कँवल भारती: हिंदी दलित साहित्य का आत्मालोचक

- कैलास बळीराम घाटे 

शोधार्थी, हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
ईमेल- ghatekailas@gmail.com; चलभाष: +91 738 245 2980


कँवल भारती की आलोचना न सिर्फ़ हिंदी साहित्य के अपितु दलित साहित्य के चिंतक, कवि, आलोचकों को भी सोचने के लिए बाध्य करती है। ऐसा नहीं है कि दलित साहित्य के चिंतक, कवि, आलोचक अपने साहित्य के प्रति एक-सा सोचते हों, हर किसी की मान्यता एक-दूसरे से मिलती हो। यह वह बात है जिससे कँवल भारती की अन्य दलित चिंतकों से, विचारकों से और साहित्यकारों से अलग पहचान बनती है। वे हिंदी साहित्य के साथ-साथ, दलित चिंतकों एवं साहित्यकारों से, सच को स्थापित करने के लिए वैचारिक संघर्ष करते हुए दिखाई देते हैं यही वह बात है, जिससे वे अन्य दलित चिंतकों से अलग नज़र आते हैं।

कुछ दलित चिंतक एवं आलोचक जब साहित्य का मूल्यांकन करते हैं तो सामान्यतः ‘जाति’ की समस्या उनके संपूर्ण चिंतन का आधार होती है। पर, सिर्फ़ इसी आधार पर किया गया मूल्यांकन अपने-आप में एक सीमा में बंधा, सीमित हो जाता है। जिसके कारण कई ऐसे कवि हैं जिन्हें दलित साहित्य में उचित स्थान नहीं मिल पाया है, मिला भी है तो उपेक्षा के लंबे समय बाद। उन नामों में से एक है- ‘मलखान सिंह’।

‘परिवेश’ हिंदी साहित्य की पत्रिका, जिसने मलखान सिंह की कविता को सबसे पहले (सन् 1996) प्रकाशित किया था। उसके बाद ‘हंस’ में भी उनकी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं। सन् 1996 से अब तक दलित साहित्यकारों का एक वर्ग मलखान सिंह को जनवादी कह कर हाशिये पर डालता रहा है। इसका उदाहरण हाल ही में आया श्यौराज सिंह बेचैन का लेख ‘वह दलितों के मुक्तिबोध थे’ है, जो अमर उजाला में 1 सितंबर को प्रकाशित हुआ है। श्यौराज सिंह बेचैन भी ओमप्रकाश वाल्मीकि का हवाला देते हुए लिखते हैं – “फरवरी में देहरादून में ओमप्रकाश वाल्मीकि को ‘परिवेश सम्मान’ दिए जाने के लिए समारोह आयोजित हुआ था। वहाँ सुनो ब्राह्मण पर भी चर्चा हुई। ओमप्रकाश वाल्मीकि मलखान सिंह की कविताओं पर जनवाद का प्रभाव देख रहे थे।”

बात सिर्फ़ जनवाद कह देने से पूरी नहीं होती है। “वाल्मीकि जी के लिए जनवाद कोई काम्य, सकारात्मक या वांछनीय विचारधारा नहीं है। जनवाद का अर्थ वाल्मीकि जी ने स्पष्ट नहीं किया है लेकिन यह कयास लगाना ग़लत नहीं होगा कि जनवाद से उनकी मुराद मार्क्सवाद से है। अगर ऐसा है तब उन्हें सीधे मार्क्सवाद ही लिखना चाहिए था। जनवाद को इसमें लाने की ज़रूरत नहीं थी। दलित लेखन का मक़सद अगर जनसामान्य को सम्मान दिलाना, अधिकार सम्पन्न करना नहीं है तो क्या है?” बजरंग बिहारी तिवारी का यह सवाल वाजिब लगता है। यहाँ और एक बात है कि, ओमप्रकाश वाल्मीकि की बात को श्यौराज सिंह बेचैन अपने लेख में जस-का-तस, मलखान सिंह को जनवादी मान आगे बढ़ जाते हैं।

अपने इस लेख में श्यौराज सिंह बेचैन, मलखान सिंह का कम पर परिवेश के संपादक का यशोगान करते हुए दिखाई देते हैं। वे लिखते हैं- “वह परिवेश के संपादक मूलचंद गौतम के सहपाठी और मित्र थे। कवि बेशक मलखान सिंह के भीतर था, लेकिन उसे पहचानने, उकसाने और प्रकाशित कर सामने लाने का काम परिवेश के संपादक ने ही किया। बेशक मलखान सिंह में प्रतिभा थी, लेकिन ऐसे मामलों में अवसर और साधन देने वाले का ही बड़ा हाथ होता है।” यहाँ कवि मलखान की अपेक्षा संपादक के महत्त्व को रेखांकित किया गया है। हिंदी में कबीर की अपेक्षा हजारीप्रसाद द्विवेदी को ही ज़्यादा महत्त्व दिया गया। जिससे देखकर लगता तो यही है कि द्विवेदी न होते तो शायद ही कबीर को कोई हिंदी साहित्य में जान पाता। ठीक इसी तरह की बात मलखान सिंह की कविताओं के संदर्भ में श्यौराज सिंह के लेख में नज़र आती है।

बात यह है कि दलित साहित्य के वरिष्ठ साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि का मलखान सिंह की कविता पर जनवाद का प्रभाव देखकर, उन्हें उसी परिधि में सीमित करना उचित जान नहीं पड़ता है। दलित साहित्य की लड़ाई न सिर्फ़ ब्राह्मणवाद से है बल्कि उतनी ही पूँजीवाद से भी है। जातिगत पीड़ा तक हिंदी दलित कविताओं को सीमित करना अपने आप में दलित वैचारिकी की सबसे बड़ी फाँक है। और इसे मिटाने का कार्य दलित आलोचक कँवल भारती करते नज़र आते हैं।

कँवल भारती, मलखान सिंह को क्यूँ जनवादी कहा गया इस बात तक पहुँचने की कोशिश अपनी आलोचना के माध्यम से करते हैं। मलखान सिंह की कविता ‘भूख’ इसका कारण दिखाई देती है। भूख की पंक्तियाँ हैं –
“भूख! आँख खुलते ही तुझे
चौखट पर बैठा देखा है
देखा है कि तुझे
आँगन में पसरा देख
मेरी माँ फूट-फूट रोई हैं।”

देखा जाए तो यह कविता दलित चेतना की सशक्त कविता दिखाई देती है। पर यह सिर्फ़ भूख पर लिखी गई समझने वाले और इसमें जाति की पीड़ा को न देखने वाले कवि आलोचकों ने इसे जनवादी कहकर दलित साहित्य से नकार दिया। “यह दलित चिंतन की विडंबना है कि वह जाति की पीड़ा को ही दलित कविता में देखना जाहता है, भूख की पीड़ा को नहीं। भूख पर लिखने वाले कवि को वह जनवादी और कम्युनिस्ट कहकर नकार देता है। ऐसे दलित लेखक यह भूल जाते हैं कि यदि गरीबी और भूख उनके पूरखों के पास नहीं होती, तो वे अनुभूतियाँ उन्हें कहाँ मिलती, जिनका मार्मिक चित्रण उन्होंने अपनी आत्मकथाओं में किया है।”

दरअसल, भूख की समस्या दलितों के लिए आर्थिक होती तो कब की हल हो चुकी होती, पर यह है नहीं। इसलिए कँवल भारती, ओमप्रकाश वाल्मीकि के साथ अन्य चिंतकों से भी उपर्युक्त सवाल करते हैं– “यदि ओमप्रकाश वाल्मीकि और सूरजपाल चौहान धनाढ्य परिवार से होते तो क्या वे मैला कमाने जाते और जूठन खाते? यदि श्यौराज सिंह बेचैन का परिवार धनी होता, तो क्या उन्हें अपने बचपन को अपने कंधों पर ढोना पड़ता? ...जनवादियों और कम्युनिस्ट चिंतकों के पास इन सवालों के जवाब नहीं है, क्योंकि ये आर्थिक व्यवस्था से नहीं, हिंदुओं की धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े सवाल हैं। इन पर दलित चिंतकों को ही विचार करना होगा।”

मलखान सिंह की कविता भूख न सिर्फ़ ग़रीबी से लोहा लेती है बल्कि ब्राह्मणवाद एवं पूंजीवाद से भी संघर्ष करती है। इसलिए यह दलित चेतना की कविता है। मलखान सिंह की एक और बात जो जनवादी होने से मलखान सिंह को बचाती है। वह है उनका ईश्वर के ख़िलाफ़ संघर्ष। कँवल भारती लिखते हैं – “यह सही है कि मार्क्सवादी और जनवादी चिंतन ईश्वरवादी नहीं है, पर जिस तरह दलित कवियों ने ईश्वर से दो-दो हाथ किये हैं, वैसी सूरते हाल हमें जनवादी और मार्क्सवादी (हिंदी) कविता में नहीं मिलती।” मलखान सिंह की कविता है ‘आखिरी जंग’ जिसे निम्नतः देखा जा सकता है - 
“ओ पमेश्वर
कितनी पशुता से रौंदा है हमें
तेरे इतिहास ने
देख, हमारे चेहरों को देख
भूख की मार के निशान
साफ दिखायी देंगे तुझे।
हमारी पीठ को सहलाने पर
बबूल के काँटों से दोनों
मुठ्ठियाँ भर जायेंगी तेरी।” 

मलखान सिंह की कविताओं की विशेषता ‘गाँव’ है। जिसे कँवल भारती की आलोचना रेखांकित करती है। गाँव के संबंध में अनगिणत कविताएँ आज हिंदी में उपलब्ध हैं। उनमें गाँव का सुंदर, मनमोहक रूप तो मिलता है पर वहीं जातिगत शोषण पर आधारित गाँव का चित्रण मिलना सबसे दूभर कार्य है। मलखान सिंह अपनी कविताओं से उस गाँव को रूबरू कराते हैं, कँवल भारती के शब्दों में कहें तो, ‘जिसे डॉ. आंबेडकर ने घेटो की संज्ञा दी थी।’ 

दसवें दशक में काव्य-सृजन करने वाले मलखान सिंह की विशेषतः इस बात में है कि, “वे इस दौर के पहले कवि हैं, जिन्होंने आदमी और दलित के बीच के फ़र्क को उभारा और आम आदमी के नाम पर लिखी जा रही समकालीन जनवादी कविता को जबरदस्त चुनौती दी।” उदाहरण स्वरूप मलखान सिंह की कविता है- “मैं आदमी नहीं हूँ स्साब/ जानवर हूँ/ दो पाया जानवर/जिसकी पीठ नंगी है।/ कंधों पर/ फैला है/ गट्ठर है/ मवेशी का ठठ्ठर है।/ खाने को जूठन है/ पोखर का पानी है/फूँस का बिछौना है/चेहरे पर/मरघट का रोना है।” 
दलित कविताओं में अंतर्निहित संवेदना, भावों एवं विचारों की गहराई को एक दलित आलोचक जितनी गहराई से पकड़ सकता है उतना द्विज कहे जाने वाले आलोचकों के लिए दुष्कर कार्य प्रतीत होता है। उपर्युक्त कविता में आये ‘दो पाया जानवर है और जिसकी पीठ नंगी है’ के बिंब को ही देखा जाए तो, कँवल भारती की आलोचना का मूल्यांकन कुछ इस तरह है- “पीठ नंगी बहुत ही मार्मिक और गहरे अर्थ वाला शब्द है। जानवर की पीठ को भी उसका मालिक ढक देता है, पर दलित वह जानवर है, जिसकी पीठ को कोई नहीं ढकता। उसकी पीठ पर किसी का हाथ नहीं है- न व्यवस्था का और न सत्ता का। उसे बात-बात में माँ-बहन की गालियाँ और बैल की तरह काम करने पर मजूरी में सिर्फ़ सत्तू मिलता है।”

मलखान सिंह के बारे में एक और बात यह कि, कँवल भारती ने मलखान सिंह को ‘दलित कविता के मुक्तिबोध’ कहा है। जिसका अर्थ उन्हीं के शब्दों में यह है कि, “जिस तरह मुक्तिबोध अपनी ‘ब्रह्म राक्षस’ की परिकल्पना के कारण हिंदी कविता में उपेक्षित किये गये, उसी तरह मलखान सिंह ‘राँपी’, ‘सुतारी’, ‘कन्नी-वसूली’, ‘छैनी-हथौड़ी’, और ‘भूख’ की वजह से दलित कविता में उपेक्षित कर दिये गये।” कँवल भारती की माने तो, ‘मुक्तिबोध को काफ़ी लबे समय के बाद स्वीकारा गया जबकि मलखान सिंह को पूरे दस साल के बाद दलित साहित्य में मान्यता मिली।’
01 सितंबर 2020 में जब श्यौराज सिंह बैचेन ‘वह दलितों के मुक्तिबोध थे’ नाम से मलखान सिंह पर लेख लिखते हैं, तब भी मलखान सिंह को जनवादी मानकर ही आगे बढ़ जाते हैं। इस लेख में मलखान सिंह की कविताओं का मूल्यांकन कम ही हुआ है वहीं इनकी कविताओं में लयात्मकता और गेयता नहीं थी, उनका गद्य में हाथ तंग था, जनांदोलन से उनका वास्ता नहीं था जैसी बातों को प्रस्तुत किया गया है।

मलखान सिंह की परम्परा एवं भाषा के संदर्भ में कँवल भारती की यह बात उचित प्रतीत होती है कि, “मलखान सिंह, कबीर और हीरा डोम की परम्परा के कवि हैं, जिन्होंने सामाजिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर आवाज़ उठायी थी। जो भाषा और तेवर हम कबीर और हीरा डोम में देखते हैं, वही भाव, भाषा और तेवर हमें मलखान सिंह में मिलते हैं।” ‘सुनो ब्राह्मण’, ‘धरती की गति’ कविताएँ इस बात का सबसे सटीक उदाहरण हैं। धरती की गति से एक उदाहरण प्रस्तुत है- “दूसरों की मेहनत पर/कब्जा जमाने वाले साँप/तुम्हारे पैर नहीं होते/मदान्ध हो तुम/तभी तो नहीं समझते/कि गर्जन/चाहे बंदूक की हो/या बादल की/धरती की गति को/नहीं बदल पाते।”

 उपर्युक्त बातों को देखने से यह बात कही जा सकती है कि मलखान सिंह की कविता जनवादी नहीं बल्कि ब्राह्मणवाद एवं पूँजीवाद के विरोध में लिखी गई दलित चेतना की वाहक कविता है। यह बात कँवल की आलोचना सामने लाती है। जाति एवं वर्ग दोनों स्तरों पर कविता को समझने का काम कँवल भारती की आलोचना करती है। इसीलिए यह आलोचना, दलितों की सिर्फ़ सामाजिक समस्या नहीं बल्कि आर्थिक समस्या भी है और यह जब कविताओं में अभिव्यक्त होती हैं, तो उन कारणों को रेखांकित करती है जिनके कारण यह समस्याएँ हैं। कँवल भारती के इस दृष्टिकोण ने दलित साहित्य की वैचारिकी को और भी मज़बूत करने का काम किया है। भविष्य में आने वाले कविताओं के मूल्यांकन के लिए दलित आलोचना की सीमाओं को परिष्कृत किया है और इसके लिए दलित आलोचकों की आलोचना की है, जिसे हम आत्मालोचना कह सकते हैं।

संदर्भ:
  1.  श्यौराज सिंह बेचैन, वह दलितों के मुक्तिबोध थे, अमर उजाला (समाचार पत्र), 1 सितंबर, 2019.
  2.  बजरंग बिहारी तिवारी, दलित साहित्य एक अंतर्यात्रा, पृ. सं. 70
  3.  श्यौराज सिंह बेचैन, वह दलितों के मुक्तिबोध थे, अमर उजाला (समाचार पत्र), 1 सितंबर, 2019.
  4.  मलखान सिंह, सुनो ब्राह्मण (कविता संग्रह), पृ. सं. 15
  5.  कँवल भारती - दलित कविता का संघर्ष, पृ. सं. 211-212
  6.  कँवल भारती - दलित कविता का संघर्ष, पृ. सं. 212 
  7.  कँवल भारती - दलित कविता का संघर्ष, पृ. सं. 219
  8.  मलखान सिंह, सुनो ब्राह्मण (कविता संग्रह), पृ. सं. 18
  9.  कँवल भारती, दलित कविता का संघर्ष, पृ. सं. 207
  10.  मलखान सिंह, सुनो ब्राह्मण (कविता संग्रह), पृ. सं. 1-2
  11.  कँवल भारती - दलित कविता का संघर्ष, पृ. सं. 207
  12.  कँवल भारती - दलित कविता का संघर्ष, पृ. सं. 222
  13.  कँवल भारती - दलित कविता का संघर्ष, पृ. सं. 223
  14.  मलखान सिंह, सुनो ब्राह्मण (कविता संग्रह), पृ. सं. 37


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