सम्बन्धबोध और सम्बन्ध-दायित्वों के निर्वहन की प्रेरणा देता उपन्यास: एकान्तवासी शत्रुघ्न

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

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पुस्तक: एकान्तवासी शत्रुघ्न (उपन्यास)
लेखक: अमिता दुबे
पृष्ठ: 124
मूल्य: ₹ 300.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2021
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर
ISBN: 978-93-90419-23-4
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हिन्दी साहित्य की समालोचना, कहानी, उपन्यास, काव्य और समीक्षा एवं बाल साहित्य आदि विविध विधाओं, में साधिकार लेखनी चलाकर ढाई दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखने वाली, प्रखर चिंतक एवं विदुषी, साहित्यकार डॉ.  अमिता दुबे का उपन्यास "एकान्तवासी शत्रुघ्न" उनकी तीसवीं कृति है।

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी सहित तीन दर्जन से अधिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत लेखिका एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की पत्रिका ‘साहित्य भारती’ एवं ‘बाल वाणी’ की सम्पादक, विदुषी डॉ. अमिता दुबे जी का उपन्यास एकान्तवासी शत्रुघ्न’ एक ऐसा उपन्यास है जो उन्होंने महामारी कोविड-19 के कारण तालाबन्दी के दौरान रचा है।

शत्रुघ्न के बहाने समस्त मानव जाति को सामाजिक एवं पारिवारिक सम्बन्धों में मधुरता की सलिला पुनः प्रवाहित करने का आह्वान करता हुआ यह उपन्यास सम्बन्धबोध और सम्बन्ध दायित्वों के निर्वहन की प्रेरणा देता प्रतीत होता है।

 पौत्र अतुल्य की बाल जिज्ञासाओं को शान्त करने के लिए दादी सुगन्धा द्वारा  दिए गये उत्तरों के रूप में बुना गया यह उपन्यास आगे और आगे पढ़ते जाने पर पाठक वर्ग को विवश करता हुआ धारा प्रवाह रूप में आगे बढ़ता है।

रामकथा के विभिन्न पात्रों के बीच शत्रुघ्न की उपेक्षा ने लेखिका के अन्तर्मन को सदैव विकल किया है परिणाम स्वरूप उन्होंने अनेक साहित्यकारों की कृतियों का मंथन कर नवनीत के रूप में उपन्यास ‘एकान्तवासी शत्रुघ्न’ की रचना की है।

लेखिका ने पूरी रामायण के सभी पात्रों  और हर परिस्थिति में उनके चरित्रों /आचरणों का उपन्यास में धीरे-धीरे सहज रूप से पुर्नउल्लेख करके पौत्र अतुल्य के बालमन पर सामाजिक एवं पारिवारिक सुसंस्कारों की नींव स्थापित  करने का कार्य किया है।

राम-सीता और लक्ष्मण के वनवास चले जाने पर तथा राम के वियोग में राजा दषरथ द्वारा प्राण त्यागने पर भरत और शत्रुघ्न जब अपनी ननिहाल से लौटकर आते हैं तो माँ के आचरण का पता चलने पर, भरत परिवार एवं अयोध्यावासियों को लेकर श्री राम को बन से वापस लाने के प्रयास के विफल हो जाने पर श्रीराम की चरण पादुकाओं को राज सिंहासन पर रखकर, स्वयं नन्दिग्राम में 14 वर्ष तक वनवासियों की भाँति रहे।

"... किन्तु शत्रुघ्न ने भी तब तक राजमहल में भोजन नहीं किया। वे भरत की भाँति ही कन्द, मूल, फल का सेवन करते रहे। वे अपने तीनों भाइयों की भाँति तपस्वी वेश में तो नहीं रह रहे थे परन्तु उनका मन वनवासी ही था, उनका भोजन वनवासी की भाँति था, उनका शयन भी वनवासी की भाँति ही था। ... इसलिए भरत के विश्राम करने जाने के उपरान्त वे एक पत्थर की शिला पर कुछ घण्टे विश्राम करते और प्रातः होने से पूर्व ही नगर की सीमाओं की चौकसी हेतु निकल पड़ते। .....जो काम श्रीराम के साथ लक्ष्मण कर रहे थे वही कार्य अयोध्या के राजमहल में रहने वाले शत्रुघ्न कर रहे थे।" (पृष्ठ-35-36)

भरत भी इस बात को स्वीकारते हैं तभी तो उन्हें शत्रुघ्न से कहना पड़ा, "... तुम्हारे कारण ही तो मैं भैया श्री राम की अमूल्य निधि उनका विश्वास सहेज पा रहा हूँ अगर तुम मेरे पास नहीं होते तो मैं इस विशाल साम्राज्य का भार अपने कंधों पर कैसे उठा पाता।" (पृष्ठ-38)

लेखिका डॉ. अमिता दुबे जी ने अपने इस उपन्यास के माध्यम से शत्रुघ्न के त्याग को बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध किया है उनका कहना है कि-"श्री राम तो पिता के वचन का पालन करने के लिए वनवासी बने थे, लक्ष्मण राम के अनुगामी थे इसलिए वन में थे। भरत अपनी माता कैकेयी के कुकृत्य का समाहार करने के लिए नन्दीग्राम में थे परन्तु शत्रुघ्न को तो राजमहल का सुख प्राप्त था। वे न तो किसी वचन से बंधे थे, नहीं उन्हें अपनी माता के कुकृत्यों के लिए पश्चाताप करना था। वे राजभवन में राजसी वस्त्रों में भी वीतरागी की भाँति जीवन जी रहे थे।" (पृष्ठ-46)

दिनेश पाठक ‘शशि’
इतना ही नहीं शत्रुघ्न ने चौदह वर्षों तक अपनी पत्नी श्रुतिकीर्ति तक की ओर नहीं देखा। 14 वर्ष बीत जाने पर जब उन्हें श्रीराम के आगमन की सूचना मिली    तब वह इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने उनके आगमन की सूचना श्रुतिकीर्ति को दी तो श्रुतिकीर्ति भी सुखद आश्चर्य में पड़ गईं, "श्रुतिकीर्ति को सहसा अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। प्राणनाथ ने आज उन्हें ठीक चौदह वर्ष बाद ‘प्रिये’ से सम्बोधित किया। मेरी ओर एक दृष्टि भी डाली है, मेरे सौभाग्य का उदय हो गया।" (पृष्ठ-57)

विद्वान लेखिका  उपन्यास में शत्रुघ्न के 14 वर्ष तक बिताये वीतरागी, त्यागी चरित्र को,  पूर्णरूपेण उकेरने में तो सफल रही ही है साथ ही उन्होंने माता-पिता और गुरुजनों के आशीर्वाद तथा भारतीय संस्कृति में एवं कर्मगति में विश्वास को दृढ़ करने का भी प्रयास किया है। उर्मिला की दषा एवं दृढ़ विश्वास को रेखांकित किया है तो सीताजी के बहाने समस्त नारी जाति के गुणों का बखान भी किया है। इतना ही नहीं भ्रातृ प्रेम, श्रुतिकीति, कौशल्या एवं कैकेयी की मनोदशाओं का क्रमिक रूप से चित्र उपस्थित किया है। वहीं राम की विनम्रता, कैकेयी का प्रलाप, राम, भरत, कौषल्या, माण्डवी और उर्मिला द्वारा शत्रुघ्न की प्रशंसा भी अद्भुत शब्दों में कराई है। जो शत्रुघ्न के चरित्र को दृढ़ता प्रदान करते हैं-

"शत्रुघ्न के कारण हम जी सके बेटा राम। अन्यथा तुम तीनों की प्रतीक्षा में हमारी आँखें तो पथरा जातीं।" सुमित्रा ने आँसू पौंछते हुए कहा।

"माँ, शत्रुघ्न भैया के कारण मैं भी यह कठिन समय बिता सकी।" उर्मिला ने कहा। ... माण्डवी ने भी शत्रुघ्न की प्रशंसा करते हुए कहा, "माता शत्रुघ्न भैया तो हमारे सेतु बने। उन्होंने हम सभी परिवारीजनों के मध्य गतिविधियों को प्रचारित किया और जहाँ कहीं भी निराशा का आधिक्य था वहाँ आशा का संचार करते रिपुसूदन।" (पृष्ठ-67)

इस प्रकार रामकथा के विभिन्न पात्रों के बीच शत्रुघ्न की उपेक्षा को भूलकर उपन्यास का पाठक रिपुसूदन यानि शत्रुघ्न के सभी सकारात्मक पक्षों से भिज्ञ होता है और स्वाभाविक रूप से शत्रुघ्न को नमन करने पर बाध्य होता है। यही इस उपन्यास की सार्थकता है।

कुल मिलाकर उपन्यास की भाषा-शैली सहज-सरल और आकर्षक है। पूरे उपन्यास में प्रवाहमयता है। मुद्रण साफ-सुथरा है। हिन्दी साहित्य जगत में उपन्यास ‘एकान्तवासी शत्रुघ्न’ का सर्वत्र स्वागत होगा, ऐसी  आशा है।

3 comments :

  1. वाह! अत्यंत सुंदर, हर्ष समीक्षा, हार्दिक बधाई।

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  2. सुंदर समीक्षा हेतु उपन्यास लेखिका डॉ अमिता दुबे जी व समीक्षक डॉ दिनेश पाठक'शशि'जी को हार्दिक बधाई।

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