कहानी: हमारे परशुराम

नमिता सचान सुंदर

हम उस समय शायद कक्षा चार या पाँच के विद्यार्थी थे। हमें हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षक का असली नाम तो हम लोग न तब जानते थे न अब पता है पर उन्हें हम लोग परशुराम मास्टर जी के ही नाम से जानते थे। इसका कारण था कि हमारे मास्टर जी दशहरे से पहले होने वाली रामलीला में नियमित रूप से परशुराम की भूमिका निभाते थे। 

छह फुट से भी अधिक लम्बा कद, हष्ट-पुष्ट गठा बदन और बिल्कुल दूध धुली रंगत, गरज यह कि हमारे मास्टर जी को ऊपर वाले ने जैसे परशुराम की भूमिका के लिए ही गढ़ा था। परशुराम के संवाद क्या मास्टर जी को तो रामायण के न जाने कितने कांड मुँह जबानी याद थे। जाहिर है हमारे मोहल्ले में महीने भर तक चलने वाली रामलीला में सबसे अधिक जनता परशुराम-लक्ष्मण संवाद वाले दिन ही जुटती थी। उन दिनों रामलीला में परशुराम का किरदार निभाने वाले व्यक्ति की लोकप्रियता का एक पैमाना यह भी हुआ करता था कि शिव-धनुष भंग होने से उपजे आक्रोश में पैर पटकते, चहलकदमी करते उन्होंने कितने तख्त तोड़े। हम बच्चों को तब यह बिल्कुल पता नहीं था कि उस दिन परशुराम जी के चलने का मार्ग बनाने के लिए तीन-चार तख्त एक के बाद एक डालने के लिये रामलीला कमेटी बहुत दिन पहले से ही पुराने और कमजोर तख्तों को इकट्ठा करने लगती थी और परशुराम जी को पहले ही अवगत करा दिया जाता था कि किस नम्बर वाले तख्त पर जोर आजमाइश करनी है। हर टूटते तख्त के साथ हम लोग अपने मास्टर जी के पराक्रम से अभिभूत हो उठते थे। हम सब के मन में मास्टर जी की छवि एक बहुत ही वीर और करिश्माई व्यक्तित्व की बनी हुई थी।

गर्मियों की छुट्टियों में हम लोग गाँव चले जाते थे। उन्हीं दिनों की बात है, हम लोग गाँव गए हुए थे। एक दिन दोपहर को अपने घर, मोहल्ले में बड़ों के जमावड़े और बातों से अंदाजा लगा कि गाँव में बहुत बड़ी अनहोनी हो गई है। हुआ यूँ कि एक अच्छे- खासे सम्पन्न परिवार की सास ने अपने मायके के किसी व्यक्ति के साथ मिल कर अपनी बहू की हत्या करके उसे आत्महत्या की शक्ल दे दी थी। जिस दिन यह कांड किया गया था घर के मुखिया और उनका बड़ा बेटा किसी कार्य से पास के कस्बे में गए हुए थे किंतु घर के छोटे बेटे ने छत में फूस के नीचे छिपे हुए आंगन में हुआ यह सारा कांड देख लिया था और इस तरह सबको असलियत का पता चल गया था। मृतका माधुरी भाभी के माता-पिता का देहांत काफी पहले ही हो चुका था। उनकी शादी उनकी बड़ी बहन और जीजा जी ने की थी। भाभी के जीजा जी शादी में दहेज के रूप में तय रकम का पूरा इंतजाम शादी तक नहीं कर पाये थे और उन्होंने वादा किया था कि कुछ माह में प्रबंध करके वे पैसे ले आयेंगे। भाभी की सास ने उनसे कह दिया था कि जब वे बाकी के पैसे ले कर आयेंगे तभी वे भाभी को उनके साथ मायके भेजेंगी। तय अवधि से कुछ समय ऊपर हो गया था और भाभी के जीजा जी उन्हें लेने नहीं आ पाए थे। यद्यपि वे बीच-बीच में खबर भिजवाते रहते थे कि बस कुछ ही पैसे रह गए हैं और वे जल्दी ही आयेंगे पर भाभी की सास को लगने लगा था कि वे बहाना बना रहे हैं। इधर भाभी इतनी सुंदर, सुघड़ और मृदुभाषी थी कि उनके ससुर और पति का बची हुई रकम के प्रति कोई आग्रह भी नहीं रह गया था। लेकिन भाभी की सास को शायद यह बात अपमान और अवहेलना के रूप में खटक रही थी और उन्होंने दुष्कर्म को अंजाम दे दिया।

कुदरत की मार देखिए कि जिस दिन यह कांड हुआ उसी दिन शाम भाभी के जीजा जी पैसे ले भाभी को लिवाने आ पहुँचे।

इधर गाँव-घर में हत्यारी सास की लानत-मलामत तो खूब हो रही थी लेकिन गाँव के प्रभावशाली व्यक्तितों का सोचना था कि यह बात थाना पुलिस तक नहीं जानी चाहिए, गाँव भर की बदनामी होगी। भाभी के पति तो एक कोने में पत्थर से बैठे थे पर उनके पिता जी सबके सामने हाथ जोड़े सिर झुकाये खड़े थे।

जब गाँव में यह खबर आई कि गाँव की तरफ आने वाली पगडंडी पर भाभी के जीजा जी आते दिखाई पड़े हैं तो सब बड़े-बूढ़ों की सलाह बनी कि उन्हें घर तक पहुँचने से पहले ही चौपाल पर रोक कर सारी स्थिति से अवगत कराया जाये और वैसा ही किया गया।

हम लोगों ने हवा में फैली सनसनी सूंघ ली थी। मन बहुत करने के बावजूद भाभी के घर की तरफ जाने की सख्त मनाही थी, फिर भी हम लोग चौपाल तक तो पहुँच ही गए। भाभी के जीजा के प्रति अम्मा, चाची लोगों की बातों में छलकती सम्वेदना ने हम लोगों को अनायास ही उनसे जोड़ दिया था। सो चौपाल के चबूतरे तक हम खिंचे चले गए और बड़े लोगों के गोल घेरे के बीच घुस कर भाभी के जीजा को देखने का प्रयास करने लगे। अरे यह क्या! चबूतरे पर सिर झुकाए, लोगों से घिरे बैठे यह तो हमारे परशुराम मास्टर साहब हैं। ये हैं भाभी के जीजा? हमारा मन अचानक ही दुख और आक्रोश से भर उठा। मास्टर साहब के चेहरे पर गहराती पीड़ा, विवशता की एक-एक लकीर मेरे मन में गुस्सा बढ़ा रही थी। गाँव के बड़े सम्मानित लोगों से घिरे हमारे मास्टर साहब हमें चक्रव्यूह में घिरे अभिमन्यु सरीखे लग रहे थे। जो कुछ भीतर उबल रहा था उसे व्यक्त करने जितनी क्षमता तो नहीं पनपी थी तब पर एकजुट समूह के बीच अकेले घिरे, आर्थिक रूप से कमजोर आदमी की बेबसी कहीं भीतर छील रही थी।

एक लम्बी चुप के बाद बोले थे मास्टर साहब, “आप लोग बड़े आदमी हो, थाना कचहरी के लिए हम कहाँ से पैसा लायेंगे। पैसा ही होता तो हमारी बिट्टो का यह हाल होता? हम कुछ नहीं कर पायेंगे, न करेंगे पर आप लोगों से एक विनती है...” थोड़ा रुक कर हाथ जोड़ते हुए बोले, “एक बार बिट्टो का मुँह दिखा दीजिए हमें। माफी तो माँग लें उससे। वचन दिया था अम्मा को मरते समय कि बिट्टो की सारी जिम्मेदारी हमारी।” मास्टर साहब का मुख दुख, आवेग से काला हो उठा था। मेरे भीतर रुलाई कलेजा फाड़ बाहर आने को जोर मार रही थी पर गुस्सा भी बहुत आ रहा था। 

सब लोग चुप थे। कोई यह नहीं चाहता था कि मास्टर साहब वहाँ तक जायें, पर अचानक हमारे बाबा उठ खड़े हुए और मास्टर साहब के कंधे पर हाथ रख कर बोले, “आओ बेटा, चलो।”

सच, इतना गर्व हुआ अपने बाबा पर कि थोड़ी देर को रोना, गुस्सा, सब जैसे कहीं बिला गए, और जब बाबा मास्टर साहब को ले कर चले तो हमने भी बाबा की अंगुली थाम ली संग चलने को। बाबा चौंके, घर लौटने को कहते उससे पहले ही हमने धीरे से कहा, हमारे मास्टर साहब हैं। बाबा कुछ नहीं बोले फिर, और मास्टर साहब तो सिर झुकाए अपने ही में गुम थे।

आंगन में माधुरी भाभी की मृत देह रखी थी और कोई भी आस-पास नहीं था। शायद मास्टर साहब के आने की खबर लगने पर सब वहाँ से हट गए थे। मास्टर साहब भाभी के पास बैठे और बस अपलक उनका चेहरा देखते रहे। न जाने कितने भाव आ जा रहे थे मास्टर साहब के चेहरे पर, कभी तूफान सा छाता, कभी बादल से घिरते पता नहीं क्या लगा हमें कि हम बाबा की अंगुली छोड़ मास्टर साहब के बगल में जा खड़े हुए और उनके कंधे पर अपना हाथ रखा। अब उन्हें मेरी उपस्थिति का भान हुआ। पहचान उभरी, असमंजस छाया, ‘’हमारी पोती है।” बाबा ने कहा।

मास्टर साहब उठ खड़े हुए थोड़ी देर में।

हम लोग लौट रहे थे। अब हम मास्टर साहब की अंगुली पकड़े थे। रास्ते में चौपाल पर मास्टर साहब ने सबको हाथ जोड़ नमस्कार किया। बाबा वहीं रुक गए पर हम गाँव के आखिरी घर तक उनका हाथ पकड़ चलते रहे। गाँव पीछे था अब। मास्टर साहब रुके, बैठ गए, मेरे सिर पर हाथ फेरा और भरे गले से बोले, ‘’अब तुम घर जाओ , बेटा।” 

दयनीय चेहरे पर बड़ी-बड़ी आँखों में अब पानी तैर रहा था। पता नहीं कैसा तो एक दायित्व बोध जागा हमारे भीतर। हमने अपनी नन्ही हथेली से उनके आँसू पोंछे और मुँह से निकला, “परशुराम रोते नहीं हैं।” उस पल मास्टर साहब के चेहरे पर उपजी एक अजीब सी मुस्कान का राज तो बड़े होने पर समझ आया। परशुराम रोये नहीं थे पर उनके भीतर जमा दुख आक्रोश बन फूटता था पर हमारे परशुराम तो न आँसू बहा सकते थे, न क्रोधित हो सकते थे। वे बस बेबस थे।

उस हादसे के बाद कभी परशुराम नहीं बने मास्टर साहब।


कथादेश अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता-12 में पुरस्कृत नमिता सचान सुंदर पूर्व बैंक अधिकारी हैं और लखनऊ में रहती हैं।

5 comments :

  1. Amazing wrenching but thats fate

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    1. yes, thats fate. Life sometimes is heartbreaking.

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  2. इस कहानी को अगर एक अंजाम दिया जाता तो परन्तु चलिये। आपने यथार्थ को ही प्रकट किया है। बहुत सुंदर।

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