कोरोनाकाल की त्रासद स्थितियों से गुजरते मानव की मानसिक स्थिति का आयना दिखाता, सकारात्मक दृष्टिकोण की स्थापना करता उपन्यास- कितने धूमकेतु

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

पुस्तक: कितने धूमकेतु (उपन्यास संग्रह)
लेखिका: पद्मश्री डा. उषा यादव
पृष्ठ: 178
मूल्य: ₹ 450.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2020
ISBN: 978-93-81130-95-7
प्रकाशक: यश पब्लिकेशंस, नवीन शाहदरा, दिल्ली-32

हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में साधिकार लेखनी चलाने वाली, प्रखर चिंतक, शिक्षाविद् एवं विदुषी, साहित्यकार पद्मश्री डा.उषा यादव का उपन्यास "कितने धूमकेतु" कोरोनाकाल की त्रासद स्थितियों से रूबरू कराता मानव की मानसिक स्थिति, सामाजिक एवं पारिवारिक सम्बन्धों के बदलते समीकरण और मानवता को सर्वोच्च सिद्ध करता एक उत्कृष्ट उपन्यास है।

उपन्यास के नायक नब्बे वर्षीय रामरतन जी अपनी विशाल कोठी में एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। रामरतन जी का पुत्र उच्च पुलिस अधिकारी है जो अपने परिवार सहित दूसरे शहर में रहता है। जब कोरोना महामारी के कारण, सभी व्यापार ठप्प हो रहे हों, त्यौंहार, त्यौहार जैसे न बचे हों, भोजन-पानी की व्यवस्था करना भी कठिन हो रहा हो। पूरे विश्व में त्राहि-त्राहि मची हो ऐसे में एक एकाकी वयोवृद्ध की क्या मानसिक स्थिति होगी, डॉ उषा यादवजी ने इसका बहुत ही मार्मिक चित्र उपस्थित किया है।
दिनेश पाठक ‘शशि’
एक ठेली वाले से सब्जी खरीदने के कारण रामरतन जी स्वय कोरोना संक्रमित हो जाते हैं। गत पन्द्रह वर्ष से जिस पुत्र ने अपने पिता के जीने-मरने के बारे में भी न पूछा हो, उसको इस संक्रमण के विषय में बताने का औचित्य वे नहीं समझते अतः अस्पताल से सम्पर्क करके अपनी कोठी पर ही आइसोलेशन एवं किसी देखभाल वाले की सवेतन नियुक्ति की प्रार्थना करते हैं किन्तु अपनी जान जोखिम में डालना किसे अच्छा लगेगा।

वृद्धावस्था में एकाकीपन की पीड़ा और सन्तति द्वारा अवहेलना की ओर सहज ही इशारा करते हुए विदुषी लेखिका ने लिखा गया है-

‘प्रदीप शायद पहले जैसा स्नेही-आज्ञाकारी पुत्र नहीं रह गया था। चालीस वर्ष के उस पुलिस अधिकारी ने पिछले बारह सालों से सपरिवार स्वतंत्र जीवन जीने की जो आदत डाल ली थी, उसमें पिता के लिए कोई कोना नहीं था।’ (पृष्ठ-19)

उन्होंने भी पंद्रह सालों में अपनी कोई समस्या उसे नहीं बताई। छोटी सी ठेस संवेदनशील मन को कितना वीतराग बना देती है, इसे उनसे बेहतर कौन जान सकता है। (पृष्ठ-20)

इतना ही नहीं वर्तमान पीढ़ी द्वारा अनेक परिवारों में अपने वृद्ध माता-पिता के प्रति धृष्टता की सीमा तक पहुँचते व्यवहार और स्वार्थपरता ने भी लेखिका को आहत किया है तभी तो रामरतन जी की पीड़ा के माध्यम से उन्होंने उसे अभिव्यक्ति दी है। रामरतन जी द्वारा पुत्र के पुलिस विभाग में एक सीनियर ऑफीसर होने के कारण उसके पास जाने की इच्छा जाहिर करते ही पुत्र भड़क उठता है।

‘आप पागल हो चुके हैं क्या?’-उधर से शेर दहाड़ा था। ‘हमारे दोनों बेटे मैनेजमेंट की पदाई के सिलसिले में यू.एस. में फँसे हैं। हमें उनको किसी तरह इण्डिया बुलवाने की चिंता है और आपको अपनी पड़ी है।’ (पृष्ठ-66)

‘पीड़ा को रोटी के निवाले की तरह चबा गये थे। आँसुओं को पानी की तरह पी गये थे। मन ही मन सोच लिया था, क्या जो लोग निपूते होते हैं, इस दुनिया में जिन्दा नहीं रहते?’(पृष्ठ-67)

 आखिरकार मयंका नाम की कम उम्र की एक नर्स उनकी सेवा करने की सहमति देती है। वे मयंका के इस साहस और पूरे आइसोलेशन पीरियड में एक माँ जैसी देखभाल से अचम्भित और अभिभूत हैं। पूरी तरह ठीक हो जाने के बाद रामरतन जी मयंका की सेवा के बदले उसे कुछ लाख रुपये देना चाहते हैं जिन्हें मयंका -‘यह मेरा कर्तव्य था’ कहकर किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करती।

कोरोना के कारण सभी तरह के व्यापारों का ठप्प होना, त्यौहारों का फीका पड़ता रंग, गरीब आदमी की अपनी-अपनी मजबूरियाँ, अपने-अपने घरों को जाते मजदूरों की दयनीय दशा और शिक्षक एवं चिकित्सकों के बदलते रूप के साथ ही सावधानी के बावजूद कोरोना वारियर्स की पारिवारिक समस्याओं का, पारिवारिक महिलाओं का कोरोना वारियर्स की भाँति योगदान आदि का विस्तृत विवेचन भी बड़ी ही शालीन भाषा का प्रयोग करते हुए विदुषी लेखिका डॉ उषा यादव जी ने उपन्यास में किया है। उपन्यास में लेखिका ने जहाँ कोरोना और कोरोना मृत्यु की भयावहता का डरावना दृश्य उपस्थित किया है वहीं बीच-बीच में देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लाइव संदेशों के माध्यम से दी गई राहत का भी उल्लेख उन्होंने निष्पक्ष रूप से किया है।

‘प्रधानमंत्री का एक-एक शब्द जैसे संजीवनी था, जो रामरतन के भीतर अनूठी जिजीविषा भर गया। सिर्फ उनके भीतर ही क्यों, समूचे देश में ऊर्जा का संचार कर गया था।’ (पृष्ठ-122)

उपन्यास के माध्यम से लेखिका, अवसरवादी प्राइवेट अस्पतालों की अनैतिक लूट की ओर इशारा करना भी नहीं भूली हैं-

‘ठीक कहते हो। सरकारी जांच विश्वसनीय है। वैसे प्राइवेट हास्पिटल इस समय कोरोना काल को स्वर्णिम अवसर मानकर सोने की फसल काटने की जो प्रवृत्ति दिखा रहे हैं, वह लज्जाजनक ही नहीं निंदनीय भी है।’ (पृष्ठ-155)

रामरतन जी कोरोना से युद्ध लड़कर मृत्यु के मुँह से वापस आये तो जीवन और देश के प्रति उनकी विचारधारा ही बदल गई। उन्होंने मयंका से प्रार्थना की कि वह एस.एन.मैडीकल काॅलेज के प्राचार्य तक मेरी बात पहुँचा कर इस विशाल कोठी को आइसोलेशन केन्द्र बनाने की स्वीकृति दिला दो तो अंतिम सांस तक अहसानमंद रहूँगा।

उनकी बात सुनकर मयंका मुस्करा दी तो रामरतन चैंके और हँंसने का कारण पूछा।

लेखिका ने मयंका के उत्तर से भारतीय संस्कृति का मुख्य गुण-‘विनम्रता’ को बहुत ही मोहक रूप से स्पष्ट किया है। मयंका ने कहा-

‘भारतवर्ष की सांस्कृतिक गरिमा देखकर नतमस्तक हूँ यही यहाँ की उदात्त परम्परा है। परोपकार को इतने विनत भाव से किया जाता है, जैसे हाथ फैलाकर भीख मांगी जा रही हो।....सर आप महान हैं। मैं आपके पैर छूती हूँ।’ (पृष्ठ-174)

उपन्यास का समापन, विदुषी पद्मश्री डा.उषा यादव जी के सकारात्मक सोच को अभिव्यक्ति प्रदान करता है-

‘कोरोना से दो-दो हाथ करने में जब आगरा का तेईस दिन का एक नवजात जीत सकता है, नब्बे साल का बुजुर्ग जीत सकता है, तो आज न सही कल, कोरोना की विदाई तय है। चाहे कितने धूमकेतु हों, एक अकेला सूरज सबका दमन करने में सक्षम है। (पृष्ठ-177)

178 पृष्ठीय इस उपन्यास का मुद्रण त्रुटिहीन और साफ-सुथरा है। भाषा सहज, सरल और शैली की प्रवाहमयता पाठक को पूरा उपन्यास पढ़ते चले जाने पर बाध्य करती है। हिन्दी साहित्य जगत में उपन्यास प्रसिद्धि के शिखर छूने में सफल होगा, ऐसी आशा है।

1 comment :

  1. कितने धूमकेतु जिन्दगी के वास्तविक रूप को दर्शाता एक सफल उपन्यास है दिनेश शशि जी ने अपनी समीक्षा में उपन्यास के हर पहलू को उजागर किया है जिससे यह. प्रतीत होता है कि यह उपन्यास निश्चित ही पाठक के मन को बाधे रखने में सफल होगा

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