कविता: सूर्यमणि दुबे 'सूर्य'

सूर्यमणि दुबे 'सूर्य'
मन के हारे हार है


मन के हारे हार है
मन के जीते जीत
जो हारे न हौसला
उसकी जग में कीर्ति,
दुख सागर यह जगत है
मनुज है तरता मीन
दुख को जीत सका वही
जो हिम्मत-हौसला प्रवीण।

हर रात के बाद सुबह हुई
जीता कब अंधियारा
हर मुश्किल से जीता वही
जो खुद से कभी न हारा,
डर तो मन का रोग है
हौसला है उपचार
हिम्मत को न हरा सका
तीर तोप तलवार।

लड़खड़ाना तो राह पर
चलना हमें सिखाता
धावक वही बनता है
जो गिरकर उठ बढ़ जाता,
पांव पर लगी ठोकरें
करती है मजबूत
इतना कर फिर हौसला
हर ठोकर जाए टूट।

तिनका तिनका जोड़-जोड़
बीते कई-कई प्रहर
हर तिनका जुड़ता गया
फिर बना बया का घर,
बिन थके अनवरत लक्ष्य को
उद्धत छोटा सा विहंग
अपर तू भी पहचान खुद
लेकर हौसले की नई उमंग।

हौसले ने किए सहस्र प्रयास
न हारा आस न विश्वास
न डर है तूफान का
न शिकारी तीर कमान का,
बया को देख इन्सान तू
बल बुद्धि का निधान तू
कर फिर से एक प्रयास अब
न हो डगमग विश्वास अब।

चींटी भी चलती गई
न देखा तन आकार
कितने योजन चल गई
फिर मनुज क्यों माने हार,
हौसले की होती विजय
करे हर सपना साकार
मन के जीते जीत है
और मन के हारे हार॥
***

विडम्बना

राम परशुराम वाल्मीकि और यदुवंशी कन्हाई
राजनीति में इनका है बँटवारा भाई॥

क्षत्रिय को बताते हैं परशुराम ने किया समूल नाश
अत्याचारी निरंकुश राजा, जो करते थे प्रजा का त्रास
न कि हर क्षत्रिय को, परशू ने वैरी माना था
कुछ को शिक्षा दीक्षा देकर क्षत्रिय धर्म निखारा था
भीष्म और कर्ण भी परशुराम के परम शिष्य
क्षत्रिय उद्धारक को ताणक कहते हैं वामपंथी मित्र॥

वाल्मीकि रामायण के सर्वमान्य रचयिता थे
न कि वर्ग विशेष के ही पूजित परमपिता थे
जाति से बढ़कर ऋषि बने, हर वर्ग था शीष नवाता
हमारा धर्म जाति वाद का, कौन तुम्हें बतलाता 
शबरी के जूठे बेर श्री राम ने खाए, 
निषाद राज को मित्र बना कर अपने गले लगाए
केवट ने गंगा पार करा कर चरणो को फिर धोया
प्रभु ने गले लगाया फिर तो प्रेम भाव में रोया॥

विश्वामित्र राजा से वन गये ब्रह्म ऋषि महान
कर्म प्रधान व्यवस्था का ये ही सबसे बड़ा प्रमाण
ग्वाल गोपाल गोपालक ने किया द्वारिका नगर पर राज
जाति पात को अपनाया लोगों ने करके सिर्फ पैत्रिक काज 
लुहार का वंशज लोहा जाने, कुम्हार चाक का उत्तराधिकारी
जात पात बन गया यही, आज बन गया यह बीमारी॥

व्यवस्थाएं बनी थी कुछ सुरक्षित समाज के लिए
मृत देह व मृत चर्म कार्य को छू कर के नहाते थे
भोजन पानी की स्वच्छता पर ध्यान रखकर खाते थे
लोगों ने छुआछूत का नियम बना दिया, स्वच्छता को भूल गये
जातियां छूत अछूत हो गयी सत्य से प्रतिकूल गये॥

हर गरीब लाचार पर तरस भी नहीं रहा दुष्टों को
हड्डी के अछूत ढाचों पर दया नहीं हष्टो-पुष्टों को 
पर अब तो नहीं रहा लोगों में छुआ छूत का आखिर रोग
होटल स्कूल मन्दिर रस्ते न कोई किसी को रोक-टोक
पर राजनीति के गलियारे अब जात पात बताते हैं
किसी के बाप को देखा नहीं, दादा के जीवन को बताते हैं
कुछ और जंगली लोग भारत की संस्कृति पर करते वार
रेगिस्तान के ऊँट का सपना, भारत के संस्कारो को तार तार
खुद पर भरोसा कर वेद योग को प्राप्त करो
दुनिया तुम पर शोध कर रही, विचारों को आजाद करो॥
सेतु, जनवरी 2021

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।