा मेरी।”
और सास-बहू के बीच पैदा हुई दरार को भरने के लिए घर के मुखिया को ही सीमेण्ट घोलनी पड़ती है-
“कहीं दरार पड़ती दिखती है तो आदमी अहतियातन सीमेण्ट-चूना घोलकर लेप-मरम्मत करने बैठ ही जाता है फिर यह बाकयात तो काका के अपने घरौंदे के हैं, जिनकी एक-एक मेहराब उसके दम पर खड़ी है, जिसकी ईट-ईट उसकी जिन्दगी का सबब है।” (पृष्ठ-77)

वर्तमान परिवेश में अधिकांश घरों की दुखती रगों पर रखी गई लेखक की उंगली मनोविज्ञान की अच्छी पकड़ को प्रमाणित करती है-
“बेटे का ब्याह करके काका ने सोचा था कि बहू के आ जाने से दिन-ब-दिन बुढ़ियाती जा रही काकी को राहत मिलेगी, पर हुआ उल्टा ही।” (पृष्ठ-79)

पूर्वजन्म की अवधारणा को सम्बल प्रदान करती नजर आती है कहानी ‘ये नाम उसने रख दिया था’ तो ‘मांस का बेस्वाद टुकड़ा’ जीवन के टुकड़े-टुकड़े सच को विस्तार से उद्घाटित करती है।

अपने दीर्घकालीन शैक्षणिक एवं परिपक्व जीवनानुभवों  का पूर्ण सदुपयोग करते हुए विद्वान साहित्यकार श्री प्रबोध कुमार गोविल जी ने जीवन की पहेलियों का विस्तृत फलक दर्शाती कहानियों का दस्तावेज प्रस्तुत किया है  कहानी संग्रह- ‘धुस-कुटुस’ के माध्यम से। पात्रानुसार भाषा एवं शैली तथा प्रवाह इस संग्रह की विशेषता है। हिन्दी साहित्य जगत में कहानी संग्रह-‘धुस-कुटुस’ को भरपूर सराहा जायेगा, ऐसी सम्भावना ही नहीं पूर्ण आशा है।


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