राकेश कबीर की कविताओ में किसान-मजदूर जीवन: संघर्ष एवं अभिव्यक्ति

सीमा

- सीमा


सारांश - 
श्रम को हीन माने जाने की परंपरा बहुत पुरानी रही है। भले ही सामंतवादी युग की बात हो या पूंजीवाद की, दोनों में किसान वर्ग शोषित वर्ग में ही शामिल होता आया है। यह उस श्रमजीवी वर्ग का हिस्सा है जो हाड-तोड़ शारीरिक मेहनत के बल पर एक नया संसार रचने की क्षमता धारण करता है। किसान आधार है वैश्विक अर्थव्यवस्था का। इसके बावजूद वह स्वयं दो वक्त की रोटी को तरस जाता है। याद कीजिए प्रेमचंद की कहानी पूस की रात के हल्कू को; जिसके पास पूस के जाड़े से खुद को बचने के लिए एक कम्बल खरीदने तक के पैसे नहीं होते और गोदान के होरी को, जो जीवन भर मेहनत करने के बाद भी ऋण के बोझ से मुक्त नहीं हो पाता व एक गाय की लालसा लिए दम तोड़ देता है। इसका एक कारण तो यह ही है कि हमारी सभ्यता शारीरिक श्रम का मूल्य न के बराबर आँकती रही है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी भी इस बात को समझते थे कि जब तक शारीरिक श्रम की प्रतिष्ठा स्थापित नहीं होगी, तब तक कृषकों-मजदूरों की दशा में सुधार हो ही नहीं सकता। समकालीन कवि राकेश कबीर की कविताओं का एक प्रमुख आयाम है श्रमजीवी वर्ग का किसान। उनकी कविता किसान जीवन के सभी पक्षों पर प्रकाश डालती है।


शोध आलेख - 
 राकेश कबीर स्वयं एक किसान परिवार में जन्मे, इसलिए इनकी कविताओं में किसान जीवन के जो परिदृश्य उभरे हैं, वे विविध रंगों से भरे हैं। खेत की मेड की हरी दूब पर मोतियों सरीखी ओस और उस पर पड़ती सुबह की अधखिली धूप, खेतों की हराइयों में झटपट चलते बैल और उनसे संवाद करती जुम्मन हरवाहे की पुचकार, नमक-प्याज़ लगी रोटियों से महकता सिवान, खेत के उबड़ खाबड़ ढेलों पर खेलते किसानों के बच्चे और गेहूँ के दानों का छींटा जाना, किसान जीवन अनगिनत रंगों को एक साथ हमारे सामने रखता है। इसी के साथ, इस जीवन को जीने की लालसा पाठक में बलवती हो उठती है। राकेश कबीर की सबसे सुन्दर कविताओं में से एक है- ‘एक बार फिर’। खेतों में बिजाई करने के साथ एक किसान के सीने में फिर से सर उठाती ‘जीने-महसूसने की ख्वाहिश’ का बहुत मनोहारी चित्र कविता ने उकेरा है।

 राकेश कबीर ने अपनी कविताओं के माध्यम से भारत के निम्न मध्यवर्गीय किसान, श्रमिक, और साधारण, उपेक्षित एवं असहाय जिंदगी बिताने वाले लोगों का चित्रण किया है। कभी ‘बेमौसम बादलों की आफत’ का मारा अन्नदाता कवि को बेचैन करने लगता है तो कभी ठाकुर के भट्टे से ईंट पाथ, थक हार कर लौटने के बाद, मूंज की नंगी खटिया पर अपने बाजुओं का तकिया बनाकर लेटे हुए हरिया की चैन की नींद कवि को सुकून पहुँचा जाती है। ‘बेचारा किसान’ कविता पढ़कर आँखों के सामने सहसा उस बेबस किसान की तस्वीर आ जाती है, जिसकी फसल बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से तबाह हो गई है। कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए।
 बेमौसम बादलों की आफत
 गेहूँ के खेतों पर उड़ेलकर
 अन्नदाता को मरने पर मजबूर कर
 क्यों बिजलियाँ गिराते हो ऐ आसमाँ वाले1

 राकेश कबीर की कवितायें निम्न मध्यवर्गीय किसान समुदाय की व्यथा को अभिव्यक्त करती है। किसान गर्मी, सर्दी, धूप और बारिश की परवाह किए बगैर अपने शरीर को बिना आराम दिए लगातार श्रम करता है। ‘सर्दी की रात’ कविता इसी श्रमहारा वर्ग के संघर्षशील जीवन को आवाज देती है। प्रेमचंद के हल्कू की जो नियति थी वही नियति आज सुमारु की है। एक सदी बीतने के बाद भी उसकी पूस की वह रात कटने का नाम ही नहीं ले रही है। इस एक सदी में किसानों के कल्याण के लिए, दर्जनों योजनाएँ जारी की जा चुकी हैं, परन्तु स्थिति जस की तस ही है। बस सरकारों के साथ नए वादे और नए नारे आते जाते रहते हैं, कुछ स्थिर है तो वह है किसानों की बदहाल स्थिति! कविता का एक अंश देखिए।
 सुमारु ने बंद कर ली टाटी
 ठण्ड से सुअर भी बिलबिलाने लगे
 पतली पड़ गई है पुरानी रजाई
 पैर की नसें भी ठिठुर
 जाने लगी।2

 फसल को सही सलामत रखने के पीछे किसान न दिन देखता है न रात और इसके बाद भी मौसम की मार पकी-पकाई फसल को चौपट कर जाती है और असहाय-सा किसान कुछ भी नही कर पाता। यदि किसी बार फसल मौसम की मार से बच भी जाए तो फसल का उचित दाम न मिल पाने के कारण वह खेत में ही पड रह जाती है क्योंकि फसल को मंडी तक पहुँचाने में लगने वाला खर्चा अर्थात परिवहन लागत फसल की अनुमानित आमदनी से बहुत अधिक होता है। ऐसे में फसल को मंडी तक पहुँचाना पहले से कर्ज़ में डूबे किसान के लिए घाटे का सौदा होता है। इसी सत्य की ओर ईशारा करती है- आलू कविता। कविता बाजारवाद से जन्मी उस विषमता आधारित व्यवस्था को हमारे समक्ष रखती है जिसमें किसान फसल के उचित मूल्य न मिलने के कारण उसे सड़क पर फेंकने को बाध्य है वहीं दूसरी तरफ बहुराष्ट्रीय कंपनिया हवा को भी चिप्स के दामों में आसानी से बेचकर भारी मुनाफा कमा जाती हैं। कविता की कुछ पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं।
 यही कमाल है ग्लोबलाइज्ड बाजार का
 बेचनेवाले हवा भी पैकेट में
 भरकर बेच देते हैं
 हम प्याज-आलू-टमाटर, जाने क्या-क्या
 पक्की सड़क पर फेंक देते हैं3

 राकेश कबीर की कवितायें लगातार बढ़ रही महंगाई की मार से त्रस्त किसान की असहाय स्थिति को पाठक के सामने खोलकर रख देती हैं। महंगाई कविता में ‘झोला भर धान’ महंगाई का प्रतीक बनकर आया है। झोले भर धन के बदले कितनी कम वस्तुएँ आती होंगी, यह इंगित करती है फंदलाल की चिंता। झोले भर धान के बदले वह बहुत ही कम चीजें खरीद पाता है। इसका सीधा सा अभिप्राय है कि उसकी अपनी फसल कितने सस्ते दामों बिकती है। किसान का उत्पाद कौड़ी के भाव बिकता है और वही उत्पाद बिचौलिए और खुदरा दुकानों से होकर वापस किसान (ग्राहक के रूप में) तक पहुँचता है तो उसकी कीमतें आसमान छूने लगती हैं। कविता से एक अंश-

 अपने ही खेत में पैदा होता है
 लेकिन सब कुछ
 कितना महंगा हो गया है
 ये सोचते हुए
 संग लिया है
 धान से भरा झोला
 साईकिल की हैंडिल में फंदलाल ने4

 महंगाई कविता का फंदलाल सहसा’ पीपली लाइव’ फिल्म के नत्था की याद ताज़ा कर देता है क्योंकि दोनों जन महंगाई नामक डायन के चंगुल में फंसे हुए तड़प रहे हैं। असल में यह सभी छोटे किसानों का भाग्य है जिस पर कर्ज और महंगाई की दोहरी मार पड़ती रहती है। आज देश के किसान की हालत का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अब एक किसान की आत्महत्या भी सरकार और मीडिया की संवेदना के तार नहीं झकझोरती वरन उसकी मौत पर ओछी राजनीति होती है। इस संदर्भ में राकेश कबीर अपनी कविता एक किसान का मरना में लिखते हैं-
 जब एक किसान अपने खेत में
 जेठ की लू भरी दोपहरी में...
 फटे प्लास्टिक के जूते पहने
 झीने गंदे कुरते में
 पुराने, गंदे गमछे की पगड़ी बांधे
 तड़प-तड़पकर मर जाता है तो
 वह अकेले नहीं मरता,
 बल्कि सारी इंसानियत मर जाती है
 सारी सभ्यता, सारी संस्कृति मर जाती है।
 और एक राष्ट्र के रूप में हम सब मर जाते हैं।5

 राकेश कबीर की कविता खेतिहर मजदूर वर्ग की दयनीय स्थिति की पहचान और पड़ताल करती है। ‘भूख’ कविता में बोरे भर अनाज की खातिर कल्लू की माँ ठाकुर के खेत पर सपरिवार बेगार स्वीकार करती है ताकि अपने भूखे बच्चों का पेट भर सके। बेगार से एक ऐसे दुष्चक्र का निर्माण होता है कि समस्त परिवार ठाकुर साहब की दया पर उसके यहाँ पीढी-दर पीढ़ी बंधुआ मजदूर ही बनकर रह जाता है। किसानों की दुर्दशा देखकर लगता है कि ‘उत्तम खेती मध्यम बान निषिद्ध चाकरी भीख निदान’ अब सिर्फ कहने भर की बात रह गयी है। असल में खेती किसानी व्यक्ति को जो जीवन स्तर प्रदान करती है, उसे देखकर वर्तमान पीढ़ी किसानी से भाग रही है। खुद किसान भी नहीं चाहते कि उसका बेटा किसानी करे। किसानों की तकदीर का फैसला सरकार निरंकुश तरीके से करती है, इसका हालिया उदाहरण है -किसान आन्दोलन। किसान बिल के विरोध में महीनों से सडकों पर बैठे किसानों की मांगे अनसुनी जा रही हैं। राकेश कबीर किसान को आशा की किरण मानते है क्योंकि इतना मुश्किलों भरा जीवन जीने के बाद भी वह अपना सारा जीवन मानवता के पोषण में लगा देता है। वे उसे ‘उम्मीद की बयार’ कहते हैं। अपने फावड़ा थामे हाथों से वह आने वाली फसल की ही नहीं बल्कि आनेवाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य की नींव भी रखता है। किसान कविता में राकेश कबीर लिखते हैं-
 वह आत्महंता नहीं
 बल्कि उम्मीद की बयार है
 जो मौसम की परवाह किए बिना
 बीज देता है सारी धरती को
 वह पोषक है मानवता का
 और जीवन में हरियाली बोने की
 ज़िद के साथ जीता है।6

 राकेश कबीर की किसान विषयक कवितायें में यह आशा दिखती हैं कि एक दिन मेहनतकश नौजवान शोषण की कब्र खोदेंगे और भेदभाव के सारे गड्ढों को पाट देंगे, क्योंकि अब वे अपने खिलाफ हो रही साजिशों के प्रति सजग हैं। यह तथ्यात्मक रूप से सही भी है, क्योंकि इस देश की लगभग सत्तर फीसद जनता आज भी गाँवों में बसती है और ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा किसान हैं। ऐसे में यदि वे अपने हितों के प्रति सजग और एक हो जाए तो किसानों की दशा बदलने से उन्हें कौन रोक सकता है? ‘बाय प्रोडक्ट’ कविता में वर्णित मेहनतकश लोगों की यह नयी पीढी इसलिए आशा की किरण है। बहरहाल यह कहा जाना अनुचित न होगा कि राकेश कबीर मैथिलीशरण गुप्त, त्रिलोचन, रमेश रंजक, हरिश्चंद्र पांडेय, वंशीधर शुक्ल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, केदारनाथ अग्रवाल, राजेश जोशी, आलोक धन्वा, रमाशंकर यादव विद्रोही आदि की परंपरा में शामिल किए जा सकते हैं, जिनकी बहुआयामी चेतना का एक महत्वपूर्ण आयाम किसान से जुड़ता है।


आधार ग्रंथ-
1. ‘कबीर’ राकेश, नदियाँ बहती रहेंगी, अगोरा प्रकाशन वाराणसी, प्रथम संस्करण 2018
2. ‘कबीर’ राकेश, कुंवरवर्ती कैसे बहे, प्रभात प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2019
 सन्दर्भ -
1. ‘कबीर’ राकेश, नदियाँ बहती रहेंगी, अगोरा प्रकाशन वाराणसी, संस्करण 2018, पृष्ठ 93
2. ‘कबीर’ राकेश, कुंवरवर्ती कैसे बहे, प्रभात प्रकाशन, संस्करण 2019, पृष्ठ 109
3. वही, पृष्ठ 57
4. वही, पृष्ठ 151
5. वही, पृष्ठ 76
6. वही, पृष्ठ 77


राकेश 'कबीर'

परिचय: सीमा
बी.ए. आनर्स हिंदी- मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
एम.ए. हिंदी- मोतीलाल नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
पी.जी.डी.टी.- इग्नू, नयी दिल्ली
एम.फिल.- गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर


परिचय: राकेश ‘कबीर’
उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के एक छोटे से गाँव से संबंध रखने वाले कवि राकेश ‘कबीर’ ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से ‘भारतीय सिनेमा में प्रवासी भारतीय जीवन का चित्रण’ विषय पर एम.फिल और ‘ग्रामीण सामाजिक संरचना में निरंतरता और परिवर्तन’ विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। वर्तमान में वे उत्तर-प्रदेश प्रशासनिक सेवा में एडीएम पद पर कार्यरत हैं। अध्ययन के दौरान से ही देश-समाज और अपने समुदाय के लिए लिखते रहे हैं। उनके अब तक दो कविता संग्रह ‘नदियाँ बहती रहीं’ और ‘कुँवरवर्ती कैसे बहे’ एवं एक कहानी संग्रह ‘खानाबदोश सफ़र’ प्रकाशित हो चुके हैं।

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