कहानी: एक और मोहित

हरदीप सबरवाल

पंजाबी यूनीवर्सिटी से सनातकोत्तर हरदीप सबरवाल की रचनाएँ विभिन्न ऑनलाइन और प्रिंट पत्रिकाओं और कुछ समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई है। अंग्रेज़ी काव्य संग्रह फेसलैस, तथा कहानी संग्रह एक ख्वाब की मौत ईबुक के रूप में प्रकाशित हो चुके हैं। अब तक 6 सांझा संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित। प्रतिलिपि कविता सम्मान 2019 से सम्मानित

“यार ये स्कूटर का गियर कितनी देर बाद बदलना होता है?”, मेरे पूछते ही मेरे दोनों बेस्ट फ्रेंड्स जोर से हँसने लगे, और काहे के बेस्ट फ्रेंड्स जब देखो तब खिल्ली उड़ाने के मौके खोजते रहते। उस वक़्त वेस्पा के नए स्कूटर आए थे मार्केट में, उन दोनों ने एक जैसे स्कूटर लिए, ब्लैक कलर के, मेरे पास एक खटारा साइकिल थी, जिसका अगला टायर बिल्कुल घिस गया था, उसे देख कर वह मजाक करते, “लोगो का सर गंजा होता है और तेरी साइकिल का टायर “, वह अभी भी हँस रहे थे, खिसियाया सा मैं भी उस हँसी में शामिल हो गया। उस वक़्त मोहित हमारे पीछे ही बैठा था। वह भी हँसी में साथ देने आ गया। अमूमन जैसा होता है सीनियर स्कूल में, बच्चों के ग्रुप से बन जाते हैं। इलीट क्लास के बच्चों का अलग ग्रुप, और हम जैसे मिडिल क्लास के बच्चों का अलग ग्रुप, मोहित भी हमारे ग्रुप में ही था। आम तौर पर इन ग्रुप्स छोटे ग्रुप्स भी होते है, जैसे मैं और मेरे तीन बेस्टी, हम में से ज्यादातर को माता-पिता ने जबरदस्ती साइंस दिलवाई थी, आधे से ज्यादा साइंस पढ़ने में दिलचस्पी नहीं रखते थे, हिंदी, पंजाबी माध्यम से दसवीं पास करने वाले हम जैसों के लिए तो ये जंजाल ही था, मैं अब थोड़ा एडजस्ट कर रहा था, पर बहुत से लड़के नहीं कर पा रहे थे, मोहित भी उनमें से एक था। अगले दिन वह स्कूटर ले आया। बजाज का चेतक स्कूटर, “चल तुझे स्कूटर सिखाऊँ”, उसने मुझसे कहा।

और हम पाँच छह लड़के स्कूल के साथ लगते एक बड़े से मंदिर में गए, जहाँ हम अकसर जाते थे। मंदिर के अंदर बहुत अच्छी सड़क बनी थी और सुनसान ही रहता था, स्कूटर सीखने का सही स्थान।

“गियर स्पीड के हिसाब से बदलना होता है”, मोहित ने मेरे कान में बताया।

  पहले गियर में डालते ही मैंने जोर से रेस दे दी, स्कूटर मंदिर की दीवार में लगते लगते बचा। पर फिर संभाल लिया, और दो तीन राउंड चलाया।

“तूने ठीक चलाया, मैंने पहले दिन इतना अच्छा नहीं चलाया था” मोहित ने कहा।

बाकी दोस्त भी अपने अपने पहले दिन के अनुभव बताने लगे। पर स्कूटर मैंने सही में चलाया, इसके छह साल बाद, जब अपना स्कूटर लिया।

   मोहित मेरा ज्यादा करीबी दोस्त नहीं था, मैं उसके घर दो बार गया था शायद, और मेरे घर वह कभी आया हो याद नहीं आ रहा। वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान था। उसके माता पिता दोनों सरकारी नौकरी में थे। फिर भी वह किसी एंगल से बिगड़ा हुआ नहीं था। इस बीच क्लास में एक नए लड़के लवदीप ने एडमिशन ली। वह मोहित के घर के घर के पास ही रहता था, साथ आने जाने की वजह से दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई।

     सीनियर स्कूल पास करते ही सब अलग अलग कॉलेज में एडमिशन ले नए रास्तों पर चल दिए। मैंने बीएससी में एडमिशन लिया। मेरा एक बेस्ट फ्रेंड् शहर के नामी इंजीनियरिंग कॉलेज में चला गया तो दूसरे ने आर्ट्स के साथ आगे पढ़ने का फैसला किया। मोहित ने मेरे कॉलेज में ही बी ए में एडमिशन लिया, वह और लवदीप अकसर मुझे साइंस और आर्ट्स ब्लॉक के बीच वाले कॉरिडोर में मिल जाते।

“ड्रेस सेंस बढ़िया हो गया है तेरा, और सेक्सी पोज बना कर चलता है, किसी लड़की के चक्कर में है क्या?”, एक दिन मोहित ने पूछा, “साइंस ब्लॉक में लड़कियाँ भी एक से बढ़ कर एक है”

   मैं सिर्फ मुस्कुरा ही सका जवाब में।

   इन दिनों मेरी दोस्ती पुराने स्कूल के लंबे तगड़े लड़के परमिंदर से हो गई थी, जो मेरी क्लास में ही था, कुछ और नए दोस्त भी बन गए थे। पंद्रह एक दिनों बाद परमिंदर ने मुझसे कहा, “किसी ने सैंडी की बहन को छेड़ा है, बदतमीजी भी की, सैंडी ने मुझसे कहा कि उस लड़के को पीटना है कल, मैंने हामी भर दी, पर बाद में पता चला कि वह लड़का मोहित है, अब मुझे जाना ही पड़ेगा उसकी पिटाई करने”

“पर, मोहित! यकीन नहीं होता, कुछ गलतफहमी होगी यार, तुझे नहीं जाना चाहिए”
“सैंडी बता रहा था उसने गालियाँ भी दी, यार अब मुझे जाना ही होगा सैंडी के साथ, वह तुझे भी आने को कह रहा है, कल सुबह रास्ते में पकड़ेंगे उसे”।
“मैं कल कॉलेज नहीं आ रहा”, मैंने अपना फैसला लिया। फिर भी मोहित के लिए दुख हो रहा था। इधर मेरे क्लास मेट भी सभी इंटेलिजेंट स्टूडेंट थे, लड़ाई झगडे वाले नहीं, उनकी बात में भी कोई सच्चाई होगी ही।
     चार दिन बाद रीडिंग रूम जाने लगा तो कैंटीन के पास खड़ा मोहित नजर आया, न जाने क्यों अपने आप में अपराध बोध महसूस होने लगा, नजरे बचा कर निकलने लगा कि उसकी आवाज आई, “हाँ हाँ तू भी निकल जा मुँह फेरकर।“
“तूने ठीक नहीं किया, उस लड़की को छेड़ कर और बदतमीजी कर के यार”, मैंने कहा।
“मैंने किसी को नहीं छेड़ा, सिर्फ प्रपोज किया था”, वह बोला।
“एक ही बात है, और फिर वह तुझे पसंद नहीं करती” उन दिनों प्रपोज करना भी छेड़ना ही माना जाता था।
“नहीं करती तो न करे, मुझे वह अच्छी लगती है, मैंने उसे बता दिया, उसे नहीं पसंद तो न सही, कोई जबरदस्ती थोड़ी है, प्रोपोजल स्वीकार करे या नहीं, उसकी मर्जी, इसमें छेड़ना या बदतमीजी करना कैसे हुआ”, अपने वक़्त से आगे की बात कर रहा था। कोई जवाब न सूझता देख मैं कुतर्क पर उतर आया।
“तेरी कोई बहन होती तो अहसास होता”।
“अच्छा जिनकी बहन होती है वह प्यार नहीं करते किसी लड़की से, हँसकर वह बोला, “चल आ एक चाय पिला दे, वह कैंटीन में खींच कर ले गया, पर सच कहूँ तो कैंटीन में मुझे डर लगा कि कहीं कोई क्लास का लड़का मुझे मोहित के साथ न देख ले।

   छुट्टियों के बाद मोहित कॉलेज में कम ही नजर आता, एक दिन कैंटीन में लवदीप मिल गया, उस से मोहित के बारे में पूछा, तो उसने बताया, ड्रग्स वगैरह लेने लगा है शायद, “तुमने समझाया क्यों नहीं, तुम्हारा तो बेस्ट फ्रेंड है वह?”
“बहुत बार समझाया यार”
उसे लेकर मोहित के घर चला गया, घर में अकेला ही था, कमरे से धुएँ की गंध आ रही थी।
“अब यही सब रह गया है मोहित, ड्रग्स लेने लगा अब तू? मैंने गुस्से से कहा
“सिंपल सिगरेट है यार” वह शर्मिंदा सा बोला
“क्यों कर रहा है ये सब, अपने करियर के बारे में सोच, अंकल आंटी के बारे में सोच, जीवन में बहुत कुछ है”
“सच कह रहा हूं भाई, सिंपल सिगरेट है, तेरी कसम” वह हँस कर बोला
“अब मुझे मार, झूठी कसम खा कर, मैंने कहा
“डर मत, अपने से पहले नहीं मरने दूंगा तुझे”

   कुछ देर उसके पास रुक कर उसे समझा(!) कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर मैं वापिस आ गया। उन्हीं दिनों हम लोगो ने शहर बदल लिया। मेरी ग्रेजुएशन बीच में ही रह गई, परिवार आर्थिक संकट में और मैं मानसिक अवसाद में घिर गया। इस बीच कुछ वक़्त और बीत गया। नए शहर में एडजस्ट नहीं हो पाने पर हम वापिस इसी शहर में आ गए। मैंने आगे की पढ़ाई यूनिवर्सिटी से पत्राचार के माध्यम से शुरू की। एक दिन यूनिवर्सिटी के कॉरिडोर में लवदीप मिल गया, हाल चाल पूछा फिर मैंने मोहित के बारे में पूछा
“तुम्हें पता नहीं चला! उसने सुसाइड कर लिया।” भर्राई आवाज में वह बोला।
“क्या! क्यों?”
“ड्रग्स तो वह लेने ही लगा था, उस पर उसके माता पिता का प्रेशर भी रहता था, शुरू से ही, वह कभी बोलता नहीं था ये बात, मेरे मम्मी पापा भी मुझे उस से मिलने नहीं देते थे, बाकी सब भी दूर थे, अकेला पड़ गया था वो…..
   घर आया तो सबसे पहले लुधियाना रहते अपने दोस्त को फोन किया।
“मोहित था न अपनी क्लास में?”
“हाँ”
“उसने सुसाइड कर ली”
“क्या! कुछ गलतफहमी हुई है तुझे क्या?
“नहीं, लवदीप मिला था, उसने बताया।”
कितनी देर तक फोन पर चुप्पी छाई रही।
  जीवन अपने रंग में रंगता गया, और साथ ही हम सब भी उसके साथ आगे बढ़ते रहे, मुश्किलों में जीवन को कोसते हुए और खुशियों में मज़े करते बिना किसी शुक्रिया के, जीवन का साथ देते। पर जब भी कभी स्कूल के पास वाली सड़क से गुजरता, मंदिर को देख कर मोहित की याद आ ही जाती, हालांकि मेरी जिंदगी में वह कभी अहम किरदार नहीं था।
     अभी पिछले हफ्ते दिल्ली गया। वापसी पर लेट हो गया, बस स्टॉप से घर का पंद्रह मिनट का पैदल रास्ता है, रिक्शा, ऑटो न दिखने पर मैंने सोचा पैदल ही निकल लूँ। रेलवे लाइन अंडर पास से निकलते समय एक दम से एक साया मेरे पास आकर मेरा कंधा पकड़ कर झूल गया।
“अंकल, एक सौ रुपए देदो प्लीज, मुझे खाना खाना है”
मैं एक दम हड़बड़ा गया, कुछ घबरा भी गया कि कोई लुटेरा तो नहीं इस सुनसान में
देखा, कोई बाईस, तेईस साल का लड़का होगा, कपड़े मैले कुचैले, पर अच्छी क्वालिटी के, शक्ल से भी किसी अच्छे घर का लग रहा था, उसकी आंखों की तरफ देखा, भुरी काली आंखें, वैसा ही रंग जैसा मोहित की आंखों का था, और भाव भी ठीक वैसा ही जब आखिरी बार उस से मिला था उसके घर, “सिंपल सिगरेट है यार” एक दम से उसके शब्द गूंजे।
तभी पीछे से आवाज आई
“नशेड़ी है, इनका काम ही यही, पैसा लेकर फिर से नशा करेगा, ये लोग ही फिर अपराधी बन जाते है, छोड़ो, हम लोग क्यों इनके लफड़े में पड़े, अपनी जिंदगी की मुश्किलें क्या कम हैं।
   मैंने उसे पीछे धकेला, वह लड़खड़ा कर गिरते गिरते बचा। और मैं तेजी से अपने घर की तरफ बढ़ गया।

***

रात को फिर मोहित याद आ गया। पर उसका याद आना भी उतना ही बेमानी है जितना उस लड़के का मेरे कंधे पर झूल कर मुझसे पैसे मांगना। मोहित मुझे याद आ जाता है सरसरी या सतही तौर पर, शायद उसका कारण सिर्फ और सिर्फ यही है कि वह मर चुका है, हम में से बहुतों को ऐसे मोहित याद आ जाते होंगे, वे मोहित, जो मर गए, हम उन पर कहानियाँ लिखते हैं, नाटक और फिल्में बनाते हैं, अपने संवेदन शील होने का दिखावा करते हैं। पर जिंदा मोहित, वह कभी हमारी गिनती में नहीं आते, हाँ, उनसे हमें घिन जरूर आती है, हम डरते है कोई हमें उनके साथ देख न ले, वह दोस्त हो तो हम कन्नी काट कर निकल जाते हैं, वह बच्चे हो तो हम उन्हें और किस्मत को कोसते रहते ऐसी औलाद के लिए। हमारे बच्चों के दोस्त हो तो अपने बच्चों को उनसे कैसे बचाएँ, यही सोचते है। गली मोहल्ले में हैं तो खिल्ली उड़ाते या गालियाँ देते। अरे नहीं, हम उनके लिए करते भी है बहुत कुछ, कभी कभी सतही तौर पर समझाते हुए अपने कर्तव्य की पूर्ति भी। आखिर इस से ज्यादा हम कर भी क्या सकते हैं।

  आज न जाने क्यों मन में ख्याल आया कि कभी मोहित मिलेगा तो उस से माफी मांग लूंगा, और उसे बता दूंगा कि उस दिन जो एक और मोहित मुझे अंडर पास के पास मिला, जिसकी आँखों में मुझे वही भाव दिखे, जो आखिरी मुलाकात में तुम्हारी आँखों में दिखे थे, शायद कल, परसों या उसके अगले दिन कोई मुझे बताए कि वह नशेड़ी लड़का था ना, अंडर पास के पास जो लोगो से पैसे मांगता था, वह मर गया, और मेरा संवेदन शील मन पीड़ा से भर जाएगा, जिसे मैं धक्का देकर आगे बढ गया था जब किसी ने पीछे से आवाज देकर कर कहा था, मोहित, सच यह है कि पीछे से जो आवाज आई, जिसे सुन कर मैं उसे धकेल कर आगे बढ़ गया था, वह आवाज असल में मेरी ही थी। छत पर चहल्की चांदनी रोशनी फैला रही थी, ऐसा लगा जैसे मोहित उधर से मेरी तरफ मुसकुरा कर देख रहा है, और मैं हमेशा की तरह उस से नजरें चुरा दूसरी तरफ देखने लगा…।

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