प्रतीकों के मौलिक सृजन से बुने नवगीत


समीक्षा
टूटेंगे दर्प शिलाओं के (समकालीन गीत संकलन)
लेखकः डॉ. मनोहर अभय
प्रकाशक: राजश्री प्रतिभा प्रतिष्ठान प्रकाशन, नवी मुंबई
मूल्य: ₹ 200
पृष्ठ संख्या - 158

समीक्षक: धर्मपाल महेंद्र जैन

गीतों के अभिनव रूपकों ने जनमानस को निरंतर आकर्षित किया है। कई गीतों ने आकंठ बसने और संगीत, राग-बद्ध हो कालजयी बनने में सफलता पाई है। निश्चित ही ऐसे में गीतकारों की प्रतिभा-समृद्ध पीढ़ियों ने गीतों को लोक में स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। हर समर्थ रचनाकार चाहता है कि उसका रचनाकर्म अपनी पहचान स्वयं बनाए। उसकी यही अभिलाषा, भाषा, तेवर, कहन और शिल्पगत तकनीकों में निरंतर नयेपन की माँग करती है। अपनी ऊर्जा और प्रयोगों से नवगीतों को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाने वाले समकाल के समर्थ रचनाकारों में डॉ. मनोहर अभय एक स्थापित नाम है। उनकी नई कृति ‘टूटेंगे दर्प शिलाओं के’ को पढ़ते हुए मुझे बार-बार लगा कि वे अपनी गहरी अनुभूतियों को गीतों में सार्थक और सफलतापूर्वक कह पाए हैं।

मनोहर अभय
सहज और आमतौर पर सरल शब्दों में गूँथे गए ये गीत छोटे-छोटे वाक्यांशों यथा- हम तो पूछेंगे, देख लेना, जंगल बेच दिए, उड़ान भरने दो, जैसे शीर्षकों में आते हैं। ये वाक्यांश मुहावरे बनकर रचनाकार की संवेदना और प्रतिबद्धताओं को ध्वनित करते हैं। ये गीत व्यापक फलक पर गूँजे हैं इसलिए इनकी सादगी भरी अभिव्यंजनाओं में भी अपूर्व नवीनता है। आम आदमी के सरोकारों को अभिव्यक्त करते नवगीत ‘हम तो पूछेंगे’ की ये पंक्तियाँ देखिए- ‘कहाँ / सुबह की लाली बिखरी / कहाँ / सिंदूरी शाम / धुली दुपहरी / किसने लूटी / हम तो पूछेंगे।’ व्यवस्था पर जोरदार और धारदार प्रहार के लिए वे मुहावरे चुन कर कहते हैं- ‘सारे घर की प्यास बंद है / बेपेंदी के लौटे में।’ रचनाकार समाज को आगाह करते हुए ‘सूरज उगेगा’ में कहता है - अपहृता / खुशबुएँ वसंत की / हुई बंधक गुफाओं में / करेंगी वकालत तितलियाँ / वैश्विक सभाओं में / सभासद भुनभुनाएँगे / देख लेना। ... गली के मोड़ पर / मजमें लगे / नारे उछाले जाएँगे / देख लेना।

धर्मपाल महेंद्र जैन
गीतों की यह चेतना प्रतिरोध की भाषा बन कर विद्रूपताएँ बताती हैं और बेहतरी की आशा करती है- ‘फटी ओढ़नी ओढ़ / हमारी बिटिया कहती है / कभी हमारे दिन पलटेंगे’। समाज, व्यवस्था और सत्ता के साथ रहते और जीते हुए प्रतिदिन रचनाकार अपने समय और परिवेश से जुझता है। डॉ. अभय की ये चिंताएँ गीतों में इस तरह सामने आती हैं – ‘छिछला पानी / दूषित लहरें / करतीं रोज सवाल।’ ये यक्ष प्रश्न समाधान पूछते हैं- घने अंधेरे के हाथों / धवल चांदनी बिकी हुई है / कैसे होगा नया सवेरा।’ रचनात्मकता और सकारात्मक सोच के साथ उनका रचनाकार सोचता है– ‘चलो देखें / और कितना / दमखम बचा है / अंधेरों में।’ वे आशान्वित होते हैं इस खूबसूरती के साथ- और कुछ / ठहरो सखे! /लेने गई हैं हवाएँ / गंध के झोंके।’ प्रजातंत्र का जिम्मेदार नागरिक रचनाकार दिलासा देता है - रोशनी का हक तुम्हें / मिलकर रहेगा / लो भरी इजलास में / फरियाद करते हैं। ‘टूटेंगे दर्प शिलाओं के’ में अपनी बात पूरी करते हुए वे कहते हैं- ‘कह दो / मावस के बंटवारे को / मैं आऊँगा / महाक्रांति के अनुपम / उद्गार लिए।’ गीतों के आरूप में चेतना को धीरे-धीरे झकझोरते हुए ये नवगीत महाक्रांति की बात करने लगते हैं। वर्तमान को ऐसे देखने का नजरिया कि ‘खड़ी घाट पर नाव / पूछते पते किनारों के’ सम्मोहक है। 

डॉ. अभय जब प्रकृति और पर्यावरण पर अपने भाव रखते हैं तब उनकी संवेदना की मुखरता देखते बनती है। ‘पौधे तुलसी के’ की ये पंक्तियाँ- ‘हवा उठा लाई / बाहर से / नकली घोल रसायन / छंद-सोरठा / अदले-बदले / अर्थान्तर रामायण / चुपके-चुपके / क्षेपक-चुपकी / करते रहे जलील।’ पर्यावरण और प्रकृति के प्रति उनका संवेदनात्मक स्वर अपने लिए ऐसे बिम्ब घढ़ता है कि पाठक विस्मित हुए बिना नहीं रहता- ‘हुई चिड़चिड़ी धूप / प्यासी चिड़िया ढूँढ रही है / छाया के स्तूप।’ वसंत पर व्यंजना में लिखा यह नवगीत हलचल मचा जाता है- ‘शापित हुआ / गुलाब खड़ा है / झुकी कंटीली डाली / देसी गंघ बेचने आया / अब परदेसी माली।’ मानवीय और सामाजिक रिश्तों की सम्यक पड़ताल करते हुए उन्होंने अपने परिवेश को अलग ही अंदाज में प्रस्तुत किया है। ‘उत्सव रंगीले’ गीत में वे – ‘लहू से लथपथ पड़े / उत्सव रंगीले’ की कटु सच्चाइयाँ सामने लाते हैं तो एक बेटी के जलाए जाने पर उनका मन इस तरह हाहाकार करता है - खाक हो कर रह गई / गाँव भर की / अस्मिता।

गीतकारों की भीड़ में अलग दिखने की कोशिश और गीतों के स्तर को उत्कृष्ट बनाए रखने के प्रयत्नों में डॉ. अभय सतर्क रहे हैं कि उनके प्रतीकों के सृजन मौलिक बने रहें और दोहराव से बचें भी। कविता के पाठकों को डॉ. अभय के ये नवगीत उनकी शैली की विशेषताओं- प्रांजल और मोहक भाषा, शब्दों के अनूठे और अर्थपूर्ण प्रयोग तथा इनके जरिए नवगीत बुनने के चमत्कार के कारण निश्चित ही प्रभावित करेंगे।
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