कविता: सागर तोमर

शब्दों की उठा-पटक 
या उनसे कोई खिलवाड़ करना 
कविता नहीं है 
लिखने की धुन में उँगलियाँ दुखाना
कविता नहीं है 
छपने के लिए 
शब्दों का मकड़जाल बुनना
कविता नहीं है 
मंच लूटने के लिए 
अदाएँ दिखाना 
कविता नहीं है 
चैत को सावन या कि 
जेठ को असाढ़ या मँगसिर कहना 
कविता नहीं है 
किसी की कुर्सी का पाया बनने के लिए 
अपने पैर कटा देना
कविता नहीं है 
अपने थर्ड-क्लास मनोविज्ञान की पूर्ति के लिए 
किसी के लत्ते फाड़ना 
कविता नहीं है 
काव्यशास्त्र के भार के साथ 
हल्की हँसी पेश कर देना भी 
कविता नहीं है ... 

बल्कि 
अपने दिल को दिल बनाए रखना 
और 
किसी के अधूरे गीत को पूरा करना 
कविता है 
अक्सर दिखने वाले सपने को 
फिर से देखने की इच्छा करना 
और 
उसके पूरा हुए बिना भी संतुष्ट रहना 
कविता है 
किसी के गिरते हुए छप्पर को उठाना 
और 
नींद में हँसते बच्चे को देखकर ख़ुश होना 
कविता है 
पत्थर खाकर भी फल देना 
और 
दुनियादारी के बदले किसान-सा धीरज रखना 
कविता है! 

और ... 

अपनी असल रंगत बनाए रखना 
और ‘बाक़ायदा’ मरने से पहले 
जी लेना 
कविता है! 
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ग्राम: बाफ़र; पोस्ट: जानी ख़ुर्द; जनपद: मेरठ (उत्तर प्रदेश); पिन: 250501; चलभाष: +91 975 616 0288  

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