दो कविताएँ: प्रकाश मनु

(1) एक दिन जब सोकर उठूँगा

एक दिन जब सोकर उठूँगा
तो यह कमरा नहीं होगा न घर...घर की
दीवारें
तकिए के नीचे तहाकर रखी लिखी-अनलिखी
कविताएँ नहीं
सिर के नीचे न होगा अपना हाथ
न आँखों में उनका प्रकाश
जिनकी स्मृतियों में जीता हूँ जागता
न शरीर में लोच और कुछ करने का माद्दा।

एक दिन जब सोकर उठूँगा
तो नहीं होगा घर भर में चीं-चीं करती किताबों 
का मीठा गुंजार
नहीं होंगी बड़की बेटी की बनाई
चक्की पीसती कर्मलीन औरतें
नहीं होगी बगल में रखे स्टूल पर
किसी मीनार की तरह अगड़म-बगड़म रखी किताबों
और पत्रिकाओं का चुप-चुप सा शोर।

नहीं होगी ट्रेड फेयर से लाई गई
जूट की जिंदादिल चिड़िया
जिसका रंग उतर गया पर अब भी जो
मुसकराती है दरवाजे पर
वक्त के आर-पार भरती हुई निर्भीक उड़ानें।

एक दिन जब सोकर उठूँगा
तो नहीं सुनाई देंगी हवा में घुलती सी
कहीं दूर-पास करछुल चलाने मसाला पीसने और नाश्ता
परोसने की धीमी-धीमी सी गुनसुन आवाजें
सदियों पुराने किसी आस्वाद भरे गीत सी
कभी घर तो कभी अड़ोस-पड़ोस से आतीं छन-छनकर
ज्यादा साफ न सही, पर जिनसे फिर भी 
एक अनछुआ सा घरेलू रिश्ता है आत्मा का।

एक दिन जब सोकर उठूँगा
नहीं होगा यह सब और वह सब
और कहीं कुछ भी नहीं...

नहीं सुनाई देंगी आकाश और 
पृथ्वी के उर से आती धड़कती आवाजें
जिनमें तमाम लंबे अनुभवों का ताप और थरथरी है
नहीं महसूस होगी धरती से और वातास से आती ऋतुवर्णी गंध
नहीं होगी आसपास संतुष्ट चेहरे वाली पत्नी
और तेजी से समझदार होती बेटियों
के स्नेह और आग्रहों की उष्मा...

नहीं होंगी सुबह-सुबह अखबार वाले और दूध वाले
और प्रेस वाले की हिलकारती आवाजें
और न दरवाजे पर रोटी की प्रतीक्षा में
देर तक बैठा रहने वाला भूरा कुत्ता
कौओं की रसिक मंडली, चिड़ियाँ, तोते और एक लँगड़ी गौरैया।

एक दिन सोकर उठूँगा और
खाली...
सब कुछ खाली होगा भीतरी कोठार में
न बची होगी
स्मृतियों की दुनिया में
कोई गंध
कोई चेहरा
कोई पहचान...।

और सब कुछ देखकर तब
सब कुछ पर एक आखिरी नजर डाल
आखिरी नजर से देख अपने ममत्व
और ‘पर’ का उजाड़
मैं आँखें मूँदूँगा सचमुच सुकून से

कि यों ही खुद-ब-खुद मुँदेंगी आँखें
और मैं बची हुई साँसों के पिंजर को
भीतर ही भीतर समेटता हुआ
तोड़कर सारे संबंध इससे उससे सबसे
और छोड़कर धागे उलझे हुए रिश्ते-नातों के 
जस के तस,
चल दूँगा उस दुनिया की ओर
जहाँ जाकर कोई लौटता नहीं!
*


(2) यों ही चलते-चलते

यों ही चलते-चलते मिल गया था कुछ
गेंदा फूल में गेंदा फूल की घरेलू गंध की तरह मुसकराता
मेरे हाथ पर रखा उसने अपना ऊष्मा भरा हाथ
और मेरे गाल सुर्ख हो गए थे

उसे जिंदगी में जिंदगी के मानी की तरह सहेजा था मैंने

यों ही चलते-चलते फिर वह खो गया एक दिन
फूल में फूल के नूर की तरह
जो था सबसे बेशकीमती खजाना मेरा 

वह जो मिला था एक दिन 
चलते-चलते
फिर चलते-चलते ही खो गया न जाने कब कहाँ किस
बेछोर दुनिया में गुम हो जाने के लिए

यों ही चलते-चलते मिलता गया खोता गया
बहुत कुछ
यहाँ तक कि खो गई मेरी भाषा मेरी जुबान भी

यों ही चलते-चलते आ गया हूँ ऐसी जगह
जहाँ इतने रास्ते खुलते हैं कि मैं
भूल ही गया अपने घर की राह
यों ही चलते-चलते पहुँच जाऊंगा ऐसी जगह
जहाँ से आगे न होगी कोई राह

भूल जाऊंगा क कबूतर वाला वह कैदा जो सीखा बचपन में
भूल जाऊंगा कविता और कहानियों के ढाई आखर
भूल जाऊंगा किसी से मिलने बतियाने के तौर-तरीके
भूल जाऊंगा सभ्यता के भीतरी और बाहरी लिबास
और चलूँगा बस चलता चला जाऊंगा

कोई पूछेगा रोककर रास्ते में कि तुम्हारा नाम क्या है प्रकाश मनु
और मैं भूल जाऊंगा कि मेरा ही तो नाम है प्रकाश मनु

मैं अचकचाई नजरों से देखूँगा और आगे चल दूँगा

चलते-चलते भूल जाऊंगा एक दिन मैं साँस लेना
भूल जाऊंगा दोस्तों और दुश्मनों के पते
डाकखाने में चिट्ठी छोड़ना...
मोबाइल फोन की घंटी पर फोन उठाना
भूल जाऊंगा कि मैं जिंदा हूँ या मरा
और फिर एक दिन मरकर मैं फिर से एक दिन मर जाऊंगा।
*

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।