व्यंग्य: परदेस में अचार-पराठे वाले

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

अमेरिका में कमला हैरिस उपराष्ट्रपति क्या बनीं, अपनी हो गई बल्ले-बल्ले। ज्योतिषाचार्यों के हिसाब से कालांतर में वे अमेरिका की राष्ट्रपति भी बन जाएँगी। दुनिया भर में फैले देसी लोगों का सीना पचपन इंच जितना हो गया है। जान-बूझ करके एक इंच कम रखा है ताकि सीबीआई को जाँच नहीं करना पड़े। यूँ तो प्रवासी भारतीयों की विदेशों में धाक मजबूत है पर राजनीति भारतवंशियों के सिर पर चढ़ कर बोलती है। मॉरीशस, सूरीनाम, गयाना, फिजी आदि देशों में सालों से प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पदों पर भारतवंशियों का कब्जा है। ये भारत के छोटे भाई देश बन गये हैं। मलेशिया, सिंगापुर, तंजानिया, पुर्तगाल जैसे देशों में भी भारतवंशी राष्ट्र प्रधान बने हैं। ये भारत के काका-बाबा देश बन गये हैं। अब प्रवासियों ने बड़े देशों की राजनीति में भी अपनी कुर्सियाँ जमाना सीख लिया है। कनाडा के एक प्रांत में जब उज्जल दोसांज प्रीमियर बने तो सबको आश्चर्य हुआ था। फिर, हरजीत सज्जन कनाडा के रक्षा मंत्री बने तो एक सिख सवा लाख के बराबर हो गया। देसी लोग दुनिया भर में राजनीति की बिसात बिछा रहे हैं। देख लेना एक दिन लाल किले से भारतीय प्रधानमंत्री बोलेंगे ‘भाइयों और बहनों, सारी दुनिया में अपनी सरकारे हैं, वसुधैव कुटुंबकम। जहाँ सरकार में अपने लोग नहीं है वहाँ हम और लोग भेजेंगे। भारतीय मंत्रियों को विदेशी टटपूंजिया संस्थाओं की बजाय अब विदेशी सरकारें सम्मान देंगी।’

मैंने एक बात नोट की कि कोई भारतीय विदेश में जाकर प्रधान बन जाए तो हम फूल कर रोटी जैसे कुप्पा। पर विदेशी मूल का कोई व्यक्ति भारतीय बनकर राजनीति में जमने लगे तो हम उसका खानदान खोद देते हैं। विदेशी मूल की बहू घर में आ जाये तो सास ही उसे पास नहीं फटकने देती। एक हाथ से ताली बजाने का जो कौशल हमारे पास है, वह सबके पास नहीं होता। हम कभी प्रतिभा पलायन को ‘ब्रेन ड्रेन’ कहते थे, पर अब भारत में ब्रेन ही ब्रेन भरे हैं। ज्यादा ब्रेन चाहे कम उत्पादन करते हों, हाँ जी, हाँ जी तो करते हैं। जो देसी ‘जी-हजूरिया संस्कृति’ नहीं अपना पाता, वह विदेश जाकर चमक जाता है। हमने संस्कृति की पुनर्व्याख्या की तो पाया कि प्रभु श्रीराम विदेश में जा कर रावण को ठोक आये तो वे जल्दी से जग प्रसिद्ध हो गये। सम्राट अशोक खुद नहीं जा पाये तो वे अपने बेटे-बेटी को विदेश भेज कर महान बने। सतयुग में देसी लोग सशरीर स्वर्ग जाते थे तो कलियुग में वे चांद पर पहुँच गये। विदेश जा कर प्रवासी होना जीवन को नये अर्थ देना है।

दुनिया में हर कहीं देसी लोग टॉप में जगमगाते हैं। प्रवासी पुरुष खुद को सत्य नडेला या सुंदर पिचाई से कम नहीं समझते पर प्रवासी बहनें खुद को कल्पना चावला और कमला हैरिस से एक कदम आगे मानती हैं। जो प्रवासी विदेशों में झंडे गाड़े और आकाश में छा जाये तो हम सबका कद ऑटोमेटिक उनके बराबर हो जाता है। हम बुजुर्ग खुद को महात्मा गांधी का अवतार मानते हैं और यहाँ के संत खुद को विवेकानंदजी का शिष्य। प्रवासी साहित्यकार टैगोर से एक इंच कम होंगे पर अज्ञेय से तो ऊपर ही हैं। हमें किसी अनजाने देश में जा कर प्रवासी बनने से डर नहीं लगता। हमें विश्वास होता है कि अपना कोई बंदा वहाँ मिलेगा ही। कुछ नहीं तो अचार-पराठे खिलाएगा और दूध नहीं भी हुआ तो ब्लैक-टी को किसी रेस्टोरेंट से उठाईगिरी में लाए गए पाउच की शकर से मीठी कर के ही पिलायेगा। 

भला हो सरकारी प्रतिनिधि मंडलों का। वे विदेशों में आ कर सरकारी बजट चट कर जाते हैं और इसे भारतीय संस्कृति का विकास बताते हैं। देसी लोग विदेशी शहरों में नवरात्रि और दिवाली मना कर भारतीय संस्कृति को जो पहचान देते हैं वह राजनीति के चश्मे से नहीं दिखती। जय हो कोरोना की कि दुनिया भर के लोग नमस्ते करना और बोलना सीख गए, काढ़ा दुनिया का इम्युनिटी बुस्टर बन गया। बस भारतीय मीडिया ने ‘प्रवासी’ शब्द का सारा मान-सम्मान धूल में मिला दिया। कोविड काल में शहरी मजदूर गाँव वापसी क्या करने लगे उन्हें ‘प्रवासी मजदूर’ कहना शुरू कर दिया! जिन्हें वंचित, बेरोजगार, निर्धन मजदूर कहना चाहिए था उन्हें ‘प्रवासी सम्मान’ दे दिया! हमने वर्षों की मेहनत से प्रवासी शब्द को गौरवमयी बनाया था। अब हमें सम्मान लेने के लिए चीख-चीख कर खुद को एनआरआई कहना पड़ता है। हे राजनेताओं, विदेश के हर भारतीय दूतावास में और देश के हर महानगर में ‘प्रवासी सम्मेलन’ कराओ, भले ही ‘ज़ूम’ पर कराओ, हमें भी सम्मानित करो। हम अचार-पराठे के बिना जिंदा रह सकते हैं पर सम्मान के बिना जिंदा नहीं रह सकते।
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