प्राचीन मान्यताओं एवं वैदिक व पौराणिक सन्दर्भों की व्याख्या और भक्ति, समर्पण, उपासना, नीति सभी का निचोड़ प्रस्तुत करता संग्रह- दोहायन

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 941 272 7361; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

पुस्तक: दोहायन (दोहा संग्रह)
लेखिका: डॉ. शशि तिवारी
पृष्ठ: 40
मूल्य: ₹ 100.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2018
प्रकाशक: राखी प्रकाशन, आगरा-282002


राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत/सम्मानित, हिन्दी, संस्कृत, ब्रजभाषा एवं उर्दू में साधिकार लेखनी चलाने वाली, प्रखर चिंतक, शिक्षाविद् एवं विदुषी, साहित्यकार, संगीत, अभिनय, चित्रकला और समाज सेवा, सभी में प्रवीण डॉ. शशि तिवारी की कृति दोहायन पढ़ने का सौभाग्य मिला।

दोहा लेखन डॉ. शशि तिवारी का प्रिय विषय है। आपने बचपन से ही घर के वैश्णव वातावरण में उच्च पारिवारिक संस्कारों को आत्मसात किया है परिणामतः उनकी लेखनी से दोहों के रूप में भक्तिभाव, उपासना, समर्पण और परब्रह्म परमेश्वर के अलौकिक रूपों का दिग्दर्शन होता है।

दिनेश पाठक ‘शशि’
भारतीय संस्कृति का पालन करते हुए पुस्तक का प्रारम्भ मंगलाचरण के 10 दोहों से किया गया है। जिसमें सर्वप्रथम गणपति का स्मरण किया गया है-
‘प्रथम नमन है आपको, हे गणपति भगवान
सब देवों में आपका, सर्वोपरि सम्मान। (पृष्ठ-1)

ईश्वर के बाद लेखिका ने माता-पिता का स्थान निर्धारित किया है। माता-पिता शीर्षक से आठ दोहों का निष्कर्ष भी यही है कि मनुष्य मात्र के जीवन में माता-पिता का स्थान कोई नहीं ले सकता है। उनका आदर-सत्कार ही कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है-
‘तीरथ-तीरथ क्यों गये, मिला न मन का चैन।
चाहो तीरथ देखना, झाँको माँ के नैन। (पृष्ठ-2)

माता-पिता के साथ ही भवसागर को पार करने के लिए सद्गुरु का साथ जरूरी है। बिना गुरु के जीवन की राहें सहज ही पार नहीं की जा सकतीं। गुरु के प्रति जिसका जितना समर्पण भाव होता है, उसके जीवन की राहें भी उतनी ही सुगम हो जाती है-
‘श्रीगुरुवर में भक्ति का, जीवन-सिन्धु समाय।
जे डूबे जितना अधिक, वह उतना तर जाय। (पृष्ठ-3)

ई्रश्वर सर्व ज्ञाता, सर्व व्यापक है। वह हजार दुष्टि से सबके कर्मों का लेखा-जोखा रखता है, ऐसा लेखिका का अटूट विश्वास है-
‘हरि बोलो दिन रात ही, बेड़ा होगा पार।
दृष्टि रखे हर कर्म पर, हरि के नयन हजार। (पृष्ठ-4)

पुस्तक में अन्य खण्डों में- श्री राम के अन्तर्गत 78 दोहे, जै सिया-राम के अन्तर्गत 19 दोहे, जय हनुमान और तुलसीदास के अन्तर्गत क्रमशः 5 और 6 दोहे, राम-श्याम शीर्षक से 21 दोहे, ओउम नमः षिवाय और ज ैश्रीकष्ण के अन्तर्गत 10-12 दोहे समाहित किए गये हैं।

राधा-श्याम शीर्षक के अन्तर्गत जहाँ10 दोहे दिए गये हैं वहीं केवल ‘राधा’ शीर्षक के अन्तर्गत विदुषी लेखिका ने राधा थी भी या नहीं? राधा नाम कैसे? पर बहुत ही विद्वतापूर्ण शोध परक विष्लेषण अनेक वेद, पुराण, प्राकृत पैगलम्, गाथा सप्तषती, गीत गोविन्दम् आदि के तथ्यों के आधार पर किया है जो प्रणम्य है। निष्कर्षतः लेखिका का मानना है कि -
‘व्यक्ति नहीं वह शक्ति है, जो राधा कहलाय।
वह मिलती जब कृष्ण से, आल्हादिनि हो जाय।

 तथा-
लोक हृदय में बस गया, राधा का जो रूप।
प्रेम-समर्पण का हुआ, वह पर्याय अनूप। (पृष्ठ-25)

देवी माँ शीर्षक से 8 दोहों के बाद लेखिका ने प्रेम दीवानी मीरा के प्रेम को 10 दोहों के माध्यम से उद्घाटित किया है। जब प्रेम की बात चले तो वात्सल्य रस के सम्राट सूर का नाम कैसे छोड़ा जा सकता है। विदुषी लेखिका डॉ. ष्शषि तिवारी जी ने सूर शीर्षक से 12 दोहे इस पुस्तक में समाहित करके उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित किए हैं-
‘कृष्ण-राधिका के नयन, बसैं सदा दिन-रैन।
सूरदास का भाग्य जो, बसे कृष्ण के नैन। (पृष्ठ-28)

भक्ति के पर्याय चैतन्य महाप्रभु के जीवन चरित्र को उद्घाटित करते 11 दोहों में डॉ. ष्शषि तिवारी जी ने साक्षात् रेखाचित्र उपस्थित कर दिया है जो अद्भुत हैं-
‘राधा बन अनुभव किया, मन में कृष्ण वियोग।
‘कृष्ण-नाम’ के नाम से प्राप्त हुआ संयोग। (पृष्ठ-29)

भक्ति भाव से इतर पुस्तक में 23 दोहे नीतिपरक 10 दोहे देशभक्ति परक 35 दोहे राजनीति परक हैं तो 11 दोहे हिन्दी की महत्ता को सिद्ध करने वाले भी हैं। विदुषी लेखिका ने अत्यन्त शालीनता के साथ श्रृंगार रस के संयोग और वियोग दोनों ही पक्षों को 36 दोहों में समाहित किया है-
‘मैं तुम हो, तुम मैं हुए, यह अद्भुत संजोग।
लेाग भले देते रहें, चाहे जो अभियोग।’ (पृष्ठ-37)

और अन्त में विविध शीर्षक के अन्तर्गत 11 दोहों में जीवन का सार प्रस्तुत करते हुए लेखिका कहती हैं-
‘दो दिन की है जिन्दगी, दो ही रखो उसूल।
संघर्षों के शूल हों, कत्तव्यों के फूल।’ (पृष्ठ-40)

चालीस पृष्ठीय इस पुस्तक में कुल 400 दोहे समाहित किए गये हैं। एक से एक उत्कृष्ट दोहा धारा प्रवाह अजस्र अमृत-धारा बहाता सा प्रतीत होता हैं। आवरण नयनाभिराम है। मुद्रण साफ-सुथरा, त्रुटिहीन है।

2 comments :

  1. दिनेश पाठक जी की समीक्षा को पढकर दोहायन पुस्तक को पढने की तीव्र उत्सुकता जाग्रत हुई है क्योंकि उन्होंने अपनी समीक्षा में हर दोहे को इतने विस्तृत रूप से समझाने का प्रयास किया है कि दोहो को पूर्ण रूप से पढने का मटन हर पाठक का करेगा और बार इस पुस्तक को अवश्य ही पढना चाहिए

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  2. वाह! विदुषी दोहाकार डॉ शशि तिवारी की दोहायन की उत्कृष्ट समीक्षा हेतु दोहाकार डॉ शशि तिवारी एवं समीक्षक साहित्य गौरव डॉ दिनेश पाठक'शशि' जी को हार्दिक बधाई।
    आचार्य नीरज शास्त्री

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