चंद्रमोहन भण्डारी की कविताएँ

चंद्र मोहन भण्डारी
 होली

नीला, पीला, लाल, हरा
और इन सबके साथ
वसंत का स्वागत करता -
वह प्यारा रंग – वसंती;
होली आ पहुँची, रंग में सराबोर;
हम, तुम, कुदरत चारों ओर।

होली आखिर हो ली, मन-प्राण सराबोर 
कुदरत के संग-संग, रंग रंगा हर कोई
आह्लादित पोर-पोर।

वक्त कितना बदल जाता है
जाने क्यों आज यह अहसास
घर कर जाता है?
जितनी जल्दी हो ले सब
उतना ही सुकून पहुँचाता है।

मन अभ्यंतर में कहीं
आस्था का उघड़ता पलस्तर
संवेदन की दीवारों को
बदरंग कर जाता है;
नीला, पीला, लाल, हरा
और वह प्यारा रंग वसंती 
अब नहीं कर पाता मन-प्राण सराबोर
नहीं दे पाता वह उल्लास 
जो कभी अंदर गहरे उतर जाता था;
अब तो बस रिसता जाता 
छलनी होती जा रही जमीन से
अंदर बदरंग कर बाहर छलक आता है
और मन को छोड़
बाकी सब रंगीन कर जाता है।
***
 

शून्य योग खेल

कैसा होता है वसंत?
पीली सरसों की बहार
कोयल की कूक, आम का ताजा बौर
हवा में एक अनोखी खनक
कुदरत में अद्भुत निखार।

अब क्यों नहीं आता वैसा वसंत
जिसका मुझे है इंतजार
वैसी ही हवा थी, पेड़ भी वही
न वो खनक थी, न निखार।

क्यों है ऐसा कि एक का वसंत
दूसरे का पतझड़ बनाता है?
एक का संभलना, दूसरे के लड़खड़ाने में
अर्थ पाता है?
एक का जोड़, दूसरे को घटाने से
जुड़ जाता है?

जिन्दगी, जुए की तरह
शून्य-योग-खेल बना दी हमने
कइयों के हारने पर ही
किसी की जीत होती है
कुछ की खुशियाँ दूसरों की 
बर्बादियों के बीज बोती है।

हमारा हमसफर वह जुगाड़ू इंसान 
ऐसी जुगाड़ क्यों नहीं कर पाता?
ऐसा क्यों नहीं हो पाता?
कि जो भी जुड़ता हो
वह सब में जुड़ता चला जाता  है। 
***


आज और कल

हमारा हाल  पूछते हो
अरे, बताएँ भी तो क्या?
रोज खुदता है कुंआ
तब जाकर पानी मिलता है।
आज  काम चल गया
क्या मालूम कल क्या हो?
खोदे  जाएँ, पर पानी ना हो;
जो भी हो, जाने दो
कल की कल पर छोड़ो
सिर्फ आज की बात करो
जितना चाहो, खोदे जाओ
ये और बात है 
धरती का पानी गुम हो रहा
जरूरतों का डायनोसौर
जिंदगी को छल रहा।
सिकुड़तीं वृक्ष छायाएँ, भरमाती मरीचिकाएँ
बढ़ती जाती जरूरतें, सिमटतीं आशाएँ
चिंता कैसे करें कल या परसों की?
आज सामने जो खड़ा
मुंह बाए, हाथ फैलाए
बड़ी उम्मीद से, टकटकी लगाए
अब आप ही बताओ
उसे खाली हाथ कैसे लौटा दें?
कल  की कल देखेंगे
वो चाहे लौटे, चाहे ठहर जाए।
***
 

कठिन होता है!

कठिन होता है संघर्ष, 
खासकर जब मूल्यों के लिये हो
आसान नहीं, चरण रोप लड़ना
संघर्ष जब खास अपनों से हो।

मुश्किल है अपनों का विरोध
वह भी सिद्धान्तों के लिये
इस से भी कठिन है
समझना – सिद्धान्तों को, यह भी कि
कौन से सिद्धान्त अपनाये जाने चाहिये?
कब, कहाँ कैसे युद्ध लड़े जाने चाहिये?

कैसा लगता है जब
अपनों से सीखे गये मूल्यों के लिये
उन्हीं के खिलाफ खड़े होना हो?
उन्हीं के घोषित युद्ध में
बागी करार दिया जाना, और तब
आस्था के दुर्ग की एक-एक ईंट
खिसकते हुए देखना;
अंतत: अपने अंदर की सारी पीड़ा छिपा
खुद को समझाना
कि जिन कारणों से युद्ध लड़ा गया 
पक्ष-विपक्ष का समीकरण 
जो समझा या समझाया गया 
समझ से एकदम परे था।

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