मानव जाति की सर्वोच्च आकांक्षाओं की प्रतीक- अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


प्राचीन काल से, मानव जाति, ग्रह पृथ्वी पर अपने संक्षिप्त इतिहास में, अपने लिए अकल्पनीय भयावहता और नरसंहार का कारण और अनुभव करती रही है। लेकिन मूलरूप में, मनुष्य की पहचान उसके सांस्कृतिक मूल्यबोध के कारण श्रेष्ठ मानी गई है। धरती पर मनुष्य रूप में या ऋषि, गंधर्व, देवता और ईश्वरत्व की भी जो कल्पना है वह मनुष्य सदृश ही की जाती है। इसका कारण स्पष्ट है कि मनुष्य अपनी सोच का ईश्वर, देवता, ऋषि, गंधर्व सब गढ़ता रहा है। उसके इस अनगढ़ को गढ़ने की भी प्रक्रिया, उसकी सोच से निष्पादित होती रही है। यह सब मनुष्य संभवतः इस वजह से कर सका क्योंकि उसने मनुष्य और देवता के बीच अंतर को समझा। राक्षस योनि भी मनुष्य ने परिभाषित किया, और यह सब उसके सांस्कृतिक चेतना का परिणाम रहा है। एक मौलिक उसकी सोच यह ज़रूर रही है कि ईश्वर कण-कण में विद्यमान है। यह परिभाषित करने की प्रक्रिया निःसंदेह मनुष्य के व्यवहार व सोच से उपजी अनुभूति के आधार पर हुई होंगी। लेकिन जो पहले था वह उत्कृष्ट था, ऐसा हमारे शास्त्र कहते हैं। जो आज हैं उससे भी हम ज्यादा परिष्कृत थे, ऐसा कहा जाता है। लेकिन जो आज है उसके हम प्रत्यक्षदर्शी हैं। जो पहले था, उसका तो हम अभिलेखों और पुस्तकों में अध्ययन करते हैं, तब हमें पता चलता है। जिन इतिहास के साथ हमारे पूर्वज जीते आए हैं, उसे सच मानें तो भी हम यह पाते हैं कि हमारा विकास और हमारी सोच का विकास सतत है। वह निरंतरता में गतिमान है। हमारे शास्त्रों की बहुत सारी कथाएँ तो मिथ मान ली जाती हैं लेकिन आज के सच से ही अपने सांस्कृतिक बोध को जब हम आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़ेंगे, तो हमारा अतीत हमारे जीवन के विभिन्न सत्कर्म और मनुष्य विरोधी कर्म को रेखांकित करेंगे। हमारी पीढ़ियाँ तो आज के हमारे कर्म के अनुसार ही हमें मनुष्य के निर्धारित परिभाषाओं में से किसी कोटि में हमें रखेंगी। सवाल इसलिए यह है कि हम अपने कर्म को लेकर क्यों ज्यादा चिंतित नहीं रहते? हम उदाहरणीय क्यों नहीं बन पाते? हम मनुष्य के मूल में करुणा व दया के ही भाव को जागृत करने में ही विफल हुए तो इसके पीछे कोई न कोई हमारी ही कमी है।

तुलसीदास जी ने लिखा है कि होइहैं वही जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावैं साखा लेकिन तुलसीदास जी ने यह भी लिखा-कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहिं सो तस फल चाखा। इस द्वैध को समझना अवश्यक है। आज भले ही कोई अपने सफलता पर अपनी पीठ ठोक ले लेकिन सत्य सबकी प्ररीक्षा लेता है। मनुष्य सत्य का आग्रही है तो वह अपने कर्म को द्वैध बनाकर नहीं जीता। वह जैसा होता है वैसा ही व्यवहार से झलकता है। जो अपने कर्म और अपने व्यवहार में द्वैध लेकर चलता है वह सत्य का अनुष्ठान नहीं करता। उसके द्वारा की जा रही परोक्ष रूप से हिंसा किसी न किसी के हृदय को पीड़ा दे रही होती है। यह हिंसा की उपस्थिति मनुष्य के लिए परिभाषा बन जाती है। स्वयं को भगवान समझ लेना तो किसी के लिए आसान है। इसे पुण्डरीक मानसिकता वाला व्यक्ति कहा जाता है। उसने श्रीकृष्ण को श्रीकृष्ण न मानने और स्वयं को श्रीकृष्ण समझने और लोक में इसे ही स्वीकारने के लिए लोक को विवश करने की धुन थी। किन्तु सत्य कुछ और था। इसी प्रकार जो मनुष्य भ्रम में स्वयं को समय से आगे और अपने को श्रेष्ठ समझ लेने की भूल करता है वह स्थिति उससे हिंसा करवाती है और वह मूलरूप से अपने सांस्कृतिक बोध से भी दूर चला जाता है। छद्म ज्यादा समय तक स्थिर नहीं रहता और इसी कारण मनुष्य के योनि की कोटि हमारे आने वाली पीढ़ी अपने अनुसार परिभाषित करके उसे वह स्थान नहीं दे पाती जिसका वह स्वयं को योग्य साबित करता रहा है। इसमें सूक्ष्म हिंसा के भाव और उसकी समझ से ही हम अहिंसक मूल्यबोध को रेखांकित कर पाते हैं। प्रायः यह देखा गया है कि हम इस मूल्यबोध का अस्वाद करके ही अपनी समझ विकसित कर पाते हैं।  

हिंसा का प्रसार जिस विधि से होता है, उसका माध्यम आम जनमानस जानता हो, यह भी आवश्यक नहीं है। हिंसा तो परोक्ष रूप से भी अपना विस्तार कर लेती है और दूसरों के दुखों का कारण बनती है। हिंसा की संस्कृति इसलिए ऐसा नहीं है कि वह आतंक या उन्माद से ही समझी जाए। वह तो सूक्ष्मता से किसी के जीवन के लिए अभिशाप बन जाती है। इसीलिए घर में रहने वाली स्त्रियाँ, ठेले पर सामान बेचने वाले विक्रेता और सफाईकर्मी सब हिंसा से आहत होते हैं और उसके स्वरूप भिन्न-भिन्न होते हैं। वे सब सहन कर रहे होते हैं अपने-अपने परिवेश की हिंसा। आतंक और उन्माद की हिंसा तो भयावह होती है। ज्यादा वृहद होती है लेकिन सूक्ष्म हिंसा के शिकार हुए लोगों को सूक्ष्म हिंसा कब अपने कब्जे में कर लेती है और इससे पीड़ित लोग कब अवसाद में चले जाते हैं, इसका अगर अध्ययन किया जाय तो हमें यह पता चलेगा कि सूक्ष्म हिंसा और ज्यादा भयावह होती है।

हिंसा की संस्कृति भी इसलिए अहिंसा की संस्कृति की तरह हमारे परिवेश में घुली हुई है। अगर हम सकारात्मक भाव से देखें तो अहिंसा की संस्कृति से मनुष्य का तादात्म्य ज्यादा है। देखने और समझने में ऐसा लगेगा कि मनुष्य तो हमेशा किसी न किसी संघर्ष के साथ जीता है। इस धरती पर अनेकों युद्ध होते रहे फिर भी अहिंसा की संस्कृति का तादात्म्य अधिक कैसे हो सकता है? यह सवाल ठीक है और सही भी है क्योंकि प्रायः लोगों को कष्ट और उसके परिणाम ज्यादा स्मरण रहते हैं। अहिंसा और अहिंसक आचार-व्यवहार कम स्मरण रहते हैं। लेकिन हमारे यहाँ शिवि की कथाएँ हैं। बुद्ध का अहिंसक सन्देश है। और दुनिया में करुणा और दयालुता के हज़ारों आख्यान हैं जो हमें अपनी और खींचते हैं। इसका कारण यह है कि मनुष्य हिंसा नहीं चाहता। उसे हिंसा की विद्रूपता से कहीं न कहीं घृणा है। वह तो प्रेम की ओर खिंचा चला जाता है। यह ऐसा नहीं है कि भारत भूमि पर देखने को मिलता है बल्कि हिंसा और अतिक्रमण की कथाएँ जहाँ कहीं भी इस धरती पर पढ़ने को मिलती हैं तो हम देखते हैं कि हिंसा से मुक्ति दिलाने वाले मनुष्य या मनुष्यता का कोई न कोई स्वर अवश्य देखने को मिलता है। ऐसे लोगों के वृत्तांत से पता चलता है कि अहिंसक सभ्यता के समर्थक और उनकी ही जय की गाथाओं की कोई कमी नहीं रही है और यह भी देखा गया है कि अहिसंक संस्कृति के लोगों की ही कथाएँ अपने उत्कृष्टता को प्रदर्शित करने के लिए मनुष्य अपनी पीढ़ियों को सुनाता रहा है। इसका अर्थ यही है कि वह अपनी नई सभ्यता को भी अहिंसक संस्कृति को देने के लिए यत्न कर रहा है। आखिर यह सवाल कि हिंसा के जो भी उपक्रम हैं उसे वह क्यों अपनी नई पीढ़ी को नहीं देना चाहता?

मनुष्य की यह मनुष्य बनने की प्रक्रिया वर्षों उसके हिंसक सभ्यता से जूझते हुए विकसित हो सकी है। वह यह समझ सका है कि हिंसा, हिंसा को और युद्ध युद्ध को विस्तार देते हैं। उनके मूल में हिंसा ही होती है। इस प्रकार की कोशिश इसलिए वर्ज्य है। उसे किसी भी दशा में अंगीकृत नहीं किया जा सकता और इससे हम मनुष्य और प्रकृति दोनों का शमन करते हैं केवल। इसलिए वह यह चाहता है कि हिंसा से मनुष्य अलग हो और अहिंसक संस्कृति के लिए ही मनुष्यता जानी जाये। यह करुणा, दया, प्रेम और अहिंसा के भाव ही मनुष्य के सांस्कृतिक बोध के सही मापांक हैं। इसी से वह ज्यादा अपने सौन्दर्यबोध को भी प्रकट कर पाता है।

अक्टूबर 2010 में महासचिव बान की मून ने अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस को संबोधित करते हुए एक संदेश में कहा था- शांति और अहिंसा की संस्कृति बनाने और बनाए रखने का काम प्रतिबद्ध पुरुषों और महिलाओं के दिलों में शुरू होता है। उन्होंने यह भी कहा था कि हिंसा को हराने और शांति की संस्कृति बनाने के लिए समुदायों, परिवारों और व्यक्तियों सभी की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह काम केवल सरकारों या अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है। वास्तव में, यह तो सभी के समेकित प्रयास से अहिंसक संस्कृति को स्थिर, टिकाऊ और सरस बनाया जा सकता है। यह किसी भी वैयक्तिक प्रयास से भी बनी रह सकती है लेकिन एक स्वर में यदि सभी इस अहिंसक संस्कृति के प्रति आग्रही होकर मनुष्य के सांस्कृतिक बोध को समृद्ध करेंगे तो बहुत से संकट आयेंगे ही नहीं।
ऐसी संस्कृति के सतता की सामान्य जड़ें व  सामान्य उपाय क्या हैं? इसका भी उत्तर मनुष्य के पास है एक सम्मान करना सीखे और सहिष्णु शिक्षा का विस्तार आगे मनुष्य करे तो यह संभव है कि वह मनुष्य के सांस्कृतिक बोध को और सर्वप्रिय बना सके। इसके लिए भेदभाव को मिटाना आवश्यक है और विविधता के लिए सम्मान भी मनुष्य के भीतर अगर उपजेगा तो यह संभव है कि वह एक अहिंसक व्यक्ति-मनुष्य बन सके। अगर वह ऐसा बनता है तो हिंसा की रोकथाम व उसका  शमन वह स्वयं करने के लिए स्वतः अभिप्रेरित होगा और प्रतिक्रियावादी नहीं बनेगा। उसके भीतर सामाजिक समावेश, अंतर-सांस्कृतिक भाव उत्पन्न होंगे। अंतर-धार्मिक और अंतर-जनवादी संवाद के लिए वह अभिप्रेरित होगा यह सभी मनुष्य के सांस्कृतिक कारक हैं। विभिन्न विचारधाराओं, विश्वासों की सहिष्णुता, जीवन दर्शन की उपस्थिति, आध्यात्मिक पहचान  सांस्कृतिक रूप से धरातल पर होना ही तो मनुष्य के प्रेम का रूप है इससे मनुष्य के सोचने की क्षमता जिस प्रकार से विश्वव्यापी बनेगी इसकी कल्पना अगर हिंसक संस्कृति के बीच नहीं समझ आती तो इसे जगतव्यापी आचार-व्यवहार में लाकर देखें फिर जो इस धरती का सौन्दर्य होगा वह भी अप्रतिम होगा।

कुछ लोग तर्क देंगे कि यह असंभव है क्योंकि हिंसा मानव मानस में इतनी गहराई से अंतर्निहित है कि यह अपरिवर्तनीय है। किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि व्यावहारिक रूप से जीवन के सभी क्षेत्रों में मानव प्रगति निर्विवाद और अजेय है और मनुष्य के मूल में अहिंसा और सत्य ही है। इसलिए अहिंसक संस्कृति का भविष्य निराशावादियों को आश्चर्यचकित करेगा।


पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

2 comments :

  1. अनुज विद्वान डा.कन्हैया त्रिपाठी का यह लेख अत्यंत प्रभावशाली तरीके से अहिंसा की सामयिकता को प्रतिष्ठित कर रहा है।उनका यह कहना शत प्रतिशत सत्य है कि मानव के मूल में अहिंसा और सत्य प्रतिष्ठित है।इसलिए अहिंसा के मूल सिद्धांत में कभी भी बासीपन नहीं आ पायेगा।डा.त्रिपाठी को हार्दिक बधाई।

    ReplyDelete
  2. Very nice paper and knowledge for PhD in ghadani philosophy. 🙏🙏

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।