काव्य: तेजी सेठी

 तारीख़ 

तारीख दर तारीख 
याद कर लिया जाता है 
किसी दिन के रूप में हादसों को 

यहाँ बड़ा चलन है तारीख़ों का----

दर्ज हो जाती है ये किताबों के पन्नों पर 
इतिहास की मुँहबोली बहनें - अंकों में 

पिछले साल जलियाँवाला बाग़ नरसंहार 
की सौवीं सालगिरह थी 
बैसाखी तो हर साल आती है, फसलें भी पकती हैं
पर वैसी बैसाखी सिर्फ़ डायर की बंदूक़ से झड़ी थी
और उग गयी इतिहास में फसल की तरह
सींचता रहा कई नस्लों का लहू आखरों को पन्नों पर 
मनती रही सालगिरह सूनी कोख़ों की 
तारीख दर तारीख ...

ऐसी ही एक और तारीख़, कुछ ज़्यादा पुरानी नहीं
मेरी अपनी आँखों देखी है 
31 अक्टूबर 1984
एक साज़िश को हादसे का जामा पहनाया गया 
एक नया पन्ना खून से सना गया 
हर साल मनती है अब उसकी भी सालगिरह 
और उभर आती हैं यादें बदन पर छालों की तरह
चलता रहेगा यह सिल सिला साल दर साल 
फिर मनेगी इसकी भी शताब्दी किसी जलसे के रूप में

यहाँ बड़ा चलन है तारीख़ों का! 
***


रेफ़्यूजी

सुनने में कितना सरल लगता है शब्द – रेफ़्यूजी
मगर जब लग जाए वजूद से 
तो आपको एक लकीर के पार ला खड़ा करता है 
जहां आप निहत्थे एक ठूंठ की भाँति खड़े रहते हैं 
रेफयूजी कोई अलग नस्ल नहीं 
यही पनपती है – इसी धरती पर 

रेफ़्यूजी होने का दर्द 
एक पंजाबी की रगों में 
लहू की तरह दौड़ता है
यह तमग़ा वो न चाह कर भी
उमर भर लटकाए फिरता है सीने पर
अपनी मिट्टी से ऐसे अलग होता है 
जैसे एक बच्चा कट जाता है गर्भनाल से 

हाँ जिया है मैंने ऐसा दर्द - 
अपने माता पिता की आँखों में 
अपने दादा दादी के क़िस्सों में 
नहीं चाहती यह बंटवारा लिखा जाए 
इतिहास में 
उस बंटवारे की तरह
और फिर यहाँ तो मुल्क भी नहीं बँटा!
बस बाँट दिया उन्हें जिनके पास साधन नहीं थे 
खाने को निवाला 
तन ढँकने को कपड़ा 
और सर छिपाने को छत 
पता नहीं कब जिंदगी खानाबदोशों सी हो गयी इनकी

कुछ ऐसी सूनी आंखों में अगर सपने बो सकूँ
हाथ थाम कुछ लड़खड़ाते कदमों को 
अपनों के क़रीब ला सकूँ 
कुछ खेतों में फिर से फसल लहलहा सकूँ 
तो शायद अदना सा इंसान होने का फ़र्ज़ निभा सकूँ 
***


किसान की नियति

पंजाब की कोख से जन्मे 
अमृता प्रीतम और पाश जैसे व्यक्तित्व
जिन्होंने स्याही से बोए, शब्दों के बीज 
जिनके सत्त पर बुद्धिजीवी व क्रांतिकारी पले बढ़े हैं

उसी धरती ने पैदा किए हैं किसान 
जिन्होंने सींचा इस मिट्टी को अपने पसीने से 
उपजा अनाज जो लहू बन दौड़ रहा है 
उन्हीं बुद्धिजीवियों की रगों में 

नियति देखिये... 
अमृता और पाश ड्राइंग रूम की शैल्फ पर सजे हैं
किसान सड़कों पर बिछे हैं! 

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