‘कनुप्रिया’ में युद्ध की निरर्थकता के परिप्रेक्ष्य में प्रेम की सार्थकता का प्रतिपादन

राजेश कुमार यादव

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, महात्मा गाँधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फतेहपुर, उत्तर प्रदेश
संपर्क : +91 638 698 3995; ईमेल: rajesh31790@gmail.com 


 नयी-कविता के युग में जो प्रबंध काव्य या काव्य-नाटक लिखे गए उनमें से अधिकांश में युद्ध से बचने की संभावनाओं की तलाश की गयी है। यह सचेत प्रयास कवियों द्वारा इसलिए हुआ क्योंकि संसार ने दो विश्व-युद्धों के दौरान अपना बहुत कुछ खो दिया था। युद्ध के परिणाम के रूप में सिर्फ तबाही और विनाश के सिवा कुछ हाथ नहीं आता। युद्ध की मनः-स्थिति को अपने अंदर की संवेदना को दबाकर पहुँचा जाता है। बाक़ी की बची-खुची कोमल वृत्तियाँ और संवेदनाएँ युद्ध की प्रक्रिया से गुज़रकर नष्ट हो जाती हैं। युद्ध मनुष्य की बर्बरता की निशानी है। युद्ध यह संकेत करता है कि मनुष्य अभी पूरी तरह सभ्य नहीं हुआ है। अतः मनुष्य को बार-बार इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि युद्ध के द्वारा वह कौन-सी मानवीय या प्राकृतिक उपलब्धि हासिल कर ले रहा है? युद्ध-दर्शन से बार-बार गुज़र कर और इसकी हानिकारक एवं ध्वंसात्मक प्रकृति को समझकर मनुष्य को अपनी सभ्यता के विकास में एक और महत्वपूर्ण कदम जोड़ते हुए युद्ध से किनारा कर लेना चाहिए। इसी उद्देश्य को केंद्र में रखकर नयी कविता के कवियों ने कविता में प्रबंधात्मक ढाँचा खड़ा किया है—चाहे वह ‘अंधा-युग’ या ‘संशय की एक रात’ के रूप में हो, चाहे ‘एक कंठ विषपायी’ या ‘महाप्रस्थान’ के रूप में। धर्मवीर भारती की कृति ‘कनुप्रिया’ में भी युद्ध की समस्या को सूक्ष्म-स्तर पर उठाया गया है। इसमें इसे प्रेम के परिप्रेक्ष्य में रखकर इसकी निरर्थकता सिद्ध करने की कोशिश की गयी है।

 कनुप्रिया में युद्धभूमि के ऊपर लीलाभूमि (प्रेमजगत) को तरजीह दी गयी है। प्रेम हृदय का रागात्मक व्यापार है और युद्ध बुद्धि का ध्वंसात्मक व्यापार। अतः प्रेम ही वरणीय है, युद्ध नहीं—“कृष्ण का युद्ध सत्य है या राधा के साथ उनके तन्मयता में बीते प्रेम-क्षण? शायद प्रेम के क्षण ही सत्य हैं, क्योंकि वे दुविधाहीन मन की संकल्पनात्मक अनुभूति हैं और युद्ध दुविधा की उपज, अनजिये सत्य का आभास।”[i] लीलाभूमि से युद्धभूमि तक जाने की प्रक्रिया में मनुष्य क्रमशः रागात्मकता से दूरी बनाता चला जाता है, उसका संपर्क क्रमशः हृदय से टूटता जाता है और वह हृदयहीन और स्वार्थी होता जाता है। यद्यपि वह अपने भौतिक विकास के लिए ही बुद्धि का सहारा लेता है पर बुद्धि के साथ हृदय को भी न रखने के कारण वह हृदयहीन हो जाता है। अतः वह चाहे जितनी बड़ी भौतिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर ले, महान नहीं हो सकता। ऊपर यह कहा जा चुका है कि युद्ध की स्थिति तक व्यक्ति अपनी कोमल भावनाओं को दबाकर ही पहुँचता है और रही-सही कसर युद्ध की घटनाएँ पूरी कर देती हैं। इसके विपरीत लीलाभूमि में मनुष्य की कोमल वृत्तियाँ विस्तार पाती हैं, वे अपने संपर्क में आने वाली प्रत्येक सहचरी वस्तुओं से रागात्मक संबंध स्थापित कर लेती हैं। लीला के साधन में तन्मयता है, युद्ध के साधन में गतिशीलता। लीला जीवन और जीवन-क्षेत्र में स्थिरता की विशेषता लिए हुए होती है और युद्ध अस्थिरता की। अतः लीलाभूमि के निरंतर संपर्क में रहने के कारण उसकी प्रत्येक वस्तु से मनुष्य का रागात्मक संबंध स्थापित हो, यह स्वाभाविक बात है; जबकि युद्ध के क्षेत्र और रास्ते सदैव अलग-अलग हुआ करते हैं, उनसे योद्धा और सैनिक कभी-कभी गुज़रते हैं, और वह भी गतिशील होकर; अतः उन रास्तों या क्षेत्रों में पड़ने वाली वस्तुओं से उनका कोई रागात्मक संबंध स्थापित नहीं हो सकता। इसके अलावा युद्ध और लीला क्षेत्र से संबंधित मनःस्थितियाँ अलग-अलग हुआ करती हैं—युद्ध की ध्वंसात्मक और लीला की रागात्मक। रागात्मक प्रवृत्ति संबंध-विस्तार करती है और ध्वंसात्मक प्रवृत्ति संबंध-संकोच। कनुप्रिया में इन सभी स्थितियों की विमर्श-सामग्री अनुस्यूत है। यहाँ उदाहरण उस प्रसंग का प्रासंगिक है जब कृष्ण की नागर सेनाएँ ग्रामीण क्षेत्र के उन रास्तों और स्थानों से होकर गुज़रने वाली हैं जिन रास्तों और स्थानों पर कभी कृष्ण और राधा का प्रेम पलता था और इसी कारण राधा को उन रास्तों एवं स्थानों की प्रत्येक वस्तुओं से बेहद लगाव हो गया था। राधा जिन वस्तुओं के संसर्ग में प्रेम-सुख की अनुभूति करती है, आज उन्हीं वस्तुओं को कृष्ण के सिपाहियों द्वारा निर्ममता से उजाड़ दिया जाएगा!—“यह आम्रवृक्ष की डाल/ उन की विशेष प्रिय थी/ तेरे न आने पर/ सारी शाम इस पर टिक/ उन्होंने वंशी में बार-बार/ तेरा नाम भर कर तुझे टेरा था—/ आज यह आम की डाल/ सदा-सदा के लिए काट दी जायेगी/ क्योंकि कृष्ण के सेनापतियों के/ वायुवेगगामी रथों की/ गगनचुंबी ध्वजाओं में/ यह नीची डाल अटकती है/ और यह पथ के किनारे खड़ा/ छायादार पावन अशोक वृक्ष/ आज खंड-खंड हो जाएगा तो क्या—/ यदि ग्रामवासी, सेनाओं के स्वागत में/ तोरण नहीं सजाते/ तो क्या सारा ग्राम नहीं उजाड़ दिया जाएगा?”[ii] यह है युद्ध के मार्ग और प्रेम के स्थान पर पड़ने वाली वस्तुओं और प्रकृति से योद्धा और प्रेमी के संबंधों की प्रकृति का उदाहरण; प्रेमी उनसे रागात्मक प्रवृत्ति से जुड़ता है और योद्धा ध्वंसात्मक प्रवृत्तिसे।

 मनुष्य अपने भौतिक विकास के लिए तकनीकी और विज्ञान का सहारा लेता है। नगर-निर्माण इस विकास-प्रक्रिया का पहला महत्वपूर्ण अंग है। नगर में कोई महत्वपूर्ण पद प्राप्त कर लेना इसका दूसरा और नगर का ही स्वामी या अधिपति बन जाना इस प्रक्रिया का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण अंग है। इन तीनों प्रक्रियाओं में मनुष्य क्रमशः अपने रागात्मक-संबंधों वाली वस्तुओं या कहें कि प्रकृति से दूर हटता जाता है। प्रकृति के पेड़-पौधों, पहाड़-पर्वतों आदि को नष्ट कर नगर-निर्माण की प्रक्रिया चलती है, जबकि ग्रामीण सभ्यता प्रकृति के साहचर्य में विकसित होती है। नगर के नियमन और विकसन की प्रक्रिया प्रतिद्वंद्विता के सिद्धांत पर आधारित होती है और उसी का चरम-परिणाम युद्ध या आपसी टकराहट होती है, जो नगर-विस्तार या पद-विस्तार की आकांक्षा लिए हुए होती है; जबकि ग्रामीण सभ्यता का नियमन और विकसन साहचर्यता के सिद्धांत पर चलता है जिसका चरम बिंदु प्रेम या आपसी रागात्मकता होती है। कनुप्रिया में नगरीय जीवन की जटिलता और कठोरता के ऊपर लोकजीवन की सरलता और रागात्मकता को तरजीह दी गयी है। उदाहरण के लिए, जहाँ एक ओर नगर-विस्तार या नगर-अधिकार के लिए महाभारत के युद्ध में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का जानी-दुश्मन बना हुआ है, प्रकृति को नष्ट-भ्रष्ट करने की बात तो आम है; वहीं दूसरी ओर ग्रामीण जन-जीवन में अपने साहचर्य में रहने वाली प्रकृति की वस्तुओं के प्रति भी राधा का प्रेम अपूर्व कोटि का है, व्यक्ति से व्यक्ति के प्रेम संबंध की बात तो बहुत आम है! एक ओर युद्धभूमि की कठोरता का दृश्य—“हारी हुई सेनाएँ, जीती हुई सेनाएँ/ नभ को कंपाते हुए, युद्ध घोष, क्रंदन स्वर।/ भागे हुए सैनिकों से सुनी हुई/ अकल्पनीय अमानुषिक घटनाएँ युद्ध की/ क्या ये सब सार्थक हैं?”[iii] और दूसरी ओर लीलाभूमि में अपने और प्रिय के साहचर्य में आम के बौर में भी अपनी छाया का भान—“तो क्या तुम्हारे पास की डार पर खिली/ तुम्हारे कंधों पर झुकी/ वह आम की ताजी, क्वाँरी, तुर्श मंजरी मैं ही थी/ और तुमने मुझसे ही मेरी माँग भरी थी!”[iv]

 कनुप्रिया में कवि का अपना पक्ष युद्ध की तरफ नहीं, प्रेम की तरफ है; इसीलिए कनुप्रिया में प्रेम-भावना का बड़ी सघनता से चित्रण किया गया है। प्रणय प्रसंग है राधा (कनुप्रिया) और कृष्ण (कनु) का, जो अपने माधुर्य और सौकुमार्य के कारण बहुत से, विशेषतः मध्यकालीन, कवियों का प्रिय विषय रहता आया है और अपने संसर्ग से उन्हें उत्कृष्ट भी बनाता आया है। धर्मवीर भारती ने इस प्रणय के माधुर्य और उसकी सघनता को बिना नष्ट होने दिए अपने युग की समस्याओं से संदर्भित किया है, यह उनकी अद्भुत कवित्व-शक्ति का प्रमाण है।

 कनुप्रिया का पूरा प्रबंध-विधान चक्रीय-पद्धति पर आधारित है, और यह चक्रीय-पद्धति की शैली स्थिति-विपर्यय पर। इसमें जीवन का एक चक्र पूरा का पूरा घूम गया है—जिसके एक सिरे पर प्रेम है, और दूसरे पर युद्ध; एक सिरे पर संयोग की तन्मयता है, तो दूसरे पर वियोग की व्याकुलता। स्थितियों के बदल जाने पर चीजों के मायने बदल जाते हैं, रिश्तों की प्रकृति बदल जाती है। यों, इसे उलट कर भी कहा जा सकता है। लीलाभूमि से कृष्ण के चले जाने के बाद स्थितियाँ बदल जाती हैं। और कनुप्रिया में बदली हुई स्थितियों को प्रतिबिंबित किया गया है उन्हीं उपादानों के सहारे, जो शुरू में इसके विपरीत की स्थिति के निर्माण के लिए प्रयोग में लाए गए थे।

 कृष्ण और राधा के प्रेम-संबंधों में सहयोगी की भूमिका निभाने वाली और इसीलिए दोनों की प्रिय सहचरी बन चुकी प्रकृति, कृष्ण के राजा बन जाने पर उनके द्वारा उपेक्षा की शिकार होती है। यहाँ तक कि उनके सैनिकों द्वारा ही युद्ध के समय इसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया जाता है। जिस कदंब के नीचे कृष्ण को वंशी बजाते राधा रोज देखती थी; जिस अशोक वृक्ष को कृष्ण के संसर्ग के कारण राधा पावन समझती थी; जिस आम की डाल के सहारे खड़े होकर कृष्ण वंशी बजाकर राधा को बुलाते थे; और जो इसी कारण उन्हें विशेष प्रिय थी, वे सब के सब युद्ध के लिए रास्ता बनाने की कवायद की भेंट चढ़ जाते हैं। इस दृष्टि से इस प्रबंध के एक सर्ग का नाम ही ‘उसी आम के नीचे’ रख दिया गया है। यहाँ कुछ उदाहरणों के माध्यम से बात को स्पष्ट करने का प्रयास किया जाएगा।

 काव्य का पहला सर्ग है ‘पूर्वराग’; और पहले सर्ग का ‘पहला गीत’ पूरा का पूरा अशोक वृक्ष को समर्पित है जिसे कृष्ण के संसर्ग के कारण या प्रेम का प्रतीक होने के कारण पावन मान लिया गया है। अशोक वृक्ष क्योंकि कृष्ण का बराबर संसर्ग पाता आया है, अतः उसके प्रति राधा का स्नेह बहुत प्रगाढ़ है। इसी अशोक वृक्ष को बदली परिस्थिति में फिर उपस्थित किया जाता है ‘इतिहास’ नामक सर्ग के ‘अमंगल छाया’ नामक शीर्षक के अंतर्गत। अब अशोक वृक्ष पर अमंगल की छाया पड़ चुकी है और यह युद्ध के परिणाम की भेंट चढ़ने वाला है—“और यह पथ के किनारे खड़ा/ छायादार पावन अशोक वृक्ष/ आज खंड-खंड हो जाएगा तो क्या—/ यदि ग्रामवासी, सेनाओं के स्वागत में/ तोरण नहीं सजाते/ तो क्या सारा ग्राम नहीं उजाड़ दिया जाएगा?”[v] इसी तरह पहले सर्ग के ‘तीसरे गीत’ में कदंब वृक्ष का जिक्र है, जिसके नीचे कृष्ण चुपचाप ध्यानमग्न खड़े रहते थे और राधा उन्हें कोई देवता समझकर प्रणाम करती थी—“घाट से लौटते हुए/ तीसरे पहर की अलसायी वेला में/ मैं ने अक्सर तुम्हें कदंब के नीचे/ चुपचाप ध्यानमग्न खड़े पाया/ मैं ने कोई अज्ञात वनदेवता समझ/ कितनी बार तुम्हें प्रणाम कर सिर झुकाया/ पर तुम खड़े रहे अडिग, निर्लिप्त, वीतराग, निश्छल!/ तुमने कभी उसे स्वीकारा ही नहीं!” [vi] यहाँ पर कदंब का इतना ही जिक्र है। इसके बाद स्थितियों के बदलने पर इसका जिक्र फिर आता है। परिस्थितियों के बदल जाने पर ‘अमंगल छाया’ नामक शीर्षक के अंतर्गत कविता की शुरुआत इसी के जिक्र से होती है—“घाट से आते हुए/ कदंब के नीचे खड़े कनु को/ ध्यानमग्न देवता समझ, प्रणाम करने/ जिस राह से तू लौटती थी बावरी/ आज उस राह से न लौट”[vii] क्योंकि आज उस रास्ते युद्ध के लिए कृष्ण की अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ जाने वाली हैं। इसी प्रकार पहले सर्ग का ‘चौथा गीत’ यमुना के वर्णन से शुरू होता है जिसमें राधा का यमुना के जल के प्रति भी असीम स्नेह दिखाया गया है, क्योंकि राधा यमुना के श्याम रंग के जल को कृष्ण का प्रतिरूप समझती थी और इसीलिए वह यमुना के जल में अपलक अपनी परछाई निहारा करती थी। फिर यमुना का वर्णन बदली हुई परिस्थिति में इसी प्रसंग में काव्य के लगभग अंतिम खण्ड ‘इतिहास’ नामक सर्ग के ‘एक प्रश्न’ नामक शीर्षक के अंतर्गत होता है। अब यमुना का रूप खंडित हो चुका है—“अपनी जमुना में/ जहाँ घंटों अपने को निहारा करती थी मैं/ वहाँ अब शस्त्रों से लदी हुई/अगणित नौकाओं की पंक्ति रोज-रोज कहाँ जाती है? धारा में बह-बह कर आते हुए, टूटे हुए रथ/ जर्जर पताकाएँ किसकी हैं? [viii] काव्य का दूसरा सर्ग है ‘मंजरी परिणय’। इसके पहले और दूसरे गीतों का शीर्षक क्रमशः‘आम्र-बौर का गीत’ और ‘आम्र-बौर का अर्थ’ है। इन सबमें एक आम वृक्ष के संसर्ग में राधा-कृष्ण का प्रेम-विकास दिखाया गया है। और स्थिति बदल जाने पर ‘इतिहास’ नामक सर्ग के ‘अमंगल छाया’ नामक गीत के अंतर्गत सैनिकों द्वारा आम की उसी डाल के काटे जाने की संभावना व्यक्त की गयी है, जिस पर टेक लगाकर कृष्ण वंशी बजाते थे—राधा को बुलाने के लिए; और जो इसी कारण कृष्ण को विशेष प्रिय थी। यह सब उद्धरण द्वारा ऊपर दिखाया जा चुका है।
 इस तरह देखा जा सकता है कि जीवन की दो विपरीत स्थितियों को बिंब-प्रतिबिंब भाव से आमने-सामने रखकर प्रबंध का विधान खड़ा किया गया है तथा इस बिंब और प्रतिबिंब के बीच से जीवन का दर्शन विकसित करने की कोशिश की गयी है। स्पष्ट है कि इस काव्य-संसार में जीवन-रथ का पहिया एक बार पूरा घूम जाता है और पहिये की दो सीधी और एक-दूसरे की विपरीत तीलियाँ आपस में स्थान परिवर्तन कर लेती हैं। और यही स्थिति-विपर्यय और उससे उपजी हुई विडंबना काव्य का उपजीव्य बनती है।

 जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया कि इसकाव्य में जीवन की दो अंतर्विरोधी परिस्थितियों को बिंब-प्रतिबिंब भाव से आमने-सामने रखकर जीवन का एक दर्शन निर्मित करने का प्रयास किया गया है। प्रेम और युद्ध दोनों अपने में अंतर्विरोधी हैं। दोनों परिस्थितियों को एक साथ रखकर उनकी प्रक्रिया और परिणाम के द्वारा यह दर्शन विकसित किया गया है कि जीवन में प्रेम तथा प्रेम की भावना ही वरणीय है और युद्ध तथा युद्ध की भावना त्याज्य है, क्योंकि युद्ध मनुष्य की कोमल भावनाओं और संवेदनाओं को नष्ट कर देता है। प्रेम की गहन सुखद अनुभूतियों से गुजरने के बाद राधा को युद्ध की दुखद अनुभूतियों का भी सामना करना पड़ता है। और तब राधा के मन में दोनों स्थितयाँ क्रमशः बिंब-प्रतिबिंब की तरह घूमने लगती हैं। इस दृष्टि से कनुप्रिया वर्तमान के संदर्भ से अतीत के विश्लेषण का प्रयास है। यह प्रयास प्रेम-संबंध को केंद्र में रख कर किया गया है जो बेहद मनोवैज्ञानिक और लाजिमी घटना है। समय की गति में जब कभी प्रेम-संबंधों में असहज बदलाव आने लगते हैं, जो किसी एक पक्ष (प्रेमी या पेमास्पद) के लिए अवांछनीय होते हैं तो वह अपने प्रेम के उन दिनों की याद करता है जब उनके बीच बहुत घना प्रेम रहा होता है। यह बात महज़ प्रेम-संबंधों पर ही नहीं लागू होती, प्रत्येक बिगड़ी स्थिति में मनुष्य अपने अतीत के उस पक्ष को याद करता है जब वह सुखी और संपन्न रहा होता है। दुख में सुख के दिनों को याद करना मनोवैज्ञानिक सच है, और प्रेम के मामले में तो यह बेहद संवेदनशील बात हो जाती है। राधा कृष्ण के व्यवहार और स्थिति से दुखी है, अतः वह अपने अतीत के उन दिनों की याद करती है जब कृष्ण का व्यवहार और उनकी स्थिति उसे असीम सुख से भर देते थे।

 कृष्ण के अतीत सुखद व्यवहार और स्थिति के परिप्रेक्ष्य में उनकी वर्तमान स्थिति और व्यवहार से राधा के दुखी होने की प्रक्रिया में ही काव्य में युद्ध जैसे अमानवीय कृत्य की सार्थकता की संभावना के विषय में संशयात्मक प्रश्न उठाए गए हैं। प्रेम के संदर्भ में यमुना का जल राधा को आकर्षित करता था, क्योंकि वह अपने रंग में श्यामता लिए हुए था। कृष्ण के रंग का होने के कारण यमुना के जल को राधा कृष्ण का ही प्रतिरूप समझती थी, पर युद्ध का संदर्भ पाकर राधा को यही श्याम-रूप यमुना-जल विकृत दिखायी देने लगता है—“अपनी जमुना में/ जहाँ घण्टों अपने को निहारा करती थी मैं/ वहाँ अब शस्त्रों से लदी हुई/ अगणित नौकाओं की पंक्ति रोज-रोज कहाँ जाती है?/ धारा में बह-बह कर आते हुए, टूटे रथ/ जर्जर पताकाएँ किसकी हैं?/ ...चारों दिशाओं से/ उत्तर को उड़-उड़ कर जाते हुए/ गृद्धों को क्या तुम बुलाते हो/ (जैसे बुलाते थे भटकी हुई गायों को)”[ix] जिस जल को राधा कृष्ण का प्रतिरूप मानकर उससे स्नेह करती थी अब उसी जल में शस्त्रों से लदी हुई नौकाएँ जाती हैं, और उसी जल की धारा में युद्ध की विभीषिका के कारण बह–बह कर टूटे हुए रथ, जर्जर पताकाएँ आती हैं। इन चीजों के आने और जाने की प्रक्रिया में कृष्ण का स्वरूप (जमुना का जल) इतना विखंडित हो चुका है कि युद्ध-क्षेत्र में पड़े हुए सैनिकों के शवों को खाने के लिए उसी ओर जा रहे गृद्ध कृष्ण के ही बुलाए हुए प्रतीत होते हैं! और फिर गृद्धों के बुलाने के परिप्रेक्ष्य में जब गायों को बुलाए जाने की घटना को रखा जाता है तो कृष्ण का यह विखंडित रूप और स्पष्ट हो जाता है। निश्चय ही राधा को कृष्ण को विखंडित कर देने वाला यह युद्ध निरर्थक प्रतीत होता है और अपने प्रेम की तन्मयता के क्षण ही सार्थक प्रतीत होते हैं, यह राधा द्वारा कृष्ण के प्रति किए गए इस प्रकार के वक्रोक्तिपरक सवाल से भी स्पष्ट है—“अच्छा मेरे महान कनु,/ मान लो कि क्षण भर को/ मैं यह स्वीकार कर लूँ/ कि मेरे ये सारे तन्मयता के गहरे क्षण/ सिर्फ भावावेश थे,/ सुकोमल कल्पनाएँ थीं/ रँगे हुए, अर्थहीन, आकर्षक शब्द थे—/ मान लो कि/ क्षण भर को/ मैं यह स्वीकार लूँ/ कि/ पाप-पुण्य, धर्माधर्म, न्याय-दण्ड/ क्षमा-शील वाला यह तुम्हारा युद्ध सत्य है—/... मान लो कि मेरी तन्मयता के गहरे क्षण/ रँगे हुए, अर्थहीन, आकर्षक शब्द थे—/तो सार्थकता फिर क्या है कनु?”[x] 
 राधा यह बिल्कुल नहीं मानना चाहती कि उसके प्रेम की तन्मयता निरर्थक थी, तो भी कृष्ण सार्थकता किसे बताते हैं, यह जानने के लिए ही उसने ‘एक क्षण के लिए मान लेने’ वाली बात कही है, क्योंकि उसे पता है कि ‘युद्ध जीवन की सार्थकता है’, इसे कृष्ण किसी भी तर्क से प्रमाणित नहीं कर सकते। यह बहुत सामान्य बात है कि जब लोगों को अपने द्वारा कही हुई बातों की सत्यता पर पूर्ण विश्वास रहता है और उनकी बातों को लोग यदि बार-बार कहने पर भी सत्य नहीं मानना चाहते तब वे इस तरह का कथन करते हैं कि ‘चलो एक क्षण के लिए हमने मान लिया कि यह बात गलत है तो यह बताइए कि यह कैसे हुआ, वह कैसे हुआ, (इस ‘यह’ और ‘वह’ के उत्तर उसी बात को सत्य प्रमाणित करने से जुड़े रहते हैं, जिसे गलत माना जा रहा है) फिर सत्य क्या है’ आदि। अतः राधा के इन कथनों अथवा प्रश्नों से यह सिद्ध नहीं होता कि राधा किसी द्वंद्व में है, बल्कि राधा इस बात पर दृढ़ है कि उसके प्रेम की तन्मयता के क्षण ही सार्थक हैं और कृष्ण द्वारा संचालित युद्ध निरर्थक है। स्पष्ट है कि कनुप्रिया में लीलाभूमि और युद्धभूमि को आमने-सामने रखकर जीवन के दो पक्षों की सार्थकता-निरर्थकता के मूल्यांकन का प्रयास किया गया है। कवि का अपना पक्ष क्योंकि लीलाभूमि की तरफ है, अतः काव्य-कलेवर में उसके विविध पक्षों पर ज्यादा हिस्सा खर्च किया गया है।

 कनुप्रिया में, जैसा कि कहा गया, कवि का अपना पक्ष लीलाभूमि अर्थात प्रेम की तरफ है। अतः उसी के अनुरूप इसमें प्रेम की गहनता को पूरी तन्मयता से चित्रित किया गया है—इन सबके बीच से युद्धभूमि की निस्सारता को पूरी सघनता से उभरने देने के लिए। कनुप्रिया में भावों और संवेदनाओं की सघनता है, गहराई है और उनका बिछलन भी; और इन सबके आपसी संबंधों के बीच से इसमें एक दार्शनिक विचारधारा भी प्रवाहित होती गयी है। भावों और संवेदनाओं की सघनता पहले ही गीत से शुरू हो जाती है, जिसमें कृष्ण के संसर्ग के कारण अशोक-वृक्ष के प्रति राधा ने अपनी कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति की है। प्रणय-भावना की सघनता का ही परिणाम होता है कि प्रणयी को हर वस्तु में अपने प्रिय की छवि दिखाई देती है, अन्य चीजों के समाने की गुंजाइश ही उस भावना में नहीं रह जाती, यही उसकी सघनता है; और यह भावना अन्य चीजों को भी प्रिय के रँग में रँगकर अपना बना लेती है, यही उसकी गहराई है! इस तरह के उदाहरण कनुप्रिया में भरे पड़े हैं। एक उदाहरण तो यमुना के जल का ही है, जिसे एकाधिक प्रसंगों में यहाँ उद्धृत किया जा चुका है। यमुना को राधा कृष्ण का प्रतिरूप समझती है—“मानो यह यमुना की साँवली गहराई नहीं है/ यह तुम हो जो सारे आवरण दूर कर/ मुझे चारों ओर से कण-कण, रोम-रोम/ अपने श्यामल प्रगाढ़ अथाह आलिंगन में पोर-पोर/ कसे हुए हो!/ यह क्या तुम समझते हो/ घण्टों—जल में—मैं अपने को निहारती हूँ/ नहीं, मेरे साँवरे!”[xi] भावनाओं की यह सघनता और गहराई सूरदास की गोपियों की याद दिला सकती है—‘लोचन जल कागद मसि मिलिकै, होइ गई स्याम स्याम की पाती’! भावाधिक्य के कारण यहाँ प्रकृति की सभी वस्तुओं में प्रिय-दर्शन तो है ही, आत्मविस्मृति भी है। आत्मविस्मृति में मात्र प्रिय याद रहता है, अपनी सुध भूल जाती है—“यह सारे संसार से पृथक पद्धति का/ जो तुम्हारा प्यार है न/ इसकी भाषा समझ पाना क्या इतना सरल है/ तिस पर मैं बावरी/ जो तुम्हारे पीछे साधारण भाषा भी इस हद तक भूल गयी हूँ/ कि श्याम ले लो! श्याम ले लो!/ पुकारती हुई हाट-बाट में/ नगर-डगर में/ अपनी हँसी कराती घूमती हूँ!”[xii] मैथिल-कोकिल कवि विद्यापति ने भी राधा द्वारा आत्मविस्मृति में स्वयं को कृष्ण समझ लिए जाने का वर्णन किया है—“अनुखन माधब-माधब सुमरइते सुंदरि भेलि मधाई/ ओ निज भाव सुभाबहि बिसरल, अपनेहि गुण लुबुधाई।”[xiii] इसी भाव का पद सूरदास ने भी लिखा है—“जब राधे तब ही मुख ‘माधौ माधौ’ रटति रहै। जब माधव ह्वै जाति सकल तनु राधा विरह दहै।”[xiv] मीरा बाई की पंक्तियाँ तो भारती जी की पंक्तियों की बिल्कुल पूर्व रूप ही हैं—“कोई स्याम मनोहर ल्योरी सिर धरे मटकिया डोलै। दधि को नाँव बिसरि गई ग्वालन ‘हरिल्यो हरिल्यो’ बोलै।”[xv] यह आत्मविस्मृति भावों की सघनता का चरम रूप है।

भावों की सघनता में प्रिय से एकाकार होने की प्रक्रिया में एक रूप आत्ममुग्धता का भी उभर कर आता है, जो विद्यापति की उपर्युक्त पंक्तियों में आया है। इस आत्ममुग्धता का एक रूप आत्मविस्तार होता है। यह आत्मविस्तार भावनाओं की पूरी गहराई लिए होता है इसीलिए इसमें सारी प्रकृति को समा लेने की शक्ति होती है। आत्मविस्तार में प्रकृति को अपना ही स्वरूप समझने का सिलसिला शुरू होता है। प्रिय के स्वरूप का विस्तार भी प्रेमाधिक्य के कारण प्रणयी द्वारा किया जाता है, यह बात ऊपर कही जा चुकी है। दोनों ही रूपों का आधार भावनाओं की सघनता और गहराई ही होती है, यदि यह प्रक्रिया प्रणयी द्वारा खुद संपन्न की गयी हो तो। कनुप्रिया में ये दोनों स्वरूप विद्यमान हैं—आत्मविस्तार और प्रिय-विस्तार; और इन दोनों की प्रक्रिया में से ही एक दार्शनिक विचारधारा भी अपना स्वरूप ग्रहण कर पायी है—“कौन है जिसकी आत्मा को तुम ने/ फूल की तरह खोल दिया है/ और कौन है जिसे/ नदियों जैसे तरल घुमाव दे-दे कर/ तुम ने तरंग-मालाओं की तरह/ अपने कण्ठ में, वक्ष पर, कलाइयों में/ लपेट लिया है/ वह मैं हूँ मेरे प्रियतम!/ वह मैं हूँ/ वह मैं हूँ”।[xvi]

 प्रेमाधिक्य ही भावनाओं में बिछलन भी पैदा करता है। कनुप्रिया की राधा कृष्ण के प्रति ऐसे भी कथन करती है जिनके पूर्व सारे तर्क और नियम-कानून पीछे धकेल दिए जाते हैं। इनमें एक तरह की हठवादिता होती है कि ‘ऐसा है, तो है; मैं कुछ नहीं जानता या कुछ नहीं जानती!’ ऐसा कथन किसी के प्रति तब किया जाता है जब कोई उस पर अपना पूरा अधिकार समझता है, और यह अधिकार अगर प्रेम का हो तो बात पूरी तरह हठवादी हो जाती है। राधा ने कई जगह भाव-बिछलन के कथन किए हैं, जैसे—“मेरे हर बावलेपन पर/ कभी खिन्न होकर, कभी अनबोला ठानकर, कभी हँस कर/ तुम जो प्यार से अपनी बाहों में कसकर/ बेसुध कर देते हो/ उस सुख को मैं छोड़ूँ क्यों/ करूँगी!/ बार-बार नादानी करूँगी/ तुम्हारी मुँहलगी, जिद्दी, नादान मित्र भी तो हूँ न!”[xvii] भावों की यह सारी सघनता और गहराई, जैसा कि कहा गया, युद्ध की विकटता के परिप्रेक्ष्य में रखे जाने के लिए हैं। कहाँ ऐसा सघन प्रेम और कहाँ युद्ध की मनःस्थिति!

राधा को युद्ध अत्यंत अप्रिय है। वह इस मनः-स्थिति से इतना आक्रांत है कि स्वप्न में भी उसे युद्ध की विकटता के चित्र ही दिखायी देते हैं। युद्धभूमि की विकटता का यह आभास या युद्ध के स्वप्न-चित्रों के ये विकट रूप भी काव्य में लीलाभूमि को सार्थकता ही प्रदान करने के लिए आए हैं—युद्धभूमि के परिप्रेक्ष्य में—“मैंने देखा कि अगणित विक्षुब्ध विक्रांत लहरें/ फेन का शिरस्त्राण पहने/ सिवार का कवच धारण किये/ निर्जीव मछलियों के धनुष लिये/ युद्धमुद्रा में आतुर हैं/—और तुम कभी मध्यस्थ हो/ कभी तटस्थ/ कभी युद्धरत/ और मैंने देखा कि अंत में तुम/ थक कर/ इन सब से खिन्न, उदासीन, विस्मित और/ कुछ-कुछ आहत/ मेरे कंधों से टिककर बैठ गए हो”। [xviii]

काव्य का अंत इस आशा के साथ किया गया है कि आगे का जीवन-इतिहास युद्धमय नहीं, प्रेममय होगा! इसी आशा को संजोये राधा युद्धभूमि में गए हुए कृष्ण का इंतज़ार लीलाभूमि के उसी रास्ते पर कर रही है जिस रास्ते कृष्ण युद्ध के बाद थके-हारे और निराश वापस आने वाले हैं। युद्ध क्योंकि मनुष्य की समस्त कोमल भावनाओं का नाश कर देने वाला है, अतः राधा को विश्वास है कि युद्ध के बाद कृष्ण थके-हारे और निराश मन से ही वापस आएँगे, और अपनी उस मनःस्थिति से त्राण पाने के लिए वे राधा का आश्रय भी ज़रूर ढूँढेंगे। राधा को यह भी पूर्ण विश्वास है कि जीवन इतिहास के निर्माण के समय, यानी अपने महान बनने की प्रक्रिया में, अगर कृष्ण ने राधा को भी साथ लिया होता तो कृष्ण युद्ध की ओर झुकते ही नहीं। अतः युद्ध के बाद जीवन के नए प्रेममय इतिहास के निर्माण लिए वह कृष्ण का साथ देना चाहती है। इसीलिए इन्हीं आशाओं को सँजोए हुए वह लीलाभूमि में कृष्ण का इंतजार करती है कि जब युद्धभूमि से थके, निराश कृष्ण इस रास्ते से लौटेंगे और अपनी निराशा और उद्वेलन के शमन के लिए वे राधा का आश्रय पाना चाहेंगे तब वह उन्हें सहारा दे सकेगी। और कृष्ण जब दुबारा किसी इतिहास का निर्माण करना चाहेंगे तो राधा उनके साथ होगी—“तुमने मुझे पुकारा था न/ मैं आ गयी हूँ कनु/ और जन्मांतरों की अनन्त पगडण्डी के/ कठिनतम मोड़ पर खड़ी हो कर/ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ।/ कि, इस बार इतिहास बनाते समय/ तुम अकेले न छूट जाओ!”[xix] कनुप्रिया में जो दार्शनिक उक्तियाँ आयी हैं, मुख्यत्तः ‘सृष्टि-संकल्प’ नामक सर्ग के अंतर्गत के ‘सृजन-संगिनी’ ‘आदिम-भय’ और ‘केलिसखी’ नामक शीर्षक गीतों में, वह सब राधा की इसी आशा की पृष्ठभूमि हैं। काव्य की दार्शनिक उक्तियों में विश्व के सृजन में राधा को कृष्ण की सहायिका माना गया है। कृष्ण की इच्छा से ही राधा ने अपने आपको सृष्टि के नाना रूपों में ढाल लिया है—“ओ मेरे स्रष्टा/ तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व का अर्थ है/ मात्र तुम्हारी सृष्टि/ तुम्हारी संपूर्ण सृष्टि का अर्थ है/ मात्र तुम्हारी इच्छा/ और तुम्हारी संपूर्ण इच्छा का अर्थ हूँ/ केवल मैं!/ केवल मैं!!/ केवल मैं!!!”[xx] सृष्टि का निर्माण जब राधा के सहयोग के बिना नहीं होता, तो जो जीवन-इतिहास उसके सहयोग के बिना रचा जाएगा वह विकृत होगा ही! अतः राधा नए जीवन-इतिहास की रचना प्रक्रिया में सहयोगी की भूमिका में रहने के लिए रास्ते में कृष्ण का इंतज़ार करती है।

स्पष्ट है कि युद्ध और प्रेम की प्रकृति को अनेक संदर्भों और परिस्थितियों में परखते हुए ‘कनुप्रिया’ में कवि जीवन में युद्ध को त्याज्य मानता है और प्रेम को वरणीय। युद्ध और युद्ध की मानसिकता बुद्धि के व्यापार हैं और प्रेम हृदय का। हृदय का व्यापार मन को किसी संकल्प की तरफ झुकाता है जबकि बुद्धि का विकल्प या दुविधा की ओर। काव्य क्योंकि हृदय का व्यापार है इसीलिए जयशंकर प्रसाद ने इसे आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूति कहा है—“काव्य आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूति है, जिसका संबंध विश्लेषण, विकल्प या विज्ञान से नहीं है।”[xxi] स्पष्ट है कि विश्लेषण, विकल्प या विज्ञान का संबंध बुद्धि से है। ‘कनुप्रिया’ की राधा का मन प्रेम और युद्ध के बीच प्रेम को तरजीह देने में तनिक भी दुविधा या संशय में नहीं पड़ता, भले ही उसका प्रिय और आराध्य युद्ध की ओर मुड़ गया हो! जीवन में प्रेम का पक्ष उसके मन का संकल्प है, जिसका कोई विकल्प नहीं।
 
संदर्भ ग्रंथ:
[i] डॉ. नगेंद्र (संपादक), तैंतीसवाँ संस्करण, 2007, हिंदी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपरबैक्स, नोएडा, पृष्ठ 642
[ii] धर्मवीर भारती, उन्नीसवाँ संस्करण, 2013, कनुप्रिया, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 65
[iii] वही, पृष्ठ 68
[iv] वही, पृष्ठ 30
[v] वही, पृष्ठ 65
[vi] वही, पृष्ठ 15
[vii] वही, पृष्ठ 64
[viii] वही, पृष्ठ 68
[ix] वही, पृष्ठ 68
[x] वही, पृष्ठ 67 और 69
[xi] वही, पृष्ठ 16
[xii] वही, पृष्ठ 31
[xiii] श्री रामवृक्ष बेनीपुरी (संपादक), तृतीय संस्करण, 2007, विद्यापति पदावली, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ 144
[xiv] बेनीप्रसाद (संपादक), द्वितीय संस्करण, 1927, संक्षिप्त सूरसागर, इंडियन प्रेस लिमिटेड, प्रयाग, पृष्ठ 466
[xv] आचार्य परशुराम चतुर्वेदी (संपादक), बाईसवाँ संस्करण, 2008, मीराँबाई की पदावली, हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग, पृष्ठ 148
[xvi] धर्मवीर भारती, उन्नीसवाँ संस्करण, 2013, कनुप्रिया, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 42
[xvii] वही, पृष्ठ 29
[xviii] वही, पृष्ठ 73
[xix] वही, पृष्ठ 81
[xx] वही, पृष्ठ 44
[xxi] जयशंकर प्रसाद, द्वितीय संस्करण, 2007, काव्य और कला तथा अन्य निबंध, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ 25 

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