कहानी: बेहतर विकल्प

अमित कुमार मल्ल
अमित कुमार मल्ल


मिसेज आरती सेठ के रहन सहन, कपड़े, स्टाइल, व्यक्तित्व के ही नहीं बल्कि उनकी सुंदरता के भी अधिकतर लोग फैन थे। मिसेज सेठ उस फैक्ट्री के जी0 एम0 की दूसरी पत्नी थी (हालांकि यह बहुत कम लोग जानते थे कि उनकी पहली पत्नी क्यों अलग हुई और यह दूसरी पत्नी है।)। यह तो उनका पहला परिचय था। इनके दूसरा परिचय का आधार उनकी कई खूबियाँ थी और उनके उतने आयाम थे।वह कई एन0 जी0 ओ0 चलाती थी। फैक्टरी के अधिकारियों की पत्नियों की समिति की अध्यक्ष थी। इस रूप में फैक्टरी के मजदूरों की पत्नियों व उनके बच्चों के कल्याण से सीधे जुड़ी थी। उन्होंने बच्चों और गरीबो के कल्याण पर कई किताबें लिखी थी। वह इस विषय की, विशेषज्ञ मानी जाती थी। इन बिंदुओं पर, जिले के प्रशासनिक अधिकारी भी उनकी राय लेते थे और वे प्रशासन के सहयोग के लिये सदैव तत्पर रहती। वे फैंसी शो की जज बनती, मेलो उत्सवों में सक्रिय रहती, किटी पार्टी की जान रहती।वह हर रूप में अपने को इतने अच्छी तरह ढाल लेती कि यह समझना मुश्किल लगता कि किस भूमिका में वे पीछे है।

 जी0 एम0 की पत्नी होने के बाद, जिले की साहित्यिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में अग्रणी होने के बाद, जिले के प्रशासनिक अधिकारियों से मित्रवत संबंध होने के बाद भी उन्हें रंच मात्र का घमंड नहीं था। मजदूरों के हर बुलावे पर, उनके उत्सवों में, शादी ब्याह में वह जाती तो थी, इसीके साथ उनके दुःख-सुख में पूरा रुचि लेती व यथा योग्य मदद का प्रयास भी करती। 

 उनके फैंस की लिस्ट में सभी तरह के लोग थे - उनके एन जी ओ से लाभ पाने वाले महिलाएँ, बच्चे, आदमी, उनके मृदु व्यवहार से प्रभावित होने वाले, प्रशासनिक अधिकारी और मुझ जैसी महिला मंडल की सदस्य। मेरे पति उसी फैक्टरी में बरिष्ठ अधिकारियो में से एक थे। शादी के पहले मैंने देश के महानगर दिल्ली के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी। मैं उनके साथ किटी में भी थी और अधिकारियों की पत्नियों के द्वारा बनाये गए महिला सेवा समिति की सदस्य थी। दोनों की अध्यक्ष मैडम सेठ थी। कुछ मुलाकातों के बाद मैंने यह ऑब्जर्व किया कि मैडम सेठ की अंग्रेजी की जानकारी सीमित है।फैशन के मामले में भी वह दिल्ली से पीछे है। जैसे ही मिसेज सेठ को यह ज्ञान हुआ कि मेरी पढ़ाई दिल्ली की है वे, धीरे धीरे आधुनिक फैशन, स्टाइल जानने के लिये मुझसे बात करने लगी। दोनों के उम्र व कंपनी के भीतर के सामाजिक स्तर में बहुत फर्क था, इसलिये वे बिना हिचक वो सारी चीजें मुझसे पूछती, उन पर चर्चा करती जो उन महिलाओं से नहीं पूछ पाती, जो तीन शीर्षस्थ अधिकारियों की पत्नियाँ थी। इसलिये अक्सर या तो वह मुझे अपने घर बुला लेती या मैं स्वयं चली जाती। उनके घर जाने पर समय का पता ही नहीं चलता। वे दुनिया भर की बाते करती। वे युवाओ के सोच, मन व लाइफ स्टाइल को जानना चाहती। मुझे लगता, वे अपने आप को लगातार परिष्कृत करती रहती। तभी वे मिसेज सेठ नामक शख्शियत थी, जिनका अपना औरा था।

 कई बार, उनके घर, मेरे जाने पर पता चलता कि वे नहीं है, तब मैं या उनके बंगले के नौकर उन्हें फोन करते तो वे घर आ जाती या बता देंती कि नहीं आ पाएंगी। मुझे उनके घर मे हर जगह जाने की इजाज़त थी। किचन से लेकर बेबी के कमरे तक। 

फैक्टरी के जी0 एम0 का घर, घर नहीं था। बंगला था। 10 से अधिक कमरे, तीन ओर लान, गेट पर सिक्योरिटी गार्ड, छह से अधिक पूर्णकालिक नौकर - कोई खाना बना रहा है, कोई सफाई का काम कर रहा है, कोई जी 0 एम0 साहब का काम कर रहा है, कोई मिसेज सेठ का काम कर रहा है, कोई बेबी का काम कर रहा है।
बेबी सेठ परिवार की इकलौती बिटिया थी जो कक्षा छह में पढ़ती थी। बेबी, अपनी माँ की ही भांति सुपर एक्टिव थी। पढ़ना, खेलना, दोस्त बनाना - सबमे आगे रहती थी। मैं जब भी उनके घर जाती थी उससे अंग्रेजी में बात करती और वह कॉन्फिडेंस के साथ अंग्रेजी में जबाब देती। वह मुझसे महानगर दिल्ली की पढ़ाई के बारे में पूछती, फिल्मो के बारे में पूछती, हीरोइनों के कपड़ो के बारे में, स्टाइल के बारे में, मैं उसको बताती। धीरे धीरे, बेबी से मेरी अच्छी बनने लगी। 

उस दिन मुझे दोपहर में पार्लर जाना था। मूड वहाँ जाने का नहीं था और काम करने का मन नहीं था। घर मे ऊब लग रही थी और आलस भी।उबाहट और आलस को दूर करने के लिये पहला नुस्खा दिमाग मे आया - मिसेज सेठ। मैंने मिसेज सेठ के यहाँ जाने को सोचा। पहले की भांति सोचा कि चलते हैं। मैडम के पास रहेंगे तो बोर होने नहीं देंगी। उनके बाउंड्री गेट पर सिक्योरिटी गार्ड था। वह मुझे जानता था, इसलिये उसने जाने दिया।अन्मने मूड के कारण सामने मुख्य द्वार से जाने के बजाय पिछले दरवाजे से मैं, मिसेज सेठ के बंगले में घुसी। पीछे से पहले किचन था, फिर स्टोर, फिर बेबी का कमरा।फिर मिसेज व मिस्टर सेठ का कमरा, फिर ड्राइंग रूम, गेस्ट रूम आदि। गैलरी से सभी कमरे जुड़े थे। गैलरी होते हुए मिसेज सेठ के बेडरूम की ओर बढ़ी। किचेन में खाना बनाने वाला नौकर काम कर रहा था। बेबी के कमरे के सामने से गुजरते हुए, मैंने देखा कि नौकर की गोंद में बैठकर बेबी वीडियो गेम्स खेल रही है। रुककर, जब तक कुछ पूछती, नौकर ने हड़बड़ाकर बेबी को उतार दिया और कमरे से निकल गया। बेबी कमरे से निकलकर गैलरी में, मेरे पास आई, "आंटी! मम्मी तो आज सुबह से नहीं हैं।"

- कहाँ गयी है?
- नानू की तबियत खराब हो गयी थी .. इसलिये उन्हें जाना पड़ा।
- सर?
- पापा!... को जरूरी काम था... आफिस में है। वे नहीं गए।
- तुम!
- मेरा स्कूल में टेस्ट था, इसलिए नहीं गयी।
इतना देखने व सुनने के बाद, मैं बेबी को लेकर उसके कमरे की ओर बढ़ी।
- खाना खाया?
- खाना बनाने वाले भइया ने खाना बनाकर मेज पर रख दिया था। स्कूल से आकर कपड़े बदल कर खाना खाती, लेकिन फिर बिरजू भइया के साथ खेलने लगी।
- मैडम, कब आएँगी।
- 6 बजे तक।
- बाकी नौकर कहाँ है
- पता नहीं।
- चलो। खाना खा लो।
किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में कुछ सूझ नहीं रहा था। बेबी से बातें कर रही थी लेकिन दिमाग बिरजू और बेबी पर चला जा रहा था। मैडम के आने तक मैं रुकी रही।सोचती रही मैडम को कैसे सचेत करू कि वे बेबी को बिरजू के भरोसे अकेले न छोड़ा करे? बेबी नासमझ है लेकिन दुनिया मे तरह तरह के लोग हैं।
शाम 6 बजे मैडम आई। मुझे देखकर चौंक गयी।
- तुम। 
-जी, मैडम। 
- कब आई?
- आंटी काफी देर से इंतजार कर रही है आपका। 
बेबी बोली।
मैडम ने पूछा, 
- कोई विशेष बात है क्या?
- नहीं मैम। मैं आपसे मिलने आई थी... पता चला आप जरूरी काम से बाहर है, बेबी अकेली थी... साथ बैठ गयी। 
- बिरजू नहीं था क्या?
- था। 
अप्रिय स्थिति से बचने के लिये मैंने जल्दी में कहा, 
- आप इतनी दूर से आ रही है... थकी होंगी... फोन कर कल आती हूँ।
- ओ के। 
दो दिन बाद फोन कर मैडम से समय लेकर पहुँची।
मैडम ने अपने बेडरूम में ही बुला लिया। वह अधलेटी दशा में थी और मैं सोफे पर अटेंशन की मुद्रा में बैठी थी। इधर उधर की बाते होने के बाद मैडम ने पूछा, 
- आज तुम कुछ अनमनी लग रही हो।
- नही... मैडम। 
- कोई बात तो है?
- कुछ खास नही। 
- फिर... कब से तुम समय लेकर... पूछकर आने लगी। 
- ऐसे ही...।
- परसो से...न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि तुम कुछ कहना चाह रही हो।
- ऐसा नहीं है मैडम। 
- हो सकता है, मेरा भ्रम हो।
मैडम ने अपने ऑब्जरवेशन से, यह तो अनुमान लगा लिया कि बात कुछ है। उस दिन वह तो घर पर थी नही। घर पर थी बेबी... कही साहब... तो घर नहीं आये थे और... कैसे पुछू...। बेबी से बात शुरू करती हूँ।
-बेबी से उस दिन बाते करके कैसा लगा..... कहाँ सुधार की जरूरत है?
- जी। मैम बेबी बहुत एक्टिव हैं बहुत ही इंटेलीजेंट है।
- हा, बिल्कुल मुझ पर पड़ी है।
- जी, मैम। आपके तरह ही बहुत खूबसूरत है।
- थैंक्यू। 
- अब तो क्लास सिक्स में है
- अपने क्लास की टॉपर है।
- जीनियस है। 
-... लेकिन मैम... मुझे लगता है कि अब बेबी को सामाजिकता का भी ज्ञान देने जरूरी है
- जैसे?
थोड़ा हैरान होकर मिसेज सेठ ने पूछा।
- कैसे रहते हैं... कैसे बाते करते हैं?
-सफाई से तो रहती है।
- मेरा वह मतलब नहीं था मैडम। 
- खुल कर कहो। 
- जैसे... परिवार के पुरुषों को छोड़कर, ..
हिचकिचाते हुए मैं बोल रही थी, 
- बाकी पुरुषों से कैसे बात करते है? कैसे उनके साथ रहते है?
मिसेज सेठ समझ नहीं पा रही थी।
- जैसे गुड टच क्या है, बैड टच क्या है?
- अपनी बात खुल कर कहो,... मैं नहीं समझ पा रही हूँ।
- जी। 
- तो बताओ?
- नाजुक बात है। 
- खुलकर बताओ। 
मैंने उस दिन बिरजू के गोद मे बैठकर खेलने वाली बात बताई। सुनकर मैडम चिंतित होकर, आँख बंद कर सिर तकिये पर टिका लिया।
बात सम्हालने की नीयत से मैंने कहा, 
- किसी ओल्ड लेडी को, बेबी के लिये रख लेते हैं। कोई शंका ही नहीं रहेगी।
- ओल्ड लेडी उसे सम्हाल नहीं पाएगी। देखती नहीं हो... बेबी कितना दौड़ती भागती है?
- जी, मैम। फिर किसी युवा लड़की मेड के रूप में रख लेते हैं।
मैडम चुप रही।
- मैम... बताइये।
मैम ने दरवाजा बंद कर अपने पास बैठने के लिए कहा। मैंने ऐसा ही किया।
- मेरे बारे में क्या जानती हो
- आप एक व्यवहार कुशल, परोपकारी, जी0 एम0 साहब की पत्नी है। आपके जैसे लोग बनना चाहते हैं, रहना चाहते हैं, जीना चाहते हैं।
- यह सामने है। पीछे कुछ और भी है।
मैं चुप। मैम आँख बंद कर ली और बोलती रही।
- इसका आधार क्या है?
- आपका प्रयास 
- इसका आधार है... तुम्हारे साहब। मैं एक छोटे शहर की एम0 ए0 की छात्रा थी, तब तुम्हारे जी0 एम0 साहब चीफ गेस्ट बनकर आये।मुझे देखे और फिर मेरे पीछे पड़ गए कि मैं उनका प्यार स्वीकार करूँ। पहले तो मैंने इंकार किया... फिर मैं भी इनके प्रेम में पागल हो गयी। जानती थी शादी शुदा है... लेकिन अपने आप को रोक नहीं पाई। माता पिता ने कितना विरोध किया? लेकिन... हम लोग साथ रहने लगे, बिना शादी के। इतने बड़े अफसर थे, कौन बोलता? जब बेबी पेट मे आ गयी, उन्होंने तब पहली पत्नी को तलाक दिया और हम दोनों की शादी हुई।
मैं हठात चुप रही।
- न जाने कब इतिहास पुनः दोहराया जाने लगे?
मैं फिर चुप रही।
मैडम खोई खोई सी, अपनी धुन में बोलती जा रही थी, 
- सारे मर्द, तुम्हारे सर... एक ही तरह के होते है। उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। 
- जी मैडम। 
- इसलिये युवा नौकरानी नहीं रखी जा सकती। 
मैडम ने साँस लेते हुए बात खत्म की।
-- और... नौकर रखने में भी तो रिस्क है?
मैंने दबे स्वर में कहा। 
मैम सोचते हुए बोली, "हो सकता है कि जैसा तुम्हे लग रहा है, वैसा न हो रहा हो। यह भी हो सकता है, तुमने सच ही देखा हो।कोई दूसरा पुरुष नौकर रखते हैं तो क्या गारंटी है कि ऐसा नहीं करेगा। यह पुराना नौकर है। मैं इसे डरा दूंगी...डाँट दूंगी...समझा दूंगी।" 

मैं चुपचाप निर्विकार भाव से सुन रही थी।
मैडम ने ठंडे व तठस्थ स्वर में बात खत्म की, " यह रिस्क, उस रिस्क से कम है।"

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