संस्मरण: सखी

नमिता राय
नमिता राय

गोमतीनगर, लखनऊ

कितना आसान है बनाना आजकल! पता चला कि ऑटोरिकशा की सवारी करते हुए आप एक चौराहे से दूसरे चौराहे तक पहुँचने मे सखी बना लेते हैं। दोस्ती हो जाती है, और वह दोस्त बन जाती है। उन्हें हम आज के जमाने में फ्रेन्डस कहते हैं। इस नयी बनी सखी से कोई उम्मीद नही रखते हैं। वह बस ऑटो की सखी होती है तो कुछ लंचटाइम की फ्रेन्डस होती हैं। कुछ औपचारिकता मे फ्रेन्ड बन जाती हैं,तो कुछ सखियाँ काम से ताल्लुक़ रखती हैं। ये सखियाँ सुख तथा दुख दोनों में मित्रता निभाएँ इसकी कोई बाध्यता नहीं है। न वे किसी वचन से बंधी होती हैं। न ही इनकी सखीत्व में कोई गहराई होती है।

एक दिन मेरी माँ के भरे-पूरे ससुराल में, जिसमें अपने सगों के अलावा, चचेरे ममेरे रिश्तेदार भी रहते थे, एकाएक खबर फैली कि मेरी माँ की सखी आ रही हैं उनसे मिलने। मै अकसर अपनी माँ से पूछती कि, "तुम्हारी फ्रेंड्स कहाँ हैं?" वे सहजता से कहती, हमारे समय में फ्रेंड्स नहीं होती थी! सखी होती थीं। मैं अत्यंत तत्परता से उस अनोखे आगन्तुक को देखने के लिये बैठक के परदे के पीछे से झाँकने लगी।तभी एक लम्बी महिला, सफेद रंग की। सीधे पल्ले की साड़ी में अंदर आकर बैठी और माँ से गले‌ मिली। यह सखी गौरवर्ण की थी और उनके मुखमंडल पर अलग ही तेज था। पता चला कि वह बाल विधवा थीं। उनके लिये जल पान रखा गया किन्तु, उन्होंने कुछ भी ग्रहण नहीं किया। माँ से उन्होने उनका कुशल मंगल पूछा और यह भी जानना चाहा, कि ससुराल में उन्हें कोई परेशानी तो नहीं थी। घर के बच्चों को ढेर आशीर्वाद दिया और, जाने से पहले वह माँ से लिपट कर रोई भी। माँ के विवाह के इतने साल बाद वह मिली फिर भी प्रेम में कोई कमी नहीं थी। कुछ दिन बाद हमारी मौसी ने खुलासा किया, कि यह सखी आजकल की फ्रेंड्स जैसी नहीं हैं,जो मिनटों में बन जाती हैं, जरा जरा बात पर तुनक जाती हैं और कुछ ही पलो में मेल मिलाप कर लेती हैं। यह सखी एक दूसरे को पान खिलाकर, नदी में एक डुबकी लगाकर वचन देकर बनी हैं। इसे सखी जुड़ाना कहते हैं। इनमें आपस में ईर्ष्या, द्वेष या बराबरी की भावना नहीं होती थी, और न ही, वह एक दूसरे के बारे में कोई गलत धारणा पालती हैं अपने हृदय में। यदि वे ऐसा करती हैं तो उन्हें अपराध बोध के साथ जीना पड़ता है और पाप लगता है इसी कारण लोग शीघ्र सखी नहीं बनाते थे उस समय मे।

मै बहुत छोटी थी इसलिये सखी के रिश्ते की गहराई को समझ नहीं पायी तब। किन्तु आज सोचती हूँ जितना आसान हो गया है आजकल फ्रेंड्स बनाना उतना ही कठिन था उस समय सखी बनाना। माँ की एक ही सखी थी। मैं सोचती हूँ इतने नाजुक ओर कठिन मित्रता को उनहोंने चुपचाप कितनी सहजता और शालीनता से निभाया। कितना प्रेम, विश्वाास और पावनता थी उन रिश्तों में, और किस खरी मिटटी के बने वह लोग थे जो रिश्तों के सम्बन्ध को हल्के में न लेकर सिर पर मुकट की तरह धारण कर लेते थे।

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