यथार्थ का उलझता, उलझाता स्वरूप

चंद्र मोहन भण्डारी

हमें यथार्थ और सत्य के अंतर को समझना है। हम जो कुछ सोच रहे होते हैं वह भी यथार्थ है चाहे वह

तर्कसंगत या अर्थपूर्ण हो या न हो; इस यथार्थ का सत्य से कोई संबंध नहीं।

यथार्थ किसी भी रूप में परिस्थिति जन्य हो सकता है और इसलिये मतिभ्रम या भ्रांति

भी यथार्थ के ही रूप हैं। ऐसा यथार्थ सशर्त या प्रतिबंधित है।

-        जिदु कृष्णमूर्ति और डेविड बाँम [1]

 

विचारशील मानव सदा से ही विश्व प्रक्रियाओं को समझने का प्रयास करता रहा है और इसी के फलस्वरूप दर्शन का उदभव एवं विकास होता गया जो बाद के चरणों में विज्ञान का पर्याय बन गया। यथार्थ का स्वरूप और उसकी प्रकृति से जुड़ी बातें अक्सर सरल प्रतीत होती हैं पर जरा गहरे उतरने पर पता चलता है कि मामला उलझा हो सकता है। जरा गौर करें अगर एक छोटा सा कीडा एक पतले तार पर चल  रहा हो कैसा लगता होगा विश्व उसको? शायद वह यह बता न सके पर हम कल्पना कर सकते हैं। कीडे की बात छोड़ें, अपनी ही सोचें, जमीन पर चलते क्या कभी हम सोच सकते थे कि दुनिया गोलाकार है संतरे की तरह?

आज से सिर्फ कुछ ही सदी पहले सभी यही समझते थे कि दुनिया चपटी है और एक दिशा में चलते चले जाने पर उसका किनारा आ जायेगा फिर अगला कदम लेना खतरे से भरा हो सकता है। लगभग चार सदी पहले आधुनिक विज्ञान के विकास के साथ सही तसवीर सामने आना शुरू हुई और तभीसे अन्य मसलों पर भी विश्व की हमारी जानकारी  मे फर्क आ चुका है और आगे भी यह संभावना बनी ही रहेगी।

मानव जीवन में जो बड़े परिवर्तन हुए हैं उनमें सबसे पहले कृषि- क्रांति को लिया जा सकता है। कृषि की जानकारी  के पहले मानव जीवन यायावर का रहा था। भोजन व सुरक्षा की तलाश तब प्राथमिकता थी और भोजन की तलाश में यायावरी जीवन एक अनिवार्यता थी। कृषि- क्रान्ति ने मानव जीवन में स्थिरता प्रदान की और इसका एक बड़ा लाभ यह मिला कि निरंतर की भाग-दौड़ से मुक्ति मिली। इसके साथ ही एक बड़ा बोनस भी मिला समय का, अवकाश के क्षणों का। स्थिरता का लाभ यह हुआ कि अब मानव के पास सोचने का समय था और अवसर था विकसित मस्तिष्क की सामर्थ्य का भरपूर लाभ लेने का। रातों मे तारों भरे आकाश को निहारते जिज्ञासु मन ने यह समझने का प्रयास किया कि यह अदभुत नजारा किसने और कैसे बनाया होगा? जिज्ञासु मन के साथ कवि-मन पहेली बूझने[2] अपनी उड़ान पर जा पहुँचा और कवि को तारों भरा आसमान लगा थाल में रखे मोतियों जैसा:

एक थाल मोती से भरा, सिर के ऊपर औंघा धरा

चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक ना गिरे।

यही नजारा किसी को चांदनी की बारात जैसा लगा जिसमें तारे बाराती बन गये [३]

आ रात जा रही है

जैसे चांदनी की बारात जा रही है

चलने को अब पलट के

तारों का कारवां है।

जिज्ञासु-मन इन सब का कारण तलाशने लगा, पर ठोस जानकारी के अभाव में कल्पना का सहारा जरूरी लगा। कारण की तलाश और कल्पना का आधार बस फिर क्या था पौराणिक संदर्भ सामने आने लगे। धीरे-धीरे इस कल्पना में तर्कपूर्ण चिंतन व सामान्य प्रेक्षण भी शामिल हो गया और दर्शन का उदभव होना आरम्भ हुवा।

यथार्थ: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष

यूनान (ग्रीस) के दार्शनिक-विचारक अरिस्टोटल (अरस्तू) विश्व के महानतम विचारकों में माने जाते हैं जिन्होंने दो हजार साल से अधिक समय पहले अपने विचारों को लिपिबद्ध किया। अरस्तू की मृत्यु के बाद ग्रीस के राजा ने शाही लाइब्रेरियन को अरस्तू के समस्त साहित्य को क्रमबद्ध करने का काम सोंपा। शाही लाइब्रेरियन ने सुविधा के लिये विशाल साहित्य को दो भागों में बांटा; पहला भाग प्रत्यक्ष यथार्थ से संबद्ध था जिसे उसने फिजिका नाम दिया जबकि दूसरा भाग जो अप्रत्यक्ष से संबंध रखता था उसे मेटाफिजिका नाम दिया, यानि फिजिक्स एवं मेटाफिजिक्स; आज मेटाफिजिक्स को अलग अलग अर्थों में प्रयुक्त किया जाता रहा है। फिजिका भौतिक जगत की प्रत्यक्ष जानकारी के लिये था, और मेटाफिजिका यानि फिजिका के इतरउन सभी बातों के लिये जो प्रत्यक्ष नहीं प्रतीत होतीं। सही मायने में उसे गहन यथार्थ कह सकते हैं और जिसे समझने के लिये तर्कविधि का सहारा लेना आवश्यक है। तर्कविधि का प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण है उसकी अनुपस्थिति में यह भी समझना मुश्किल होगा कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर नहीं घूमता अपितु पृथ्वी तथा अन्य ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। इसी तरह प्रत्यक्ष तौर पर यह सोचना कठिन होगा कि सभी पदार्थ छोटे- छोटे कणों से मिलकर बने हैं जिन्हें परमाणु कहते हैं। अप्रत्यक्ष ज्ञान का दायरा बहुत बड़ा है और उन सबको हम गहन यथार्थ की एक ही श्रेणी में नहीं रख सकते। दरअसल अणु, परमाणु व उस से छोटे कणों के व्यवहार को समझना जब बहुत मुश्किल होने लगा तब यह निष्कर्ष निकाला गया कि उस लघु स्तर पर पुरानी विज्ञान (क्लासिकी विज्ञान) विधि प्रभावी नहीं हो सकेगी और उसके लिये एक नयी प्रणाली विकसित करने की जरूरत होगी। इस तरह नयी भौतिकी का विकास हुआ बीसवीं सदी  के तीसरे व चौथे दशकों में, और उसे क्वांटम भौतिकी नाम दिया गया। इस प्रयास में वर्नर हाइजनबर्ग और एरविन श्रोडिंजर का नाम प्रमुख है।

श्रोडिंजर संस्कृत जानते थे और उन्होंने उपनिषदों का अध्ययन किया था। उन्होंने अपने विचारों पर भारतीय चिंतन के प्रभाव को स्वीकारा है [4] परन्तु वह खूबी हमें न दिखायी दी; शायद हम चिंतन के  बजाय आस्था को अत्यधिक महत्व देने लगे थे, मनन के बजाय कीर्तन करना हमें अधिक रास आने लगा था और यह कमोबेश हमारी मानसिकता में गहरे पैठ चुका है। 

यथार्थ का स्वरूप

वैसे यथार्थ की परिभाषा पहली नजर में सरल नजर आती है जो अस्तित्व में है वह यथार्थ है। अस्तित्व में क्या है इसका ज्ञान सबसे पहले इन्द्रियों की सहायता से हुआ करता है। जिनको हम देखते,सुनते, स्पर्श करते या स्वाद से जान रहे होते हैं वे इस श्रेणी में आती हैं। पर बहुत कुछ ऐसा भी है जो हमारे इन्द्रियों के दायरे में नहीं आता। इन सवालों से हम रूबरू होना चाहेंगे।

यथार्थ का हमारा ज्ञान कई बातों पर आधारित है। सबसे पहली बात तो यह कि इसमें एक चिंतनशील मन की मौजूदगी है जो यथार्थ को समझने का प्रयास कर रहा है। दूसरी उपस्थिति उस वस्तु या चीज की है जिसे समझने का प्रयास हो रहा है। मैं एक चिड़िया को देखता हूं; मेरे और चिड़िया के अलावा भी कुछ है जो देखने के लिये जरूरी है वह है प्रकाश किरणें और उनका मेरी आखों पर प्रभाव। यह भी हो सकता है कि उस चिडिया का फोटो लेने का प्रयास करूं ताकि फुरसत के पलों में उसका अध्ययन कर सकू्ं। फोटो के लिये  भी प्रकाश चाहिये और चाहिये कैमरा व आवश्यक फिल्म। प्रकाश किरणों की तरंग लम्बाई बदल जाये तो द्दश्य पूरी तरह बदल सकता है। द्दश्य प्रकाश और एक्स किरणें अलग चित्र दिखायेंगी। 

एक्स किरण हड्डी का ढाँचा दिखायेगी और प्रकाश में दिखेगा चिड़िया का बाहरी परिचित रूप; दोनों ही यथार्थ के रूप होते हुए भी एक दूसरे से अलग। चिड़िया का हड़्ड़ी का ढ़ांचा भी सही है और बाहरी स्वरूप भी जो हमें सामान्यतया दिखायी देता है अपनी जगह सही है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि जिसे हम यथार्थ कहते व समझते हैं वह कोई एक निश्चित चीज नही है अपितु सापेक्षिक है और द्दष्टा, प्रयुक्त उपकरण या प्रयुक्त माध्यम (जैसे प्रकाश) पर निर्भर करता है। एक अन्य उदाहरण लेना उपयोगी होगा। आकाश में दीख रहे कई तारे बहुत दूर हैं यह दूरी प्रकाश वर्ष में कही जाती है। एक तारा हमसे १000 प्रकाश वर्ष दूर है यानि उसका प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचने में एक हजार साल लगते हैं। प्रकाश का वेग लगभग तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड है। आज हम जिस तारे को देख रहे हैं वह एक हजार साल पहले का प्रकाश है आज के दिन जो प्रकाश वह दे रहा है वह अगले एक हजार साल में हम तक पहुँच सकेगा। हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि आज की तारीख में वह तारा उसी जगह पर है जहां हमें दीख रहा है। इसीलिये हम पहले ही कह चुके हैं कि प्रत्यक्ष ज्ञान अपने आप में पर्याप्त नहीं अपितु उसके साथ तर्कपूर्ण विश्लेषण ही हमें यथार्थ के अधिक निकट ले जा सकते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि कई बार यथार्थ कोई निरपेक्ष चीज न होकर कई प्रभावों का मिला-जुला निष्कर्ष है।

हम कह सकते हैं कि यथार्थ परिस्थितिजन्य [1] होता है। मृग मरीचिका की बात करें जब मरुथल प्रदेश में दूरी पर जल का आभास होता है। यह आभास भी एक वास्तविकता है यथार्थ है; जल की उपस्थिति सत्य नहीं पर वह आभास अपनी जगह सच है। 

द्दष्टा का यथार्थ

अंतत: असली द्दष्टा मन ही है जो विश्व व उसकी धटनाओं का बोध कराने में सक्षम है और जिसकी अनुपस्थिति होने न होने का अंतर मिटा सकती है। देकार्त के बहुचर्चित कथन पर पहले भी कई बार चर्चा हुई  है: मैं सोचता हूं इसलिए मैं हूं। यह कथन मन की उपस्थिति की महत्ता को दर्शाता है, आखिर होने का बोध मन ही कराता है। मसलन हमें बोध है अपने होने का, क्या धरती को बोध है कि वह है क्या पहाड़ को बोध है अपने होने का? शायद नहीं, इसलिये देकार्त की बात भी ठीक है।

हमने पहले गहन यथार्थ की बात की है वह जो दिखायी नहीं देता पर उसकी उपस्थिति है। तारों के अंदर तापमान करोड़ों डिगरी सेलसियस होता है और इस भट्टी में सब कुछ पकता रहता है। एक तरह से तारों की भट्टी में ईंटें पकती रहती  है दरअसल जिन्हें हम ईंटें कह रहे हैं वे परमाणु हैं जो जीवन का, तारों का, ब्रह्मांड का सार हैं उनकी आधारभूत इकाई हैं। ये साधारण ईंटें नहीं अपितु खास तरह की आधारभूत इकाइयां हैं जो समपूर्ण विश्व और अस्तित्व का सार हैं। ईंटों से मकान बनते हैं और भी बहुत कुछ संरचनाऐं बनती हैं। पर तारों की भट्टी में जो पक रहे हैं वे परमाणु हैं कार्बन, नाइट्रोजन, आक्सीजन, सिलिकन या अन्य सभी परमाणु; हाइड्रोजन को छोड़कर, जो आरम्भ से ही मौजूद था। इसीलिये हमने कहा कि इन भट्टियों में जीवन व ब्रह्मांड की आधारभूत इकाई यानि परमाणु तैयार किया जा रहे हैं। 

 यह कैसा यथार्थ है एकदम अविश्वसनीय, रोचक और कभी बेतुका भी? लेकिन यही सच है। सारे खगोल विज्ञान का निचोड़ यही बयान करता है। यह सच है और जो सच है वह यथार्थ नहीं तो फिर यथार्थ किसे कहेंगे? पर जो भी है बड़ा उलझाता प्रतीत होता है। और एक तरह से देखें तो यह रोचक भी है यह जानना कि हमारे शरीर के परमाणु हजारों सालों तक तारों के गर्भ में रहे थे।

वास्तविकता या यथार्थ अधिकतर अर्थपूर्ण नहीं प्रतीत होता जबकि कोई लेख या कहानी अर्थपूर्ण हो सकते हैं। एल्डुवस हक्सले का  यह कथन सारगर्भित है। हमने कायनात की कुछ बातों की चर्चा की है  वह जो घटनाक्रम हजारों लाखों सालों के अंतराल में बिखरा हुआ है और अरबों-खरबों मीलों से अधिक विस्तार में फैला है हमारी नजरों के सामने लेख या कहानी के रूप में आता है। आकाश को निहारते रहने से कुछ स्पष्ट नहीं होता। जो सामने है या जो हम जान रहे होते हैं वह बहुत कम है उसकी तुलना में, जो हम नहीं जानते। अप्रत्यक्ष विराट है उलझा हुआ है और उस तक हमारी पहुँच तार्किक आधार पर ही संभव है जिसका प्रयोग विज्ञान में बहुतायत से होता रहा है।

विज्ञान हमें कुछ अन्य वास्तविकताओं से भी रूबरू कराता नजर आता है। जैसे हम यह मानते रहे हें कि मानव श्रेष्ठ है अन्य जीवों की तुलना में। पर यह भी जान लेना होगा होगा कि पहले हम भी वही थे। लगभग साठ लाख साल पहले चिम्पांजी योनि से अलग होकर विकास प्रक्रिया ने हमें आज का रूप दे दिया। लगभग दो करोड़ साल पहले सामान्य वानर तक हमारी रिश्तेदारी दीख पड़ती है पर निश्चय ही अन्य योनियों से भी गुजर कर इस मुकाम तक पहुँचे हैं। डारविन के शब्दों में: अपने सारे श्रेष्ठ गुणों के बावजूद मानव के शरीर में उसके निम्न मूल के प्रतीक चिन्ह एकदम साफ मौजूद दीख पड़ते हैं। निम्न यानि वानर से भी बहुत पहले की योनियों के चिन्ह। मसलन एक बैक्टीरिया हमारे शरीर की कोशिका की तरह है और एक वाइरस हमारे डी एन ए की तरह। धरती के पहले जीवों में बैक्टीरिया माना जा सकता है।

बंदरों से कुछ और पीछे चलते हैं जैविक-विकास-प्रक्रम में; उनसे कुछ करीब लगते हैं मूषक यानि चूहा। लगभग आठ करोड़ साल पहले पहले दोनों की जीन-व्यवस्था में अंतर आना आरम्भ हो चुका था। इसके बावजूद दोनों में समानताऐं बहुत हैं।

एक सवाल आसानी से पूछा जा सकता है क्या कोई प्रमाण है इन बातों की सचाई का ठोस प्रमाण. डी एन ए परीक्षण को अब लोग समझने लगे है और उसकी  खास जानकारी न होते भी उसकी सच्चाई में विश्वास करने लगे हैं जीन से मिलकर क्रोमोसोम बनते हैं जो एक पीढी से दूसरी में आनुवंशिक सूचना ले जाते हैं। मानव में 23 क्रोमोसोम युगल होते हैं इस काम के लिये जबकि मूषक में 20 या 21। प्रोटीन कोडिग मानव व मूषक में 85% समान है जीन की समानता 60% समान होती है। गाय व मानव में 80% जीन समान हैं जबकि चिंपाजी से यह समानता 98% है.

चिंपांजी से 98% समानता होते भी दरअसल फर्क सबसे अधिक मस्तिष्क में ही है जिनमें भाषा व बुद्धिमत्ता जैसी बातों की वजह से मस्तिष्क की समानता बहुत कम रह जाती है। जीन के स्तर की यह समानता इस बात का एक पुख्ता प्रमाण है कि मानव नाम के प्राणी का वर्तमान स्वरूप एक लम्बी जैविक-विकास-प्रक्रिया का निष्कर्ष है वैसे ही जैसे अन्य प्राणियों में। इसके अतिरिक्त और क्या चाहिये सिद्ध करने के लिये कि मानव जीव-जगत की पूरी श्रंखला से जुड़ा है। हमारा आज का यथार्थ हमारे साठ लाख साल पहले के यथार्थ से अलग है क्योंकि तब हम किसी और  योनि में थे।

मन की बात, न्यूरोनों के साथ

मन मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर आधारित है और न्यूरोनों के लचीले जुड़ाव में थोड़ा-बहुत इधर-उधर होने की संभावना बनी ही रहती है। यथार्थ से जुड़ी बात अंतत: इन न्यूरोन जुड़ावों पर आ जाती है इन बातों पर कुछ विस्तृत चर्चा समीचीन होगी। हमें बहुत कुछ लाभप्रद जानकारी मिली है खासकर मनोरोगों के अध्ययन में।  इन सबकी विस्तृत जानकारी देने का यहां सवाल नहीं उठता और यह संभव भी नहीं, पर उसकी एक झलक भर पर्याप्त है बात की तह तक पहुँचने के लिये। कुछ असामान्य मनोदशाओं का जिक्र अक्सर होता रहा है जिनमें सिनेस्थेसिया की चर्चा हुई है।. इस मनोदशा में गणितीय अंक रंगीन दिखने लगते हैं जबकि सामान्य लोगों के लिये वे सफेद पटल पर काले से लिखे गये हैं। पहले जब कोई इस तरह की बात करता था तब उसे द्दष्टि भ्रम समझकर टाल दिया जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं और यह एक सच है। किसी सिनेस्थेटिक इंसान का यथार्थ सामान्य इंसान के यथार्थ से थोड़ा अलग हो सकता है और दोनों ही सही हैं। एक अन्य अवस्था का जिक्र करेंगे जिसे फैंटम लिम्ब कहा जाता है। मस्तिष्क मे एक स्पर्श संवेदना क्षेत्र होता है जहां देह के किसी भाग को छूने पर होने वाली संवेदना अंकित हो जाती है  और वह इंसान आंख बंद होने पर भी बता सकता है कि देह के किस भाग को छुआ गया।

आभासी अंग और भ्रामक संवेदन

न्यूरोन जुड़ावों में लचीलापन होता है और जोड़ने में कभी थोड़ा आगे-पीछे भी हो सकता है। कुछ ऐसे इंसानों  पर किये गये प्रयोग [5] महत्व के हैं जिनका एक हाथ दुर्घटनावश कट गया था। लगभग 80 प्रतिशत लोगों को कुछ खास जगह छूने पर उस कटे अंग की उपस्थिति का भ्रामक संवेदन हुआ करता है। आँखों पर पट्टी बांधकर जब उनके शरीर के भागों को छुआ गया तो निष्कर्ष प्रत्याशित थे। बायें कंधे व गर्दन को छूने तक उसका उत्तर वही था जैसा होना चाहिये। लेकिन जब उसका बायाँ गाल छुआ गया तब यह जानते भी कि उसका बायाँ हाथ नहीं है उसने अनुभव किया कि उसके बायें हाथ की तर्जनी को छुआ गया। निचले होंठ के बायें भाग को छूने पर उसे अनुभव हुआ कि उसकी छोटी उंगली को छुआ गया। जो है ही नहीं उसके स्पर्श का अनुभव यथार्थ की हमारी समझ को एक नया आयाम दे देता है। आज हम इसका कारण समझ सकने की स्थिति में हैं। मस्तिष्क में एक छोटा सा क्षेत्र है जिसमें देह के अलग हिस्सों का संवेदन दर्ज होता है जिसे होमनक्युलस (homunculus) कहते हैं जिसका शाब्दिक अर्थ लघु मानव है यानि मानव की देह के संवेदन का एक छोटा सा खाका। होमनक्युलस का वह क्षेत्र जो हाथ की उंगलियों के संवेदन दर्ज करता है एकदम निकट है उस क्षेत्र के जो चेहरे और गले का संवेदन दर्ज करता है। जिसका हाथ नहीं है उसके होमनक्युलस का वह क्षेत्र संवेदन के लिये तरसता है और चेहरे व गले को छूने पर उनके हिस्से का संवेदन ले लेता है जिसके कारण भ्रामक संवेदन की अनुभूति होती है।

  बातें और भी हैं कि कुछ खास तरह की मनोदशा मस्तिष्क के चुनिंदा स्थलों पर रासायनिक अथवा विद्युत प्रभावों से भी पैदा की जा सकती हैं [6]। कुछ रसायन मन को विशेष दिशा में जाने के लिये प्रेरित करते पाये गये हैं बीसवीं सदी के मध्यवर्ती दशकों में एल एस डी नामक रसायन का प्रचलन हुआ था जो मन को विशेष कलात्मक अभिरुचि प्रदान करती थीं और तब इनके सेवन से सेवन कर्ता खास तरह की पेन्टिंग का सृजन करने में सक्षम हो जाता था जिन्हें साइकेडेलिक कला (psychedelic art) कहा जाता है। यह बात अब पूरी तरह स्वीकार्य है कि मन की करवट को अस्थायी रूप से रसायनों के प्रयोग से निर्देशित किया जा सकता है जिसका एक उदाहरण हम ले चुके हैं। मस्तिष्क के कुछ चुनिंदा स्थल ऐसे हैं जिन्हें इलेक्ट्रोडों की सहायता से विद्युत द्वारा उत्तेजित करने पर मन की करवट में खास तरह के परिवर्तन किये जा सकते हैं जैसे कि अध्यात्म के लिये विशेष अभिरुचि।

 मस्तिष्क में चोट लगने से भी ऐसे बदलाव आ सकते हैं जो लगभग स्थायी हो जाते हैं मस्तिष्क के न्यूरोनों के आपसी संपर्क में परिवर्तन होने के कारण. न्यूरोलोजिस्ट ओलिवर जैक [7] ने  मनोरोगों के अपने अध्ययन में ऐसी कुछ मनोदशाओं का जिक्र किया है जो संगीत के प्रति न केवल आकर्षण बढा देती है अपितु अचानक संगीत की गहन समझ भी प्रदान कर देती हैं। कई बार जब हम किसी की प्रतिभा का जिक्र करते हैं तो निश्चय ही बहुत कुछ शिक्षा एवं संस्कारों पर निर्भर करता है पर कुछ ऐसा भी है जो मस्तिष्क के न्यूरोनी परिपथ के जुडाव पर निर्भर करता है। इन जुड़ावों में कुछ इधर-उधर हो जाय तो मनोरोग का कारण बन सकते हैं पर कुछ मामलों में किसी विशेष दिशा में प्रतिभा के धनी।

यथार्थ के आयाम और भी हैं। हमारी भावनाऐं भी अस्तित्ववान हैं क्या प्रेम, ईर्श्र्या, क्रोध, सह्रदयता यथार्थ नहीं? वे सबके लिये एक समान नहीं फिर भी किसी खास के लिये वास्तविक हैं और उसकी जिंदगी को प्रभावित कर सकती हैं।

प्रकृति में वैविध्य और उसकी समझ

जीव-जगत के विराट वैविध्य की बात हम कर चुके हैं। इनके अतिरिक्त भी बहुत कुछ है जो रोचक है और सुंदर भी। अक्सर सरल रचनाऐं सरल तरीके से समझी जा सकती हैं और जटिल बातें वैसी ही उलझी हुई कार्यप्रणाली से। पर कभी ऐसा भी संभव है कि जटिल घटनाऐं बहुत ही सरल आधार पर समझी जा सकती हैं। ऐसी ही एक विधा है नई गणित की। अत्यंत सुंदर और आकर्षक डिजाइन प्राप्त किये जा सकते हैं अत्यंत ही सरल तरीके से जिन्हें एक बच्चा भी आसानी से कर सकता है। ऐसी आकृतियां फ्रैक्टल संरचनाऐं [8] कहलाती हैं।

यथार्थ, सच्चाई, वास्तविकता जैसे शब्दों का हर कहीं प्रयोग होता रहा है पर गौर से देखें तो मामला उतना आसान नही। इसके कई उदाहरण हम ले चुके हैं और कई अन्य भी लिये जा सकते हैं। दार्शनिक एवं वैज्ञानिक इन विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते आये हैं और यह क्रम चलता रहेगा। हमने देखा कि मस्तिष्क और उसकी कार्यविधि पर रासायनिक प्रभावों ने हमें गहराई से सोचने के लिये प्रेरित किया है। जैसे- जैसे हमारी जानकारी बढ़ेगी नये आयाम उदभाषित होंगे इसमें संदेह नहीं। दार्शनिक जिदु कृष्णमूर्ति ने ऐसे मसलों पर बहुत कुछ लिखा है और उनकी एक पुस्तक [1] का जिक्र उपयोगी होगा। भौतिकीविद डेविड बाँम के साथ उनकी लम्बी वार्ता में कुछ ऐसे ही प्रश्नों पर विस्तृत विचार-विनिमय रोचक एवं सारगर्भित है जिसकी एक झलक आरम्भ में दी गई है। इनमें से कुछ बातों पर इस अध्याय में भी चर्चा की गई है।  

संदर्भ 

[1] जिदु कृष्णमूर्ति, Truth and Actuality, Krishnamurti Foundation India, 1992; Part I is based on a discussion between Krishnamurti and Bohm on Truth and Reality..

[2] अमीर खुसरो रचित पहेली।

[3] हिंदी फिल्म अनमोल घड़ी में तनवीर नकवी रचित गीत।

[4] एफ कापरा, Uncommon Wisdom, Bantam Books, 1989.

[5] वी रामचन्द्रन, The Emerging Mind, Profile Books Ltd., 2003.

[6] Ray Kurzweil, the Age of Spiritual Machines, Penguin Books (USA), 2000.

[7] Oliver Sacks, Musicophilia, Vintage Books, 2008.

[8] चन्द्रमोहन भंडारी, आकृतियों के समंदर में मोती की तलाश, सेतु-हिंदी,


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