भक्ति आन्दोलन का वैचारिक पक्ष

खुशबू अंसारी

- खुशबू

शोधार्थी, हिन्दी-विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
ईमेल: khushboo18121989@gmail.com


 भक्ति-आन्दोलन के सन्दर्भ में “भक्ति द्रविड़ उपजी, लाये रामानंद” पंक्ति बार-बार उद्घृत की जाती है। यह तो स्पष्ट है कि भक्ति-आन्दोलन सर्वप्रथम दक्षिण भारत में शुरू हुआ और यही से उत्तर भारत की ओर गया। भक्ति आन्दोलन की खास बात यह भी थी कि भारत के विभिन्न हिस्सों में यह आन्दोलन संस्कृत की परम्परा को तोड़ते हुए क्षेत्रीय भाषाओ में विकसित हुआ। दक्षिण भारत में आलवार युग (छठी-नवी शताब्दी) को आचार्य युग कहा गया। आलवारों ने तमिल भाषा में भक्ति का जो अलख जगाया, प्रकारान्तर में वह पूरे भारत में फैल गया। भक्ति के क्षेत्र में सर्वप्रथम आलवार संत परम्परा में सभी वर्गों-जातियों के साथ-साथ महिलाओं को भी स्थान मिला। यह एक क्रन्तिकारी पहल थी। दक्षिण में आलवार संतो का इतना व्यापक प्रभाव जनता पर पड़ा कि उनकी वाणी को ‘दिव्य प्रबन्धम’ नाम से संकलित कर उसे ‘तमिल वेद’ का सम्मान दिया गया। आलवारो की भक्त परम्परा में ही रामानुजाचार्य का नाम आता है, जिनके शिष्य रामानंद को उत्तर भारत में भक्ति आन्दोलन लाने का श्रेय प्राप्त है।

 भक्ति-आन्दोलन के इस परम्परा को हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने विभिन्न रूपों में देखा है। एक ओर ग्रियर्सन इसे ईसाइयत की देन मानते हैं तो दूसरी ओर शुक्ल जी इसे मुस्लिम आक्रमणकारियों की देन बताते हैं, वहीं हजारीप्रसाद द्विवेदी इसे सहज स्वाभाविक विकास के रूप में देखते हैं। इस के साथ हिन्दी साहित्य में भक्ति-आन्दोलन के उद्भव को लेकर वाद-विवाद की श्रृंखला चल पड़ी। वाद-विवाद की इस श्रृंखला को मैनेजर पाण्डेय ने हिन्दी आलोचना का महाभारत कहा। यह महाभारत भक्ति-आन्दोलन के सन्दर्भ में बहुत विवादित रहा। इस विवाद का प्रारंभ मोटे तौर पर शुक्ल जी के इस कथन से हुआ – “देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए वह अवकाश न रह गया  ... अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था ?”1 शुक्ल जी के अनुसार भक्ति आन्दोलन का एक मात्र कारण भारत में मुस्लिम आक्रमणकारियों एवं शासको का आगमन और प्रतिष्ठित होने का परिणाम था। जबकि बाद के कई विद्वानों ने शुक्ल जी के इस मत का खण्डन किया। सबसे पहले हजारीप्रसाद द्विवेदी ने शुक्ल जी कि इस मान्यता का खंडन करते हुए भक्ति आन्दोलन को ‘भारतीय चिंतन का स्वभाविक विकास’ माना और उसे सिद्धो, नाथों की परम्परा से जोड़ा। शुक्ल और द्विवेदी जी के इस कथन को आधार बनाकर भक्ति-आन्दोलन सम्बन्धी आलोचना के विषय में यह कहा गया कि शुक्ल जी और द्विवेदी जी अलग-अलग धारा के व्यक्ति हैं। अत: हिन्दी साहित्य में इसे अलग–अलग विचारधाराओं की परम्परा के रूप में देखा जाने लगा। गोपेश्वर सिंह इसी धारणा के आधार पर भक्ति आन्दोलन के सन्दर्भ में लिखतें हैं –“इस कुरुक्षेत्र में दो अवधारणाएँ आमने-सामने हैं – अपने तर्कों और आग्रहों-दुराग्रहों के साथ। एक ओर आचार्य शुक्ल और रामविलास शर्मा हैं तो दूसरी ओर आचार्य द्विवेदी और नामवर सिंह।”2

 प्रश्न यह उठता है कि गोपेश्वर सिंह का यह मानना कि शुक्ल जी और रामविलास शर्मा तथा हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह दो विरोधी विचार धाराएँ हैं, जो कुरुक्षेत्र में आमने – सामने जंग लड़ रहीं हैं। जब हम गहनता से इन तथ्यों की समीक्षा करतें हैं तब हमें निष्कर्ष के रूप में कुछ और ही देखने को मिलता हैं। भक्ति-आन्दोलन के उद्भव के सन्दर्भ में शुक्ल जी और रामविलास शर्मा एक दुसरे से सहमत नहीं दिखते। स्वयं रामविलास शर्मा के शब्दों में –“यह स्थापना कि मुसलमानों के शासन काल में पराधीनता के कारण लोग भक्ति और निराशा के गीत गाने लगे, अवैज्ञानिक है। भक्ति-आन्दोलन तुर्क आक्रमणों से पहले का है। गुप्त सम्राटों के युग में ही वैष्णव मत का प्रसार होता है, तमिलनाडु भक्ति आन्दोलन का केंद्र रहा, जहाँ मुसलमानों का शासन न था। स्वयं अनेक मुस्लिम संतों ने इस आन्दोलन में योग दिया।”3

 अतः स्पष्ट है कि रामविलास शर्मा भक्ति आन्दोलन के सन्दर्भ में शुक्ल जी की मान्यता का खंडन करते हुए हजारी प्रसाद द्विवेदी के मान्यता को अपनी सहमति देतें हैं। अतः यह बात साफ हो जाती है कि शुक्ल जी और रामविलास शर्मा को भक्ति आन्दोलन के सन्दर्भ में एक ही अवधारणा का आलोचक कहना ठीक नहीं। यहाँ एक बात और ध्यान देने योग्य है कि क्या शुक्ल जी और द्विवेदी जी परस्पर विरोधी आलोचक थे ? जैसा प्रायः कहा जाता है। यह ठीक है कि एक स्थान पर द्विवेदी जी ने शुक्ल जी कि इस मान्यता का खंडन किया कि भक्ति आदोलन मुस्लिम आक्रमणकारियों कि देन है, लेकिन दूसरी ओर भक्ति-आन्दोलन के प्रचार-प्रसार में द्विवेदी जी भारत में मुसलमानों के आगमन को एक महत्वपूर्ण कारण भी मानतें हैं, वे लिखतें हैं – “अब तक वर्णाश्रम व्यवस्था का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था... अब सामने एक जबरदस्त प्रतिद्वंद्वी समाज था जो प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक जाति को अंगीकार करने को प्रतिबद्ध था। उसकी एकमात्र शर्त यह थी कि उसके विशेष प्रकार के धर्ममत को स्वीकार कर ले। समाज में दंड पाने वाला बहिष्कृत व्यक्ति अब असहाय नहीं था। इच्छा करते ही वह एक सुसंगठित समाज का सहारा पा सकता था। ऐसे समय में दक्षिण से वेदांत भावित शक्ति का विशाल आगमन हुआ। जो इस विशाल भारतीय महाद्वीप के इस छोर से उस छोर तक फ़ैल गया।”4 

 इस कथन से स्पष्ट है कि द्विवेदी जी शुक्ल जी के विपरीत नहीं हैं और न ही कोई अलग बात कह रहे हैं। वास्तव में दोनों विद्वानों के कहने की शैली में अंतर है। साहित्य या आलोचना को खेमों में या परम्परा के रूप में बाँट कर देखना एक प्रकार का सरलीकरण है, जबकि प्रत्येक साहित्यकार तथा आलोचक स्वतंत्र होता है, वह एक दूसरे से सहमत या असहमत हो सकता है, परन्तु एक दूसरे का विरोधी या पदगामी कभी नहीं होता। शुक्ल जी और द्विवेदी जी के बारे में वीर भारत तलवार लिखते हैं – “यह तथ्य है कि हिन्दी साहित्य के एक हजार वर्षो के इतिहास के लिए न तो द्विवेदी जी ने लगातार किसी एक ‘पैराडाइम’ का उपयोग किया है, न ही शुक्ल जी ने हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष को अपना ‘पैराडाइम’ बनाया है। जिसे शुक्ल जी का पैराडाइम बताया जाता है, वह वास्तव में भक्तिकाल के उद्भव के बारे में उनकी एक धारणा या टिप्पणी से अधिक कुछ और नहीं है ; उसे पैराडाइम बनाकर उसके पीछे-पीछे शुक्ल जी नहीं चलते।”5 यहाँ ध्यान देने योग्य है कि वीरभारत तलवार जिसे शुक्ल जी की भ्रामक धारणा या टिप्पणी कहते हैं दरअसल वह शुक्ल जी की भ्रामक धारणा या टिप्पणी मात्र नहीं है बल्कि वह शुक्ल जी की वैचारिकी है, जिसके बल पर उन्होंने पूरे भक्ति-आन्दोलन को स्थापित करने का प्रयास किया है। इसी विचारधारा का प्रभाव था कि शुक्ल जी के लिए कबीर की अपेक्षा तुलसी ज्यादा महत्वपूर्ण थे। यह ठीक है कि शुक्ल जी पूरे हिन्दी साहित्य के इतिहास को हिन्दू मुस्लिम संघर्ष के रूप में नहीं देखते और न ही हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष को अपना ‘पैराडाइम’ बनाकर चलते हैं, लेकिन भक्ति-आन्दोलन के सन्दर्भ में यह कहना ठीक नहीं कि यह उनकी एक भ्रामक धारणा थी।

 दक्षिण में भक्ति की जो परम्परा अलवारों तथा नयनारों से शुरू हुई थी, वह मुसलमानों के आने से पहले की थी। वास्तव में यह आन्दोलन समाज पर एक वर्ग-विशेष का वर्चस्व (ब्राह्मण) तथा साहित्य पर एक भाषा विशेष (संस्कृत) के वर्चस्व के विरुद्ध सामान्य जनता द्वारा किया गया आन्दोलन था, लेकिन भारत में मुसलमानों तथा अन्य विदेशी शक्तियों एवं धर्मों के आने से इस आन्दोलन को सहायता मिली। इसीलिए हजारीप्रसाद द्विवेदी भक्ति-आन्दोलन को बारह आने सहज विकास के रूप में देखते हैं लेकिन चार आने छोड़ देते है। यह चार आने तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक परिस्थितियों की देन है। इस सन्दर्भ में रामविलास शर्मा लिखते हैं – “भक्ति आन्दोलन विशुद्ध देशज आन्दोलन है। वह सामन्ती समाज की परिस्थितियों से उत्त्पन्न हुआ था ; वह मूलतः इस सामन्ती समाज व्यवस्था से विद्रोह का साहित्य है।”6

 मध्यकालीन भारतीय समाज मूलतः धर्माधारित समाज था। समाज वर्ण-व्यवस्था द्वारा संचालित था। इस व्यवस्था के भीतर जाति का विधान किया गया था और इसी आधार पर वर्गो का समाज में स्थान और उनका पेशा निर्धारित किया गया था। जैसा कि कहा जाता है- पठन-पाठन का कार्य ब्राह्मण को, युद्ध क्षेत्र से सम्बंधित कार्य क्षत्रिय को, व्यवसाय का अधिकार वैश्य को तथा इन तीनों की सेवा का दायित्त्व शुद्र को था। लेकिन इस वर्ण-व्यवस्था से ऊपर समाज में जाति का स्थान था, जैसे कि- वर्ण-व्यवस्था के प्रथम पायदान (ब्राह्मण) का ही विश्लेषण करें तो इसमें भी कई सारी जातियाँ थी, जिनमें बहुतों को पढने का अधिकार नहीं था, उन्हें भिक्षाटन और मृतक कर्म-कांड तक ही सीमित रखा गया था। इसीलिए मध्यकालीन समाज में जाति-बोध सर्वोपरि था; लेकिन तुलसी का जन्म उच्च ब्राह्मण कुल में होने के बावजूद भी उनको उपेक्षित होना पड़ा। किंवदंती यह है कि जन्म के समय ही तुलसी के मुख में दाँत थे और उनके जन्म के बाद ही उनकी माता कि मृत्यु हो गयी थी, तत्कालीन मिथ-चेतना के अनुसार यह अत्यंत ही अशुभ था। जिसके कारण तुलसी के पिता ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। कहने का तात्पर्य यह है कि समाज में मिथकीय-चेतनाएँ भी प्रबल तरीके से अपना स्थान बनाये हुए थीं। तुलसी का सम्पूर्ण रचनात्मक कर्म इसी मिथ-चेतना से टकराता है। अवधी में ‘रामचरितमानस’ लिखना और मस्जिद में सोने की बात करना*, वर्ण एवं जाति व्यवस्था के प्रति तुलसी का मोहभंग ही था, जिसने उन्हें बचपन से ही भीख मांगकर खाने पर विवश किया था।
वर्णाश्रम व्यवस्था के पोषक, तुलसी को वर्णाश्रम व्यवस्था तथा उच्च जाति के अगुआ के रूप में देखते हैं, लेकिन सत्य तो यह है कि वर्णाश्रम व्यवस्था के आधार पर अपनी दुकान चलाने वालों ने तुलसी को बहुत सताया था। ऐसे ही दुकानदारों का एक उदाहरण काशी के पंडितों के रूप में दिखाई देता है, जो तुलसी द्वारा रामकथा को जनभाषा में लिखने पर उनका विरोध करते हैं और उनका सारा सामान गंगा में फेंक दिया करते थे। तुलसी को वर्णाश्रम व्यवस्था का समर्थक कहने वाले तुलसी की समय-सीमा का भी ध्यान नहीं रखते। वे भूल जाते हैं कि तुलसी जाति और वर्ण व्यवस्था** के विरुद्ध निष्काम भक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं – “जाति-पाँति, धन-धरम बड़ाई, सब तजि तुम्हहि रहहु लौ लाई।” जाति-पांति का विरोध सभी भक्तिकालीन कवियों के यहाँ दिखाई देता है। कबीर भी भक्ति में जाति-पांति का विरोध करते हैं – “जात-पाँत पूछै नहि कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।” जाति-पाँति का विरोध सूर के यहाँ भी मिलता है – “जाति-पाँति कुल कानि न मानत, वेद पुराननि साखै।”

 जायसी जाति-धर्म रहित समाज की परिकल्पना करते हुए प्रेम को सामाजिक समानता तथा धार्मिक एवं सांस्कृतिक सौहार्द के लिए महत्वपूर्ण मानतें हैं। कबीर तथा अन्य भक्तिकालीन कवियों की तरह जायसी के चिंतन के केंद्र में भी तत्कालीन पतित समाज और मूल्य-चिंता है। ‘विजयदेव नारायण साही’ पद्मावत को एक ट्रेजिडी के रूप में देखतें हैं। उनका मानना है कि जायसी को एक जबरदस्त करुणा आप्लावित करती है और उस करुणा कि व्यथा इतनी भारी है कि उनके पास चुनौती और प्रतिरोध के लिए फुरसत नहीं है। ‘छार उठाई लीन्ह एक मुठी। दीन्ह उड़ाई पिरथिमी झूठी।।’ इस एक पंक्ति से जायसी जीवन की वास्तविकता को उजागर करते हैं। इस पंक्ति से यह भी जाहिर हो जाता है कि इस संसार में जिस भौतिकता को पाने के लिए मानवद्रोही और पाशविक प्रवृति को सहज ही अपना लिया जाता है असल में इस भौतिकता का वजूद मुट्ठी भर राख के सिवा और है ही क्या ? पूरे पद्मावत का ध्येय प्रेम ही है, उसे ही आधार बनाकर जायसी रचते हैं। इस महाकाव्य के अंत में सबकुछ तो बच ही जाता है भव्य सिंहलद्वीप, विस्तृत चितौढगढ़, विशाल सेना। फिर क्यों इसका अंत सुना पड़ जाता है ? क्योंकि इस कथा के मूल से प्रेम ही विदा हो जाता है। जो इस कथा का मूल था। यह अकारण नहीं है कि जायसी जिस पद्मावती को अनुपम सौन्दर्य प्रदान करते हैं उसे एक सुल्तान (अलाऊद्दीन) को न सौपकर एक योगी (योगी वेश धारी रतनसेन) को सौपतें है। क्योंकि पद्मावती को प्राप्त करने के लिए रतनसेन का आधार प्रेम था, जबकि अलाउद्दीन “सुल्तान” की हैसियत से उसे ‘हर’ लेना चाहता है। 

 प्रेम का यही आधार भक्तिकालीन कवियित्री मीरा के यहाँ भी दिखाई देता है। मीरा प्रेम के खातिर अपने समाज से विद्रोह करती हैं। वे तत्कालीन सामाजिक तथा धार्मिक रुढियों को तोडती हैं, जो समाज स्त्री को मनुष्य मानने को तैयार न था, पुरुष प्रधान समाज उसके अधिकार, उसकी स्वतंत्रता सब कुछ सीमित करके उस पर अपना एकमात्र अधिकार समझता था। मीरा इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाती हैं और इसकी शुरुआत अपने घर से पति के मृत्यु पर सती प्रथा का विरोध करके करती हैं। जिस समाज के मांगलिक आयोजनों में विधवा का छाया पड़ना भी अशुभ था, ऐसे समाज में विधवा मीरा कृष्ण को अपना पति घोषित करती हैं। मीरा, समाज, कुल, जाति सब को ठोकर मरते हुए कहती हैं – “लोक लाज कुल कानि जगत की, दई बहाय जस पानी। अपने घर की परदा कर लो, मै अबला बौरानी।”

 सामन्ती समाज व्यवस्था के प्रति विद्रोह का यह स्वर सभी भक्तिकालीन कवियों में दिखाई देता है। भक्ति आन्दोलन को पढ़ते हुए प्रायः मन में सवाल उठता है कि इस आन्दोलन के कवि सामन्ती व्यवस्था के खिलाफ ‘भक्ति’ को ही प्रतिरोध का स्वर क्यों बनाते हैं? इसके जवाब में ‘शिवदान सिंह चौहान’ कहते हैं – “उन दिनों विभिन्न वर्गों के आर्थिक सामाजिक बन्धनों को – विचार क्षेत्र में धर्म व्यवस्था ही व्यक्त और प्रतिबिंबित करती थी क्योंकि धर्म ही मनुष्य के समस्त कार्य व्यापारों का नियमन करता था – यही तब के सामन्ती समाज का स्वीकृत विधान था। ... यही कारण है कि उस काल के तमाम जन आंदोलनों का वाह्य रूप धार्मिक था।”7 
 इसीलिए तुलसी का विद्रोह उस ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ था, जिसने उन्हें जन्म से ही उपेक्षित किया था, इसीलिए वे लिखते हैं – “मांग के खैबो मसीत को सोइबो लेबे को एक न देबे को दोऊ।” अपने समूचे साहित्य को संस्कृत में न लिखकर अवधी और ब्रज में लिखना विरोध ही तो था। कबीर के यहाँ शिष्ट-अशिष्ट का प्रश्न नहीं था क्योंकि उनका सामाजिक परिवेश अलग था इसलिए उन्होंने सामाजिक बुराइयों, रुढ़ियों, आडम्बरों आदि के प्रति विद्रोह किया। कबीर, तुलसी, मीरा, सूर, जायसी, रैदास आदि सभी भक्तिकालीन कवियों ने अलग-अलग स्वरूप तथा स्वर में तत्कालीन सामाजिक तथा धार्मिक व्यवस्था के खिलाफ अपनी प्रतिक्रिया दर्ज की है।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची -
1- रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, अनुपम प्र० पटना पृ०सं०- 39
2- गोपेश्वर सिंह, साहित्य से संवाद, मेधा बुक्स दिल्ली, प्रथम संस्करण 2005 पृ०सं०-15
3- रामविलास शर्मा, परम्परा का मुल्यांकन, राजकमल प्र०दिल्ली, प्रथम सं० 1981 पृ०सं०-93
4- पूरा कबीर, सं०- डॉ० बलदेव वंशी प्रकाशन संस्थान दिल्ली, संस्करण 2005 पृ०सं०-212
5- वीर भारत तलवार, सामना, वाणी प्र० दिल्ली, प्रथम संस्करण 2005 पृ०सं०-14
6- रामविलास शर्मा, परम्परा का मुल्यांकन, राजकमल प्र० दिल्ली, प्रथम सं० 1981 पृ०सं०-93

सम्पादकीय नोट:
*धूत कहो, अवधूत कहो, रजपूत कहो, जोलहा कहौ कोऊ,
काहू की बेटी सों बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगारौं न सोऊ।
‘तुलसी’ सरनाम गुलाम है राम को, जाको मचै सो कहौ कछुओंऊ,
मांगि कै खइबो मसीत को सोइबो, लैबे को एक न दैबे को दोऊ। 

तुलसी कवितावली से उद्धृत यह कथन उनके जाति-भेद में अविश्वास, वटुक-भिक्षावृत्ति और मस्जिद बना दिये जाने के बावजूद राम-जन्मभूमि के पवित्र स्थल में ही शरणागत होना सिद्ध करता है। "सिया राम मय सब जग जानी" की अवधारणा में समस्त संसार राम का है, लेकिन उनकी पवित्र जन्मभूमि हर परिस्थिति में राम-भक्तों की शरणस्थली है।

** कर्म-वय आधारित वर्णाश्रम व्यवस्था की प्राचीन भारतीय परम्परा अपने मूलरूप में जाति-पाँति की काट ही है जो भारत की विभिन्न मूल जातियों तथा आक्रमणकारियों के अनेक कबीलों के जन्म-आधारित भेद और ऊँच-नीच को समाप्त करके मानवमात्र को उसी एक विराट पुरुष का अंग मानती है, जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड समाया है और जीवन के प्रत्येक बिंदु को चार आश्रमों के दायित्वों से जोड़ती है। तुलसी, सूर या अन्य भक्त कवियों द्वारा भारतीय परम्पराओं का पूर्ण सम्मान और अनुपालन करते हुए जाति-पाँति का विरोध करने में कोई विरोधाभास नहीं है।

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