व्यंग्य: समकाल की होली कथा

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

समकाल में एक राजा हुए, नाम था हरिण्यकशिपु। महर्षि कश्यप पूज्य थे तो राजा ने परमपूज्य बनने के लिए अपना नाम हरिण्यकश्यप रख लिया। नाम बदलने से न उनकी फितरत बदली और न ही वे अपने बेटे प्रह्लाद को मना पाए। वे इसलिए क्रोध में लाल-पीले हो रहे थे। वे हरे-नीले भी हो सकते थे, पर हरा और नीला रंग भगवान का था, और भगवान ठहरे उनके पक्के दुश्मन। वह लाल-पीले इसलिए भी हुए कि दैत्यवृत्ति के लोगों को ये ही रंग शोभा देते थे। चेहरे पर खून चढ़ जाए तो महाराजा होना सार्थक हो जाता है। जो पुलिसकर्मी होलिका के अग्नि में जल मरने की खबर लेकर आया था, उन्होंने उस नामुराद को सस्पेंड कर दिया। फिर महामंत्री को अपने मंत्रणा कक्ष में बुलाकर कहा, “इस राजद्रोही प्रह्लाद का कुछ करिए। इसे मारने के चक्कर में मैंने अपनी प्राणप्रिया, आज्ञाकारी मंत्री होलिका को सुलगा दिया। वह देश की बेटी थी और मेरे सिंहासन की असली वारिस। उसका यूँ सुलग जाना विपक्षियों की साजिश है।” महामंत्री की घिग्घी बंधी थी। क्रोधित महाराजा के सामने वे डिफेंस में विनम्र खड़े रहते थे। गुस्सैल आदमी वैसे भी दिमाग रहित होता है, ऊपर से वह महाराजा हो तो अविवेकी भी हो जाता है। इसलिए महामंत्री डरते हुए बोले, “हे महाबली, मेरे प्राणों की रक्षा हो तो मैं निवेदन करूँ।”

अपनी यथोचित प्रशंसा सुनकर महाराजा का दिमाग सातवें आसमान के ठिकाने पर आ गया। वे प्रसन्न हो कर बोले, “महामंत्रीजी आप मेरे रात-दिन के राज़दार हैं, निसंकोच हो कर कहिए।“ तब महामंत्री बोले, “सम्राट यशस्वी हों। प्रह्लाद है ही दुष्ट। वह सम्राट के चिर विरोधी भगवान का भक्त है। हमारे दुश्मन घोषित दुरात्मा हैं सम्राट। हमने रॉ, सीबीआई, नारकोटिक्स, ईडी, इनकम टैक्स और अपने पालतू आतंकवादियों को प्रह्लाद के पीछे लगा कर देख लिया श्रीमान। हमारे जानलेवा गुप्तचरों ने जर्मनी में बनी लेज़रगनों से उस पर प्रहार किए। जलसैनिकों ने हाथ पैर बाँधकर उसे गहरे जलडमरूमध्य में डाल दिया। रूस से आयातित और हमारे द्वारा परीक्षित सर्वोत्तम विष को भी वह पचा गया। चीन से वीआयपी उपहार में आए विषैले सर्पों से उसे डसवाया पर चीनी सर्प भी घटिया निकले। हमारे हेलिकॉप्टर उसे पाकिस्तान की सीमा में डाल आये पर वहाँ की फौजें निकम्मी निकलीं। वह वहाँ से भी लौट आया। तब हमने अग्निरोधी देवी होलिका की शरण ली। हमारे विशेषज्ञों ने कहा था कि भयानक से भयानक आग भी देवी होलिका का बाल बाँका नहीं कर पाएगी। तब हमने प्रह्लाद-दहन का सार्वजनिक कार्यक्रम तय किया। प्रह्लाद का यूँ बच जाना चिंता की बात है। धिक्कार है मुझे नाथ। इससे हमारी अयोग्य मशीनरी की पोल खुल गई है।”

महाराजा गुस्से में मौन रहे तो महामंत्री ने चाटुकार शैली अपना ली। वे बोले, “मैंने आपके प्रिय सेवानिवृत्त न्यायाधीश को आयोग बना दिया है। उन्हें जाँच कर तीन महीने में रिपोर्ट देने को कहा है। हम प्रह्लाद को छोड़ेंगे नहीं, वह सच का पुजारी बना फिरता है। यहाँ गांधी उड़ गए तो प्रह्लाद क्या चीज है। उसका ऐसा बंदोबस्त करेंगे कि वह हे राम, हे राम करता धराशायी हो जाएगा।” मारधाड़ की बात से सम्राट की चेतना लौट आई। अन्यथा योग्य महामंत्री के होते सम्राट पट्टी बाँध कर सो सकते थे। राजन ने चिंतातुर हो पूछा, “महामंत्री आप ही बताइए, अब प्रह्लाद का क्या करें? ” सम्राट मुदित हो कर महामंत्री से मंतव्य पूछें तो उसका महामंत्री होना सार्थक हो जाता है। महामंत्री अपना संचित ज्ञान खंगाल कर आए थे। उन्होंने कहा, “सम्राट आप ईश्वर हैं। ब्रह्माजी ने आपको वरदान दिया है। देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी, दैत्य और सर्प आदि आपको नहीं मार सकते। आप न राजभवन में मारे जा सकते हैं, न विदेश में। न एलएसी पर मारे जा सकते हैं, न एलओसी पर। एके-47 हो, एटम बम हो या कोरोना जैसा जैविक हथियार, आप अजर-अमर ही रहेंगे। हम प्रह्लाद को पकड़ कर सर्वोत्कृष्ट स्टील से बनी अमेरिकी जंजीरों में जकड़ देंगे। फिर आप उससे मल्लयुद्ध करें, गदायुद्ध करें या तीक्ष्ण तलवार घोंप दें। जो चाहें करें,  प्रेम और युद्ध में सब जायज है। आपकी विजय निश्चित है।” 

दूसरे दिन प्रह्लाद को बेड़ियों में राजदरबार लाया गया और संविधान के खंभे से बाँध दिया गया। जनता सुबक-सुबक कर रो रही थी। सत्य और दया की प्रतिमूर्ति प्रह्लाद का दैत्य सम्राट के हाथों मारा जाना तय था। सम्राट के बाहुबल से सीआईए वाले भी डरते थे। सम्राट ने प्रह्लाद के मस्तक को निशाना बनाया। प्रह्लाद जरा-सा हट गया। सम्राट के मुक्के के प्रहार से खंभे के टुकड़े-टुकड़े हो गए। टूटे खंभे से नरसिंह का रूप धारण कर जनता निकली। जनता गा रही थी, “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।” चुनाव की घोषणा हो गई। सम्राट हवा में शहर दर शहर छलांगें लगाने लगे। परिणाम के दिन वे न विदेश में थे, न राजमहल में, वे संसद की चौखट पर खड़े थे। तब न दिन था, न रात थी। न विधाता निर्मित कोई प्राणी था, न कोई अस्त्र-शस्त्र था। जनता के वोटों की गिनती हो रही थी और हरिण्यकश्यप हार रहे थे।
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