ये पूरब है पूरब वाले

अनुराग शर्मा
नमस्कार!

संसारभर की संस्कृतियाँ अपनी-अपनी विशेषताओं के कारण अन्य संस्कृतियों से भिन्न हैं। उनमें रमे बिना दूर से से देखकर, किसी कहानी, उपन्यास, या फ़िल्म के आधार पर एक राय बना लेना सही नहीं है। परदेश में एक कार्यक्रम के दौरान जब खेल में विभिन्न दलों के नाम नदियों पर रखने की बात चली तो मैंने अपने दल का नाम इंडस रख लिया। टेम्स, पोटोमैक, एमेज़ॉन आदि नामों को सहज समझने वाले कई भारतीय युवकों ने मुझसे इंडस का अर्थ पूछा। ये युवक अमेरिका में जन्मे, पले, बढ़े वैसे भारतीय नहीं थे जिन्हें कई भारतीय मज़ाक में एबीसीडी (अमेरिकन बॉर्न कन्फ़्यूफ़्यूज़्ड देसीज़) कहते हैं बल्कि वे पीढ़ियों से भारत में रह रहे समृद्ध परिवारों के  भारत में जन्मे, और वहीं के प्रथम श्रेणी अभियांत्रिकी संस्थानों में पढ़े उच्च-शिक्षित भारतीय थे जिन्हें भारत के इतिहास-भूगोल, परम्परा, संस्कृति आदि के बारे में कुछ भी पता नहीं था। उनसे मिलने से पहले मैं समझता था कि भारत को समझने में तीन पीढ़ियाँ लगती हैं। उनसे मिलने के बाद मेरा भ्रम टूट गया।

विदेशी संस्कृति पर टीका-टिप्पणी कोई नयी बात नहीं, और न ही प्रवासी साहित्य पर चर्चा। भारत उपमहाद्वीप में पश्चिम पर चरित्रहीन होने के आरोप लगाना सामान्य बात है। पिछले दिनों एक रचना में में पाश्चात्य संस्कृति को नशे तक सीमित रही संस्कृति कहे जाते देखा। लेखक को पता नहीं होगा कि हुक्के की खोज भारत में हुई थी और आज भी वैधानिक रूप से अफ़ीम का उत्पादन करने वाले देशों में भारत अग्रगण्य है। कुछ समय बाद ही कहीं पढ़ा कि अमेरिका के सभी नेता श्वेत प्रभुत्व के समर्थक हैं तो ध्यान गया कि भारत में रहने वाले लेखकों की कृतियों में ही नहीं बल्कि अनेक प्रवासी रचनाओं में भी पश्चिम की ऐसी छवि प्रस्तुत की जाती है मानो पश्चिम में रंगभेद, अनैतिकता, लालच और अकड़ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता। पश्चिमी (या किसी भी) संस्कृति पर लाँछन लगाना हमारी दृष्टि का दोष मात्र है। इस अंक में स्वामी रामतीर्थ के एक आलेख का अंश "नक़द धर्म' पाश्चात्य संस्कृति को देखने की एक भिन्न दृष्टि प्रदान करता है।

करोना का टीका आने के बाद जहाँ रोग का खतरा कम हुआ वहीं विषाणु के नये रूपांतरण तथा जनता के अधैर्य के कारण  रोगियों की संख्या में एक बार फिर वृद्धि हुई है। सचेत रहकर सबकी रक्षा करना हम सबका सामूहिक दायित्व है, कृपया अपना अनुशासन शिथिल न करें।

सेतु के इस अपेक्षाकृत छोटे अंक में आपका स्वागत है। अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवश्य अवगत कराइये।
 
शुभाकांक्षी,   

सेतु, पिट्सबर्ग
31 मार्च  2021 ✍️

2 comments :

  1. सुंदर, विचारोत्तेजक संपादकीय। एक सचेत बतकही सरीखा।

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  2. संस्कृति को पहचाने व इतिहास को जाने.
    उत्कृष्ट संपादकीय
    हार्दिक अभिनंदन सेतु पत्रिका की टीम का।

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