काव्य: नफे सिंह योगी मालड़ा (महेंद्रगढ़ हरियाणा)

फौजी ऐसे ही होते हैं

चाँद देखकर चलते रहते, दीपक की ज्यों जलते रहते।
नींद उदासी पास न आए, हाथ से आँखें मलते रहते।।
नीर देख कर पी लेते हैं, देख कर फोटो जी लेते हैं।
काँटो में पोशाक फटी को, अपने हाथों सी लेते हैं।।
आसमान के नीचे सोते, रोज पसीने से मुँह धोते।
गहना है हथियार हाथ का, पीठ गोला बारूद ढोते।।
हिम पर्वत पर घर होता है, नहीं किसी का डर होता।
मंजिल मन की चाहत होती, क्षितिज पार सफर होता है।।
भूखे-प्यासे चल लेते हैं, हर मौसम में ढल लेते हैं।
कटे तने के पेड़ देखकर, उनसे ही सम्बल लेते हैं।।
याद गाँव की आती सरहद, ताल किनारे पीपल बरगद।
जोश रगों में दौड़े ऐसे, पार सभी कर जाता वो हद।।
पत्थर ऊपर नाम लिखाते, सरहद रिश्ता गाँव दिखाते।
बहत्तर घंटे बाद खोलकर, छालों वाले पाँव दिखाते।।
दृढ़ संकल्पी रखे इरादा, कभी नहीं थकता है ज्यादा।
खेल जान पर पूरा करता, बाधा तोड़ सके ना वादा।।
फौजी ऐसे ही होते है, जगते ज्यादा, कम सोते हैं।
जिम्मेदारी घर, सीमा की, कंधों ऊपर वो ढोते हैं।।
मुख पे हँसी सजाकर रखते, तन से हार भगाके रखते।
सुला देश को नींद चैन की, खुद को खूब जगाके रखते।।
दुख-दर्दों को खुश हो पीते, अपनो, सपनों खातिर जीते।
जान हथेली पर रख चलते, हिमपर्वत हिंदुस्ताँ चीते।।
याद सभी करते महफिल में, रहते हिंदुस्ताँ के दिल में।
हिम्मत बाधाओं में भी ना, आ जाए जो पथ मंजिल में।।
***

मैं हूँ इक साधारण नारी

मैं हूँ इक साधारण नारी, कैसे सीता बन दिखलाऊँ?
चोर खड़े हर चौराहे पर, बचकर कैसे घर को जाऊँ??
कोई भी न जगह सुरक्षित, नहीं जहाँ पर घात लगी है।
जिक्र फिक्र में होते मेरे, जब-जब होने रात लगी है।।
सब मौके की ताक में बैठे, सोच-सोच कर दंग रह जाऊँ।
चोर खड़े हर चौराहे पर, बचकर कैसे घर को जाऊँ?
लेखन में नारी को कहते, कि प्रेम की ये साकार मूर्ति।
पर देखन में भाव अलग हैं, तिरछी नजर कटार घूरती।।
जगह-जगह जहरीले बिच्छू, कैसे अपनी जान बचाऊँ?
चोर खड़े हर चौराहे पर, बचकर कैसे घर को जाऊँ?
बची कोख से, फँसी प्रेम छल, और ऊपर से दहेज दानवी।
उत्पीड़न की पीड़ पचासो, बींध गए दिल तीर मानवी।।
काँटों भरी कंटीली राहें, कैसे आगे कदम बढ़ाऊँ?
चोर खड़े हर चौराहे पर, बचकर कैसे घर को जाऊँ?
बेटी बचाओ लिखते हैं सब, कार्ड और परिवहनों पर।
अपने हाथों आप तमाचा, मारते अपनी बहनों पर।।
इतनी नीचे सोच गिरी है, कैसे ऊपर कहो उठाऊँ?
चोर खड़े हर चौराहे पर, बचकर कैसे घर को जाऊँ?
***


मिलन

दुनिया बन दूरबीन देखती, छुपके-चुपके से आना तुम।
इक रैन चैन से नैन मिला, बस बाहों में बस जाना तुम।।
पलकों के गिरने की आहट,
ये साँसों की आवाज़ कहीं।
धीरे करलो ध्वनि धड़कन की,
कभी खुल न जाएँ राज कहीं।
कोयल कायल न हो जाए, गलती से भी मत गाना तुम।
इक रैन चैन से नैन मिला, बस बाहों में बस जाना तुम।।
सागर सी शीतल आँख देख,
मन मीन का लीन न हो जाए।
न करो समीर समीप शरीर,
गेंदा गंधहीन न हो जाए।
मंद-मंद मुस्काना मन में, भंवरे को मत भा जाना तुम।
इक रैन चैन से नैन मिला, बस बाहों में बस जाना तुम।।
चोटी की चोटिल चमक देख,
इस तरफ सर्प न आ जाए।
चुनरी जो तन से तनिक तरी,
मन काम का न ललचा जाए।
चपला भी चुपके से चमके, मत इतना भी इठलाना तुम।
इक रैन चैन से नैन मिला, बस बाहों में बस जाना तुम।।
अधरों की आभा देख कहीं,
भ्रमर नहीं भ्रमित हो जाए।
चुनरी पर चमके तारों में,
जगमग जुगनू नहीं खो जाएँ।
कजली की बदली से पगली, कभी बूँद नहीं गिराना तुम।
इक रैन चैन से नैन मिला, बस बाहों में बस जाना तुम।।
***


लिखते लिखते सोता हूँ

कागज भूमि पर भाव, कल्पना के, बीज कलम से बोता हूँ।
नींद गजब की आती है जब, मैं लिखते -लिखते सोता हूँ।।
बचपन में माँ की गोदी में,
मैं ऐसे ही तो सोता था।
गोदी की गर्माहट पाकर,
बिल्कुल भी तो ना रोता था।
आज कलम कंधों पर रखकर, मैं उन्हीं भावों को ढोता हूँ।
नींद गजब की आती है जब, मैं लिखत -लिखते सोता हूँ।।
बैलों के पीछे चल-चलकर,
दिन-रात बीज बोया करते।
रेत खेत का याद आज भी,
जब थककर हम सोया करते।
रखता जब पुस्तक पर माथा, मैं उसी खेत में होता हूँ।
नींद गजब की आती है जब, मैं लिखते -लिखते सोता हूँ।।
इक घायल सैनिक थका हुआ,
जब भूखा-प्यासा होता है।
जीत दिलाकर, हाथ हिलाकर,
रण में ऐसे ही सोता है।
कर अदा फर्ज, दे चुका कर्ज, कह बीज जोश के बोता हूँ।
नींद गजब की आती है जब, मैं लिखते-लिखते सोता हूँ।।
जागरुकता की जला ज्वाला,
करे जगत का मार्गदर्शन।
बढ़ता देखे कदम कलम का,
सरस्वती माँ होती प्रसन्न।
बात शहीदों की जब लिखता, कलम संग मैं भी रोता हूँ।
नींद गजब की आती है जब, मैं लिखते -लिखते सोता हूँ।।
***


आओ सब परोपकार करें

निस्वार्थ भाव से प्रकृति ज्यों, आओ सब परोपकार करें।
मोह, लालच व क्रोध त्याग हम एक दूजे से प्यार करें।।
सहानुभूति सब रखें दिल में, मानवता का धर्म निभाएँ।
खुद तो भला करें ही सबका, औरों को भी हम सिखाएँ।।
हवन करें और पेड़ लगाएँ, जीवों का नहीं शिकार करें।
मोह, लालच व क्रोध त्याग हम एक दूजे से प्यार करें।।
दया, हया को दिल में रख सभी सेवा संग सम्मान करें।
भूखे-प्यासे को अन्न, पानी, सब सच्चे दिल से दान करें।।
कैसे दुख दर्दों को बाँटें, ये मिलकर सभी विचार करें।
मोह, लालच व क्रोध त्याग हम एक दूजे से प्यार करें।।
सब धुआँ, धूल और ध्वनि से, होता प्रदूषण बंद करें।
बुर्झे चेहरों पर मुस्कान हो, कुछ ऐसा हम प्रबंध करें।।
योग, हवन व पेड़ों की रक्षा का दुनिया में प्रचार करें।
मोह, लालच व क्रोध, त्याग हम एक दूजे से प्यार करें।।
सब प्रेम-प्यार करें प्रकृति से धरती माँ को स्वर्ग बनाएँ।
धर्म-कर्म को साथ में लेकर, सेवा से सम्मान सजाएँ।।
अवगुण से घायल रोगी का, सद्गुणों से उपचार करें।
मोह, लालच व क्रोध त्याग हम एक दूजे से प्यार करें।।

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