जयजयवंती (कहानी) - स्वरांगी साने

स्वरांगी साने
प्रिया उसे छेड़ रही थी पर उसका ध्यान ही नहीं था। 
प्रिया ने नीलांबरा की आँखों के सामने चुटकी बजाते हुए कहा- नीला!
- अ… हाँ!
- कहाँ खोई रहती है?
- कहीं नहीं, यहीं तो हूँ, बता।
- मैं क्या बताऊँ, तू ही बता।
- अरे मेरे पास बताने को कुछ नहीं है, तेरे पास ही होती हैं दीन-दुनिया की बातें।
- दो लोग बैठे हों और एक एकदम चुप हों, तो दूसरे को तो बोलना ही पड़ेगा, नहीं तो दोनों के बीच बातचीत कैसे होगी?
- कोई एक बोलता रहे उसे भी संवाद नहीं कहते, उसे एकालाप कहते हैं।
- आलाप, तान, रागदारी, अब तू कुछ भी कह ले पर तू कुछ बोलती ही नहीं, तो मुझे ही बोलना पड़ता है।
- कहा न क्या बोलूँ, मेरे पास बोलने को कुछ नहीं है। ऐसा कहते हुए उसने पास रखा तानपूरा उठा लिया और उसकी अंगुलियाँ उस पर चलने लगती हैं।
प्रिया कहती है- तो तुझे मेरे एकालाप से यह आलाप अधिक अच्छा लगता है, तो कुछ सुना ही दे, बहुत दिन हो गए, तुझसे कुछ सुना नहीं।
नीलांबरा आँखें बंद कर लेती है और एक आलाप लेकर राग जयजयवंती में गाने लगती है- ‘मनमोहना, बड़े झूठे, हार के हार नहीं माने मनमोहना... मोसे बेईमानी करे, मुझसे ही रूठे...’
दोनों गायकी में खो गईं, नीलांबरा की आँखों से पानी बहने लगा... और वह चुप हो गई। प्रिया आँखें मूँदे इस गंभीर राग को सुन रही थी। नीलांबरा के रुकते ही प्रिया ने आँखें खोलीं- अरे क्या हुआ, तू रोने लगी!
- ये राग ही ऐसा है। रात्रि के दूसरे प्रहर का यह राग कितनी शांति दे देता है न
- हाँ और तुझे तो उदास भी कर देता है।
- नहीं, नहीं ऐसी कोई बात नहीं, आज ऐसे ही कुछ करने का मन नहीं हो रहा था, अच्छा हुआ तू आ गई।
- मेरे आने से भी क्या हुआ, तेरी उदासी तो वैसी ही रही।
- प्रिया कभी-कभी कोई कारण नहीं होता फिर भी लगता है कोई मेरे भीतर विरह के गीत छेड़ रहा है।
- क्यों तेरी आँखों में इतनी वीरानगी है? क्या है जो तुझे उदास करता है?
- लगता है आई एम नॉट फ़िट फ़ॉर एनीथिंग।
- तुझे ऐसा क्यों लगता है?
- यदि मैं भली होती तो सुधांश मुझे क्यों छोड़ता?
- उसने तुझे छोड़ा या तूने उसे, या तुम दोनों ने एक-दूसरे को, पहले इस सवाल को परख, तब समझने में आसानी होगी।
- शायद हम दोनों ने एक-दूसरे को छोड़ा। उसे जैसी पत्नी चाहिए थी, मैं वैसी नहीं बन पाई। 
नीलांबरा थोड़ी देर चुप हो गई जैसे अतीत के कुछ धागे पकड़ रही हो और बोली- मैंने सब तो किया, जो वह चाहता था। माँग भर सिंदूर, माथे पर बिंदी, हाथ भर चूड़ियाँ, पैरों में बिछिया-पायल, सिर पर पल्लू फिर उसे क्या शिकायत थी। उसके लिए खाना बनाती थी, उसका घर सँभालती थी।
- उसका घर? वो तुम्हारा भी तो घर था नीला।
- नहीं, मेरा घर नहीं था। वो उसका घर था, वहाँ उसे अपनी मनपसंद पत्नी चाहिए थी, जो उसके मनमुताबिक रहे, घर में उसकी मर्जी का खाना बने, उसकी मर्जी से उठना-बैठना हो।
- लोग प्यार में वैसे भी ये अपने आप करते हैं।
- हाँ, अपने आप करते हैं न, कोई किसी पर थोपता तो नहीं है न, मुझे तो लगता तो मैं भी करती, पर प्यार पनपने से पहले ही उसने हुकुम चलाना शुरू कर दिया। लगने लगा जैसे उसके घर की दूसरी चीज़ों की तरह मैं भी एक चीज़ हूँ, उसकी ख़रीदी हुई। 
- यह सोच तो पूरी तरह ग़लत है।
- और मैं खुद सरकारी नौकरी में हूँ, अच्छा कमाती हूँ, मैं क्यों वो सब सहन करती?
- पर क्या यदि तुम खुद कमा नहीं रही होती तो सहन करती?
- हाँ, शायद। पैसों की ताकत बड़ी ताकत होती है। उसे छोड़ने का निर्णय इसलिए भी ले पाई क्योंकि मेरे पास नौकरी थी, मुझे रहने के लिए अलग से सरकारी क्वार्टर मिल सकता था। मैं उसके शहर को छोड़ने की भी हिम्मत कर पाई। अब इस शहर में तुम्हारे अलावा मुझे कोई नहीं जानता। सुकून है।
- क्या सच सुकून है? है तो वो दिखता क्यों नहीं? 
- अपना कमा रही हूँ, खा रही हूँ पर ऐसा लगता है कोई तो होगा, कहीं तो होगा, कोई तो होगा न प्रिया मेरे लिए भी!
- हम स्कूल-कॉलेज की परिकथाओं में जीने वाली, सपनों में खोने वाली और फ़िल्मी दुनिया को सच मानने वाली उम्र से बहुत आगे निकल आए हैं, तू भी होश में आ। कोई होता तो मिल जाता, नहीं मिला मतलब कोई नहीं है, सब तेरे दिमाग के खेल हैं।
- जिस यकीन से तू कह रही है न उतने ही विश्वास से मैं भी मानती हूँ कि कोई है।
- हाँ, कोई तो होगा ही, दुनिया की आबादी 6 अरब है, इसमें से कोई न कोई तो होगा ही, अ, ब, स, द, पर तेरे जैसा पागल कोई नहीं होगा।
- तू मुझे पागल समझती है, तो तुझे भी नहीं बताऊँगी। ये बातें वैसे भी मैं किसी से नहीं कहती। चार लोगों में जैसे उठना-बैठना होता है, वैसी जीती हूँ। सबके जो मन भाए, वह करती हूँ, पर मेरे मन को कुछ भी नहीं भाता, मुझे लगता है जैसे मैं इस दुनिया की हूँ ही नहीं।
- तो तू किस दुनिया की है?
- नहीं पता, पर मैं अपने आस-पास से खुद को जोड़ ही नहीं पाती।
- ओह, थोड़ी तो प्रैक्टिकल बन, आँखें खोलकर जी। 
- आँखें खुली ही हैं लेकिन जब मैं लोगों को देखती हूँ, मुझे लोग नहीं दिखते, ऐसा लगता है सब केवल आदमकद होर्डिंग्स हों। सबके चेहरे पर हँसी चस्पा है जबकि कोई हँसना नहीं चाहता।
- इतना समझ आता है तो तू भी सबकी तरह हँस, क्यों उदास रहती है?
- समझ आता है इसीलिए झूठी हँसी नहीं हँस सकती। 
- तो तू चाहती क्या है?
- एक अधूरापन सालता है। रियाज़ करती हूँ तब परिपूर्ण लगता है लेकिन जैसे ही तानपूरा छोड़ दूँ फिर वही खालीपन घेरने लगता है।
- मतलब साधना में तेरा मन रमता है तो साधना कर।
- साधना जैसे शब्द बहुत गहन है रे, केवल गाने बैठूँ तब भी आँखें बहने लगती हैं, किसी की याद आने लगती है, बहुत बहुत बहुत ज़्यादा, किसकी यह भी नहीं पता।
- केवल गाने मत बैठ, साधना कर, उसमें डूब जा और रोना आ रहा है तो रो ले, खुद को रोकती क्यों है, जो भी दर्द होगा एक बार पूरा निकल जाएगा। फिर तू हलका महसूस करेगी, तुझे अच्छा लगेगा।
- लोग सोचेंगे इसके पास सबकुछ है फिर यह क्यों रोती है, किसे याद करती है, त्रिया चरित्र कहने लगेंगे।
- लोगों का कहाँ ले बैठी, लोग तो कुछ भी सोचते हैं। मैं हँसती हूँ तब भी लोग सोचते हैं ये हँसती क्यों है? लोगों को हँसने का भी कारण बताना पड़ता है मतलब कोई बिना बात हँस भी नहीं सकता, कोई बेवजह खुश रहे तो भी लोगों को दिक्कत होने लगती है।
- पर सच बता तू हँसती क्यों है?
- ले तू भी लोगों की तरह पूछने लगी। क्यों हँसती हूँ का क्या मतलब, खुश रहती हूँ इसलिए हँसती हूँ। 
- पर किस बात को लेकर खुश होती है? क्या है खुश होने के लिए? और तू तो अख़बार में काम करती है। कौन-सी ऐसी ख़बर है जो खुश कर सकती है? पूरा समाज, अर्थव्यवस्था, कानून सब तो जर्जर हो रहा है।
- समाज, कानून, आर्थिक व्यवहार ये सब बाहरी चीज़ें हैं, मन को इनमें से किसकी ज़रूरत है बता? मिल गया तो भोजन कर लिया, न मिला तो हरि कीर्तन कर लिया, मन लागा फ़कीरी में, हम तो कबीर भए। कह प्रिया ज़ोर से हँस देती है।
- मज़ाक मत कर।
- मज़ाक नहीं कर रही। तू भी खुश रह, अपने भीतर खुशी ढूँढ फिर बाहर की बातें ज़्यादा प्रभावित नहीं करेंगी।
- तो क्या तुझे दर्द नहीं होता?
- होता है न, जब चोट लगती है तो मुझे भी दर्द होता है लेकिन हँसी ही मेरे लिए पेनकिलर है।
- और यदि मैं कहूँ कि आँसू मेरे पेनकिलर हैं तो?
- पर हम दु:खी रहने के लिए नहीं जन्मे हैं। हमें खुश रहना चाहिए। 
- यार होना तो बहुत कुछ चाहिए, लेकिन सब कहाँ हो पाता है।
- यही तो अंतर है, तू रोने के सैकड़ों कारण ढूँढती है और मुझे हँसने के हज़ार कारण मिल जाते हैं।
- कहाँ मिल जाते हैं?
- मिल जाते हैं, बस, मुझे कहीं ढूँढने नहीं जाना पड़ता। खुशी को अपने भीतर देखो बाहर कुछ नहीं है।
- श्रीश्री प्रिया माँ उवाच है क्या ये?
प्रिया ने ठहाका मारते हुए कहा – नहीं, नहीं, ऐसा कुछ नहीं है बाबा। हम अधिकतर बातें ग्रहण ही नहीं करते, जैसे वे हमारे लिए हैं ही नहीं। मैं इससे उल्टा सोचती हूँ, मैं सोचती हूँ कि वे मेरे लिए क्यों नहीं? क्यों मैं खुश नहीं रह सकती, क्यों मुझे खुश रहने का अधिकार नहीं? हमें लगता है फलाँ मिल जाएगा तो हम खुश हो जाएँगे, ऐसा नहीं होता। फलाँ मिल जाएगा तो कुछ और खींचेगा, लगेगा काश वो होता। उस काश के चक्कर में, जो है, उसे भी इन्जॉय नहीं करते। अब तेरे ही पास कहने को सब है और कहने को कुछ नहीं क्योंकि तू दु:खी है। छप्पन भोग परोस देने पर भी दु:खी रहने वाले दु:खी ही रहेगा और खुश रहने वाला चरणामृत की दो बूँदें छककर भी तृप्त हो जाएगा।
- इतना ज्ञान नहीं माँगा था रे।
- ज्ञान कहाँ दे रही हूँ। तू जयजयवंती गाकर दु:खी हो रही थी और सिख परंपरा की गुरुबानी तो इस राग में शांति दे जाती है। एक ही राग है, कौन क्या लेता है, उस पर निर्भर है। यह तो भक्ति का राग है।
- पता नहीं रे, मेरा मन तो बावला है और बावली ही बातें करता है।
इतना कहकर नीलांबरा ने फिर से तानपूरा उठा लिया और गा पड़ी - "ये दिल की लगी कम क्या होगी, ये इश्क भला कम क्या होगा, जब रात है ऐसी मतवाली फिर सुबह का आलम क्या होगा।"

शाम गहराने लगी, नीलांबरा के जज़्बात भी गहराने लगे। नीलांबरा अपने ग़म में और प्रिया अपनी मस्ती  के प्रवाह में बहे जा रहे थे। प्रिया भी नीलांबरा के साथ गाने लगी - "नग़मों से बरसती है मस्ती, छलके हैं खुशी के पैमाने, आज ऐसी बहारें आई हैं, कल जिनके बनेंगे अफ़साने..."

सेतु, फ़रवरी 2021

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