व्यंग्य: ऑक्सफोर्ड में घुस गई आत्मनिर्भरता

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

अभी तक आत्मा के इधर-उधर घुसने के बारे में सुना था। इस बार आत्मा, निर्भरता को विदेश भ्रमण पर साथ ले गई। इन दोनों ने नया अंग्रेजी शब्द बनाया- आत्मनिर्भरता। ऑक्सफोर्ड की इंग्लिश डिक्शनरी में आत्मनिर्भरता शब्द घुस गया और छा गया। पड़ोसीजी को मेरे आत्मनिर्भर आनंद से जलन हो उठी। उन्होंने व्यंग्य से पूछा - क्या कर रहे हैं? मैंने कहा – ‘आत्मनिर्भरता का आनंद ले रहे हैं। आप दूसरों को ताड़ना बंद कीजिए और ख़ुद आत्मनिर्भर हो जाइए। ऑक्सफोर्ड में जगह पा जाएँगे।’ वे आत्मनिर्भर होने घर में घुस गए। घर में घुसा आदमी कभी आत्मनिर्भर हुआ है भला।

स्कूल में मास्टरजी कहते थे आत्मनिर्भर बनो पर मुर्गा बना देते थे। बुजुर्ग आत्मनिर्भर बनने की सलाह देते थे तो ब्याह करा देते थे। अफ़सर लोग सेल्फ-डिपेंडेंट बनने का उपदेश देते थे पर उनके निजी काम करने भेज देते थे। सब ने कहा कुछ बनो, उन्होंने उल्लू बनाया पर आत्मनिर्भर नहीं बनाया। हम जगतगुरु बन गए पर आत्मनिर्भर नहीं बन पाए। सरकार ने खजाना खोल दिया, वह घाटा उठाती रही, जनता ठेठ रही, बस राजनेता आत्मनिर्भर बनते रहे। कुछ मामलों में हम जो आत्मनिर्भर बने, वह उल्टी दिशा में बने। अमेरिका उधार देता था तो हम उसे अनुदान समझते थे, दुत्कारता था तो प्यार समझते थे। उनके सिरफिरे राष्ट्रपति भारत आए तो हमने मनवा दिया कि हम भीड़ जुटाने में आत्मनिर्भर हैं। जनता जानती है कि फाइलों के मामले में देश आत्मनिर्भर है। दफ्तरों में इतनी फ़ाइलें हैं कि दस-बीस सरकारें कुछ भी नहीं करें तो भी दफ़्तर चलते रहें। बीमा कंपनियों के क्लेम रिकॉर्ड देखें तो लगेगा यह बीमारों का देश है, मरीजों के मामलों में हमारा देश सुपर आत्मनिर्भर है। हमारे बैंकों ने जितने पशुओं के लिए लोन दिया है उस हिसाब से देश में पशु ही पशु होना चाहिये। जितने उद्योग कागज पर हैं, उतने सही में हों तो आदमी के लिए जगह ही नहीं बचे। पर आप डरे नहीं, हम बैठे-बैठे आँकड़े बनाने में आत्मनिर्भर हैं।

एक बाबा ने मुझे आत्मनिर्भर बनने का फॉर्मूला बताया। कहा, सवेरे उठकर बड़ी मात्रा में धन खा लो, तुम आत्मनिर्भर बन जाओगे। मैंने यह फॉर्मूला बड़े साहब को बताया। उन्होंने इसे ऊपर बताया, ऊपर वाले ने और ऊपर। तब कहीं वित्तमंत्री को समझ में आया कि सिस्टम में करोड़ों-करोड़ रुपए डालना पड़ेंगे तो लोग पैसे खा सकेंगे। सरकारी पैसे खाए बिना आत्मनिर्भर नहीं बना जा सकता। मुफ्त के दो पैग में आत्मनिर्भरता बोलने लगती है। इसलिए समझदार लोग लंबी लाइनों में लग कर लाख-लाख रुपयों की शराब खरीदते हैं। लोकल दारू और ज़्यादा वोकल होती है। दो पैग गटको और दाता को गटकाओ तो आत्मनिर्भर हो जाओ, जो आत्मनिर्भरता प्रछन्न रहे वह सरकारी पैसा पाते ही प्रकट हो जाती है।

सरकारें जानती हैं करोड़ों रुपये किन्हें आत्मनिर्भर बनायेंगे। बहुमत में विधायक कम पड़ेंगे तो ये करोड़ों रुपये विपक्षी विधायकों को दे कर वे आत्मनिर्भर सरकार बनायेंगे। अपने विधायक को आत्मनिर्भर मुख्यमंत्री बनाएंगे। मुख्यमंत्री रिजर्व बैंक खुलवा देंगे। वे जानते हैं उनके संगी राजनेता आत्मनिर्भर होंगे तो देश भी आत्मनिर्भर होगा। सच कहूँ, हम भारतीय कभी आत्मनिर्भर थे ही नहीं। भ्रम टूटता है तो डर लगता है। हमारे खोखलेपन का सांस्कृतिक नाम आत्मनिर्भरता है। हम ख़ुद उठकर पानी नहीं पी सकते, वोट देने नहीं जा सकते और दिन-दहाड़े जनतंत्र को लुटने से नहीं बचा सकते। हम बातों का बतंगड़ बनाने वाले क्या आत्मनिर्भर बनेंगे! आत्मनिर्भरता मजदूरों में थी जब उनकी घर वापसी पर राजनीति ने घोषित ट्रेनें निरस्त कीं, राज्य-सीमा पर खड़ी बसों को जाम किया। तब बेटी बीमार बाप को साइकल पर बिठा कर बारह सौ किलोमीटर दूर गाँव ले गई। काश ऐसी आत्मनिर्भरता देश का तंत्र जुटा पाता। वह तो मजदूरी का पैसा दबाए मालिकों जैसा दिवालिया दिखने लगा। ऑक्सफोर्ड ने आत्मनिर्भरता को अंग्रेजी में तव्वजो दे कर हमें फिर छला है। ऐसी शाब्दिक आत्मनिर्भरता के क्या मायने!
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